25 June 2026

WISDOM -------

 हमारे पुराणों  की  कथाएं  केवल  मनोरंजन  के  लिए  नहीं  हैं  , उनके  भीतर  प्रत्येक  युग  के  अनुरूप  ज्ञान  है  , महत्वपूर्ण  संकेत  हैं  l  एक  कथा  है  ---महाराज  ययाति  की  ----ययाति  की  मृत्यु  का  समय  आया  तो  यमराज  उन्हें  लेने  गए  l  अब  तो  ययाति  बहुत  रोए , गिडगिडाए  कि  अभी  तो  मेरी  कामनाएं , वासनाएं  ही  पूरी नहीं  हुईं  , मुझे कुछ  समय  और  दो  l  यमराज  को  दया  आ  गई  , उन्होंने  कहा  ---यदि  तुम्हारा  कोई   पुत्र   तुम्हे  अपना  यौवन  दे  दे   तो  तुम्हे  उतने  वर्ष  का  जीवन  मिल  जायेगा l  महाराज  ययाति  अपने  सभी  पुत्रों  के  पास  गए  , उनसे  याचना  की  l  सभी  ने  उन्हें  अपना  यौवन  देने  से  इनकार  कर  दिया   लेकिन   ' छोटे पुत्र '  को  दया  आ   गई  , उसने  अपना  यौवन  उन्हें  दे  दिया  l  ययाति  को  पुत्र  की  परवाह  नहीं  थी  वे  तो  भोग -विलास  में  मगन  हो  गए  l  कहते  हैं   ऐसा  दस  बार  हुआ  , ययाति  ने  हजारों  वर्षों  तक  सुख   भोगा  लेकिन  इच्छाएं  शांत  नहीं  हुईं  l  मृत्यु  तो  आखिर  होनी  ही  थी  , उन्हें  गिरगिट  की  योनि  मिली  l  इस  कथा  का  संकेत  यही  है  की  यह  'छोटा  पुत्र '   जागरूक  नहीं  था  , पिता  के  प्रति  कर्तव्यपालन  तो  उचित  है   लेकिन  उसकी  अंध  भक्ति  से  पिता  का  ही  पतन  हो  गया  , वे  गिरगिट  की  योनि  में  न  जाने  कितने  वर्षों  तक  रहे  l    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  लिखते  हैं  ----  ' वासना  कभी  समाप्त  नहीं  होती  , देह  पर  देह  बदलती  है  लेकिन  वासना  समाप्त  नहीं  होती  l  आचार्य  जी कहते  हैं  ---- वासना  का  रूपांतरण  संभव  है  और  भक्ति  वासना  का  दिव्य  रूपांतरण  है  l '   इस  ज्ञान  की  कलियुग  में  सबसे  ज्यादा  जरुरत  है  , संसार  में  हजारों , लाखों  की  संख्या  में  यायाति  भर  गए  हैं  जिनकी  इच्छाएं  किसी  तरह   पूरी  ही  नहीं  हो  रही  हैं  l  कलियुग  की  मार  ऐसी  है  कि  लोग  विवेकशून्य  हैं  , उनमें  जागरूकता  नहीं  है  , वे  स्वयं  ही  यायातियों  का  पोषण  करते  हैं  l  सतयुग  इतनी  आसानी  से  नहीं  आता  ,  या  तो  ययातियों  में  विवेक   जागे  या  पुत्रों  में  विवेक  जागे   तभी  संसार  में  सुख -शांति  होगी  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने   ' गायत्री मन्त्र '  को  संसार  के  लिए    ही  सरल  ढंग  से  समझा  दिया  l  केवल  यही  एक  रास्ता  है   l  गायत्री  मन्त्र   सद्बुद्धि  का  ही  मन्त्र  है  , इससे  विवेक  जाग्रत  होगा   तभी  संसार  में    सुख-शांति  होगी  l  

