विधाता ने इस स्रष्टि में अनेक प्राणियों की रचना की l इन सब में मानव सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि मनुष्य के पास बुद्धि है , उसके पास अपनी चेतना को परिष्कृत करने के पर्याप्त अवसर हैं लेकिन अन्य प्राणियों को यह सुविधा नहीं है l मनुष्य शरीर में हम विभिन्न रिश्तों में बंधे हैं l ये सब रिश्ते हमारे विभिन्न जन्मों में किए गए कर्म हैं जिनका हिसाब हमें चुकाना पड़ता है l यदि हमारे पूर्व के कर्म अच्छे हैं तो उन रिश्तों से हमें सुख मिलेगा l जब विभिन्न सांसारिक रिश्तों को लेकर जीवन में दुःख मिलता है l अपमान , तिरस्कार , धोखा , षड्यंत्र , धन , संपदा और हक़ छीन लेना जैसे दुःख जब इन रिश्तों में मिलते हैं , तब हमें इस कष्टपूर्ण समय का सकारात्मक ढंग से सामना करना चाहिए l इन दुःखों के लिए हम ईश्वर को दोष देते हैं कि हमारे जीवन में ही ऐसा क्यों हुआ ? यदि ईश्वर को दोष देने के बजाय हम इस सत्य को समझें कि यह हमारे पूर्व जन्मों में किए गए विभिन्न कर्मों का हिसाब होगा , जो इस जन्म में हमें इन विभिन्न तरीकों से चुकाना पड़ रहा है तो हमारे मन को शांति मिलेगी l सुख का समय तो बड़ी आसानी से बीत जाता है लेकिन जब दुःख आता है तो सामान्य मनुष्य यही कहता है कि यदि ईश्वर हैं तो वे आकर संसार के कष्ट क्यों नहीं दूर कर देते l यह संसार कर्मफल के आधीन है l ईश्वर सर्वगुण संपन्न और श्रेष्ठता का सम्मुचय हैं , यदि हमारी पीठ पर पाप कर्मों की गठरी लदी है तो ईश्वर कैसे आयेंगे ? ईश्वर को पाने के लिए हमें अपने मन और आत्मा को परिष्कृत करना होगा l यदि हम अपनी चेतना को परिष्कृत करने का संकल्प लेते हैं और उस दिशा में आगे बढ़ने का निरंतर प्रयास करते हैं तो समय -समय पर इस मार्ग पर आने वाली कठिनाइयों से हमारी रक्षा करने के लिए ईश्वर अवश्य आते हैं l ईश्वर की सत्ता को केवल अनुभव किया जा सकता है l
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