22 March 2025

WISDOM -----

  देवता  और  असुरों  में  तो  आदिकाल  से  ही संघर्ष  चला  आ  रहा  है  l  देवता  विजयी  होते  हैं   लेकिन  कलियुग  का  यह  दुर्भाग्य  है  कि  इसमें  असुरता  पराजित  नहीं  होती  , असुरता  बढ़ती  ही  जाती  है  l  असुरता  को  पराजित  करने  के  लिए  आध्यात्मिक  बल  की  और  सत्कर्मों  की  पूंजी  की  आवश्यकता  होती  है  l  इसी  के  आधार  पर  दैवी  शक्तियां  मदद  करती  हैं  l  हिरण्यकश्यप  से  डरकर  सबने  उसे  भगवान  मान  लिया   लेकिन  उसी  के  पुत्र  प्रह्लाद  ने  उसे  भगवान  नहीं   माना  l  प्रह्लाद  के  पास  भक्ति  का  बल  था  l   वर्तमान  समय  में  धन -वैभव  के  आधार  पर  मनुष्य  की  परख  है  l  इसलिए  हर  व्यक्ति  धन  कमाने   और  धन  के  बल  पर  समाज  में  अपनी  साख  बनाने  का  हर  संभव  प्रयास  करता  है   l  मात्र  धन  कमाना  है  , उसमें  नैतिकता  मायने  नहीं  रखती   इसलिए  धन  कमाने  और   विलासिता  से  उसका  उपभोग  करने  के  कारण  व्यक्ति  से  अपने  जीवन  में  अनेक  गलतियाँ  हो  जाती  हैं  , जिन्हें  वह  समाज  से  छुपाना  चाहता  है  l  यही  वजह  है  कि  व्यक्ति  में  यह  कहने  का  कि  "  गलत  का  समर्थन  नहीं  करूँगा  "   का  साहस  नहीं  होता  l  अपराधी  और  शक्तिशाली  के  समर्थन  में  अनेकों  खड़े  हो  जाते  हैं  l  जब  स्वयं  में  कमियां  हों  तो   उसका  विरोध  कौन  करे  l  इसलिए  असुरता   दिन  दूनी  रात  चौगुनी  ' गति  से  बढ़ती  जाती  है  l  आसुरी  कर्म  करते  रहने  से  व्यक्ति  की  आत्मा  मर  जाती  है  ,  उनका  मन  रूपी  दर्पण  इतना  मैला  हो  जाता  है  कि  उन्हें  उसे  देखने  की  जरुरत  ही  नहीं  होती  l   उन्हें  समय -समय  पर  प्रकृति  की  मार  भी  पड़ती  है  लेकिन  ऐसे  लोगों  को  पाप कर्म  करने  की  लत  पड़  जाती  है  ,  उन्हें  इसी  में  आनंद  आता  है  l  इसी  का  नाम  संसार  है  l  

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