हमारे महाकाव्य हमें बहुत कुछ सिखाते हैं l महाभारत की कथा महर्षि व्यास की ओजपूर्ण वाणी से प्रवाहित हुई और गणेश जी की अथक लेखनी ने उसे लिपिबद्ध किया l महाभारत के विभिन्न प्रसंग इस युग में , इस धरती पर वैसे ही हैं जैसे उस युग में थे l छल , कपट , षड्यंत्र , धोखा , अहंकार ---सब कुछ वैसा ही है , केवल पात्र बदल गए l कुछ घटनाएँ ऐसी हैं , उनमे छिपे हुए संकेतों को समझा जा सकता है जैसे ----गुरु द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की l उस काल के सब गणमान्य , विचारवान , नीति , अनीति को समझने वाले , महानुभाव सब इस में सम्मिलित थे l कुटिलता से उन्होंने अर्जुन को संशप्तकों के साथ युद्ध में उलझा दिया l अब इस पक्ष में केवल अभिमन्यु ही था , जिसे चक्रव्यूह का ज्ञान था , यह उसने अपनी माँ के गर्भ में था तभी सीख लिया था l यह कैसा युद्ध था , एक ओर 17 -18 वर्ष का युवा अभिमन्यु अकेला था और दूसरी ओर उससे आयु में दुगुने -तिगुने , शक्तिशाली सब एक समूह में थे l द्रोणाचार्य , अश्वत्थामा , कर्ण , जयद्रथ , शकुनि आदि सात महारथी अपने -अपने स्वार्थवश दुर्योधन के साथ थे और सब ने मिलकर अभिमन्यु का वध कर दिया l यह स्थिति आज भी है , चाहे परिवार हो , कोई संस्था हो राष्ट्र हो या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति हो , चक्रव्यूह आज भी रचे जा रहे हैं l उम्र के बढ़ने के साथ कामनाएं , वासनाएं बढ़ती ही जा रही हैं , त्याग का तो नाम ही नहीं है l अभिमन्यु का जब वध हुआ तब वह समय भी युग परिवर्तन का था और कलियुग के इस धरती पर आने की आहट थी , इसलिए ऐसा अनर्थ हुआ l आज का समय भी युग परिवर्तन का है लेकिन अब कलियुग का अंत और सतयुग के आरम्भ होने का समय है इसलिए अब कोई अभिमन्यु नहीं मारा जायेगा , अब आसुरी शक्तियों का अंत होगा l बड़े -बड़े चक्रव्यूह रचने वालों के राज बाहर आयेंगे , अब अभिमन्यु विजयी होगा और चक्रव्यूह में सम्मिलित जयद्रथ , द्रोणाचार्य -----आदि सभी का एक -एक कर के अंत होगा l ईश्वरीय विधान कुछ ऐसा है कि वे बड़े से बड़े महापपियों को भी सुधरने का पूरा मौका देते हैं , विभिन्न संकेतों से उन्हें समझाते भी हैं कि अनीति , अत्याचार का साथ मत दो वरना अंत बहुत बुरा होगा l जो इन संकेतों को समझ जाये तो ठीक है अन्यथा यम के दूत तो तैयार हैं l कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है चाहे हँसकर भोगो या रो -रोकर भोगो l
Omkar....
