पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " सद्विचार और सत्कर्मों का जोड़ होना बहुत आवश्यक है l विचारों की शक्ति जब तक कर्म में अभिव्यक्त नहीं होती उसका पूरा लाभ नहीं होता l ' वर्तमान युग कलियुग इसी लिए है कि यहाँ सद्विचार और सत्कर्म का जोड़ नहीं है l लोग बहुत आदर्श की बात करते हैं लेकिन उनका वैसा आचरण नहीं है इसलिए जनता उनसे प्रभावित नहीं होती , उनकी चेतना में विचारों में कोई परिवर्तन नहीं होता l एक नशा करने वाला अपने साथ सैकड़ों नशेड़ी जोड़ लेता है क्योंकि पहले वह स्वयं नशा करता है , उसके बाद ही दूसरों को नशा करने के लिए प्रेरित करता है l वह जो कहता है , वैसा ही स्वयं भी करता है इसलिए वह अनेकों को अपने साथ जोड़ लेता है l
Omkar....
27 December 2025
25 December 2025
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " व्यक्ति का चरित्र और उसकी उच्च भावनाएं ही उसे महान और यशस्वी बनती हैं , पद , सम्मान नहीं l " अथाह धन -संपदा जोड़ लेने से , उच्च पद प्राप्त कर लेने से , प्रवचन से कोई व्यक्ति महान नहीं बनता l महत्वपूर्ण यह है कि इस स्थिति तक पहुँचने का सफ़र कैसे तय किया ? आचार्य जी लिखते हैं - ' गलत रास्ते से प्राप्त की गई सफलता अंत में कलंकित हो जाती है l ' कलियुग की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि समाज को सही दिशा देने वाले ही दिशा भ्रमित हैं l तृष्णा , कामना , वासना , महत्वाकांक्षा ----का जाल इतना घना है कि व्यक्ति उसमें एक बार फँस गया तो निकलना मुश्किल है ! लेकिन इस संसार में असंभव कुछ भी नहीं l व्यक्ति की आत्मा में इतनी शक्ति है कि वह संकल्प ले तो असंभव को भी संभव कर सकता है l आचार्य श्री कहते हैं ---भूल समझ आने पर उल्टे पैरों लौट आने में कोई बुराई नहीं l ' विचारों में परिवर्तन और परिमार्जन से जीवन की दिशा कैसे बदल जाती है इसका उदाहरण लियो टालस्टाय का जीवन है l l वे रूस के सामंती वंश के राजकुमार थे l सामंत सेनापतियों की सारी बुराइयाँ उनमें भरी पड़ी थीं लेकिन सत्य का प्रकाश आते ही , विचारों में परिवर्तन होते ही उनके जीवन की दिशा धारा ही बदल गई l मद्यपान , क्रूरता , हत्या , व्यसन और विलासिता का जीवन जीने वाले टालस्टाय अब प्रेम , करुणा , सह्रदयता , सहानुभूति और त्याग , तपस्या की मूर्ति महात्मा टालस्टाय बन गए l लियो टालस्टाय कहते हैं --- " दुनिया की हर बुराई और बेइंसाफी की अधिकतम जिम्मेदारी से विद्वान , साहित्यकार और कलाकार बच नहीं सकता l आरम्भ में मैं भी साहित्यकार की जिम्मेदारी को नहीं समझा था l मैं नहीं जानता था कि मैं क्या लिख रहा हूँ और क्या शिक्षा दे रहा हूँ l मेरी एक ही अभिलाषा थी कि अधिक से अधिक धन और यश का संपादन किया जाए l यह मेरा पागलपन था और इस पागलपन को दूर करने में मुझे पूरे छह वर्ष लग गए l " टालस्टाय ने जब अपने साहित्यिक दायित्व को समझा तो वे महात्मा बन गए l
21 December 2025
19 December 2025
WISDOM ------
बर्नार्ड शा एक प्रसिद्ध आलोचक और नाटककार थे l उनका एक प्रसिद्ध नाटक था ' मिसेज वारेंस प्रोफेशन ' इसमें समाज में फैली विकृतियों पर आक्रमण किया गया था l इसमें दिखाया गया था कि जो लोग समाज में ऊपर से ' सज्जन और सभ्य ' बने रहते हैं , उनमे से कितनों का ही भीतरी जीवन कितना पतित होता है l यह रचना प्रकाशित होते ही अश्लील बताकर जब्त कर ली गई l लेकिन बाद में यह प्रतिबन्ध हटा लिया गया और इसे सच्चरित्रता की शिक्षा देने वाला माना गया l मनुष्य नाम का प्राणी जब से इस धरती पर आया तभी से विकृतियां उसमें हैं , मनुष्य ने उन्हें दूर करने का , अपने मन पर नियंत्रण करने का कभी प्रयास नहीं किया इसलिए मानव चेतना परिष्कृत नहीं हो सकी , भौतिक रूप से मनुष्य सम्रद्ध होता गया लेकिन चेतना के स्तर पर पशु से भी निम्न स्तर का हो गया l पशु तो अपनी आयु और मौसम के अनुसार आचरण करते हैं लेकिन बुद्धिमान होने के कारण और सद्बुद्धि न होने के कारण