30 December 2022

WISDOM ----

    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- ' मानव जीवन  काल  और  कर्म  का  संयोग  है  l  हम  सब  को  जो  जीवन  मिला  है  , वह  काल  का  सुनिश्चित  खंड  है  l  इसी  काल  खंड  में  हमें   कर्म  करने  हैं  और  भोगने  हैं  l  काल  का  जो   वर्तमान  खंड  है  उसमें  हम  कर्म  करने  के  लिए  स्वतंत्र  हैं  l  इस  अवधि  में  हम  जो  भी  कर्म  करते  हैं   उनका  प्रभाव  केवल  वर्तमान काल  तक  ही  सीमित  नहीं  रहता  ,  वे  हमारे  भूतकाल  और  भविष्य  को  भी  प्रभावित  करते  हैं l  यदि  भूतकाल  में  हमसे  कुछ  गलतियाँ  हो  गईं , कुछ  अपराध  हो  गए   तो  वर्तमान  के  शुभ  कर्मों  से  उनका  प्रायश्चित   और  परिमार्जन  किया  जा  सकता  है  l  और  हमारे  वर्तमान  के  ये  शुभ  कर्म  हमारे  उज्ज्वल  भविष्य  का  निर्माण  करने  में  भी  समर्थ  हैं   l  '  आचार्य श्री  आगे  लिखते  हैं ---- जो  जीवन  के  इस  सच  से  सुपरिचित  हैं  ,  वे  जीवन  के  प्रत्येक  क्षण  का  सदुपयोग  करते  हैं  और  शुभ  कर्मों  के  संपादन  में  संलग्न  रहते  हैं   लेकिन  जो  अशुभ  कर्मों  की  डगर  पर  चल  पड़ता  है  ,  उसके  लिए  आदिशक्ति  के  महाकाली   स्वरुप  में  विनाश  प्रकट  हो  जाता  है  l  "    दुर्योधन  आदि  कौरवों  ने  सारा  जीवन  छल , कपट , षड्यंत्र  किया ,  वे  फरेबी , झूठे  व  अहंकारी  थे  l  उनके  जीवन  का  उदेश्य  अपने  को  स्थापित  करना  और  दूसरों  को  परेशान  करना  था  l  वे  घोर  अधर्मी  थे  इसलिए  महाभारत  के  युद्ध  में   महा पराक्रमी  भीष्म , द्रोणाचार्य  और  कर्ण   जैसे  महारथी  भी  दुर्योधन  को  विनाश  की  नियति  से  उबार  नहीं  सके  , कौरव  वंश  का  अंत  हो  गया  l  इसलिए  हमें  इस  सत्य  को  स्वीकार  करना  चाहिए  कि  हमारे  मन  के  तार  ईश्वर  से  जुड़े  हैं ,  हमारे  हर  कर्म  पर  उनकी  नजर  है  l  ईश्वर  केवल  हमारे  कर्मों  को  ही  नहीं  जानते  बल्कि  हमारे  मन  में  क्या  चल  रहा  है , हमारी  भावना  क्या  है  , हम  क्या  सोच  रहे  हैं  , इन  सब  की  हर  पल  की  खबर  ईश्वर  को  है  l  

29 December 2022

WISDOM ----

   लघु -कथा --- एक  बार  एक  राजा  ने   मंत्री  ने  प्रश्न  किया  कि  ,  क्या  गृहस्थ  में  रहकर  भी  ईश्वर  को  प्राप्त  किया  जा  सकता  है  ?   मंत्री  ने  कहा  --हाँ  ऐसा  संभव  है  लेकिन  इस  प्रश्न  का   उत्तर  समझकर , सही  तरीके  से  एक  महात्मा  दे  सकते  हैं  जो   गोदावरी  नदी  के  पास  एक  घने  वन  में  रहते  हैं  l  राजा  अपने  प्रश्न  का  उत्तर  पाने  के  लिए  दूसरे  दिन   मंत्री  को  साथ  लेकर  महात्मा  से  मिलने  चल  दिए  ल  दो -चार  कदम  चलकर  मंत्री  ने  राजा  से  कहा --- " महाराज  !  ऐसा  नियम  है  कि  जो  महात्मा  से  मिलने  जाता  है  , वह  रास्ते  में  चलते  हुए   कीड़े -मकोड़ों  को  बचाता  चलता  है  l  यदि  एक  भी  कीड़ा  पांव  से  कुचल  जाए  तो  महात्मा जी श्राप  दे  देते  हैं  l  राजा  ने  मंत्री  की  बात  स्वीकार  कर  ली   और  खूब  ध्यानपूर्वक   आगे   की  जमीन  देख -देखकर  पांव  रखने  लगे  l  इस  प्रकार  सावधानी पूर्वक   चलते  हुए  वे  महात्मा जी  के  पास  पहुंचे  l   महात्मा  ने  दोनों  को  सम्मान पूर्वक  बैठाया   और  राजा  से  पूछा ---l  राजन !  आपने  रास्ते  में  क्या -क्या  देखा  l  राजा  ने  कहा ---  भगवान  !  मैं  तो  आपके  श्राप  के  डर  से    रास्ते   भर  कीड़े -  मकोड़ों  के  देखता  और  उन्हें  बचाता  आया  l   इसलिए  मनेर  ध्यान  दूसरी  ओर  गया  ही  नहीं   l  रास्ते  के  द्रश्यों  के  बारे  में  मुझे  कुछ  मालूम  नहीं  l  "   महात्मा  ने  कहा --- "  यही  तुम्हारे  प्रश्न  का  उत्तर  है  l  जिस  तरह  मेरे  श्राप  से  डरते  हुए  तुम  यहाँ  तक  आए  , उसी  तरह  ईश्वर   के  दंड   से  डरना  चाहिए  l   कीड़ों  को  बचाते  हुए  जैसे  चले ,  उसी  प्रकार  दुष्कर्मों  से   बचते  चलना  चाहिए  l  रास्ते  में  अनेक  द्रश्यों   के  होते  हुए  भी  वे  दिखाई  न  पड़ें  l  उनके  आकर्षण  में   उलझो  नहीं  l  जिस  सावधानी  से  तुम  मेरे  पास  आए  हो  उसी  सावधानी  के  साथ  जीवन  क्रम  चलाओ  तो  गृहस्थ  में  रहते  हुए  भी  ईश्वर  को  प्राप्त  कर  सकते  हो  l  "   राजा  को   अपने  प्रश्न  का  उत्तर  मिल  गया   और   उसने  महात्मा जी  के  बताए  मार्ग  पर  चलने  का  प्रयास  शुरू  किया  l 

26 December 2022

WISDOM ---

 जब  संसार  में  पाप  बहुत  बढ़  जाता  है   और  उससे  भी  बढ़कर   जब  गलत  कार्य  करने  वालों  को  समाज  मान्यता  देता  है ,  उनको  सम्मान  देता  है , उनसे  संरक्षण  प्राप्त  करता  है    तब  प्रकृति न्याय  करती  है  l  प्राकृतिक  प्रकोप , आपदाएं ,  भूकंप ,  तूफान , महामारी  आदि  के  विज्ञानं  कितने  भी  कारण  बताए  लेकिन  ये  प्रकृति  द्वारा  दिया  गया  सामूहिक  दंड  विधान  है  l  इसलिए  हमारे  ऋषियों  ने  सत्कर्म  करने  पर  जोर  दिया  है  l  श्रेष्ठ  कर्मों  से , मन्त्र -जप  आदि  करने  से  प्रकृति  को  पोषण  मिलता  है   और  सत्कर्म  ढाल  बनकर  व्यक्ति  की  रक्षा  करते  हैं  l  

WISDOM

   लघु -कथा --- युवराज  भद्र्बाहू   अत्यंत  सुन्दर  थे  , उन्हें  इस  सुन्दरता  का  अभिमान  भी  था  l  एक  बार  वे  मंत्री पुत्र  सुकेश  के  साथ  भ्रमण  पर  निकले  l  एक  स्थान  पर  शवदाह  हो  रहा  था  l   राजकुमार  ने  पूछा --- " यह  क्या  हो  रहा  है  ? " सुकेश  ने  कहा --- " यहाँ  मृत  व्यक्ति  का  डाह संस्कार  हो  रहा  है  l " राजकुमार  ने  कहा --- " अवश्य  ही  वह  कुरूप  होगा  l "   सुकेश  ने  कहा --- 'नहीं , मरने  पर  पोरात्येक  व्यक्ति  का  शरीर  सड़ने -गलने  लगता  है  , इसलिए  उसे  जला  देना  पड़ता  है  l '  यह  सुनकर  भद्रबाहु  का  सुन्दरता  का  दर्प  चूर -चूर  हो  गया   और  वह  उदास  रहने  लगे  l  राजा  और  राजगुरु  ने  उनकी  उदासी  दूर  करने  की  बहुत  कोशिश  की  किन्तु  कोई  सफलता   हाथ  न  लगी  l  राजगुरु  युवराज  को  महा आचार्य  के  पास  ले  गए   ल  महाचार्य  ने  युवराज  से  कहा --- " तुम  इस  शरीर  के  अंतिम  परिणाम  की  चिंता  से  व्यथित  हो  ?   आज  तुम  जिस  भवन  के  स्वामी  हो   उसके  जीर्ण  होने  पर  तुम  अन्यत्र   निवास  करोगे  l  यही  नियम  शरीर  पर  भी   लागू    होता  है  l   यदि  यह  शरीर  जीर्ण  हो  जाये  तो  इसमें  रहने  वाली  आत्मा  शरीर  त्याग  देती  है   और  तब  इस  शरीर  को  नष्ट  कर  दिया  जाता  है  l  आत्मा  के  विकास  हेतु  यह  शरीर  उपकरण  मात्र  है   उसके  लिए  चिंतित  न  हो  l  श्रेष्ठ  और  शुभ  कर्मों  से  जीवन  को  सार्थक  करो  l  " 