22 August 2026
19 August 2026
WISDOM -----
संसार में बहुत लम्बे समय से धर्म पर चर्चाएँ होती रही हैं l कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है , किसका वर्चस्व रहेगा यह सब विवाद बहुत सामान्य हो गया है लेकिन सर्वश्रेष्ठता का पैमाना क्या होगा ? संख्यात्मक वृद्धि या गुणात्मक वृद्धि ? किसे आधार माना जाए l पं . श्रीराम शर्मा जी ने अपने प्रवचनों में बहुत सरल ढंग से समझाया है l आचार्य श्री कहते हैं ---"भगवान को समीप बुलाने का एक ही मार्ग है कि हम ' धर्म पथ ' पर अग्रसर रहें और पात्रता विकसित करें l सत्पात्र की दो ही निशानियाँ हैं ---1 .उसका चरित्र पवित्र और पारदर्शी हो l 2 . उसके ह्रदय में करुणा हो , संवेदना हो l जिस व्यक्ति का व्यक्तित्व ऐसा शानदार और मजबूत होगा भगवान उसके पास खिंचे चले आते हैं l " उनके इन वचनों से यही स्पष्ट होता है कि सद्गुणों से युक्त व्यक्ति जिस भी धर्म में अधिक होंगे वही धर्म सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा और वही चिरकाल तक कायम रहेगा l अब समस्या यही है कि कलियुग में पाप , अनीति , अपराध , अत्याचार आदि दुर्गुणों की बाढ़ आ गई है , तो सद्गुण कैसे स्थापित हों ? समाज को दिशा देने वाले ही दिशाभ्रमित हैं , उनके कोरे उपदेशों का कोई असर नहीं होता l आचरण से ही शिक्षा दी जा सकती है लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं जिनके आचरण और व्यवहार में एकरूपता हो l आज की युवा पीढ़ी तो इतनी बुद्धिमान है कि समाज के बड़े -बड़े और जिम्मेदार लोगों का भूत , वर्तमान सब खोज लेती है l बुराई का मार्ग बहुत सरल होता है , पानी नीचे की ओर बड़ी तेजी से गिरता है इसलिए युवा पीढ़ी का भटकना स्वाभाविक है l आज संसार पतन और पराभव की ओर जा रहा है , इस स्थिति को पलटने का और अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने का एक ही मार्ग आचार्य श्री ने संसार को बताया और वह है ---- ' गायत्री मंत्र ' l यदि संसार में सभी लोग इस मन्त्र को अपनी पूजा का अभिन्न अंग बना लें तो नकारात्मकता दूर होगी l व्यक्ति के जीवन में , वातावरण में सकारात्मकता आएगी l आचार्य श्री कहते हैं --- हम मंत्र का अर्थ जाने या न जाने , यदि हम श्रद्धा और विश्वास से मंत्र जप करते हैं तो मंत्र के देवता अवश्य आते हैं और आशीर्वाद देते हैं l '
17 August 2026
WISDOM -----
3 August 2026
WISDOM -------
हमारे पुराणों में जो कथाएं हैं , वे मात्र मनोरंजन के लिए नहीं हैं l उनमें प्रत्येक युग की परिस्थितियों के अनुरूप गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं l ऐसी ही एक कथा है ---- एक असुर जिसका नाम भस्मासुर था , उसने शिवजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और वरदान माँगा कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रख दे , वही भस्म हो जाए l यह वरदान प्राप्त कर उसने धरती पर उत्पात मचाना शुरू कर दिया l गलत सलाह देने वाले प्रत्येक युग में होते हैं , उन्होंने भस्मासुर को सलाह दी कि तुम शिवजी के ही सिर पर हाथ रख दो , उसके बाद उनका सब कुछ तुम्हारा ही होगा l शिवजी ने जब देखा कि भस्मासुर उन्हें ही भस्म करने आ रहा है तो उन्होंने भागकर विष्णुजी के पास शरण ली l तब विष्णुजी ने मोहिनी रूप धारण किया , उसको सम्मोहित कर कहा कि जैसे वे नृत्य करें वैसी ही भाव -भंगिमा वह भी करे l नृत्य की लय के साथ मोहिनी रूप धारी विष्णुजी ने अपने सिर पर हाथ रखा , वैसे ही भस्मासुर ने अपने सिर पर हाथ रखा और वह वहीँ जल कर भस्म हो गया l यह कथा सांकेतिक रूप में बहुत बड़ा शिक्षण देती है ------- ------- आज एक नहीं अनेक भस्मासुर हैं , जो अपने जीवन में अनेक पापकर्म करते हैं और फिर किसी सिद्ध संत -साधक के पाँव पकड़ कर उनकी करुणा को जगा देते हैं , अनेक लोग तरह -तरह के प्रलोभन देकर , कभी भय दिखाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लेते हैं l इन संत -साधकों के पास ज्ञान का तो भंडार है लेकिन ये भी शिवजी की तरह बहुत भोले व सरल होते हैं , आज के युग के लोगों की चालाकी को नहीं समझ पाते l वास्तव में ये भस्मासुर , इन संत -साधकों की समीपता प्राप्त कर उनके पुण्य , उनकी सकारात्मक ऊर्जा को खींच लेते हैं और अपने पापों का बोझ , अपनी नकारात्मक ऊर्जा उन पर उड़ेल देते हैं l ये एनर्जी वैम्पायर हैं , समाज में छुट्टा घूमते हैं और पुण्यात्मा लोगों की एनर्जी चूसकर ऐशोआराम का जीवन जीते हैं l एनर्जी ट्रान्सफर के इनके पास अनेक तरीके हैं l भगवान शिव तो स्वयं महाकाल हैं , यह कथा तो समाज को सचेत करने के लिए है कि अपने ज्ञान से अच्छे-बुरे लोगों की परख करो l अब विष्णु भगवान नहीं आयेंगे , अपनी एनर्जी की स्वयं सुरक्षा करो l हम देखते हैं कि अनेक संत -साधक बहुत नियम संयम से , तपस्वी का जीवन जीने के उपरांत भी बड़े शारीरिक कष्ट में हैं , ईश्वर उन्हें सहन शक्ति देते हैं लेकिन ये बीमारी उनके भाग्य की नहीं है , ये तो पापियों को आशीर्वाद देकर , अपने पुण्य देकर उनके पापों का बोझा ढो रहे हैं l हमारी गंगा मैया भी पापियों का बोझा ढोने से इतनी प्रदूषित हो गईं l विधाता भी न्याय करने से पहले पाप -पुण्य के घड़े को देखते हैं l इस युग के असुर एनर्जी ट्रान्सफर से अपने पाप का घड़ा जब -तब खाली कर लेते हैं और पुण्यात्मा लोगों की एनर्जी पर ठाठ से रहते हैं l यही कारण है कि संसार में असुरता कम नहीं हो रही है l
1 August 2026
WISDOM ------
इस संसार में धरती का कोई ऐसा कोना नहीं जहाँ जाति , धर्म , अमीर -गरीब , ऊँच -नीच , रंग -रूप आदि को लेकर भेदभाव न हो l केवल मृत्यु ही ऐसी है जो किसी से कोई भेदभाव नहीं करती , यमराज के सामने सब एक समान हैं l ईश्वर ने सब को गिनती की साँसे दी हैं , जिस पल वह पूरी हो गईं , फिर उसका धरती पर खेल खतम l l कहते हैं जब मनुष्य का जन्म होता है तब विधाता आते हैं , उसका भाग्य लिख देते हैं जिसमें यह भी लिखा होता है कि उसकी मृत्यु कब और कैसे होगी l एक कथा है ----- राजा विक्रमादित्य रात्रि को वेश बदल कर राज्य का भ्रमण करते थे l भ्रमण करते हुए वे बहुत दूर निकल गए l वहां उन्हें एक झोपड़ी से कुछ आवाज आ रही थी , उन्होंने वहीँ रुकने का निश्चय किया और उसका दरवाजा