27 December 2025

WISDOM ------

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- "  सद्विचार  और  सत्कर्मों  का  जोड़  होना  बहुत  आवश्यक  है l  विचारों की  शक्ति  जब  तक  कर्म  में  अभिव्यक्त  नहीं  होती   उसका  पूरा  लाभ  नहीं  होता   l '       वर्तमान  युग  कलियुग  इसी  लिए  है  कि  यहाँ  सद्विचार  और  सत्कर्म  का  जोड़  नहीं  है  l  लोग  बहुत   आदर्श  की  बात  करते  हैं लेकिन  उनका  वैसा  आचरण  नहीं  है  इसलिए   जनता  उनसे  प्रभावित  नहीं  होती  ,  उनकी चेतना  में  विचारों  में  कोई  परिवर्तन  नहीं  होता  l   एक  नशा  करने  वाला   अपने  साथ  सैकड़ों  नशेड़ी  जोड़  लेता  है   क्योंकि पहले  वह  स्वयं  नशा  करता  है  ,  उसके  बाद  ही  दूसरों  को  नशा करने  के  लिए  प्रेरित  करता  है  l  वह  जो कहता  है , वैसा  ही  स्वयं  भी  करता  है   इसलिए  वह  अनेकों  को  अपने  साथ  जोड़  लेता  है  l  

25 December 2025

WISDOM -----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- " व्यक्ति  का  चरित्र  और  उसकी  उच्च  भावनाएं  ही  उसे  महान  और यशस्वी   बनती  हैं  , पद , सम्मान  नहीं  l  "    अथाह  धन -संपदा  जोड़  लेने  से , उच्च  पद  प्राप्त  कर  लेने  से ,  प्रवचन  से   कोई व्यक्ति  महान  नहीं  बनता  l  महत्वपूर्ण  यह  है  कि  इस  स्थिति तक  पहुँचने का  सफ़र  कैसे तय  किया   ?   आचार्य जी  लिखते  हैं  - ' गलत   रास्ते  से  प्राप्त  की  गई  सफलता  अंत  में कलंकित  हो  जाती  है   l '    कलियुग  की  सबसे  बड़ी  त्रासदी  यही  है  कि   समाज  को  सही  दिशा  देने   वाले  ही  दिशा भ्रमित  हैं  l  तृष्णा , कामना , वासना  , महत्वाकांक्षा  ----का  जाल  इतना  घना  है  कि  व्यक्ति  उसमें  एक  बार  फँस  गया  तो  निकलना  मुश्किल  है  !  लेकिन  इस  संसार  में  असंभव  कुछ  भी  नहीं  l  व्यक्ति  की  आत्मा  में  इतनी  शक्ति  है   कि  वह  संकल्प  ले  तो  असंभव  को  भी  संभव  कर  सकता  है  l  आचार्य श्री कहते हैं  ---भूल समझ  आने  पर  उल्टे  पैरों  लौट  आने  में  कोई  बुराई  नहीं  l  ' विचारों  में परिवर्तन  और  परिमार्जन  से  जीवन की  दिशा  कैसे  बदल जाती  है   इसका  उदाहरण  लियो टालस्टाय  का  जीवन  है  l  l  वे  रूस  के  सामंती  वंश  के  राजकुमार  थे  l सामंत  सेनापतियों  की  सारी  बुराइयाँ  उनमें  भरी  पड़ी  थीं  लेकिन  सत्य  का  प्रकाश  आते  ही , विचारों  में  परिवर्तन  होते  ही   उनके जीवन  की  दिशा  धारा ही  बदल  गई  l   मद्यपान , क्रूरता , हत्या  , व्यसन  और  विलासिता  का  जीवन  जीने  वाले   टालस्टाय   अब  प्रेम , करुणा , सह्रदयता , सहानुभूति  और  त्याग , तपस्या  की  मूर्ति   महात्मा टालस्टाय  बन  गए  l  लियो टालस्टाय  कहते  हैं --- "  दुनिया  की  हर  बुराई  और  बेइंसाफी  की  अधिकतम  जिम्मेदारी से  विद्वान , साहित्यकार  और  कलाकार  बच  नहीं  सकता  l  आरम्भ  में  मैं  भी  साहित्यकार  की  जिम्मेदारी को  नहीं  समझा  था  l  मैं  नहीं  जानता  था  कि  मैं  क्या  लिख  रहा  हूँ   और  क्या  शिक्षा  दे  रहा  हूँ  l  मेरी  एक  ही  अभिलाषा थी  कि  अधिक  से  अधिक  धन  और यश  का   संपादन  किया  जाए  l  यह  मेरा  पागलपन  था   और  इस  पागलपन  को  दूर  करने  में   मुझे  पूरे  छह  वर्ष  लग  गए  l "   टालस्टाय  ने  जब  अपने  साहित्यिक  दायित्व  को  समझा  तो  वे  महात्मा  बन  गए  l  