25 December 2022

WISDOM -----

    ' मृत्यु  अटल  सत्य  है '  लेकिन  संसार  का  प्रत्येक  प्राणी  चाहे  वह  पशु -पक्षी  हो , कीट -पतंगे  हो  , जल , थल  और  नभ  में  रहने  वाला  कोई  भी  प्राणी  हो  सबको  अपने  शरीर  से  बहुत  मोह  होता  है ,  कोई  मरना  नहीं  चाहता l   मनुष्य  तो  एक  बुद्धिमान  प्राणी  है  , वह  चाहे  कितना  भी  बीमार  हो , गरीब  हो , शरीर  सूख  गया  हो   लेकिन  कोई  मरना  नहीं  चाहता , सब  जीना  चाहते  हैं  l  संसार  में  आकर्षण  बहुत  है   और   ' मोह ' है  अपने  से  और  अपनों  से  l   पुराण  की  एक  कथा  है -----  महाराज  प्रद्युम्न  का  रोग  बहुत  बढ़  गया ,  उनका  अंत  निकट  आ  गया  , सभी  वैद्य  निराश  होकर   अपने  घर  लौट  गए  l  राज परिवार  बहुत  परेशान  था , कैसे  भी  हो  राजा  को  बचाया  जाये  l  प्रधान  सचिव  ने   परामर्श  कर  आचार्य  पुरन्ध्र  को  बुलवाया  l   आचार्य  ने  महाराज  का  पूर्ण  परिक्षण  किया  और  कहा  कि  अब  उनमे  जीवन  के  कोई  लक्ष्ण  शेष  नहीं  हैं  l   लेकिन  राज परिवार  हठ  करने  लगा  कि  आप  तो  सिद्ध  पुरुष  हैं  , कैसे  भी  महाराज  को  बचाइए  !  आचार्य  ने  बहुत  समझाया  कि  आज  बच  भी  गए  तो  यह  जर्जर  शरीर  कब  तक  चलेगा  , एक  दिन  तो  जाना  ही  है  l  फिर  यह  शरीर  छूता  तो  एक  नया  शरीर  मिलेगा  l  आचार्य  के  उपदेश  को  किसी  ने  नहीं  सुना , समझा  !  तब  आचार्य  ने  कहा --- हाँ , एक  उपाय  है  , प्रधान सचिव   , आप  प्रयत्न  करें  तो  महाराज  के  प्राण   अभी  बच   सकते  हैं   l '   उन्होंने  कहा --- आगया  दें  , हम  महाराज  के  लिए  सब  कुछ  करने  को  तैयार  हैं  l '  तब  आचार्य  ने  कहा ---- " महाराज  को  अभी  मर  जाने  दो  l  थोड़ी  देर  में  ही  राजोद्यान  में   आम  का  एक  वृक्ष  है  , ये  उसमे  काष्ठ -कीट  के  रूप  में  जन्म  लेंगे  l  आप  उसे  जा  कर  मार  देना  तो  महाराज  पुन:  जीवित  हो  उठेंगे  l "  सब  लोग  बहुत  प्रसन्न  हुए  और  आचार्य   के  गुण  गाने  लगे  l  इस  बीच  महाराज  को  प्राणांत  हो  गया   l  शव  को  ढककर  प्रधान सचिव  राजोद्यान  पहुंचे  l  थोड़ी  ही  देर  में  आचार्य  ने  जैसा  बताया  था   वैसा  ही  एक  कष्ट कीड़ा  दिखाई  दिया , प्रधान सचिव  उसे  पकड़ने  के  लिए  पेड़  पर  चढ़े  l  लेकिन  कीड़ा  अपनी  जान  बचाने  के  लिए  एक  डाल  से  दूसरी  पर  जाता  रहा   और  फिर  इस  पेड़  से  दुसरे  पेड़  पर  छलांग  लगा  ली  l  प्रधान  ने  बहुत  पीछा  किया  लेकिन  पकड़  न  सके  , निराश  हो  गए  l  आचार्य  ने  कहा --- कीड़े  को  अपने  शरीर  से  इतना  मोह  है  कि  वह  इसे  त्यागकर  राजा  बनना  नहीं  चाहता  l  आचार्य  ने  अपनी  दिव्य  शक्ति  से  उसके  मन  की  बात  पता  की  और  कहा  कि  यह  कीड़ा  अपने  शरीर   में    प्रसन्न  है , उसे  इससे  मोह  है ,  उसे  अपने  कीट  समुदाय  में  भी  सब  सुख  हैं , भोग  विलास  सब  है  , वह  इसे  त्यागना  नहीं  चाहता   इसलिए  जान  बचाने  के  लिए  भाग  रहा  है  l  आचार्य  ने  कहा --इसी  तरह  हम  भी  एक  अच्छे  और  नए  जीवन  के  लिए  भी  डरते  हैं  , शरीर  को  त्यागना  नहीं  चाहते  है  l  आचार्य  की  बात  सुनकर  सबका  मोह  टूटा  और  मृत्यु  को  अटल  मानकर  वे  दाह -संस्कार  की  तैयारी  में  जुट  गए  l  

24 December 2022

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- " हिरन , हाथी , पतंगा , मछली  और  भौंरा   ये  अपने -अपने  स्वाभाव  के  कारण   पांच  विषयों  में  से   केवल  एक  से  आसक्त   होने  के  कारण   मृत्यु  को  प्राप्त  होते  हैं  , तो  इन  पांच  विषयों  में  जकड़ा  हुआ  असंयमी  पुरुष   कैसे  बच  सकता  है  l  असंयमी  की  दुर्गति  निश्चित  है  l  "  श्रीमद्भगवद्गीता   में  भगवान  कहते  हैं ---- " जैसे  जल  में  चलने  वाली  नाव  को  वायु  हर  लेती  है  , वैसे  ही  विषयों  में  विचरती  हुई  इन्द्रियों  में  से  मन  जिस  इन्द्रिय  के  साथ  रहता  है  , वह  एक  ही  इंद्रिय  इस  आयुक्त  पुरुष  की  बुद्धि  को  हर  लेती  है  l  '    आचार्य श्री ,   लिखते  हैं  --- इसका  अर्थ  यह  हुआ  कि   मनुष्य  को  बहुत  सावधान  रहना  चाहिए   l   एक  ही  इंद्रिय  काफी  है  , जो  मनुष्य  को  पतन  की  ओर  ले  जा  सकती  है  l   द्वापर युग  में  एक  असुर  था  , जिसका  नाम  था  शम्बरासुर  l  शम्बरासुर  ने  भगवान  श्रीकृष्ण  के  बड़े  पुत्र  प्रद्युम्न   जो  कामदेव  के  अवतार  थे , उनका  हरण  कर  लिया  था  l  रति  भी  उनके  यहाँ  कैद  थी  l  शंबरासुर   पाककला  में  निपुण  स्त्रियों  का  ही  अधिकतर  हरण  करता  था  l  उसे  खाने  का  बड़ा  शौक  था  l  वह  चाहता  था  कि  उसकी  पाकशाला  में  बढ़िया  स्वादिष्ट  खाना  बने   और  उसे  खिलाया  जाये  l  वह  किसी  स्त्री  की  खूबसूरती  को  नहीं  देखता  था   और  न  ही  उन्हें  हाथ  लगाता  था  l  उस  स्त्री  का  पाक कला  में  पारंगत  होना  जरुरी  था  l  प्रद्युम्न  ने  उसे  मारकर   अगणित  स्त्रियों  को  मुक्त   किया  l  मात्र  एक  इंद्रिय  ही   उस  असुर  के  पतन  का   कारण  बनी --- सुस्वादु  आहार  का  सेवन , दिन -रात  उसी  का  चिन्तन  l   प्रत्येक  मनुष्य  को  स्वयं  अपना  ही   परीक्षण  करना  चाहिए  l  आचार्य जी  लिखते  हैं ---' अपनी  दुष्प्रवृतियों  को  नियंत्रित  कर  लेना  ही  साधना  है  l  '