खटखटाया l किसान बाहर निकला , राजा ने कहा --मैं आज रात यहाँ विश्राम करना चाहता हूँ , सुबह चला जाऊँगा l किसान ने कहा ---मेरी झोपड़ी बहुत छोटी है और पत्नी को प्रसव पीड़ा हो रही है अत: आप बाहर विश्राम करे l राजा तो वेश बदले हुए थे बाहर विश्राम करने लगे l कुछ समय बाद शिशु के रोने की आवाज आई , किसान ने बताया कि पुत्र हुआ है l उस समय राजा विक्रमादित्य ने किसी को झोपड़ी में प्रवेश करते देखा , उन्होंने तुरंत उसे रोक लिया और कहा --कौन हो तुम ? इतनी रात्रि में यहाँ क्यों जा रहे है ? उसने कहा ---मैं विधाता हूँ , इस शिशु का भाग्य लिखने जा रहा हूँ l थोड़ी देर बाद जब विधाता लौटे तो राजा विक्रमादित्य ने तलवार निकलकर उनका रास्ता रोक लिया और कहा कि बताओ , तुमने उस बच्चे के भाग्य में क्या लिखा ? विधाता ने कहा --यह बताया नहीं जाता , तुम मुझे जाने दो l विक्रमादित्य बहुत वीर थे , वे टस से मस न हुए , उन्होंने विधाता से कहा --केवल इतना बता दो कि इसकी मृत्यु कैसे होगी l तब विधाता को बताना पड़ा कि अमुक तिथि को इसको शेर खा जायेगा l प्रात:काल होने पर राजा ने किसान को अपना परिचय दिया और कहा कि इस बच्चे को अब राजसी सुरक्षा में रखा जायेगा l राजा ने उसकी सुरक्षा के लिए बहुत मजबूत एक हॉल बनवा दिया , इतना मजबूत कि एक परिंदा तो क्या एक चींटी भी उसमे प्रवेश नहीं कर सकती थी l हजारों नौकर , सिपाही उसकी सुरक्षा में लगे थे l राजा को विधाता के लेख को मिटाना था l सुरक्षा के साथ उस बच्चे की शिक्षा व मनोरंजन के लिए सब व्यवस्था थी , दीवार पर विभिन्न जानवरों की तस्वीरें भी थीं l आखिर उसकी मृत्यु की घड़ी आ गई , अन्दर बाहर सब जगह उसकी सुरक्षा के लिए सैनिक तैयार थे , सब अपने हथियार लेकर देखते ही रह गए , दीवार पर शेर की भी तस्वीर थी , उसमें से शेर प्रगट हो गया और बच्चे को खा गया l तब राजा को समझ में आया कि कोई कितना भी वीर क्यों न हो , सुरक्षा के कितने ही साधन हों , मृत्यु को , विधाता के लेख को टाला नहीं जा सकता l
30 July 2026
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ' महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग ' में लिखते हैं ----- " वास्तव में अधिकार पद बड़ा विडम्बनापूर्ण होता है l जब तक वह सक्षम और समर्थ है , लोग उसकी झूठी चाटुकारी किया करते हैं और जब वह असहाय और विवश होता है तो तुरंत आँखे ही नहीं फेर लेते बल्कि न उठने देने के लिए दो धक्के और दे देते हैं l " --- विश्व विजय की कामना लिए हुए जब सिकंदर फारस देश पर आक्रमण करने जा रहा था l सहसा एक स्थान पर उसकी तबियत ख़राब होने लगी , तुरंत तम्बू लगा दिया गया l सिकंदर पेट और ह्रदय-स्थल की पीड़ा से छटपटाने लगा l सिकंदर के साथ यूनान के कई सुयोग्य हकीम आए हुए थे , उन्होंने सिकंदर के शरीर और नाड़ी की परीक्षा की और वे हताश हो गए l उन्हें विश्वास हो गया कि सिकंदर चन्द मिनटों का मेहमान है l सिकंदर असहाय सा हकीमों और सरदारों की ओर सहायता के लिए देख रहा था l इधर सरदार सहायता से यह सोचकर मुँह छिपा रहे थे कि शायद इसकी मृत्यु के बाद यह अधिकार हमें मिल