नारद जी ईश्वर के परम भक्त हैं l तीनों लोकों में वे भ्रमण करते हैं l इसी क्रम वे जब वे धरती पर भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि पापी तो बहुत सुख से जीवन व्यतीत कर रहे हैं और जो सज्जन हैं , पुण्यात्मा हैं , वे बड़ा कष्ट पा रहे हैं l उन्होंने भगवान विष्णु जी से कहा कि भगवान ! धरती पर तो अंधेरगर्दी चल रही है , पाप का साम्राज्य बढ़ता ही जा रहा है l ईश्वर भी क्या उत्तर दें ? यह तो कलियुग का प्रभाव है l द्वापर युग का अंत होने वाला था , तभी से कलियुग ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया था l युधिष्ठिर सत्यवादी थे , पांचों पांडव धर्म की राह पर चलते थे , स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके साथ थे फिर भी सारा जीवन उन्हें कष्ट उठाना पड़ा , वन में भटकना पड़ा , राजा विराट के यहाँ वेश बदलकर नौकर बनकर रहना पड़ा l दूसरी ओर दुर्योधन अत्याचारी , अन्यायी था l सारा जीवन पांडवों के विरुद्ध षड्यंत्र करता रहा , फिर भी हस्तिनापुर का युवराज था , सारा जीवन राजसुख भोगता रहा l युद्ध भूमि में मारा गया तो मरकर भी स्वर्ग गया l पांडवों ने जीवन भर कष्ट भोगा l महाभारत के महायुद्ध के बाद राज्य भी मिला तो वह लाशों पर राज्य था , असंख्य विधवाओं और अनाथों के आँसू थे l धृतराष्ट्र और गांधारी के पुत्र शोक से दुःखी चेहरे का सामना करना मुश्किल था l पांडवों ने मात्र 36 वर्ष ही राज्य किया फिर वे अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को राजगद्दी सौंपकर हिमालय पर चले गए l यह सब ईश्वर का विधान है , इसका सही उत्तर किसी के पास नहीं है l कलियुग में भी भगवान पापियों और अत्याचारियों का अंत करने , उन्हें सबक सिखाने किसी न किसी रूप में अवश्य आते हैं लेकिन भगवान बहुत देर से आते हैं l एक बार महर्षि अरविन्द ने भी कहा था --भगवान को सबसे अंत में आने की आदत है l जब व्यक्ति का धैर्य चुक जाये , संघर्ष करते -करते हिम्मत टूट जाये , तब भगवान आते हैं l किसी कवि ने बहुत अच्छा लिखा है ---- " बड़ी देर भई , बड़ी देर भई , कब लोगे खबर मोरे राम l चलते -चलते मेरे पग हारे , आई जीवन की शाम l कब लोगे खबर मोरे राम ? " कलियुग में पाप का साम्राज्य बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यही है कि ईश्वर के न्याय का इंतजार करते -करते व्यक्ति का धैर्य समाप्त हो जाता है l ईश्वर मनुष्य के धैर्य की ही परीक्षा लेते हैं l इसलिए हमारे ऋषियों ने , आचार्य ने ईश्वर को पाने के लिए भक्ति मार्ग का सरल रास्ता बताया है l ईश्वर स्वयं अपने भक्तों की रक्षा करते हैं , भक्त के जीवन में कठिनाइयाँ तो बहुत आती हैं लेकिन ईश्वर स्वयं आकर उन्हें उन कठिनाइयों से उबार लेते हैं l सत्य के मार्ग पर कठिनाइयाँ तो बहुत हैं , लेकिन ईश्वर हमारे साथ है , वे हमारी नैया पार लगा देंगे , यह अनुभूति मन को असीम शांति प्रदान करती है , जो अनमोल है l