22 December 2022

WISDOM ----

    जब  संसार  में  धर्म  एक  व्यवसाय  बन  जाता  है   तब  सामान्य  जन -जीवन   दुःख , तनाव , चिंता , बीमारी , महामारी  जैसी  समस्याओं  से    चारों  ओर  से  घिर  जाता  है  l  धर्म  के  नाम  पर लड़ाई -झगडे  करते  रहने  से  बुद्धि  कुंद  हो  जाती  है   l  जीवन  के  और  भी  बहुत  से  पहलू   हैं   जिनमे   थोड़ा   -बहुत  सुधार  कर  के  स्वस्थ  जीवन  जिया  जा  सकता  है  l  पढना - लिखना , डिग्री  होना  एक  अलग  बात  है , लेकिन  विवेक  होना  बड़ी  बात  है   और  विवेकहीन  व्यक्ति  भेड़चाल  चलता  है  l  धर्म  के  संबंध  में  एक  दुःखद   बात  यह  भी  है  कि  धर्म  केवल  पाखंड  बन  गया  है l  धर्म  का  असली  मर्म    नैतिकता , मानवीयता , सत्य , ईमानदारी , प्रेम ,  करुणा   आदि  सद्गुणों  को  लोग  भूल  गए  हैं  इसीलिए  संसार  में  युद्ध , आतंक , लूट , हत्या ,  आत्महत्या , विवाद  आदि  बढ़  गए  हैं  l  ------ कांचीपुरम  में  किसी  ने  विनोबा जी  से  कहा  कि  यहाँ  एक  ऐसा  समुदाय  है  ,  जो  ईश्वर  को   नहीं  मानता  l   वे  कहने  लगे --- " इसमें   कौन  सी  नई  बात  है  !  ऐसे  आदमी  सारे  देश  में  हैं  , सारी  दुनिया  में  हैं  l  हमें  इसकी  कोई  परवाह  नहीं  करनी  चाहिए  , क्योंकि  वे  लोग  भगवान  को  भले  ही  नहीं  माने, भगवान  तो  उनको  मानता  है  l  बच्चा  माँ  को  भूल  जाये   तो  कोई  बात  नहीं  l  माँ  बच्चे  को  भूल  जाये  , तो  बड़ी  बात  है  l  आगे  वे  कहते  हैं  कि  --- " जो   यह  कहते  हैं  कि  हम  भगवान  को  नहीं  मानते  , वे  यह  तो  कहते  हैं  कि  हम  सज्जनता  को  मानते  हैं  , मानवता  को  मानते  हैं  l  हमारे  लिए  तो  इतना  ही  बहुत  है  l  मानवता  को  मानना   और  ईश्वर  को  मानना  हमारी  द्रष्टि  में  एक  ही  बात  है  l  जो  भगवान  को  मानते  हैं  ,  देखना  चाहिए  कि  वे  मानवता , करुणा , दया , सेवा  में  कितना  विश्वास  रखते  हैं  l   मूल्यांकन    इसी  आधार  पर  होना  चाहिए  l                                                                                               विज्ञान  ने  इतनी  तरक्की  कर  ली  कि   अब  मनुष्य  स्वयं  को  ही  भगवान  समझने  लगा  है  , चाहे  जिस   आकार -प्रकार  की  सब्जी , फल  उगा  ले  , चिकित्सा  के  आधुनिक  तरीकों  से  सबको  स्वस्थ  कर  दे   लेकिन   ऐसा  समझना  मनुष्य  की  सबसे  बड़ी  भूल  है  l  भोजन सामग्री , मिटटी  सब  रासायनिक  पदार्थों  से  प्रदूषित  हो  गई  l  अब  किसी  की  सामान्य  मृत्यु  हो  , यह  तो  सुनने  में  नहीं  आता  l  जो  भी  मरता  है  वह  किसी  न  किसी  बीमारी   या  हादसे  से  ही  मृत्यु  को  प्राप्त  होता  है   l  यह  चिन्तन  का  विषय  है  कि  यह  कैसी  उपलब्धि  है  ?  

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21 December 2022

WISDOM ----

 ज्योतिर्मठ  के  शंकराचार्य   के  शिष्य  कृष्ण  बोधाश्रम  120 वर्ष  जीवित  रहे  l  एक  बार  वे   प्रवास  पर  थे  l  उस  इलाके  में  लगातार  चार  साल  पानी  नहीं  गिरा  था  l  कुएं  , तालाबों  का  पानी  सूख  गया  था  l  सभी  आए  और  कहा --- महाराज  जी  !  उपाय  बताएं   l "  वे  बोले  --- पुण्य  होंगे   तो  भगवान  प्रसन्न  होंगे  l "  लोगों  ने  पूछा --- 'क्या  पुण्य  करें   ?  तो  वे  बोले ---" सामने   तालाब  है  ,  उसमें  थोडा  ही  पानी  है   इस  कारण  मछलियाँ  मर  रही  हैं  l " लोग  बोले --- " हमारे  लिए  पानी  नहीं  हैं है  , मछलियों  को  पानी  कहाँ  से  दे.  l "  महाराज  ने  कहा --- " कहीं  से  भी  लाओ  और   तालाब  में  डालो  l  सभी  ने  तालाब  में  पानी  डालना  शुरू    किया  l  तीसरे  दिन   बादल  आए  और   महीने  भर  तक   मूसलाधार  पानी  बरसा  l  

20 December 2022

WISDOM ----

   एक  बादशाह  अपने  गुलाम  के  साथ  नाव  में  यात्रा  कर  रहा  था  l   गुलाम  ने  कभी  नौका  में  सफ़र  नहीं  किया  था  , इसलिए  उसे  कुछ  अटपटा  लग  रहा  था     वह  उन्मत्त  बन्दर  की  भांति नाव  में  उछल -कूद  मचा  रहा  था  l   इससे  सभी  लोग   परेशान   हो  रहे  थे  l  मल्लाह  ने  उसे  कई  बार  समझाया   कि  इस  तरह  नाव  डूब  सकती  है   लेकिन   उसकी    समझ  में  कुछ  न  आया   नाव  में  एक  दार्शनिक  भी  था  , उसने  बादशाह  से  कहा --" जहाँपनाह  ,  आप  इजाजत  दें  तो  मैं   इस  गुलाम  को  भीगी  बिल्ली  बना  सकता  हूँ   l "  बादशाह  ने  तत्काल  अनुमति  दे  दी  l   दार्शनिक  ने  दो  यात्रियों  का  सहारा  लिया   और  उस  गुलाम  को   नाव  से  उठाकर  नदी  में  फेंक  दिया  l  गुलाम  को  तैरना  नहीं  आता  था  , जब  डूबने  लगा  तो  उसने  नाव  के  खूंटे  को  कसकर  पकड़  लिया  l  कुछ  देर  बाद  दार्शनिक  ने  उसे  खींचकर  नाव  में  चढ़ा  लिया  l  वह  गुलाम  अब   कोने  में  जाकर  ऐसे  चुपचाप  बैठ  गया  मानो  भीगी  बिल्ली  हो  l  नाव  के  यात्रियों  और  बादशाह  को  भी  गुलाम  के  इस  संयमित  व्यवहार  पर  आश्चर्य  हुआ  l  बादशाह  ने  दार्शनिक  से  पूछा  ---  'यह  पहले  उन्मत्त  बन्दर  की  भांति   हरकतें  कर  रहा  था  , अब  इतना  सयाना  बनकर  कैसे  बैठा  है  l  दार्शनिक  ने  जवाब  दिया  --- " स्वयं  आपत्ति  और  दुःख  का  स्वाद  चखे  बिना   किसी  को  पराये  दुःख  और  विपत्ति  का  एहसास  नहीं  होता  l  इस  गुलाम  को  जब  मैंने  पानी  में  फेंक  दिया   और  इसके  मुंह  में  पानी  भरने  लगा   तब  इसे  पता  चला  कि  नाव  डूब  गई  तो  सब  यात्रियों   की  क्या  हालत  होगी  l 