जाए और हकीम सोच रहे थे कि यदि मेरी दवा लेने के बाद मर गया तो लोग यह संदेह करेंगे कि इसे मैंने जानबूझ कर मार डाला , तब बेकार में जान आफत में फंसेगी l उन सब का स्वामी सिकंदर मर रहा था और उसकी मृत्यु की घड़ी देखकर सब अपने -अपने हित की सोच रहे थे l l आचार्य श्री आगे लिखते हैं ---- " जब तक शक्तिमंतों की भुजा में बल , वाणी में प्रभाव और विस्तार पर नियंत्रण रहता है , सभी उसे नमन करते हैं , उसके अत्याचार को वीरता , अनीति को चातुर्य और शोषण को आवश्यकता मानते हैं किन्तु ज्यों ही उसकी ये विशेषताएं समय पाकर क्षीण हो जाती हैं त्यों ही लोगों के मन और द्रष्टिकोण बदल जाते हैं l लोग निर्णायक की तरह उसके जीवन तथा कृत्यों का लेखा -जोखा करने लगते हैं , उसके गुण नीचे पड़ जाते हैं और सारे दोष उभर आते हैं l " आचार्य श्री लिखते हैं ---"सिकंदर का जीवन इस सत्य को सिद्ध करता है , सिखाता है कि बड़े आदमी बनने की अपेक्षा महान कार्य करने की कामना हजार गुनी श्रेष्ठ है l "
29 July 2026
WISDOM -----
कहते हैं जो भी महाभारत में है , वही इस धरती पर है l सब कुछ वैसा ही है , यह हमारा विवेक है कि हम क्या सीखते हैं l कौरवों के कुलगुरु थे --- कृपाचार्य l दुर्योधन ने जीवन भर जितने षडयंत्र किए , छल -कपट किया , कुलगुरु होने के नाते वे दुर्योधन को ऐसा करने से रोक सकते थे , धृतराष्ट्र को भी समझा सकते थे कि ऐसा अन्याय न करें , इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उन्हें राजसी सुख भोग की आदत हो गई थी और दुर्योधन के विरोध का मतलब था उन राजसी सुखों से वंचित हो जाना l ऐसे ही संत -महात्मा आज के समय में भी हैं , उन्हें अपनी दुकान की चिंता है , वे सब शक्ति और धन -वैभव संपन्न लोगों को खुश करने में लगे रहते हैं l इस युग में जिनके पास पद -प्रतिष्ठा है , धन संपन्न हैं वे भी सोचते हैं की जितनी चाहे मनमानी कर लो , पापकर्म कर लो फिर बड़े -बड़े संत -साधकों से पूजा - पाठ करा लेंगे जिससे सारे पाप धुल जाएंगे l मन्त्र की और विधि -विधान से पूजा -पाठ की ऐसी शक्ति भी है कि ऐसा होता भी है और ऐसे लोगों के सुख - वैभव में कहीं कोई कमी नहीं आती l लेकिन जो साधक - संत उनके लिए इतनी तपस्या करते हैं , इसके लिए उन्हें पर्याप्त धन -राशि , मान -सम्मान तो मिल जाता है लेकिन कहते हैं इसमें उनके पुण्यों का एक बड़ा हिस्सा भी चला जाता है l अब वे विभिन्न नेक कर्मों से इसकी क्षतिपूर्ति कर लें तो ठीक है अन्यथा उन संत -साधकों का पतन शुरू हो जाता है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- अत्याचारी , अन्यायी और मर्यादाहीन आचरण करने वालों का कभी भी साथ न दें , ऐसे लोग स्वयं तो डूबेंगे और जो भी उनके साथ है , उन सब को ले डूबेंगे l महात्मा विदुर ने दुर्योधन के गलत कार्यों का कभी समर्थन नहीं किया राजमहल के सुख छोड़कर बहुत साधारण जीवन जिया l विदुर जी की सत्य -निष्ठा और सादगी की ऐसी ताकत थी कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के स्वादिष्ट पकवान त्याग दिए और विदुर जी के घर जाकर साग -रोटी खा कर ही तृप्त हो गए l