आज संसार में छल , कपट , फरेब , धोखा , लालच , अहंकार , कायरता , अतृप्त इच्छाएं ----- आदि नकारात्मक शक्तियों का जाल इतना सघन हो गया है कि मन में प्रश्न उत्पन्न होता है कि ईश्वर कहाँ हैं ? यदि ईश्वर हैं तो असुरता इतनी हावी क्यों है ? आसुरी शक्तियों का साम्राज्य इतना क्यों बढ़ता जा रहा है ? ययाति की तरह भोग -विलास की इच्छाएं कभी समाप्त ही नहीं हो रहीं हैं l अब मनुष्य पर स्वार्थ , अहंकार इतना अधिक हावी हो गया है कि वे त्याग , ईमानदारी , सत्य बोलना जैसे सद्गुण भूल गये हैं l अनेक विद्वान कहते हैं कि भगवान कलिक का अवतार होगा , फिर सतयुग आएगा l अत्याचार , अन्याय और अधर्म को मिटाने , आसुरी शक्तियों का अंत करने के लिए भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण इस धरती पर अवतरित हुए l आसुरी शक्तियों का अंत भी हुआ , कुछ समय शांति भी रही लेकिन संस्कार नहीं मिटे , रावण , कंस , दुर्योधन , दु:शासन , हिरन्यकश्यप जैसे आसुरी तत्वों ने सम्पूर्ण संसार पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- 'असुरता को मिटाने के लिए अब ईश्वर का अंशावतार होगा l इसका अर्थ है कि एक व्यक्ति विशेष के रूप में ईश्वर नहीं आयेंगे , वे लाखों , करोड़ों लोगों के मन में , ह्रदय में अंश रूप में प्रवेश करेंगे l जिससे व्यक्ति की चेतना जाग्रत हो , उसका विवेक जागे , वह अपना मूल्य समझे की वे ईश्वर के राजकुमार हैं , बंदरों के वंशज नहीं हैं l जब लोग जागरूक होंगे , अपनी सोयी हुई शक्तियों को जाग्रत करेंगे तब असुरता को मिटने में देर न लगेगी l
Omkar....
9 June 2026
3 June 2026
WISDOM -------
यह स्रष्टि कर्मफल विधान से ही संचालित है , यदि आम बोया है तो आम ही मिलेगा और यदि बबूल बो दिया तो कांटे ही मिलेंगे l स्वयं ईश्वर भी इस विधान से बंधे है l किसी को अपने अच्छे -बुरे कर्मों का फल इसी जन्म में मिल जाता है लेकिन कभी -कभी किसी को अपने कर्मों का फल कई जन्मों के बाद मिलता है l हमारे द्वारा किए गए अच्छे -बुरे कर्मों का फल हमें कब , कैसे और किस रूप में मिलेगा , इसे काल निश्चित करता है l इस विधान को समझना बहुत कठिन है l हम महाभारत में देखें तो धृतराष्ट्र और भीष्म पितामह को अपने पिछले किसी जन्म में किए पापकर्म का यह परिणाम यह मिला कि धृतराष्ट्र नेत्रहीन हुए और भीष्म पितामह को शर -शैया का कष्ट सहन करना पड़ा l महारानी द्रोपदी को भरी सभा में अपमानित करने वाले दु :शासन को कठोर दंड भोगते हुए देखने के लिए तेरह वर्ष तक अपने खुले केशों के साथ इंतजार करना पड़ा l व्यक्ति संसार के किसी भी कोने में छुप जाये , अपने किए गए कर्मों के परिणाम से वह बच नहीं सकता l जो पापकर्म व्यक्ति छिपकर , अँधेरे में करता है , योजनाबद्ध तरीके से लोगों को उत्पीड़ित करने के लिए करता है और सोचता है कि उसे किसी ने नहीं देखा , तो यह उसकी भूल है l यह सम्पूर्ण प्रकृति और कण -कण में ईश्वर है जो उसे देख रहे हैं l उनके पास प्रत्येक प्राणी के कर्मों का हिसाब है l कलयुगी संसार में तो न्याय पर बड़ा प्रश्न चिन्ह है लेकिन भगवान के दरबार में ' देर है , पर अंधेर नहीं l ' ऋषि कहते हैं -- ' जैसे हजारों गायों के मध्य बछड़ा अपनी माँ को स्वत: ढूंढ निकालता है , वैसे ही अपने किए गए कर्म आपको किसी भी योनि में सहजता से ढूंढ निकालते हैं l इसलिए सदा शुभ कर्म ही करना चाहिए l "
20 May 2026
WISDOM -----