23 June 2026

WISDOM ------

 आज  संसार  में     लोगों  के  जीवन  में  अनेक  समस्याएं  हैं   इसके  लिए  सम्पूर्ण  मानव  समुदाय  ही  उत्तरदायी  है  l  इसका  मूल  कारण  यही  है  कि  सभी  धर्मों  में  आडम्बर  और  दिखावा  तो  बहुत  है   लेकिन  नैतिकता  और  मानवीय  मूल्यों   की  अनिवार्यता   की  सभी  ने  उपेक्षा  कर  दी  है  l  धन  के  लालच  ने  मानवीय  गरिमा  को  ही  समाप्त  कर  दिया  है  l  जीवन  के  सभी  क्षेत्र  अब   व्यापार    बन  गए  हैं  l  वैज्ञानिक  तो  बड़े -बड़े  अविष्कार  कर  देते  हैं  ,  उन्हें  समाज  में  लाना  , लोगों  के  हाथों  में  पहुँचाना  , यह  व्यापारी  और   धनाढ्य  लोगों  की  जिम्मेदारी  है  l  लेकिन  यदि  उन्हें  मानवीय  मूल्यों  का  ज्ञान  नहीं  है  तो  वे  इसे  अधिकाधिक  धन  कमाने  के  लिए इस्तेमाल  करेंगे  जैसे  कृषि  में  रासायनिक  खाद ,  कीटनाशक  , उन्नत  बीज  आदि  का  प्रयोग  करने  से  फसल  तो  ज्यादा  हो  गई  लेकिन  ऐसे  जहरीले  रसायन  से  चील , गिद्ध  भी  नहीं  दीखते , मनुष्यों  को  खतरनाक  बीमारियाँ  हो  गईं  l  सब  छोटे  -बड़े  अस्पताल  बीमारों  से  भरे  हैं   लेकिन  दूसरी  ओर  एक  वर्ग  ऐसा  भी  है   जो  दिन -दूनी   रात   चौगुनी   गति  से  अमीर  हो  रहा  है  l  वैज्ञानिकों  को  तो  ईश्वर  ने  बुद्धि  दी  है  तो  वे  नए -नए  अविष्कार  करते  ही  हैं  लेकिन  उन्हें  संसार  में  क्रियाशील  करने  वालों  में  विवेक , करुणा , दया  , मानवीयता  नहीं  है   तो  वे   उन  आविष्कारों  की  मदद  से  कहीं  बेरोजगारी  फैला  देंगे , कभी  महामारी  फ़ैल  जाएगी  l  धरती  आकाश  सब  प्रदूषित  कर  दिया  , इस  धन  के  लालच  ने  l  धन  जीवन  के  लिए  बहुत  जरुरी  है  लेकिन  इसकी  भी  एक  सीमा  , एक  मर्यादा  होनी  चाहिए  l  यह  मर्यादा  अब  नहीं  रही   , कला  और  साहित्य  में  इस  लालच  ने  लोगों  की  मानसिकता  को  प्रदूषित  कर  दिया  l  ईमानदारी  , सच्चाई  सब  समाप्त  होने  से  मनुष्य  एक  वस्तु  बन  गया  है  , जीवन  सुरक्षित  नहीं  है  l  फिर  भी  लोग   आशावादी  हैं  कि  भगवान  आएंगे  और  सब  ठीक  हो जायेगा  l    अब  धर्म  और  अधर्म  के  बीच  युद्ध  नहीं  है   कि  ईश्वर  धर्म  की  रक्षा  के  लिए  आयेंगे  l  अब  तो  सभी  अधर्म  की  राह  पर  हैं  l  अब  जरुरत  है  लोगों  की  चेतना  को  जगाने  की  l  जिन  लोगों  में  सद्गुण  हैं , सन्मार्ग  पर  हैं  , ईश्वर  उन्ही  की  चेतना  में  प्रवेश  कर  के  उन्हें  अध्यात्म  पथ  पर  आगे  बढ़ाते  हैं   और  उनके  प्रकाश  से  अन्य  लोगों  के  जीवन  का  अँधेरा  भी  दूर  होने  लगता  है  l  l  आचार्य श्री  कहते  हैं  ---ईश्वर  तो  हर  पल  हमारी  मदद  को  तैयार  हैं  ,  हम  सन्मार्ग  पर  चलने  का  संकल्प  तो  ले , उस  दिशा  में  एक  कदम  तो  आगे  बढ़ाएं  l  लेकिन  हमें  एक  बात  अवश्य  ध्यान  रखनी  होगी  कि  अध्यात्म  की  राह  पर  झूठ , फरेब , धोखेबाजी  नहीं  चलती  l  