21 December 2025

19 December 2025

WISDOM ------

   बर्नार्ड  शा  एक  प्रसिद्ध  आलोचक  और  नाटककार  थे  l    उनका  एक  प्रसिद्ध  नाटक  था   ' मिसेज  वारेंस  प्रोफेशन '    इसमें  समाज  में  फैली  विकृतियों  पर  आक्रमण  किया   गया  था  l   इसमें  दिखाया  गया  था  कि  जो  लोग  समाज  में  ऊपर  से  ' सज्जन  और  सभ्य '  बने  रहते  हैं   , उनमे  से  कितनों  का  ही  भीतरी  जीवन   कितना  पतित  होता  है  l  यह  रचना  प्रकाशित  होते  ही  अश्लील  बताकर जब्त  कर  ली  गई  l  लेकिन  बाद  में  यह  प्रतिबन्ध  हटा  लिया  गया   और  इसे  सच्चरित्रता   की  शिक्षा  देने  वाला  माना  गया   l                                                                                                                     मनुष्य  नाम  का  प्राणी  जब  से  इस  धरती  पर  आया  तभी  से  विकृतियां  उसमें  हैं  , मनुष्य  ने  उन्हें  दूर  करने  का  , अपने  मन  पर  नियंत्रण  करने  का  कभी  प्रयास  नहीं  किया   इसलिए  मानव  चेतना  परिष्कृत  नहीं  हो  सकी  ,  भौतिक  रूप  से  मनुष्य  सम्रद्ध  होता  गया  लेकिन  चेतना  के  स्तर  पर   पशु  से  भी  निम्न  स्तर  का हो  गया  l  पशु  तो  अपनी  आयु  और  मौसम  के  अनुसार  आचरण  करते  हैं  लेकिन  बुद्धिमान  होने  के  कारण   और  सद्बुद्धि  न  होने  के  कारण   मनुष्य     मनुष्यता  को  ही  भूल    जाता  है   और  समाज  से  छिपकर  , मुखौटा  लगाकर   अपनी  विकृतियों  को  पोषण  देता  है  l   मनुष्य  की  सबसे  बड़ी  भूल  यह  है  कि   वह  सोचता  है  कि  समाज  से  , परिवार  से  छिपकर  वह  जो  कुकृत्य  करता  है  उसे  कोई  भी  नहीं  जान  सकेगा  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- ' सत्य   को   कभी   छुपाया  नहीं  जा  सकता  l  मनुष्य  के  व्यक्तित्व  में  इतने  छिद्र  हैं  कि  सत्य  उनमें  से  होकर  बाहर  आ  ही  जाता  है  l  '  फिर   परमात्मा  हजार  आँखों  से  देख  रहा  है  , यह  सम्पूर्ण  प्रकृति  , यूनिवर्स  व्यक्ति  के  प्रत्येक  कार्य  का  , उसके  मन  में   छिपे  अच्छे-बुरे  विचारों  का  गवाह  है  l  यदि  मनुष्य  प्रकृति  के  हर  कण  में  ईश्वर  की  सत्ता  को  स्वीकार  कर  ले   तभी  वह  पापकर्म  करने  से  डरेगा  ,   ईश्वर  के  न्याय  से उसे  भय  होगा   और  यहीं  से  उसकी  चेतना  के  परिष्कृत  होने  का  मार्ग  खुल  जायेगा  l   

17 December 2025

WISDOM ------

   जरथुस्त्र  जब  जन्में  तो  हँसते  हुए  पैदा  हुए  l  अन्य  बालकों  की  तरह  रोए  नहीं  l  सभी  आश्चर्यचकित  थे  कि  यह  रोए  क्यों  नहीं  l  जब  जरथुस्त्र  बड़े  हुए  तो  तो  लोगों  ने  जन्म  के  समय  हँसने  का  वृतांत  उन्हें  सुनाया   और  इसका  रहस्य  जानना  चाहा  l  वे  बोले  ---- "  हम  तो  मर  रहे  थे  ,  तब  भी  हँस  रहे  थे  l  तब  से  ही  परदे  के  पीछे  से  हँसते  चले  आ  रहे  हैं  l  हम  जन्म  के समय ही  नहीं  हँसे  ,  हर परिवर्तन   हँसकर  ही  झेला  जाता  है  l  "  जरथुस्त्र  अंतिम  समय  भी  हँसे   तो  लोगों  की समझ  में  नहीं  आया  कि  अब  क्यों  हँसे  ?  पूछा  गया  तो  बोले  ----- "  लोगों  को  रोते  देखकर    हँसी  आ  गई  कि  कितने  नादान  हैं  ये  ,  हम  मकान  बदल  रहे  हैं  ,  तो  इन्हें  क्यों  परेशानी  हो  रही  है  l "  आचार्य श्री  कहते हैं  ----' यदि  हम  परिवर्तन  को   इसी  तरह  मुस्करा कर  स्वीकार  कर  लें   तो  जीवन  जीने  का  मन्त्र  आ  जाए  l '

