देवता और असुरों में तो आदिकाल से ही संघर्ष चला आ रहा है l देवता विजयी होते हैं लेकिन कलियुग का यह दुर्भाग्य है कि इसमें असुरता पराजित नहीं होती , असुरता बढ़ती ही जाती है l असुरता को पराजित करने के लिए आध्यात्मिक बल की और सत्कर्मों की पूंजी की आवश्यकता होती है l इसी के आधार पर दैवी शक्तियां मदद करती हैं l हिरण्यकश्यप से डरकर सबने उसे भगवान मान लिया लेकिन उसी के पुत्र प्रह्लाद ने उसे भगवान नहीं माना l प्रह्लाद के पास भक्ति का बल था l वर्तमान समय में धन -वैभव के आधार पर मनुष्य की परख है l इसलिए हर व्यक्ति धन कमाने और धन के बल पर समाज में अपनी साख बनाने का हर संभव प्रयास करता है l मात्र धन कमाना है , उसमें नैतिकता मायने नहीं रखती इसलिए धन कमाने और विलासिता से उसका उपभोग करने के कारण व्यक्ति से अपने जीवन में अनेक गलतियाँ हो जाती हैं , जिन्हें वह समाज से छुपाना चाहता है l यही वजह है कि व्यक्ति में यह कहने का कि " गलत का समर्थन नहीं करूँगा " का साहस नहीं होता l अपराधी और शक्तिशाली के समर्थन में अनेकों खड़े हो जाते हैं l जब स्वयं में कमियां हों तो उसका विरोध कौन करे l इसलिए असुरता दिन दूनी रात चौगुनी ' गति से बढ़ती जाती है l आसुरी कर्म करते रहने से व्यक्ति की आत्मा मर जाती है , उनका मन रूपी दर्पण इतना मैला हो जाता है कि उन्हें उसे देखने की जरुरत ही नहीं होती l उन्हें समय -समय पर प्रकृति की मार भी पड़ती है लेकिन ऐसे लोगों को पाप कर्म करने की लत पड़ जाती है , उन्हें इसी में आनंद आता है l इसी का नाम संसार है l
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