WISDOM

   दूध  ने  पानी  से  कहा --- बन्धु, किसी  मित्र  के  बिना  मेरा  ह्रदय  सूना  है  l  आओ  मैं  तुम्हे  ह्रदय  से  लगा  लेना  चाहता  हूँ   l   पानी  ने  कहा --- भाई , तुम्हारी  बात  तो  मुझे  पसंद  है  , पर  यकीन    नहीं  होता  कि   अग्नि  परीक्षा  के  समय  भी   तुम  मुझसे  अलग  न  होगे  l  दूध  ने  वचन  दिया  --ऐसा  ही  होगा   और  दोनों  में  मित्रता  हो  गई  ,  ऐसी  कि  उनके  पृथक  स्वरुप  को  पहचानना  कठिन  हो  गया  l  अग्नि  हर  रोज  परीक्षा  लेती  है   और  पानी  को  जलाती  है  ,  पर  दूध  है  कि   वह  हर  बार  मित्र  की  रक्षा  के  लिए   अपने  आप  को  जला  देता  है  l  दूध  और  पानी  जैसा  मेल  ही   मनुष्य  के  पारिवारिक  और  सामाजिक  जीवन  को  सफल   बनाता  है  l  


19 December 2022

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- ' संकीर्ण  स्वार्थ , वासना  और  अहं  से  युक्त  अनैतिक  जीवन   भय  का  प्रमुख  कारण  है  l '  पद -प्रतिष्ठा , धन , वैभव  जिनके  पास  है   वे  सबसे  ज्यादा  भयभीत  हैं  l  मनुष्य  का  मन  एक  दर्पण  है  l  बहुत  कुछ  हासिल  करने  के  लिए  वह  जो  तरीके  अपनाता  है   या  जाने -अनजाने  उससे  जो  भूलें  हो  जाती  हैं   उन्हें  वह  संसार  से  चाहे  छुपा  ले  ,  लेकिन  उसकी  आत्मा  उन  गलतियों  के  लिए  उसे  सदा  कचोटती  रहती  है  l  यह  भय  उसका  अपने  आप  से  है   कि  जैसा  उसने  किया  , कहीं  वैसा  उसके  साथ  न  हो  जाये  l  प्रकृति  का  न्याय  है  l  एक  और  भय   है  --वह  है ---- खोने  का  भय  l   पद , प्रतिष्ठा , धन - वैभव   आदि  को  अपने  पास  बनाये  रखने  के  लिए  व्यक्ति  न  जाने  क्या -क्या  यत्न  करता  है  l  इन  सबसे  बढ़कर  है  --मृत्यु  का  भय  l  इस  भय  का  कोई  अर्थ  नहीं  है  क्योंकि  यह  तो  निश्चित  है  , ईश्वर  ने  सबको  गिनकर   श्वास  दी  हैं    , इन्हें  कम  या  अधिक  नहीं  किया  जा  सकता  l  एक  कथा  है ----  एक  राजा  को  सदा  यह  भय  सताता  रहता  था  कि  कहीं  कोई  शत्रु  उस  पर  हमला  न  कर  दे  l  इसलिए  उसने  किले  के  चारों  ओर  बड़ी -बड़ी  दीवारों  का  निर्माण  कराया  , जिनके  बीच  में  गहरी  खाइयाँ  थीं  l  सुरक्षा  का  घेरा  इतना  मजबूत  बनाया  कि  कोई  शत्रु  उसे  मारने  के  लिए  प्रवेश  न  कर  सके  l   अपनी  उपलब्धि  पर  कुलगुरु  की  स्वीकृति  प्राप्त  करने  के  लिए   उसने  उनको  महल  में  आमंत्रित  किया  l  कुलगुरु  ने  पूरा  महल  देखा  , फिर  राजा  से  बोले ---- " राजन  !  यह  तो  ठीक  है  कि  अब  इस  महल  में  कोई  शत्रु  प्रवेश  नहीं  कर  सकता  ,  परन्तु  मृत्यु  को  आने -जाने  के  लिए  द्वार  की  आवश्यकता  नहीं  होती  l  उसका  आना  रोकने  के  लिए  तुमने  क्या  व्यवस्था  की  है  ?  निरंतर  सत्कर्म  करो  और  सन्मार्ग  पर  चलो  l  यही  सत्कर्म  ढाल  बनकर  व्यक्ति  की  रक्षा  करते  हैं  l "  अब  राजा  को  अपनी  भूल  समझ  में  आई   कि  बाहर  के  उपाय  तो   मात्र  मन  की  सांत्वना  के  लिए  हैं  l  

WISDOM -----

   संसार  में  अनेक  जाति , अनेक  धर्म  और  अनेक  संस्कृतियाँ  हैं   और  आज  सभी  अपने  अस्तित्व  के  लिए  प्रयत्नशील  हैं  l  संसार  की  अनेक  सभ्यता , संस्कृति  समय  के  साथ  काल  के  गाल  में  समां  गईं  लेकिन  भारतीय  संस्कृति  अभी  तक    जीवित  है  l  इसे  नष्ट  करने  के  अनेकों  प्रयास  किए  गए   लेकिन  हमारे  पास   नैतिक  बल  था , श्रेष्ठ  चरित्र  था   इसलिए  यह  संस्कृति  जीवित  रही   लेकिन  अब  प्रचार -प्रसार  के  साधनों  के  कारण  आसुरी  तत्वों  को   इस  देश  के  चरित्र  पर  आक्रमण  करने  का  सुनहरा  मौका  मिल  गया  l   ये  आसुरी  तत्व   संसार  में  कहीं  भी  हो  सकते  हैं   जो  अच्छाई  को  बर्दाश्त  नहीं  करते   और   मनुष्य  की  मानसिक  कमजोरियों  जैसे  लोभ , लालच , तृष्णा , महत्वकांक्षा, कामना   आदि   का  सहारा  लेकर  उसके  नैतिक  बल  को   कम  कर  देते  हैं  l  जागरूक  रहकर  ही  अस्तित्व  की  रक्षा  संभव  है , भगवान  बार -बार  अवतार  नहीं  लेते  l 

18 December 2022

WISDOM ----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " संवेदना  की  गहरी  नींव  में  संबंधों  का  भव्य  महल  खड़ा  होता  है  l  मानव  जीवन  में  पनपने  वाला  संबंध   भावनाओं  के  तल  पर  उपजता  है  l  भावनाओं  की  परिष्कृति  एवं  स्थिरता  संबंधों  को  स्वस्थ   एवं    सुद्रढ़  बनाती  है  l  यदि  संबंध  अच्छे  होते  हैं   तो  जीवन  की  सुन्दरता , खूबसूरती  बढ़  जाती  है   और  यदि  संबंधों  में  कटुता  पनपती  है   तो  जीवन  नरकतुल्य  और  अर्थहीन  लगता  है  l  "  आचार्य श्री  लिखते  हैं  --- 'आज  भावनाओं  की  सार्थकता  खो  गई  है  , आज  का  सबसे  बड़ा  दुर्भिक्ष  भावनाओं  के  क्षेत्र  का  है  l  इसी  के  कारण  जीवन  के  प्रत्येक  क्षेत्र  में  समस्याएं  उत्पन्न  हुई  हैं  l "                          आज  की  संस्कृति  भोग प्रधान  है  l  मनुष्य  का  लालच , कामनाएं  , वासना  , तृष्णा  , महत्वाकांक्षा  आदि  मानसिक  विकार  अपने  चरम  पर  हैं   जिसके   नीचे  भावनाएं  कुचल  गई  हैं  l  भौतिक  प्रगति  तो  बहुत  हुई  लेकिन  चेतना  के  स्तर  पर  मनुष्य  पशु  और  कहीं  तो  नर पिशाच   है  l     भावनाएं  जाति , धर्म , प्रेम विवाह , अरेंज मैरिज , अंतर्जातीय  विवाह  आदि   के  कारण  परिष्कृत  या  विकृत  नहीं  होतीं  l  माता -पिता  बहुत  सोच समझकर  अपनी  पुत्री  का  विवाह  करते  हैं   , तब  भी  घरेलु  हिंसा ,  उत्पीड़न , दहेज़ हत्या ,  चारित्रिक  कमियां  आदि   अनेक  जटिल  समस्याएं  संतान  के  जीवन  में  आती  हैं  l   भावनाओं  का  सीधा  संबंध  विचारों  से  है  l  आज  सम्पूर्ण  समाज  का  वातावरण  जहरीला  हो   चुका  है  l  फिल्मों  के  माध्यम  से  जो  अश्लीलता  और  अपराध  के  नए -नए  तरीके   समाज  के  सामने  आते  हैं  उससे  क्या  बच्चे  और  क्या  वृद्ध   सबके  विचार  विकृत  हो  गए  हैं  l  प्रौढ़  हों  या  वृद्ध  हों  , उन्हें  लगता  है  जीवन  कब  हाथ  से  फिसल  जाये  ,  कितना  सुख  और  भोग  लें  l  उनमें  त्याग   की  भावना  ही  नहीं  है  l  बच्चों   और  युवाओं  को  दिशा  कौन  दे  l   आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- चिन्तन  परिक्षेत्र  बंजर  हो  जाने  के  कारण  कार्य  भी  नागफनी  और    बबूल   जैसे  हो  रहे  हैं  l '   समस्या  का  समाधान  भी  हमारे  ही  पास  है -- जब  हम   विदेशियों  की  नक़ल  करने  के  बजाय   अपनी  संस्कृति , अपने  आचार -विचार , अपना  रहन -सहन  और   शिक्षा , चिकित्सा , कृषि  आदि  सभी  क्षेत्रों  में   जब  हम  अपनी  संस्कृति , अपनी  मिटटी  के  अनुरूप  कार्य  करेंगे   तभी  स्वस्थ  और  सुन्दर  समाज  का  निर्माण  होगा   l 

