29 September 2021

WISDOM ------

   भक्ति  में   जाति   का  नहीं   ,  हृदय  का स्थान  होता  है  ,  यही  वजह   है    कि   मजहब  की  दृष्टि  से  मुसलमान   होते  हुए  भी   अब्दुल  रहीम  खानखाना   कृष्ण  के  परम  भक्त  थे   l    बादशाह  अकबर   रहीम दास   जी  को  बहुत  सम्मान  देते  थे   l   अकबर  के  पुत्र  जहांगीर  ने    रहीम  को   बादशाह  के  विरुद्ध    विश्वासघात  करने  में   साथ  देने  का  प्रलोभन    दिया  कि  बादशाह  बनने  के  बाद   वह  उन्हें  मंत्री पद  सौंपेगा  l   रहीम  ने  यह  बात  नहीं  मानी   और  जब  जहांगीर  बादशाह  बना   तो  उसने    रहीम दास  जी  से  भारी  बदला  लिया   l   उसने  रहीम  के  दोनों  पुत्रों  की  हत्या  कर   के  दरवाजे  के  पास  फिंकवा  दिया   l   रहीम  के  सारे   अधिकार  छीन  लिए   और  उन्हें  दर -दर   की  ठोकरें  खाने  को    छोड़  दिया   लेकिन  रहीम  तो  भगवान  के  भक्त  थे  ,  सुख - दुःख  से  परे  !   वे  तब  भी  भक्त  थे  जब   अपरिमित  संपदाओं   के  स्वामी  थे   और  बादशाह  के  दरबार  में  श्रेष्ठ  लोगों  को   बेशकीमती   रत्नों  का  उपहार   दिया  करते  थे  ,  और  अब  इस  स्थिति  में  भी  मस्ती  में  डूबे   रहते  थे  ,  जब  उनके  पास  कुछ  नहीं  था   l     एक  दिन  रहीम  अपने  जीवकोपार्जन  हेतु  बैठे  थे   और  सामने  बेचने  के  लिए  चीजें   पड़ी  हुई  थीं  l   उसी  समय  जहांगीर  अपनी  सेनाओं  के  साथ  वहां  से  गुजरा   और  उन  पर  कटाक्ष  किया   ----- "  देखा  रहीम  !   मेरे  साथ  न  होने  का  परिणाम    l  "    रहीम  को  तनिक  भी  दुःख  नहीं  था   अपनी  करनी  पर    और  कोई  शिकवा  भी  नहीं  था  बादशाह  के   इस    कटाक्ष   व  अपमान   पर   l   इकहत्तर  वर्ष  की  उम्र  में    बड़े  ही  फक्र  के  साथ   इस  नश्वर  देह  को  छोड़ने  से  पूर्व   उन्होंने  अनेक  उल्लेखनीय  कार्य  किए  ,    उन्होंने  ज्योतिष  शास्त्र  में   खेत खोतुकम   एवं  द्वाविशद   योगावली   की  रचना  की   ,  इसके  अतिरिक्त  उन्होंने  अनेक  महान  कार्य  किये   l   ऐसी  मान्यता  है  की  अंतिम  समय  में   उन्होंने   अपने  इष्ट    भगवान  कृष्ण  के  सामने      ही  देह  का  त्याग  किया   और  उन्ही  में  विलीन  हो  गए   l