जीवन में आने वाली कठिनाइयों को चुनौती मानकर सकारात्मक तरीके से उनका मुकाबला किया जाए तो जीवन में सफलता अवश्य मिलती है l हमारे महाकाव्य हमें इस बात की शिक्षा देते हैं कि अंधकार कितना ही घना क्यों न हो , सूर्योदय अवश्य होता है l इसी विश्वास को अपने ह्रदय में रखकर निरंतर अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने का प्रयत्न किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है l महाभारत में पांडवों की माता कुंती का चरित्र अनूठा है l उनकी महानता की कहीं कोई तुलना नहीं है l धृतराष्ट्र के भाई पांडु से उनका विवाह हुआ था l महाराज पांडु को शिकार का शौक था , एक दिन उन्होंने जंगल में अपने तीर से हिरन को मारा , वह एक ऋषि थे जो हिरन के वेश में थे और उस समय अपनी पत्नी के साथ थे l मरते हुए ऋषि ने पांडु को श्राप दिया कि ----अपनी पत्नी के साथ जब तुम इसी तरह प्रेम में होगे तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी l ' इस श्राप के कारण महाराज पांडु अपनी दोनों पत्नियों कुंती और माद्री के साथ ब्रह्मचारी का जीवन व्यतीत करने लगे l महारानी कुंती ने अपने जीवन में सादगी को अपना लिया , उन्होंने अपना व्यवहार संतुलित रखा ताकि महाराज के जीवन पर कोई आंच न आए l होनी को कौन टाल सकता है l एक दिन जब वह अपनी दूसरी पत्नी माद्री के साथ एकांत के पल में थे तब ऋषि के श्राप का असर हुआ और उनकी तत्काल मृत्यु हो गई l माद्री ने स्वयं को उनकी मृत्यु का कारण मानकर उसी समय अपने प्राण त्याग दिए l युवावस्था में ही पति की मृत्यु हो जाने से पांचों पुत्रों के पालन -पोषण की जिम्मेदारी कुंती पर आ गई l पिता का साया सिर पर से हटते ही दुर्योधन आदि कौरवों के अत्याचार और षड्यंत्र शुरू हो गए l कुंती ने कभी हिम्मत नहीं हारी , अनेक कष्टों को सहते हुए उन्होंने अपने बच्चों की सही परवरिश की l यह कुंती का ही त्याग और बलिदान था जिसने पांचों पांडवों को शस्त्र और शास्त्र में निपुण , धर्म , सत्य और नीति की राह पर चलने वाला बना दिया l दूसरी ओर धृतराष्ट्र की पत्नी पतिव्रता थीं , लेकिन उन्होंने अपनी आँख पर पट्टी बाँध ली ताकि अपने पति की तरह वे भी दुनिया को न देख सकें l इसका परिणाम यह हुआ कि वे अपने बच्चों की गतिविधियों पर भी नजर नहीं रख सकीं और सब साधन होते हुए भी उनके जीवन को सही दिशा न दे सकीं परिणाम स्वरुप कौरव अधर्म और अन्याय की राह पर चलने लगे और कौरव वंश का सर्वनाश हुआ l