16 December 2022

WISDOM -----

 हमारे  महाकाव्य  हमें  जीवन  जीना  सिखाते  हैं  l  महर्षि  वाल्मीकिजी  ने  रामायण  की  रचना  की  l  वे  त्रिकालदर्शी  थे  ,  वे  जानते  थे  कि  सोने  की  लंका  में  रहने  वाले  रावण  के  परिवार  की  जो  समस्या  है  , वह  कलियुग  में  घर -घर  में  होगी  l   हम  इनका  जितना  अध्ययन  करेंगे  , हमें  जीवन  जीने  के  विभिन्न  सूत्रों  का  ज्ञान  होगा  l  रामायण  का  प्रसंग  है  ---- जब  विभीषण  ने  रावण  को  समझाया   कि  माँ  सीता  स्वयं  जगदम्बा  है  ,   रावण  का  यह  हठ  उचित  नहीं  है  l  तब  रावण  ने  भरी  सभा  में  विभीषण  को  लात  मारी , अपमानित  किया  l  फिर   विभीषण  ने  रावण  को  त्याग  दिया  और  भगवान  राम  की  शरण  में  आ  गया  l  आज  के  युग  में  हम  देखते  हैं  कि  भाई -भाई  में  विवाद  है  , पारिवारिक  विवादों  के  केस  से  ही  अदालतें  भरी  हैं  ,  घरेलू  हिंसा , उत्पीड़न  है  , जीवन  सुरक्षित  नहीं  है  , अब  मनुष्य , मनुष्य  से  ही   भयभीत  है  l  ऐसे  में  विभीषण  का  चरित्र  हमारी  आँखें  खोलने  के  लिए  है  l  यह  प्रसंग  हमें  शिक्षा  देता  है  कि  जो  अत्याचारी  है , अन्यायी  है   उसे  त्याग  दो   फिर  चाहे  वह  रिश्ते  में  कोई  भी  हो  l  जिस  व्यक्ति  के  पास   अपार  सम्पदा  है , विद्वान्  भी  है  लेकिन  वह   अत्याचारी  है , दूसरे  की  पत्नी  पर  कुद्रष्टि  रखता  है  l  वन  के  कष्टों  में  भी  राम -सीता  प्रेम  से  रहते  थे  , रावण  ने   उन्हें  एक  दूसरे  से  दूर  कर  दिया  , ऐसे  अत्याचारी  का  त्याग  करना  ही  उचित  है  l  आज  तो  अत्याचार  के  विभिन्न  रूप , विभिन्न  तरीके  समाज  में  हैं   इसलिए  जागरूक  रहकर  ऐसे  रावण   को  त्याग  देना  जरुरी  है  l  विभीषण  का  चरित्र  एक  बात  और  सिखाता  है  कि  जब  दसों  दिशाओं  में  रावण  का  अत्याचार  है  ,  आतंक  है  ,  तब  जाएँ  तो  जाएँ  जहाँ  ?  एकमात्र  ईश्वर  की  शरण  में  रहो  , अपने  आत्मविश्वास  को  जगाओ  l  जो  ईश्वर  की  शरण  में  रहेगा  उसका  राजतिलक  होगा   और  जो  अत्याचारी , अन्यायी  का  साथ  देगा   उसकी  दुर्गति  और  अंत  निश्चित  है  l  सूपर्णखा  रावण  का  आदेश  मानकर  राम , लक्ष्मण  को  लुभाने  गई  तो  अपने  नाक , कान  कटवा  बैठी , पापी  का  साथ  देने  से  दुर्गति  हुई  l  विभीषण  का  चरित्र  हमें  सिखाता  है  कि  जागरूक  रहकर   और  समय  पर    सही  निर्णय  लेकर  हम  भविष्य  में  आने  वाली  विभिन्न   समस्याओं  से  स्वयं  को  सुरक्षित  कर  सकते  हैं  l  

WISDOM----

   पं.श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- विनम्रता  व्यक्ति  को   ग्रहणशील , संवेदनशील   बनाती  है  l  विनम्रता  से  व्यक्ति  का  विवेक  जाग्रत  होता  है  , वह  औचित्य् पूर्ण  कार्य  कर  पाता  है  l  विनम्रता  से  ही  व्यक्ति  के  अंदर  सद्गुणों  का  समावेश  होता  है  l '  ये  सद्गुण  ही  व्यक्ति  को   महानता  के  पथ  पर  ले  जाते  हैं   l  पुराण  की  एक  कथा  है ----- किसी  समय   भीलों  की  शबर  जाति  में   कृपालु  नाम  का  व्यक्ति  था  जो   ' वृक्ष  नमन '  मन्त्र विद्या  जानता  था  l  यह  मन्त्र  उसके  अलावा  केवल   उसके  पुत्र  को  ही  पता  था  l   उसकी  विद्या  में  ऐसा  प्रभाव  था  कि  खजूर  के   ऊँचे -ऊँचे  वृक्ष  भी  झुक  जाते  थे   और  उनका  रस  वह  सरलता  से  एकत्र  कर  लेता  था  l  एक  दिन  महाभारत  के  रचयिता  महर्षि  वेदव्यास  ने  उसे  इस  विद्या  का  प्रयोग  करते  देख  लिया   तो  उनके  मन  में  इस  मन्त्र  को  जानने  की  जिज्ञासा  हुई  l  वे  कृपालु  के  नजदीक  गए  ताकि  उससे  नम्रता  से  मन्त्र   सीख   लें  लेकिन  कृपालु  उन्हें  देखकर  भाग  गया   l  वे  उसके  पीछे  उसके  घर  गए  तो  वह  वहां   से   भी  भागने    लगा  l   व्यास जी  समझ  गए  कि  कृपालु  उन्हें  मन्त्र  नहीं  देना  चाहता   और  सामने  आने  से  कतरा  रहा  है  l   इसलिए  वह  शांत  भाव  से  वापस  लौटने  लगे  l  कृपालु  के  बेटे  को  उन  पर  दया  आ  गई  और  उसने  कुछ  कर्मकांड  कर  के  उन्हें  वह  मन्त्र  सिखा  दिया  l  रास्ते  में  व्यास जी  ने  नारियल  के  वृक्ष  को  लक्ष्य  कर  के  मन्त्र  जपा   तो  वह   वृक्ष   झुक  गया   , उन्होंने  एक  नारियल  तोड़  लिया   फिर   ऐसा  मन्त्र  जपा  कि  वह  वृक्ष   फिर  अपनी  जगह  पर  हो  जाये  l    कृपालु  जब  घर  लौटा  तो  उसके  पुत्र  ने  उसे  बताया  कि  उसने   वह  मन्त्र  उन्हें  सिखा  दिया  l  इस  पर  कृपालु  नाराज  होकर  कहने  लगा --- " मूर्ख  है  तू  !  वेदव्यास जी  इतने  बड़े  महापुरुष  हैं  

13 December 2022

WISDOM

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---" मनुष्य  को  सदा  अपना  विवेक  जाग्रत  रखना  चाहिए  l  दूसरों  की  नक़ल  कर  , बिना  अपनी  बुद्धि  लगाए  , वैसा  ही  करने  वाला  सदा  उपहास  का  पात्र  बनता  है  l "  विज्ञानं  ने  सारी  दुनिया  को  एक  मंच  पर  ला  दिया  है  l  इसके  फायदे  भी  हुए  हैं   लेकिन  जहाँ  विवेक  का  इस्तेमाल  नहीं  हुआ   वहां  नुकसान  भी  बहुत  हुआ  है  l   भारतीय  संस्कृति  जो  चरित्र  और  नैतिक  मूल्यों  पर  टिकी  थी  , उसका  ही  पतन  हो  रहा  है  l  बुद्धिमत्ता  इसमें  है  कि  हम  अपनी  पहचान  को  बनाये   रखें  और  दूसरे  का  जो  श्रेष्ठ  है  उसे  अपनाएं  l  विवेकहीन  नक़ल  कर  के  कहीं  के  नहीं  रह  जाते  l  ---- दो  गधे  बोझा  उठाये  चले  जा  रहे  थे  l  एक  की  पीठ  पर  नमक  की   और  दूसरे  की  पीठ  पर  रुई  की  बोरियां  लदी  थीं  l  रास्ते  में  एक  नदी  पड़ी  l  नदी  के  ऊपर   रेत  की  बोरियों  का  कच्चा  पुल  बना  था  l  जिस  गधे  की  पीठ  पर   नमक  की  बोरी  थीं  उसका  पैर  फिसल  गया   और  वह  नदी  में  गिर  पड़ा  l  नदी  में  गिरते  ही  नमक  पानी  में  घुल  गया   और  उसका  वजन  हल्का  हो  गया  l  वह  यह  बात  दूसरे  गधे  को  बड़ी  प्रसन्नता  से  बताने  लगा  l  दूसरे  गधे  ने  सोचा  कि  बढ़िया  युक्ति  है  ,  ऐसे  तो  मैं  भी  अपना  भार  हलका  कर  सकता  हूँ   और  उसने  बिना  सोचे -समझे  पानी  में  छलांग  लगा  दी   किन्तु  रुई  के  पानी  सोख  लेने  के  कारण   भार  कम   होने  की  जगह  बहुत  बढ़  गया  l   ' नक़ल  में  अक्ल  की  जरुरत  होती  है  l  

