21 March 2019

WISDOM ---------

 पेड़ों  में  चिड़िया , बिलों  में  दीमक , जंगलों  में  हिरन   कुदकते - फुदकते  प्रसन्नता  का  जीवन  जीते  हैं  l जलाशय  में  मछलियाँ  कल्लोल  करती  हैं   l  एक  मनुष्य  ही  ऐसा  है   जो  उत्कृष्ट  शरीर  संरचना , विशिष्ट  बुद्धिमत्ता   के  होते  हुए  भी  हर  घडी  चिंतित ,  शंकित  और  भयभीत   रहता  है   l  इसका  कारण  न  तो  संसार  की  परिस्थितियां   हैं  और  न  प्रतिकूलताओं  की  भरमार   l  केवल  अपनी  ही  मन;  स्थिति  अस्त व्यस्त  , अनगढ़  होने  से  विचारणा  भावना  विकृत  हो  जाती  है  l  
  मनुष्य   के  हाथ  पैरों  में  हथकड़ी   तो  तभी  पड़ती  है   जब  उसे  किसी  अपराध  में  जेल  जाना  पड़ता  है   l  किन्तु  मनोविकारों  के  बंधन  ऐसे  हैं  ,  जो  इस  प्रकार  जकड़ते  हैं  ,  मानो    किसी  भयंकर   व्यथा   ने  जकड़  लिया  हो   l   

20 March 2019

WISDOM ---- बदलती हुई परिस्थिति के साथ विचारों में परिवर्तन भी अनिवार्य है

 विचारकों  का  मत  है  कि--- यदि  मनुष्य  समय  के  अनुरूप  अपने  विचारों  में  परिवर्तन  नहीं  लाता,  तो  बदलते  परिवेश  में  उसका  अस्तित्व  समाप्त  होने  की  संभावना   उसी  प्रकार  बढ़  जाएगी  ,  जिस  प्रकार  शरीर  तंत्र  के  अनुकूलन  के  अभाव  में   किसी  जीव  का  अस्तित्व  संकट  गहरा  जाता  है  l 
  मनुष्य  अपने  विचारों  के  प्रति  हठी हो  जाता  है  , बदलते  समय  के  साथ  वह   अपने  विचारों  को  बदलना  नहीं  चाहता  ,  यही  उसके  पतन    और   विनाश  का कारण  है   l  

19 March 2019

WISDOM ----- संन्यास का सही स्वरुप --- सेवा लेना नहीं सेवा करना है l

 बात  उन  दिनों  की  है  जब  स्वामी  विवेकानंद  घूम - घूम  कर  समूचे  देश  की  स्थिति  का  अवलोकन  कर  रहे  थे   l  उन  दिनों  वे  दक्षिण  भारत में  थे   l  एक  मठ  में  प्रवेश  कर  उन्होंने  महंत  से  पूछा  -- " क्या  मैं  यहाँ   एक  दो  दिन  रह  सकता  हूँ  l "  उनका  उद्देश्य  वहां  की  जीवन  प्रणाली  का  अध्ययन  करना  था  l   उन्होंने  देखा  कि  कुछ  लोग  उपनिषद  पढ़  रहे  हैं  l  स्वामी विवेकानंद  ने  उनसे  पूछा --- " आप  लोग  इस  ज्ञान  को  जीवन  में  उतारने  के  लिए  क्या  कर्म  करते  हैं  ? "
वे  लोग  बोले --- " कर्म  !  कर्म  से  हमारा  क्या  प्रयोजन  ? "
स्वामीजी ---- " शरीर  की  आवश्यकताओं  की  पूर्ति  आप  लोग  कैसे  करते  हैं  ? "
 साधु  ने  जवाब  दिया --- " अरे !  इतना  भी  नहीं  मालूम ,  यह  काम  गृहस्थों  का  है   l  वे  ही  हमारी  आवश्यकताओं  की  पूर्ति  करते  हैं   l "
स्वामीजी उस  स्थान  पर   पहुंचे  जो  साधुओं  के  निवास  के  लिए  था  -- संगमरमर  का  फर्श , विशाल  कमरे , गद्देदार  पलंग   l  यह  सब  देखकर   स्वामीजी  ने  साधु  से  पूछा --- " क्यों  महात्माजी  !  क्या  आपने  मजदूरों  की  बस्तियां  देखी   हैं  ?   क्या  उनके  घरों  से  भिक्षा  ली  है  ?  "
 साधु  बोला --- " वे  भला  क्या  देंगे ?  उनके  पास   खुद  नहीं  है  l "
स्वामीजी---- "  क्या  आपने  कभी  उनके  दुःख - दारिद्र्य  दूर  करने  के  सम्बन्ध  में  विचार  किया  ? '
साधु ---- " वे  अपने  पापों  का  दंड  भुगत  रहे  हैं  l "
   स्वामी  विवेकानंद  विचारमग्न  हो  गए  l  क्या  यही  संन्यास  है   ?  मूढों, , अकर्मण्य  और  विलासियों  का  जमावड़ा  हो  गया  है  l   स्वामीजी  का  मन   परेशान   हो  गया , वे  कन्या कुमारी  जा  पहुंचे  और  समुद्र  की  उत्ताल  तरंगों  को  बेध  कर  पाषाण  शिला  पर  पहुंचकर  ध्यान  में  डूब  गए  l
स्वामीजी  के  शब्दों  में  यह  ध्यान  भारत  की  आत्मा   का  था  l   एक  नया  भारत  l  संन्यास  का  नया  स्वरुप  समझाना  होगा  ,  सुशिक्षित , अनुशासित , कर्मठ  व्यक्तियों  का  दल   घर - घर , द्वार - द्वार  जाकर  लोगों  को  जीवन  बोध  कराये  l  कर्मठता  जीवन  का  ध्येय  बन  जाये  ,  मानव मात्र  जागरूक  हो  और  सामाजिक  कर्तव्य  निभाने  में  जुट  जाये   l    विराट  विश्व  की  आराधना  जो  कर  सके , ऐसे  समय दानी , लोकसेवी , कर्मठ  व्यक्ति  ही  सच्चे  संन्यासी  हैं   l  