14 December 2025

WISDOM -----

    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- " संसार  में  बुराई  और  भलाई  का  , हानि -लाभ  का  , प्रिय -अप्रिय  का  और  सुख -दुःख   अस्तित्व  है  और  वह  बना   ही  रहेगा  l  हमें  किसी  का  भी  प्रभाव  अपने  ऊपर  ऐसा  नहीं  पड़ने  देना  चाहिए   जो  मानसिक  संतुलन  बिगाड़  कर  रख  दे  l  यदि  हमारा  द्रष्टिकोण  सकारात्मक  है   तो  विपत्ति  का प्रत्येक  धक्का   हमें  अधिक  साहसी , बुद्धिमान   और  अनुभवी  बनाता  है  l "  आचार्य श्री  कहते  हैं  ---- " जीवन  एक  कला  है   और  इसे  आनंदपूर्वक   सीखना  एवं  जीना  चाहिए  l  जो  जीवन  जीना  जानता  है  वही  सही  मायने  में  कलाकार  एवं  प्रतिभावान है  l  "   विभिन्न  सर्वेक्षणों  से  यह  तथ्य  प्रकट  होता  है   अपने  विषय  के   विद्वान , प्रतिभावान ,  धन-वैभव  संपन्न  , , उच्च पदों  पर  बैठे  व्यक्ति  ---- अनेक  ऐसे  हैं  जिनका  निजी  जीवन  विखंडित  और  विभाजित  है   l  उन्हें  अपनी  सामान्य  सी  जिन्दगी  को  चलाने  के  लिए   नशा , मादक  द्रव्य ------ आदि  का  सहारा  लेना  पड़ता  है  l  कारण  यही  है  कि  लोगों  की  सोच  सकारात्मक  नहीं  है  ,  जो उन्हें  मिला  है  वे  उसमें  खुश  नहीं  हैं  ,  उनका  मन  कामनाओं  , वासना  के  पीछे  भाग  रहा  है   ऐसे  में  दुःख  का  ,  कष्ट    का  एक  छोटा  सा  झटका  भी  उन्हें  विचलित  कर  देता  है  l  हमें  इस  सत्य  को  स्वीकार  करना  होगा  कि  ईश्वर  कभी  किसी  को  पूर्ण  रूप  से   दुःख  नहीं  देते  l  अपने  मन  के  तराजू  में तोल  कर  देखें  कुछ न कुछ  सुख  तो  होता  ही  है  l  और  यदि  हम  ध्यान  से  देखें  तो  उस  दुःख  में  भी  कोई  सुख  अवश्य  छिपा  होता  है  l  यदि  हम  उस  सुख    पर  अपनी  द्रष्टि  केन्द्रित  करेंगे   तो  हमारा  मन  शांत  रहेगा ,  तनाव  नहीं  होगा  l    संत  तुकाराम  ने  लिखा  है ------ "  हे  भगवान  !  अच्छा  ही  हुआ  ,  मेरा  दिवाला  निकल  गया  l  अकाल  भी  पड़   गया  ,  यह  भी  अच्छा  ही  हुआ  l  स्त्री  और  पुत्र  भी  भोजन  के  अभाव  में  मर  गए   और  मैं  भी  हर  तरह  से  दुर्दशा  भोग  रहा  हूँ  ,  यह  भी  ठीक  ही  हुआ  l  संसार  में  अपमानित  हुआ  ,  यह  भी  अच्छा  हुआ  l  ग्राम , बैल , द्रव्य  सब  चला  गया  ,  यह  भी  अच्छा  ही  हुआ  l  लोक -लाज  भी  जाती  रही  ,  यह  भी  अच्छा  हुआ   क्योंकि  इन्ही  सब  कारणों  के  फलस्वरूप   तुम्हारी  मधुरिमामय ,  शांतिपूर्ण  गोद  मुझे  मिली  l  "  

12 December 2025

WISDOM -----

महान  दार्शनिक  संत  अगस्तीन  के  पास    एक  जिज्ञासु   पहुंचा  l  उसे  अपने  जीवन  के  सत्य  को  समझने  की  बहुत जिज्ञासा  थी  l  उसने  संत  से  कहा  -- आप  मुझे  बहुत  कुछ  कहने -समझाने  की  बजाय  ,  केवल  एक  शब्द  में  उपदेश  दें  l  संत  अगस्तीन  उसकी  ओर  देख  रहे  थे  ,  वह  व्यक्ति  उनसे  कहे जा  रहा  था  कि  आप  मुझे  बहुत  आज्ञाएँ  न  देना  ,  क्योंकि  मैं  भूल  जाऊँगा  l  आप  तो  मुझे  एक  शब्द  में  ही  सार  की  बात  बता  दें  l  मैंने  शास्त्रों  को  भी  नहीं  पढ़ा  है   और  न  ही  पढ़ने  की  इच्छा  है l  संत  अगस्तीन मुस्कराते  हुए  बोले  ---- "  तुम्हारे  लिए  वह एक  शब्द  है  ' प्रेम  ' l  पर  यह  तथ्य  ध्यान  रखना  कि  प्रेम  वही   कर  सकते  हैं  ,  जिन्होंने   स्वार्थ , वासना  और  अहंता  की  क्षुद्रता  का   पूरी  तरह  से  त्याग  कर  दिया  है  l  यदि  तुम  सचमुच  ही  प्रेम  कर  सको  ,  तो  शेष  सब  अपने  आप  ही  हो  जायेगा  l "