12 December 2022

WISDOM -----

   आचार्य  गुरुकुल  में शिष्यों  को  पढ़ा  रहे  थे  l  एक  शिष्य  ने   प्रश्न   किया --- " गुरूजी  ! धन , कुटुंब  और  धर्म  में  कौन  सच्चा  सहायक  होता  है  ? "  आचार्य  बोले --- " वत्स  ! धन  वह  है  , जिसे  मनुष्य  जीवन  भर  प्रिय  समझता  है  ,  लेकिन  उसकी  मृत्यु  के  बाद   धन  उसके  साथ  एक  कदम  की  भी  यात्रा  नहीं  करता  l  कुटुंब  यथा संभव   सहायता  तो  करता  है  , परंतु  उसका  सहयोग  भी   शरीर  रहते  तक  ही  है  l  मात्र  धर्म  ही  ऐसा  है  ,  जो  लोक  और  परलोक   दोनों  में  मनुष्य  का  साथ  देता  है   और  उसे  दुर्गति  से  बचाता  है  l  यद्यपि  मनुष्य  जीते  जी  इसकी  उपेक्षा  करता  है  ,  तब  भी  यही  धर्म  मनुष्य  को   चिरस्थायी  सुख -शांति  प्रदान  करता  है  l  "  यहाँ  धर्म   का  अर्थ  वह  धर्म  नहीं  जिसके  नाम  पर  लोग  लड़ते  हैं   l   स्वार्थी  तत्वों  ने  धर्म  को  अपनी  स्वार्थ पूर्ति  का  जरिया  बना  लिया   इसलिए  धर्म  ही  विकृत  हो  गया  l   यदि  हमें  धर्म  को  समझना  है  तो  भगवान  राम  और  रावण  के  युद्ध  को  देखें   एक  ओर   आसुरी  तत्वों  का  प्रतीक  रावण  था  और  दूसरी  ओर   मर्यादापुरुषोत्तम  राम  थे  l  महाभारत  में  कोई  साम्प्रदायिकता  नहीं  थी    , वह  अधर्म  के  नाश  और   धर्म  व  न्याय  की  स्थापना  के  लिए  युद्ध  था  l   जिसमे  सत्य  ,न्याय  और  सन्मार्ग  पर  चलने  वाले  और  सच्चे  धर्म  के  प्रतीक  पांडव  थे  तो  दूसरी  ओर   छल , कपट , षड्यंत्र , अपनों  का  ही  हक   छीनना , अहंकार  से  ग्रस्त  अधर्मी  कौरव  थे  l  यदि  संसार  में  शांति  चाहिए  तो  रामायण  और  महाभारत  की  शिक्षाओं  को  लोगों  को  जानना  होगा   और  गीता  के  व्यवहारिक  ज्ञान  से  जीवन  जीने  की  कला  सीखनी  होगी  l  

11 December 2022

WISDOM ----

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---  अपने  दोष  बताने  वाले  से  क्रुद्ध  न  हों ,  उसका  कारण  समझें  और  उस  दोष  को  दूर  करें  उस  में  अपना  हित  ही  है  l  वे  आगे  लिखते  हैं --- बड़ों  की  सीख  याद  रखने  वाला  अनर्थ  से  बच  जाता  है  l '  एक  कथा  है ---- सम्राट  वृष  मातंग   साधुता  और  शील   में  अद्वितीय  थे   लेकिन  उन्हें  क्रोध  बहुत  जल्दी  आता  था   l  एक  बार  उनकी  परिचारिका  ने   उनकी  सेवा  परिचर्या  करने  से   इनकार  कर  दिया   और  बोली  -- " आपके  शरीर  से  दुर्गन्ध  आती  है  l "  सम्राट  क्षण  भर  को  क्रोध  से  उबल  पड़े    पर  तभी  उन्हें  अपने  आचार्य  के  ये  वचन  याद  आ  गए  --- " प्रशंसा  और  निंदा  को   समभाव  से  ग्रहण  करने  वाला  ही  सच्चा  योगी  होता  है  l "  अत:  वे  अपने  क्रोध  को  पी  गए   और  मन  में  यह  निश्चय  किया  कि  यदि  शरीर  में  कोई  कमी  है   तो  उसे  दूर  करेंगे   l  अपनी  निंदा  सुनकर   हमारे  मन  में  हीन  भावना  नहीं   आनी   चाहिए  और  न  ही  क्रोधित  होना  चाहिए  l   सम्राट  ने  वैद्यों  को  बुलाया   और  दुर्गन्ध  का  कारण  पूछा  l  शरीर  की  परीक्षा  हुई  ,  पता  चला  कि   उनके  दांत  में  भयंकर  रोग  हो  गया  है  l  यदि  एक  दो  दिन  में  चिकित्सा  नहीं  हुई  तो   वह  असाध्य  हो  जायेगा  l  समय  पर  चिकित्सा  हुई   वे  स्वस्थ  और  दुर्गन्ध रहित  हो  गए   l  

WISDOM

  एक  बार  सम्राट  अशोक  के  शासनकाल  में   अकाल  पड़ा  l  जनता  भूख  और  प्यास  से  त्रस्त  हो  उठी  l  राजा  ने  तत्काल  राज्य  में  अन्न  के  भंडार  खुलवा  दिए  l  सुबह  से  लेने  वालों  का  ताँता  लगा  रहता  l  एक  दिन  संध्या  हो  गई  l  जब  सब  लेने  वाले  निपट  गए   तो  एक   बहुत  कमजोर  बूढ़ा  आया  और  उसने  अन्न  माँगा  l  बाँटने  वाले  तब  तक  थक  चुके  थे  , उन्होंने  उसे  डांटकर  कहा --' कल  आना  , अब  खैरात  बंद  हो  गई  l '  तभी  एक  ह्रष्टपुष्ट  नवयुवक  आया   और  बाँटने  वालों  से  कहा  --- " बेचारा  बूढ़ा  है  , शरीर  से  दुर्बल  होने  के  कारण   सबसे  पीछे  रह  गया  l  इसे  अन्न  दे  दो  l " उसकी  वाणी  का  प्रभाव  था  कि  बाँटने  वालों  ने  उसे  अन्न  दे  दिया  l  उस  नवयुवक  की  सहायता  से  उसने  गठरी  बाँध  ली  l  लेकिन    उठे  कैसे  ?  तब  वही   नवयुवक  बोला --- 'लाओ , मैं  ही  पहुंचा  देता  हूँ  l '  गठरी  उठाकर  चलने  लगा  l  बूढ़े  का  घर  थोड़ी  दूर  पर  ही  रह  गया  था  ,  तभी  एक  सैनिक  टुकड़ी  वहां  से  निकली  l  टुकड़ी  के  नायक  ने   घोड़े  पर  से  उतरकर     गठरी  ले  जाने  वाले  का  फौजी  अभिवादन  किया  l  नवयुवक  ने  संकेत  से  आगे  कुछ  बोलने  से  मना  कर  दिया  l  बूढ़े  की  समझ  में  कुछ -कुछ  आ  गया  , वह  वहीँ  खड़ा  हो  गया  और  बोला  -- " आप  कौन  हैं  , सच -सच  बताइए  ? "  वह  व्यक्ति  बोला --- " मैं  एक  नौजवान  हूँ  और  तुम  वृद्ध  हो  दुर्बल  हो  l  बस , इससे  अधिक  परिचय  व्यर्थ  है  l  चलो  बताओ  तुम्हारा  घर  किधर  है  ? '  अब  तक  बूढ़ा  पूरी  तरह  से  पहचान  चुका  था  , वह  उनके  पैरों  पर  गिर  पड़ा  और  क्षमा  मांगते  हुए  बोला  -- 'प्रजापालक  !  आप  सच्चे  अर्थों  में  प्रजापालक  हैं  l  "