18 March 2019

WISDOM ---- जाग्रत विवेक ही सामाजिक बुराइयों को नियंत्रित कर सकता है

  यह  आवश्यक  नहीं  कि  शोषित  वर्ग  स्वयं  ही   समर्थ  शोषकों  को  परास्त  करे   l दास  प्रथा  इसलिए  नहीं  चली   कि  गुलामों  ने   मालिकों  को  लड़कर  हराया  था  ,  बल्कि  विश्व  के  जाग्रत  विवेक  ने  पीड़ित  पक्ष   की   हिमाकत  की  l  उत्तरी  और  दक्षिणी   अमेरिका  में  दास  प्रथा  विरोधी  और  समर्थक  गोरों  के  बीच  ही   इस  प्रश्न  को  लेकर  गृहयुद्ध  हुआ  था   और  उस  प्रचलन  की  कानूनी  मान्यता  समाप्त   हुई  थी
      बिस्मार्क , क्रोपाटिकिन , नेहरु  आदि  शोषित  वर्ग  के  नहीं  थे   तो  भी  उन्होंने  शोषकों  के   पैर  तोड़ने  में  डटकर  मोर्चा  लिया  l  भारत में  भी   बाल - विवाह , सती- प्रथा , बेगार -  प्रथा  ,  बंधुआ  मजदूरी   आदि  का  अंत   पीड़ितों  के  पराक्रम  ने  नहीं  , जाग्रत  विवेक  ने  किया  l 
  संसार  में  अनीति  इसलिए  नहीं  बढ़ी  कि दुरात्माओं  की  ताकत  अधिक  थी  ,  बल्कि  उसका  विस्तार  इसलिए  हुआ   क्योंकि   उसके  विरोध  में  सिर  उठाने  वाला  साहस  मूक  और  पंगु  बना  रहा  l  

17 March 2019

WISDOM ---- परिष्कृत द्रष्टिकोण के बिना सब अनुदान - वरदान व्यर्थ हैं

 एक  संत  सत्संग  को  चले  जा  रहे  थे  l  देखा  एक  व्यक्ति  नाली  में   गिरा  पड़ा  है   l  संत  ने  उसे  उठाया , मुंह  साफ  किया   व  बैठाया  l  देखते  ही  उसे  पहचान  गए   और  आश्चर्य  से  बोले ---- ' तुम  और  यहाँ  ? "  आदमी  ठिठका  फिर   होश  संभालकर  बोला --- " प्रभु  की  कृपा  है  , अन्यथा  मैं  तो  चारपाई  से  भी    नहीं  उठ  पाता  l  जब  से  आपने  ठीक  किया  ,  तब  से  रोज   बराबर  शराब  घर  तक  तो  चलकर  आ  ही  जाता  हूँ   l   संत  उदास  हो  गए , अपने  अनुदान  का  ऐसा   दुरूपयोग  देखकर  उन्हें  बहुत  पीड़ा  हुई   l   आगे  बढे  तो  देखा  एक  व्यक्ति  नवयुवती  के  पीछे   दौड़ा  चला  जा  रहा  है  l   संत  उसे  पहचान  गए   l   संत  ने  रोका  और  कहा ---  "  तुम  तो  पहले  अंधे  थे   l  आँख  मिलते  ही  इस  हरकत  पर  उतर  आये  l '
 वह  व्यक्ति  बोला  --- " सब  आपकी  कृपा  है  l   जब  तक  अँधा  था  तो  नरक  में  जी  रहा  था   l  आपकी  कृपा  से  नयनो  का  यह  सुख  मिला  है   l "  
  संत    को  यह  सत्य  समझ  में  आया  कि--- सदुपयोग  का  महत्त्व  समझाए  बिना   कोई  भी  अनुदान , वरदान , उपलब्धि  सब  व्यर्थ  है  ,  बल्कि  वह  विनाशकारी  और  पतनगामी  भी  हो  सकते  हैं   l  

