ईश्वर ने इस धरती पर अनेकों बार विभिन्न रूपों में अवतार लिए l अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना के लिए ही ईश्वर को आना पड़ा l कुछ समय के लिए आसुरी शक्तियों का अंत हो जाता है लेकिन अति शीघ्र ये असुर फिर से प्रबल होकर आतंक मचाने लगते हैं l असुरता क्या है ? यदि बच्चों को आरम्भ से ही नैतिक शिक्षा न दी जाए , तो बालक समाज में व्याप्त दोष -दुर्गुणों को सीख जाता है , उसका आचरण दूषित हो जाता है , यही असुरता है l व्यक्ति शिक्षा प्राप्त कर बुद्धिमान तो बन जाता है लेकिन नैतिकता का ज्ञान न होने के कारण वह अपने ज्ञान का दुरूपयोग करता है l असुरता का सबसे बड़ा दोष यह है कि यह जंगल की आग की तरह भड़कती है l ईश्वरीय विधान से उन्हें उनके कर्मों का दंड भी समय -समय पर मिलता है लेकिन इस दंड के बाद उनके आसुरी कृत्य समाप्त नहीं होते समाप्त नहीं होते l अपना अंत आया देखकर और प्रबल हो जाते हैं l श्री हनुमान जी ने रावण की लंका जला दी , उसका पुत्र अक्षय कुमार और अनेक राक्षस मारे गए , इससे रावण कमजोर नहीं हुआ , उसने देवी की पूजा -साधना कर के और अधिक शक्ति प्राप्त कर ली l कंस ने तो आकाशवाणी सुन ली थी कि उसको मारने वाला पैदा हो चुका है लेकिन अपनी मृत्यु को निकट जानकार उसने कोई सत्कर्म नहीं किए बल्कि अबोध बालकों की हत्या कराना शुरू कर दिया , अत्याचार और अधिक करने लगा l यह स्थिति प्रत्येक युग में है l आसुरी प्रवृत्ति के लोग बड़े -बड़े अपराध करते हैं , जीवन का अंत आया देखकर भी सुधरते नहीं l अपनी सफलता के लिए किसी को भी अपने रास्ते से हटाने में परहेज नहीं करते l यह तो स्पष्ट हो चुका है कि असुरों को मारने से असुरता का अंत नहीं होता l यदि किसी विधि से उनके विचारों में सुधार हो जाये , विचार परिष्कृत हो जाएँ , उनमें सद्बुद्धि आ जाए तो रूपांतरण होने में कोई देर नहीं लगती l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने सद्बुद्धि के लिए ' गायत्री मन्त्र ' को संसार के लिए सुलभ कर दिया l इस मन्त्र में अद्भुत शक्ति है जिससे संसार का कल्याण संभव है l
4 April 2025
1 April 2025
WISDOM -------
यदि मनुष्य ईश्वर के बनाए इस कर्मफल विधान को समझ जाए और होश में रहकर कर्म करे तो संसार से अत्याचार , अन्याय , अपराध और पापकर्मों का अंत हो जाए l संसार में इतना अत्याचार , अधर्म , अन्याय इसीलिए है क्योंकि अहंकार के वशीभूत होकर मनुष्य स्वयं को भगवान समझने लगा है और अपने अहंकार के पोषण के लिए मनमानी करता है l जो जितना बड़ा है उसका अहंकार भी उतना ही बड़ा है l यही कारण है कि परिवार , समाज , राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितना भी अन्याय , युद्ध , षड्यंत्र , शोषण ----- यह सब अहंकारियों के कारण ही है l यदि धन , वैभव , पद , प्रतिष्ठा , शक्ति में जो उच्च स्तर पर हैं , वे किसी तरह कर्मफल विधान को समझ जाएँ तो संसार में भी शांति आ जाये और उनका परलोक और आगे आने वाले जन्म भी सुधर जाएँ l पुराणों में अनेक कथाएं हैं जिनमें बताया गया है कि स्वयं भगवान और कर्मों का निर्धारण करने वाले यमराज को भी कर्मफल भोगना पड़ता है तो मनुष्य इस विधान से कैसे बच सकता है l ऋषि कहते हैं ---कर्मों के परिणाम से बचने के लिए आप संसार के किसी भी कोने में छिप जाओ , कर्म आपको उसी तरह ढूंढ लेते हैं जैसे हजारों गायों के बीच बछड़ा अपनी माँ को ढूंढ लेता है l हमारे कर्म हमारी पर्सनल फ़ाइल है जो हमेशा हमारे साथ है l अच्छा -बुरा जो भी किया है उसका हिसाब जन्म -जन्मांतर की इस यात्रा में कभी न कभी चुकाना ही पड़ेगा l एक कथा है ---- एक चरवाहे की शिकायत पर राजा ने दूसरे पक्ष को सुने बिना ही अनजाने में महर्षि मांडाव्य को सूली की सजा सुना दी l सूली का भयंकर कष्ट सहन करते हुए महर्षि ने प्राण त्याग दिए और उनकी आत्मा यमलोक पहुंची l महर्षि की तपस्या के कारण स्वयं महर्षि को लेने यमराज यमलोक के द्वार पर पहुंचे l तब महर्षि ने यमराज से पूछा ---" यमराज ! मेरे द्वारा वह कौन सा कर्म था जिसके परिणाम स्वरुप मुझे सूली पर चढ़ने का घातक कष्ट भुगतना पड़ा l " तब यमराज ने चित्रगुप्त के पास उनके सभी कर्मों का हिसाब देखा और कहा --- " महर्षि ! जब आप आठ वर्ष के थे तब आपने एक कीड़े की गर्दन पर एक धारदार वस्तु से प्रहार किया था l वही कर्म आपको सूली पर चढ़ने के रूप में चुकाना पड़ा l " महर्षि ने कहा ---- " यमराज ! आठ वर्ष के बालक को कर्मों के शुभ -अशुभ होने का विवेक नहीं होता , उस बालक में इतनी समझ नहीं होती कि वो अपने कर्मों के दूरगामी परिणामों को महसूस कर सके l ऐसी स्थिति में कर्म के निर्धारण की सम्यक जिम्मेदारी इस पद पर आसीन होने के कारण तुम्हारी थी यमराज l इस जिम्मेदारी को पूर्ण करने में तुम सफल नहीं रहे इसलिए तुम्हे भी अपने कर्म दोष का परिणाम भुगतना पड़ेगा और तुम धरती पर एक साथ दो व्यक्तियों के रूप में जन्म लोगे l एक रूप में तुम शासक बनोगे , परन्तु जीवन भर भटकते रहोगे और दूसरे रूप में तुम ज्ञानी तो होगे , परन्तु अधिकार से शून्य रहोगे l " महर्षि का वचन सत्य हुआ l यमराज को धरती पर दो रूपों में जन्म लेना पड़ा l पहले रूप में वे युधिष्ठिर बने , जिसमें वे शासक तो थे , परन्तु जीवन भर भटकते रहे और दूसरे रूप में वे सूतपुत्र विदुर थे l विदुर ज्ञानी थे लेकिन उन्हें कोई महत्त्व और अधिकार नहीं मिला , गरीबी में जीवन व्यतीत किया l कर्म की गति गहन है l