9 December 2022

WISDOM -----

    कर्म  करने  का  व्यक्ति  को  अधिकार  है   लेकिन  वह  उसके  परिणाम  से  बच  नहीं  सकता   l  महाभारत  का  प्रसंग  है  ---- दुर्योधन  के  कहने  पर  दु:शासन  ने  द्रोपदी  का  चीर हरण  किया   l  स्वयं  भगवान  कृष्ण  ने  द्रोपदी  के  चीर  को  अनंत  कर  दिया l  दु:शासन  में  दस  हजार  हाथियों  का  बल  था  , वह  थक गया , पस्त  होकर  गिर  पड़ा ,  अपने  उद्देश्य  में  वह  तनिक  भी  सफल  नहीं  हो  पाया  l   भगवान  चाहते  तो  उसी  समय  दुर्योधन  और  दु:शासन  का  अपने   सुदर्शन चक्र  से  अंत  कर  देते   लेकिन  यहाँ  ईश्वर  ने  बताया  कि  पापियों  को  दंड  तो  अवश्य  मिलता  है  ,  यह  कब  मिलेगा  इसका  ईश्वरीय  विधान  के  अनुसार  समय  निश्चित  हैं  l  द्रोपदी  जब  भी  भगवान  को  अपने  खुले  केश  दिखाती    और  कृष्ण जी  से  कहती -- हे  माधव -!  वह  वक्त  कब  आएगा   जब  मैं  अपने  इन  खुले  केशों  को  बांधुंगी  l  तब  कृष्ण जी  यही  कहते  कि  केवल  दुर्योधन  और  दु:शासन  के  अंत  के  लिए  ही   अवतार  नहीं  लिया  ,  अवतार  का  उद्देश्य  है  --अधर्म  का  अंत  और  धर्म  की  स्थापना   l  दैवीय  विधान  के  अनुसार  ही  सबको  अपने  कर्मों  का  फल  मिलेगा  l   पापियों  को  फलते -फूलते  देख   सामान्य  जन  का  कर्म विधान  से  विश्वास  हट  जाता  है  और  वह  भी  पाप  और  अनीति  की  राह  पर  चलने  लगता  है  l  संसार  में  ऐसे  असंख्य  उदाहरण  देखकर    हमें  कर्म फल  विधान  पर  विश्वास  रखकर  सदा  सत्कर्म  करने  चाहिए   l    

8 December 2022

WISDOM

   लघु -कथा ---- एक  ऊंट  बड़ा  आलसी  था  l  चरने  के  लिए  जंगल  जाना   और  परिश्रम  करना  उसे  बहुत  बुरा  लगता  था  l   एक  बार  महादेव और   पार्वती  वहां  से  निकले   तो   ऊंट  उनके  सामने  गरदन  झुककर  खड़ा  हो  गया  l  महादेव जी  ने  कहा --- 'कहो  क्या  बात  है  , क्या  चाहते  हो  ? '  ऊंट  ने  कहा --. भगवन  !  यदि  आप  प्रसन्न  हों  तो  मेरी  गरदन  एक  योजन  लम्बी  कर  दीजिये   जिससे  मैं  एक  ही  स्थान  पर  बैठा -बैठा   दूर  तक  के  वृक्षों  को  चर  लिया  करूँ  , इधर -उधर  जाने  का  कष्ट  मुझे  न  उठाना  पड़े  l '  महादेव जी  ऊंट  पर  बहुत  झल्लाए   और  उसे  समझाया  ---" आलस्य  का  पोषण  करने  वाला  वरदान  मांगता  है , यह  तो  तेरे  नाश  का  कारण  बन  जायेगा  l  उचित  परिश्रम  कर  के  कमाई  गई   वस्तुएं  ही  सुखदायक  होती  हैं  l "  लेकिन  ऊंट  ने  कुछ  भी  नहीं  समझा , वह  गरदन  झुकाए  एक  पैर  से खड़ा  रहा  l  पार्वती जी  को  उस  पर  दया  आई  , उन्होंने  कहा  --आप  हजारों  प्राणियों  को  नित्य  ही  वरदान  देते  हो  , इसे  भी  दे  दीजिए  l  महादेव जी  ने  देखा  कि  यह  ऊंट  बड़ा  जिद्दी  है , कुछ  समझना  नहीं  चाहता  तो  उन्होंने  भी  कह  दिया  ' तथास्तु ' l  अब  ऊंट  की  गर्दन  एक  योजन  लम्बी  हो  गई   और  चैन  से  उसका  समय  काटने  लगा  l  लेकिन  समय  जाते  देर  नहीं  लगती  l   वर्षा  शुरू  हुई  , कहाँ  तक  वह  पानी  में  भीगता  सो  एक  लम्बी  गुफा  में  उसने   अपनी  लम्बी  गर्दन  को  किसी  तरह  टिका  दिया   l  उसी  समय  एक  श्रगाल  भी  भीगता  हुआ  उस  गुफा  में  आ  गया  l  वह  भूखा  था  ,  उसने  समझा  यह  मांस  का  इतना  बड़ा  लट्ठ  पड़ा  है  l वह  बहुत  खुश  हुआ  और  मजे  से   उस  मान  को  खाने  लगा  l  एक  योजन  लम्बी  गर्दन  को  इतनी  आसानी  से  गुफा  से  निकालना   संभव  नहीं  था , ऊंट  वैसे  ही  आलसी  था  जब  तक  प्रयास  करता   सियार  ने  उसकी  गरदन  को  फाड़कर  दो  टुकड़े  कर  दिए  l  ऊंट  मर  गया   और  सियार  को  बहुत  दिनों  का  भोजन  मिल  गया  l  आलसी  और  अकर्मण्य  व्यक्ति  बिना  परिश्रम  किए  बड़ी  सम्पदाएँ  चाहते  हैं  l  यदि  किसी  प्रकार  वे  उन्हें  मिल  भी  जाएँ   तो  अंत  में  वे  दुःख दायक  ही  होती  हैं  l 

7 December 2022

WISDOM ----

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- ' सामान्य  जन  प्रेरणा  तभी  लेते  हैं  , जब  आदर्शों  की  चर्चा  करने  वाले  ,  नीतिवेत्ता ,  नियम  बनाने  वाले   स्वयं  भी  उनका  पालन  करें  "    आज  संसार  में  एक  -से -बढ़कर -एक  उपदेश  देने  वाले , प्रवचन  करने  वाले  हैं  , जिन्हें  सुनने  के  लिए  हजारों , लाखों  की  भीड़  तो  इकट्ठी  हो  जाती  है   लेकिन  उनके  उपदेशों  का  असर  किसी  पर  भी  नहीं  होता  l  इसका  कारण  यही  है   कि  उनमे  से   कुछ  को  छोड़  कर  शेष  सब    उपदेश  तो  अच्छा  देते  हैं  लेकिन  उनकी  असलियत  सिर्फ  ईश्वर  ही  जानते  हैं  , उनके  उपदेश  और  आचरण  में  बहुत  अंतर  है  l  यही  कारण  है  कि  संसार  में  इतनी  अशांति , इतना  तनाव   है   l  संसार  को  सही  राह  दिखाने  की  जिम्मेदारी  ईश्वर  ने  जिनको  सौंपी  है   उनकी  राह ---- ?  एक  इतिहास  का  प्रसंग  है ------  सम्राट  बिंबसार  का  शासनकाल  था  l  एक  साल  लू  बहुत  चली , प्रजा  के  झोंपड़े  फूस  के  बने  थे  l  लोग  लापरवाही  करने  लगे  ,इस  कारण  अग्निकांड  की  घटनाएँ  बहुत  अधिक  होने  लगीं   और  शासन  द्वारा  दी  जाने  वाली  सहायता  राशि  का  खरच  भी  बढ़  गया  l  लोगों  की  लापरवाही  रोकने  के  लिए  राजाज्ञा  प्रसारित  हुई  कि  जिसका  घर  जलेगा  उसे  एक  वर्ष  तक  शमशान  में  रहने  का  दंड  भुगतना  पड़ेगा  l  लोग  चौकन्ने  हो  गए  l  एक  दिन  राजा  के  भूसे  के  कोठे  में  आग  लगी  और   देखते  ही  देखते  वह  जल  गया  l  समाचार  मिलने  पर  दरबार  से  राजा  को  श्मशान  में  रहने  की   आज्ञा  हुई  l  दरबारियों  ने  समझाया  कि ---- " नियम  तो  प्रजा जनों  के  लिए  होते  हैं  , राजा  तो  उन्हें  बनाता  है  इसलिए  वे  उस  पर  लागू  नहीं  होते  l  " परन्तु  बिंबसार  ने  किसी  की  न  मानी   और  वे  एक  वर्ष  तक  फूस  की  झोंपड़ी  बनाकर  श्मशान  में  रहने  लगे  l  समाचार  फैला  तो  सतर्कता  सभी  ने  अपनाई   और  अग्निकांड  का  सिलसिला  समाप्त  हो  गया  l  