16 March 2019

WISDOM ----- शक्ति का सदुपयोग जरुरी है

  जब  तक  लाठी  हाथ  में  है  ,  तब  तक  उसके  दुरूपयोग  का  बचाव  भी   हो  सकता  है  ,  पर  जब  मशीनगन  चलने  लगे   और  बम  बरसने लगे   तो  फिर  सुरक्षा  का  प्रश्न  कठिन  हो  जाता  है  l 
 असाधारण     उपलब्धियां   यदि  कभी  नियंत्रण  से  बाहर  होने  लगें   और  मनुष्य  की  उद्दंडता  पर  अनुशासन  न  लगे     तो  परिणति   कितनी  भयंकर   होती  है  ,  इसका  परिचय  भूतकाल  से  आज  तक   मनुष्य  जाति  अनेक  बार  प्राप्त  कर  चुकी  है   l  यह  सामर्थ्य  ही  है  जो  अनियंत्रित  होने  पर  प्रेत - पिशाच  का  रूप  धर  लेती  है   l   मदान्ध  जो  भी  कर  बैठे  कम  है   l  मानवी  दुर्बुद्धि  के  कारण  उपलब्धियां  वरदान  नहीं  अभिशाप  बन  गई  हैं   l 
  शक्ति  का  सदुपयोग  हो,    मनुष्य  इनसान  बने   इसके  लिए   विवेकशीलता  और  दूरदर्शिता   और  संवेदनशीलता  चाहिए  l  सभी  समस्याओं  का  एकमात्र  हल  है ---- संवेदना  l 

15 March 2019

WISDOM ------ ---

 मंदिरों  में  शंख   और  घड़ियाल,  गिरजाघरों  में  घंटियाँ  ,  मस्जिदों  में  अजान  के  स्वर   गूंजे   l  सभी  धर्मावलम्बी  अपने  अपने  पूजा  स्थलों  की   ओर  चल  पड़े   l
 मस्जिद  की  मीनार ,   गुरूद्वारे  का  निसान   साहिब  ,   मंदिर  का  गुम्बद   और  गिरजाघर  का  क्रास    भक्तों  की  भारी  भीड़  को    आता  देख   आपस  में  विस्मय  की  मुद्रा  में  मुस्कराए   l
  मस्जिद  की मीनार  ने    निसान  साहिब ,  गुम्बद  और  क्रास  से  कहा ---- "  भाईसाहब  !  ये  इन्सान  भी  क्या  खूब  है   ?  यह  सारी  भीड़    अभी  अपने - अपने   पूजाघरों  में   जाकर  भगवन  के सामने  बड़ी   भोली  बनकर   वेड मन्त्र ,  आयतें   और  कवितायेँ  गाएगी  ,  परवरदिगार  से  दुआ  करेगी  की  हमसे   कोई  गलती  न  हो  ,  हमारी  नियत  साफ  रहे , हम  नेक  इनसान  बनें ,      फिर  न  जाने  इस  पूजाघर  के  बाहर   क्या  हो  जाता  है  l  तब  इन्सान  का  दूसरा  मुखौटा  होता  है   l  भोला   बनने   वाला वही         इन्सान  शोषक  बन  जाता  है   और  सजातीय मनुष्यों  का  गला  काटने  से   भी  नहीं  चुकता  l "
 मंदिर  के  गुम्बद  ने  कहा ---- " चुप  रह  बहन  !  धीरे  बोल  l  यदि  इन  मनुष्यों  ने  सुन  लिया  तो   तेरी - मेरी   और  इन  सब  पूजाघरों  की  खैर  नहीं    l  यह  इन्सान  बड़ा  जिद्दी  है  ,  अपने  को  छोड़कर  सबको   मूर्ख      समझता  है   l  यही  इसकी  आज  की  दुर्गति  का  कारण  है   l