बंगाल के विख्यात शिक्षाविद् पंडित मुखोपाध्याय से मिलने संस्कृत महाविद्यालय के शिक्षक पहुंचे l उन्होंने पंडित जी से कहा ---- " आप संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं , फिर आप अन्य की तरह दुर्गापूजा महोत्सव धूम -धाम से क्यों नहीं मनाते ? " पंडित जी ने उस समय तो उनके प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया , पर इस वार्तालाप के कुछ दिन बाद उन्होंने शिक्षा तथा संस्कृत के प्रचार -प्रसार के लिए निर्मित विश्वनाथ संस्कृत ट्रस्ट को डेढ़ लाख रूपये दान में दिए l वे शिक्षक इसी ट्रस्ट द्वारा निर्मित महाविद्यालय में कार्यरत थे l पंडित जी उन्हें संबोधित कर के बोले ---- " मैंने दुर्गा पूजा महोत्सव में धूम -धाम न कर के जो पैसे बचाए हैं , ये वही धन है l संस्कृत देववाणी है और माँ दुर्गा के महत्त्व को सामने लाने का श्रेय भी संस्कृत को है l यदि इस धन से संस्कृत की सेवा हो जाये , तो मेरे लिए वही दुर्गा पूजा है l
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