मनुष्य मनुष्यता को ही भूल जाता है और समाज से छिपकर , मुखौटा लगाकर अपनी विकृतियों को पोषण देता है l मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह सोचता है कि समाज से , परिवार से छिपकर वह जो कुकृत्य करता है उसे कोई भी नहीं जान सकेगा l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' सत्य को कभी छुपाया नहीं जा सकता l मनुष्य के व्यक्तित्व में इतने छिद्र हैं कि सत्य उनमें से होकर बाहर आ ही जाता है l ' फिर परमात्मा हजार आँखों से देख रहा है , यह सम्पूर्ण प्रकृति , यूनिवर्स व्यक्ति के प्रत्येक कार्य का , उसके मन में छिपे अच्छे-बुरे विचारों का गवाह है l यदि मनुष्य प्रकृति के हर कण में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार कर ले तभी वह पापकर्म करने से डरेगा , ईश्वर के न्याय से उसे भय होगा और यहीं से उसकी चेतना के परिष्कृत होने का मार्ग खुल जायेगा l
17 December 2025
WISDOM ------
जरथुस्त्र जब जन्में तो हँसते हुए पैदा हुए l अन्य बालकों की तरह रोए नहीं l सभी आश्चर्यचकित थे कि यह रोए क्यों नहीं l जब जरथुस्त्र बड़े हुए तो तो लोगों ने जन्म के समय हँसने का वृतांत उन्हें सुनाया और इसका रहस्य जानना चाहा l वे बोले ---- " हम तो मर रहे थे , तब भी हँस रहे थे l तब से ही परदे के पीछे से हँसते चले आ रहे हैं l हम जन्म के समय ही नहीं हँसे , हर परिवर्तन हँसकर ही झेला जाता है l " जरथुस्त्र अंतिम समय भी हँसे तो लोगों की समझ में नहीं आया कि अब क्यों हँसे ? पूछा गया तो बोले ----- " लोगों को रोते देखकर हँसी आ गई कि कितने नादान हैं ये , हम मकान बदल रहे हैं , तो इन्हें क्यों परेशानी हो रही है l " आचार्य श्री कहते हैं ----' यदि हम परिवर्तन को इसी तरह मुस्करा कर स्वीकार कर लें तो जीवन जीने का मन्त्र आ जाए l '
14 December 2025
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " संसार में बुराई और भलाई का , हानि -लाभ का , प्रिय -अप्रिय का और सुख -दुःख अस्तित्व है और वह बना ही रहेगा l हमें किसी का भी प्रभाव अपने ऊपर ऐसा नहीं पड़ने देना चाहिए जो मानसिक संतुलन बिगाड़ कर रख दे l यदि हमारा द्रष्टिकोण सकारात्मक है तो विपत्ति का प्रत्येक धक्का हमें अधिक साहसी , बुद्धिमान और अनुभवी बनाता है l " आचार्य श्री कहते हैं ---- " जीवन एक कला है और इसे आनंदपूर्वक सीखना एवं जीना चाहिए l जो जीवन जीना जानता है वही सही मायने में कलाकार एवं प्रतिभावान है l " विभिन्न सर्वेक्षणों से यह तथ्य प्रकट होता है अपने विषय के विद्वान , प्रतिभावान , धन-वैभव संपन्न , , उच्च पदों पर बैठे व्यक्ति ---- अनेक ऐसे हैं जिनका निजी जीवन विखंडित और विभाजित है l उन्हें अपनी सामान्य सी जिन्दगी को चलाने के लिए नशा , मादक द्रव्य ------ आदि का सहारा लेना पड़ता है l कारण यही है कि लोगों की सोच सकारात्मक नहीं है , जो उन्हें मिला है वे उसमें खुश नहीं हैं , उनका मन कामनाओं , वासना के पीछे भाग रहा है ऐसे में दुःख का , कष्ट का एक छोटा सा झटका भी उन्हें विचलित कर देता है l हमें इस सत्य को स्वीकार करना होगा कि ईश्वर कभी किसी को पूर्ण रूप से दुःख नहीं देते l अपने मन के तराजू में तोल कर देखें कुछ न कुछ सुख तो होता ही है l और यदि हम ध्यान से देखें तो उस दुःख में भी कोई सुख अवश्य छिपा होता है l यदि हम उस सुख पर अपनी द्रष्टि केन्द्रित करेंगे तो हमारा मन शांत रहेगा , तनाव नहीं होगा l संत तुकाराम ने लिखा है ------ " हे भगवान ! अच्छा ही हुआ , मेरा दिवाला निकल गया l अकाल भी पड़ गया , यह भी अच्छा ही हुआ l स्त्री और पुत्र भी भोजन के अभाव में मर गए और मैं भी हर तरह से दुर्दशा भोग रहा हूँ , यह भी ठीक ही हुआ l संसार में अपमानित हुआ , यह भी अच्छा हुआ l ग्राम , बैल , द्रव्य सब चला गया , यह भी अच्छा ही हुआ l लोक -लाज भी जाती रही , यह भी अच्छा हुआ क्योंकि इन्ही सब कारणों के फलस्वरूप तुम्हारी मधुरिमामय , शांतिपूर्ण गोद मुझे मिली l "