3 December 2022

WISDOM

    लघु -कथा ---- एक  वृक्ष  पर  उल्लू   बैठा    था  , उसी  पर  आकर  एक  हंस  भी  बैठ  गया   और  स्वाभाविक  रूप  से  बोला --- आज  सूर्य  प्रचंड  रूप  से  चमक  रहे  हैं   इससे  गर्मी  तेज  हो  गई  है  l  उल्लू  ने  कहा ---सूर्य  कहाँ  है  ?  गरमी  तो  अंधकार  बढ़ने  से  होती  है  , जो  इस  समय  भी  हो  रही  है  l  उल्लू  की  आवाज  सुनकर   एक  बड़े  वट वृक्ष  पर   बैठे   अनेक  उल्लू  वहां  आकर  हंस  को  मूर्ख  बताने  लगे   और  सूर्य  के  अस्तित्व  को   स्वीकार  न  कर   हंस  पर  झपटे  l  हंस  अपने  प्राण  बचाकर बचाकर  भाग  खड़ा  हुआ  l         उल्लू  को  दिन  में  दिखाई  नहीं  देता  इसलिए  वह  अंधकार  को  ही  सत्य  मानता  है   l  आज  की  स्थिति  कुछ  ऐसी  ही  है l  सच्चाई , ईमानदारी  और   विवेक   की  बात  करने  वालों  का  बहिष्कार  किया  जाता  है  और  जो   अनैतिक , अमर्यादित  कार्य  करते  हैं ,  या  गलत  कार्य  करने  वालों  का  सहयोग  करते  हैं   उनको  महत्त्व  दिया  जाता  है  l  समस्या  में  ही  समाधान  निहित  है  l   जिस  दिन  सरोवर  से   बहुत  सारे  हंस  उड़कर  वृक्ष  पर  बैठे  हंस  के  पास  आ  जायेंगे   और  अपने  हंस  की  बात  का  समर्थन  करेंगे    , अपनी  विवेक   शक्ति  से   प्रतिपक्षी    को  निरुत्तर  कर  देंगे   उस    दिन  सत्य   की  जीत  होगी  l  

2 . एक  मनुष्य  ने  किसी  महात्मा  से  पूछा , महात्मन  ! मेरी  जीभ  तो  भगवान   का  नाम   जपती  है  , पर  मन  उस  ओर  नहीं  लगता  l  महात्मा  बोले -- भाई  ! हमारा  यह  शरीर  ईश्वर  की  दी  हुई  विभूति  है  l  इस  बात  की  प्रसन्नता  मनाओ  कि  कम  से  कम  जीभ  तो  भगवान  का  नाम  लेती  है  , एक  अंग  ने  तो  उत्तम  मार्ग  पकड़ा  है  l  धीरे -धीरे  प्रयास  करते  रहो  और  सत्कर्म  करो   तो  एक  दिन  मन  भी   निश्चित  रूप  से   ठीक  रास्ते  पर  आ  जायेगा  l  शुभारम्भ  छोटा  भी  हो    तो  भी  निरंतर  प्रयास  से  सफलता  मिलती  है  l  

2 December 2022

WISDOM ----

   एक  चोर  संत  नानक  के  पास   पहुंचा   और  अपनी  चोरी  की  बुरी  आदत  से  छुटकारा  पाने  का  उपाय  पूछा  l  नानक  ने  जोई  उपाय  बताये  वे  उससे  निभते  न  थे  l  एक  के  बाद  एक   उपाय  बदलते -बदलते  जब  बहुत  दिन  बीत  गए   और  किसी   से  भी  वह  आदत  न  छूटी   तब  उन्होंने  चोर  से  कहा  कि  तुम  अपने  पाप  सबके  सामने  प्रकट  करने  लगो  l  चोर  का  बार -बार  आना  और  पूछना  समाप्त  हो  गया  l  पाप  प्रकट  करने  से  उसे  लज्जा  आती  थी  ,  सो  उसने  चोरी  करना  ही  बंद  कर  दिया  l  

1 December 2022

WISDOM -----

  ऋषियों  का  वचन  है ---- ' उदय  होता  सूर्य  भी  रक्त  होता  है  और  अस्त  होते  समय  भी  रक्त  रहता  है  l  उसी  तरह  बुद्धिमान  सज्जनों  का  रूप  भी  विपत्ति   में  और  संपत्ति  में  एक  जैसा  रहता  है  l  '    संसार  में  जो  व्यक्ति  सुख -दुःख  के  चक्र  को  नहीं  समझते  वे  सुख  आने  पर  अहंकारी  हो  जाते  हैं   और  दुःख  आने  पर  हताश -निराश  हो  जाते  हैं ,  उनका  आत्मविश्वास  ही  समाप्त  हो  जाता  है  , आत्महत्या   कर  लेते  हैं  l  लेकिन  जो  इस  सत्य  को  जानते  हैं  कि  गहरी  रात  के  बाद  सुबह  अवश्य  होगी  , उसे  कोई  रोक  नहीं  सकता , वे  अपने  आत्मविश्वास  पर  दृढ  रहते  हैं , उन्हें  ईश्वरीय  सत्ता  पर  विश्वास  होता  है   और  दुःख  के  कठिन  समय  में  आने  वाले  सुनहरे  पल  की  तैयारी  करते  हैं   l  महाभारत  का   प्रसंग  है ---- जब  पांडवों  को  जुए  में  हारने  के  बाद  बारह  वर्ष  का  वनवास  और  एक  वर्ष  का   अज्ञातवास  मिला   तब  अर्जुन  ने  दिव्यास्त्र  प्राप्त  करने  के  लिए  कठोर  तपस्या  की , शिवजी  से  'पाशुपत अस्त्र  ' प्राप्त  किया   तब  देवराज  इंद्र   जो  अर्जुन  के  पिता  थे  अपने  साथ  कुछ  समय  के  लिए  स्वर्गलोक  ले  गए  , वहां  उनका  मन  बहलाने  के  लिए  अप्सराओं  के  नृत्य  का  आयोजन  किया  l  स्वर्ग  की  सबसे  सुन्दर  अप्सरा  उर्वशी  उन  पर  आसक्त  हो  गई   और  उसने  अर्जुन  से  प्रेम -याचना  की  लेकिन  अर्जुन  ने  उर्वशी   की  याचना  को  अस्वीकार  कर  दिया  और  कहा  कि   आपके  सौन्दर्य  में  मैंने  अपनी  माँ  के  दर्शन  किए  l  उर्वशी  को  यह  अपना  अपमान  लगा  और  उसने  क्रोधित  होकर  अर्जुन  को  नपुंसक  होने  का  श्राप  दे  दिया  l  तब  देवराज  इंद्र  ने  उनकी  तपस्या  और  श्रेष्ठ  चरित्र   के  आधार  पर  कहा  कि  यह  श्राप  केवल  एक  वर्ष  के  लिए  जब  वह  चाहेंगे  तब  लागू  होगा  l  यह  शाप  अज्ञातवस्  की  अवधि  में  पांडवों  के  लिए  वरदान  बन  गया  , अर्जुन  ने  ब्रह्न्न्ला  बनकर  राजा   विराट   की  पुत्री   उत्तरा  और    उसकी  सहेलियों  को  नाच , गाना -बजाना  सिखाया l  कहाँ  अर्जुन  जिसके  गांडीव  की   टंकार    से  धरती  हिल  जाती  थी  , विपदा  के  समय  ऐसा  रूप  धरना  पड़ा  l  महारानी  द्रोपदी   ने   ऐसे  कठिन  समय  में  राजा    विराट   के  रनिवास  में  नौकरानी  बन   कर   सैरंध्री   नाम  रखकर   सबकी    सेवा  की  l    वहां  का  सेनापति  कीचक  जो  रानी  का  भाई  था  , रनिवास  में  आता -जाता  था  , उसकी   कुद्रष्टि  द्रोपदी  पर  थी   l  एक  दिन  जब  उससे  जान  बचाकर  द्रोपदी  राजसभा  की  ओर भागी   तब  कीचक  भी  उनके  पीछे  भागा  और  भरी  सभा  में  उसने  द्रोपदी  को  ठोकर  मारी , अपशब्द  कहे  l  महारानी  होकर  कितना  अपमान  !  समय  विपरीत  था   इसलिए  सहना  पड़ा  l   धीरे -धीरे  कष्ट  के  दिन  बीत  गए  l  कष्ट  , मान -अपमान  हम  सबके  जीवन  में  आता  रहता  है   इसलिए  हमें  अपने  सारे  रिश्तों  के  साथ  एक  रिश्ता  भगवान  से  भी  रखना  चाहिए   , इससे  हमें  शक्ति  और  सद्बुद्धि  मिलती  है  l