दो बन्दर एक दिन घूमते -घूमते एक गाँव के समीप पहुंचे l उन्होंने वहां फलों से लदा पेड़ देखा l एक बन्दर ने दूसरे से कहा ----" इस पेड़ को देखो l ये फल कितने सुन्दर दिख रहे हैं l ये अवश्य ही स्वादिष्ट होंगे l चलो हम दोनों पेड़ पर चढ़कर फल खाएं l ये अवश्य ही स्वादिष्ट होंगे l " दूसरा बन्दर बुद्धिमान था , उसने कहा---- " नहीं , नहीं , जरा ठहरो l यह पेड़ गाँव के समीप है , यदि ये फल अच्छे होते तो गांववाले इन्हें तोड़कर खा लेते , इन्हें पेड़ पर नहीं लगे रहने देते l हमें जल्दबाजी में कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए l अचानक कहीं से भी मिली भोजन सामग्री को देख -परख कर ही इस्तेमाल करना चाहिए l " पहले बन्दर को फलों को देखकर लालच आ गया था , स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पा रहा था , वह तेजी से पेड़ पर चढ़ गया और फल खाने लगा l वह फल उसका अंतिम भोजन बन गए क्योंकि वे जहरीले थे l दूसरा बन्दर जब पेड़ के समीप पहुंचा तो उसने अपने साथी को मरा पाया l उस बन्दर ने अपने अन्य साथियों को इकट्ठा किया और समझाया कि बाहर से अच्छा दिखने वाला भीतर से हमारे लिए जहरीला और घातक हो सकता है l हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती l जल्दबाजी न करें , सोच -समझकर ही निर्णय लें l "
11 May 2024
WISDIM --------
कहते हैं एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी रात्रि को कहीं से लौट रहे थे कि सामने से कुछ चोर आते दिखाई दिए l चोरों ने तुलसीदास जी से पूछा --- " कौन हो तुम ? " तुलसीदास जी तो ईश्वर के परम भक्त थे और हर जीव को ईश्वर का अंश मानते थे , इस द्रष्टि से उन्होंने कहा ---" भाई ! जो तुम सो मैं l ' चोरों ने अपनी द्रष्टि से इसका अर्थ लगाया कि जैसे वे सब चोर हैं वैसे ही ये भी चोर हैं l इसलिए चोरों ने तुलसीदास जी को चोर मानते हुए कहा -- मालूम होता है तुम अभी नए निकले हो , चलो तुम भी हमारे साथ चोरी में साथ दो l तुलसीदास जी उनके साथ चल पड़े l चोरों ने उनसे कहा --- तुम घर के बाहर खड़े रहना , कोई आता -जाता दिखे तो हमें सावधान कर देना , जब तक हम कीमती सामान उठाते हैं l अभी चोरों ने अन्दर जाकर सामान खंगालना शुरू ही किया था तभी तुलसीदास जी ने अपनी झोली से शंख निकाला और बजाना शुरू कर दिया l चोरों ने शंख की आवाज सुनी तो डरकर बाहर निकल आए l बाहर तो और कोई नहीं था , चोरों ने तुलसीदास जी से कहा ---- " जब आसपास कोई नहीं है , फिर तुमने शंख क्यों बजाया ? " तुलसीदास जी ने कहा --- मुझे तो सर्वत्र [प्रभु श्रीराम दिखाई दिए , उन्होंने तुम लोगों को भी देख लिया होगा , चोरी करना पाप है प्रभु अवश्य दंड देंगे , इसलिए मैंने आप लोगों को सावधान करना उचित समझा l " चोर समझ गए कि ये तुलसीदास कोई चोर नहीं हैं , ये तो महात्मा हैं l उनकी बातों का चोरों पर ऐसा असर हुआ कि वे सब तुलसीदास जी के चरणों पर गिर पड़े और कहने लगे ---आपने हमारी आँखें खोल दीं l प्रभु ने न जाने कितनी बार हमें पापकर्म करते हुए देखा होगा l अब हम कभी कोई बुरा कर्म नहीं करेंगे l वे सब तुलसीदास जी के शिष्य बन गए और ईश्वर की भक्ति करने लगे l