पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " संपदा बाहर भी है और भीतर भी l बाहर की , द्रश्य , भौतिक संपदा मिलने पर उसका खोना सुनिश्चित है , लेकिन भीतर की संपदा मिल जाने पर वह सदा बनी रहती है l उसे पा लेने के बाद कुछ और पा लेना शेष नहीं रह जाता l " समय कितना बदल गया ! एक समय था जब ऋषि , मुनि तपस्या , यम , नियम , साधना आदि के द्वारा आंतरिक संपदा के धनी थे , समृद्ध थे l भौतिक सुख -साधनों की उनकी कोई मांग नहीं थी , उन्होंने अपना जीवन संसार के कल्याण में और मनुष्य की चेतना को कैसे परिष्कृत किया जाए , इन खोजों में व्यतीत किया था l लेकिन अब इस वर्ग के लोग केवल बाना पहनकर स्वयं को आध्यात्मिक दिखाते हैं , उनके पास आंतरिक संपदा नहीं है और बाहरी सुख - भोग के अपार साधन हैं l इसलिए अब वे समाज को दिशा नहीं दे पाते बल्कि शक्तिशाली लोग उन्हें अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं l अपवाद स्वरुप प्राचीन ऋषियों की श्रेणी के भी हैं लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है l बुराई ने अच्छाई को ढक दिया है l ---- महर्षि कणाद केवल अन्न के कण बीनकर अपनी गुजर कर लेते थे l राजा को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने प्रचुत धन सामग्री उनके पास भेजी l मंत्री सब लेकर पहुंचा तो महर्षि ने कहा --- " मैं सकुशल हूँ l इस धन को तुम उन्हें बाँट दो जिन्हें इसकी जरुरत है l " ऐसा तीन बार हुआ , अंत में राजा स्वयं बहुत सा धनधन लेकर उनके पास पहुंचे तो महर्षि ने कहा ---- " देखो मेरे पास तो सब कुछ है l यह धन उन उन लोगों में वितरित कर दो जिनके पास कुछ नहीं है l " राजा ने चकित होकर महर्षि को देखा कि जिनके तन पर केवल एक लंगोटी है और कह रहे हैं कि उनके पास सब कुछ है l राजा ने महर्षि से कुछ नहीं कहा लेकिन महल पहुंचकर रानी को सब कथा कह सुनाई l रानी विवेकवान थी , उसने कहा ---" आपने भूल की l जिनके पास भीतर की संपदा है , वे ही बाहर की संपदा छोड़ने में समर्थ होते है l आप महर्षि को कुछ देने नहीं , उनसे अनमोल ज्ञान प्राप्त करने जाएँ l" रानी की बात सुनकर राजा महर्षि के पास गए और उनसे ज्ञान प्राप्त कर अपने जीवन को सार्थक किया l