प्रकृति का प्रकोप विभिन्न रूपों में होता है और वैज्ञानिक तरीके से देखें तो उसके अनेक कारण हैं l लेकिन आध्यात्मिक द्रष्टि से देखें तो यह एक प्रकार का सामूहिक दंड है l कहते हैं पापकर्म करने वाला , उस कार्य में सहयोग करने वाला , , उसे देखने वाला और देखकर चुप रहने वाला सभी दंड के भागी होते हैं l वर्तमान का समय लगभग सभी देशों में ऐसा है की लोग बड़े -बड़े अपराध करते हैं , और अपनी शक्ति और सामर्थ्य से दंड से बच जाते हैं l व्यवस्थाएं ही कुछ ऐसी हैं कि अपरा'नेक ऐसे भी हैं जो समाज से छिपकर अनैतिक और अमानवीय कार्य करते हैं l संसार के किसी भी धर्म में लोगों को अपराध करने की छूट नहीं है , नैतिकता और मानवता को ही श्रेष्ठ कहा गया है l जब मानव समाज का नैतिक पतन अति का हो जाता है तब प्रकृति स्वयं दंड देती है l संसार को सुधारना संभव नहीं है यदि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को सुधारे , सन्मार्ग पर चले , ईश्वर का नाम जप और निस्स्वार्थ सेवा के कोई कार्य करे तो ये सत्कर्मों को पूंजी ही उसकी इन आपदाओं से रक्षा करती है , अकाल मृत्यु नहीं होती l पं , श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- 'पिछले जन्मों में हमने क्या किया उस पर अब हमारा कोई वश नहीं है लेकिन वर्तमान समय हमारे हाथ में है l हम सत्कर्म कर के अपने प्रारब्ध के कर्मों की पीड़ा को कुछ कम कर सकते हैं और एक सुन्दर और सुनहरे भविष्य की तैयारी भी कर सकते हैं l
19 May 2026
WISDOM -----
कर्मफल का विधान सबके लिए एक समान है l चाहे हम राजा हों , धर्मात्मा हों या महात्मा , साधु हों या शैतान , कर्म किसी को नहीं छोड़ता l इस विश्व ब्रह्माण्ड में हम जहाँ कहीं भी हों , हमारा कर्म हमारा पीछा करता हुआ हम तक पहुँच ही जाता है l इस जन्म में नहीं तो अगले कई जन्मों तक ये कर्म हमारा पीछा करते ही रहते हैं और तब तक समाप्त नहीं होते , जब तक हम उन्हें भोग नहीं लेते l एक कथा है ----- देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने माँ सीता के पैर में कौवे के रूप में चोंच मार दी l उनके पैर से रक्त निकल आया l प्रभु श्रीराम ने यह देखकर समीप रखे कुषा के एक तिनके को उठाया और उसे अभिमंत्रित कर के जयंत की ओर फेंक दिया l कुषा के उस तिनके ने अभेद्य बाण का रूप धारण कर लिया l जयंत भाग निकला था , उसे लगा था कि वो बच गया l उसने पीछे मुड़कर देखा तो भगवान श्रीराम द्वारा छोड़ा गया बाण उसका पीछा कर रहा है l उस बाण से बचने के लिए जयंत ने सभी लोकों की परिक्रमा की लेकिन स्वयं उसके पिता देवराज और ब्रह्माजी तक ने उसकी सहायता करने से मना कर दिया l अंत में उसे भगवान श्रीराम की शरण में आना ही पड़ा l उन्होंने उसे क्षमा तो किया परन्तु कर्मफल के रूप में उसे अपनी एक आँख गंवानी ही पड़ी l
18 May 2026
WISDOM -----
श्रुतायुध ने भगवान शिव की तपस्या कर के उनसे ऐसी गदा प्राप्त की , जिसका प्रहार त्रिलोक में किसी के लिए सह पाना संभव नहीं था l गदा देते समय भगवान शिव ने श्रुतायुध को आगाह किया कि गदा का उपयोग मात्र सत्कार्यों में किया जा सकता है , यदि व्यक्तिगत राग -द्वेष की पूर्ति के लिए इसका उपयोग हुआ तो यही गदा उसकी मृत्यु का कारण बनेगी l महाभारत के युद्ध में श्रुतायुध को अर्जुन के सामने युद्ध के लिए आना पड़ा l भगवान श्रीकृष्ण को श्रुतायुध की गदा के विषय में ज्ञात था और वे जानते थे कि यदि वह गदा चली तो अर्जुन उस प्रहार को झेल न सकेगा l भगवान श्रीकृष्ण श्रुतायुध को देखकर हँस पड़े l श्रुतायुध को लगा कि भगवान कृष्ण उसे कुरूप समझकर उस पर हँस रहे हैं l क्रोध में वह अपना संयम खो बैठा और भगवान शिव की चेतावनी भूल गया l उसने वह गदा भगवान कृष्ण को लक्ष्य कर के फेंकी , परन्तु गदा ने लौटकर श्रुतायुध का ही वध कर दिया l शक्तियों का उपयोग विवेकसम्मत तरीके से ही किया जाना चाहिए , अन्यथा दंड का भागी बनना पड़ेगा l
17 May 2026
WISDOM ----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है कि --- ' शक्ति के साथ यदि विवेक न हो तो वह शक्ति उसी के लिए घातक हो सकती है l ' पुराण में इस संबंध में अनेक कथाएं हैं l रावण , भस्मासुर , हिरन्यकश्यप जैसे अनेक असुरों ने घोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किए और बहुत शक्तिशाली हो गए लेकिन विवेक न होने से उन्होंने अपनी शक्ति का दुरूपयोग किया l अपनी शक्ति का अहंकार ही उनके अंत का कारण बना l असुरों की यह परंपरा समाप्त नहीं हुई l आज भी जिसके पास धन का , पद का बल है वह उसका दुरूपयोग कर रहा है l भस्मासुर तो जिसके सिर पर हाथ रख दे केवल वही भसम होता था लेकिन आज तो लाखों भस्मासुर की ताकत का मिलकर परमाणु बम है l जिस दिन क्रोध में बुद्धि भ्रष्ट हो गई और बटन दब गया तो परिणाम क्या होगा ? भस्मासुर अपने साथ लाखों , करोड़ों को ले डूबेगा l कलियुग की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि मनुष्य के पास सब कुछ है , हर तरह की सुख -सुविधाएँ , भोग -विलास के साधन सब कुछ है लेकिन सद्बुद्धि नहीं है , विवेक नहीं है l वह जाने -अनजाने स्वयं अपने और अपने परिवार के , इस सम्पूर्ण प्रकृति के विनाश की ओर बढ़ रहा है l अपनी कष्टदायक मृत्यु की तैयारी स्वयं ही कर रहा है l असुरों ने जो सबसे बड़ी चालाकी की वह यह कि धन -वैभव आदि हर तरह से स्वयं को शक्तिशाली बनाने तक ही ईश्वर को माना l जब उन्हें वरदान मिल गया तब वे स्वयं को ही भगवान समझने लगे l ईश्वर की सत्ता को चुनौती देना ही उनकी सबसे बड़ी भूल है l ईश्वर का न्याय कैसे होगा , यह तो वक्त ही बताएगा l
16 May 2026
WISDOM -------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " इस दुनिया में इतना अधर्म है , उसका कारण यह नहीं कि नास्तिक दुनिया में ज्यादा हो गए हैं , बल्कि कारण यह है आस्तिकों ने एक दूसरे को गलत सिद्ध कर के ऐसी हालत पैदा कर दी है कि कोई भी सही नहीं रह गया l मंदिर मस्जिद को गलत कह देता है और मस्जिद मंदिर को गलत कह देती है l दोनों एक दूसरे को गलत इसलिए कहते हैं , ताकि वे अपने आप को सही साबित कर सकें l पूरी दुनिया में लगभग तीन सौ धर्म हैं और एक धर्म को दो सौ निन्यानवे गलत कह रहे हैं l हर एक के खिलाफ दो सौ निन्यानवे हैं l इन तीन सौ ने मिलकर तीन सौ को गलत सिद्ध कर दिया है और धरती की ऐसी बदतर हालत हो गई है l ये सभी एक दूसरे की लाशें बिछाने और गला काटने में लगे हैं l हिन्दू मुसलमानों को गलत कहते हैं और मुस्लमान हिन्दुओं को गलत कहते हैं l ऐसे लोगों के अनुसार ---बाइबिल कुरान के खिलाफ है , कुरान गीता के खिलाफ है , वेद तालमुद के खिलाफ हैं , तालमुद जिंदे अवेस्ता के खिलाफ है l बस ! इस तरह खिलाफत और झगड़ों का सिलसिला जारी है और पूरी दुनिया लाशों से पटी पड़ी है l सब ओर एक दूसरे का खून बहाया जा रहा है l ऐसी दशा में भगवान श्रीकृष्ण बहुत ही क्रांतिकारी सूत्र देते हैं l वे कहते हैं विपरीतताएँ कितनी ही क्यों न हों , झगड़े कितने ही खड़े कर लो , पर यदि तुम चलना शुरू करोगे तो पहुंचोगे एक ही मंजिल तक l ईश्वर तक पहुँचने के अनेक मार्ग हैं , हम किसी भी पथ से चलें , पहुंचेंगे भगवान तक ही l "