19 June 2026

WISDOM -----

हमारे  महाकाव्य  हमें  बहुत कुछ  सिखाते  हैं  l  प्रत्येक  व्यक्ति  के  अपने  संस्कार   हैं  कि  वह  क्या  सीखता  है    और  सीखकर    वैसा  ही  आचरण  करता  है  l   अनेक  लोग  महाभारत  के  मामा  शकुनि  और  दुर्योधन  की  तरह  छल , कपट , षडयंत्र  सीख  लेते  हैं  l  अनेक  दु:शासन  की  तरह  नारी  का  अपमान  और  उत्पीड़न  करना  सीख  जाते  हैं  l  जो  ज्यादा  बुद्धिमान  हैं  वे  शल्य  मामा  की  तरह    अपने  प्रतिद्वंदी  का  मनोबल  गिराने  का  हर  संभव  प्रयास  करते  हैं  ,  जिसने  उन  पर  विश्वास  किया  , उसी  के  साथ  धोखा  करते  हैं  l  बुराई  सीखना  बहुत  सरल  है  इसलिए  लोग  इन्ही  सब  तरीकों  से  आज  के  युग  में   धन  कमाने  और  सफलता  प्राप्त  करने  का  प्रयास  करते  हैं  l    इसी  कारण  संसार  में  इतनी  अशांति  और  तनाव  है    l  यदि  महाभारत  से  मनुष्य  कर्मफल  विधान  की  सत्यता  को  समझ  ले   तो  जीवन  की  सारी  उलझने  समाप्त  हो  जाएँ  और  संसार  में  भी  सुख -शांति  आ  जाए  l  l  दुर्योधन  आदि  कौरवों  ने  बिना  किसी  वजह  के  , केवल  ईर्ष्यावश  ही  पांडवों  पर  इतने  अत्याचार  किए  l   पांडवों  ने  उनका  कुछ  नहीं  बिगाड़ा  था  , फिर  भी    दुर्योधन  ने  उन्हें  मारने  के  लिए  और  उनका  अस्तित्व  मिटाने  के  लिए   छल , कपट  और  षडयंत्र  की  अति  कर  दी  l  इसका  परिणाम   सबके  सामने  है    , कौरव  वंश  का  नामोनिशान  मिट  गया  l    पांडव  सन्मार्ग  पर  थे  , उन्होंने  नैतिकता  के  विरुद्ध  कोई  आचरण  नहीं  किया   इसलिए  स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  उनके  रथ  की  बागडोर   संभाली  l  उन्होंने  पांडवों  को  हर  मुसीबत  से  बचाया   और  जब  अश्वत्थामा  ने  अभिमन्यु  की  पत्नी   उत्तरा   के  गर्भ  को  लक्ष्य  करके  ब्रह्मास्त्र  चलाया    तब  भगवान  ने  उत्तरा  के  गर्भ  में  प्रवेश  कर   पांडवों  के  वंश  की  रक्षा  की  l  पांडवों  के  वंशज  परीक्षित  का  जन्म  भगवान  श्रीकृष्ण  की  कृपा  से  ही  हुआ  l  यह  सब  आज  भी  इस  धरती  पर  है  जिन्होंने  भी  अपने  जीवन  की  सही  राह  चुनी  है  , उन्हें  ईश्वर  की  कृपा  प्राप्त  होती  है  l  यह  मनुष्य  का  अज्ञान  और  अहंकार  है  कि  वह  इस  कृपा  को  देख  और  समझ  नहीं  पाता  l  

17 June 2026

WISDOM ------

   असुरता  का  अस्तित्व  प्रत्येक  युग  में  रहा  है  l  आसुरी  प्रवृति , छल , कपट , षडयंत्र , धोखा , भ्रष्टाचार , अनैतिकता , पाशविक स्तर  के  घोर  अपराध  -----यह  सब  पीढ़ी -दर -पीढ़ी   चलते  ही  रहते  हैं  l  संस्कार  परिवर्तन  सबसे  कठिन  कार्य  है  , कोई  इस  कठिन  राह  पर  चलना  भी  नहीं  चाहता  है  l  संतान  सब  की  होती  हैं  , इसलिए  यह  असुरता   कभी  समाप्त  नहीं  होती  l  संसार  तो  अपनी  गति  से  चलता  है  l  अँधेरा  है , तभी  उजाले  का  महत्त्व  है  l  ईश्वर  ने  मनुष्य  को  चयन  की  स्वतंत्रता  दी  है  ,  यह  हमारी  इच्छा  है  कि  हम  असुरता  की  राह  चुनते  हैं  या  देवत्व  की  l  जब  मनुष्य  कोई  गलत  राह  चुनता  है ,  तब  दैवी  शक्तियां  उसे  विभिन्न  तरीके  से  संकेत  देती  हैं  कि  इस    गलत  मार्ग  पर  नहीं  जाओ  , ऐसी  गहरी  खाई  में  गिरोगे  कि   संभलना   मुश्किल  होगा  l  लेकिन  मनुष्य  अपने  अहंकार  में  इन  संकेतों  को  अनदेखा  कर  देता  है  ,  कुछ  पल  मौन  नहीं  रहता  कि  प्रकृति  के  संकेतों  को  समझ  सके  l  जैसे  कर्म  करता  है  उसका  परिणाम  उसे  भोगना  ही  पड़ता  है  l  मनुष्य  को  अपने  अच्छे -बुरे  कर्मों  का  फल  कब  और  कैसे  मिलेगा  , यह  काल  तय  करता  है  l  काल  की  गति  को  कोई  नहीं  समझ  सकता  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  है  ----'सत्कर्म  का  कोई  भी   मौका    हाथ  से  न  जाने  दो  l  यह  सत्कर्मों  की  पूंजी  हमारी  हर  तरह  से  रक्षा  करती  है  l  '  आसुरी  प्रवृति  क्या  है  ?  यह  मन  का  विकार  ही  तो  है  l   गीता  में  भगवान  ने  कहा  है  कि   निष्काम  कर्म  से  मन  के  विकार  दूर  होते  हैं  l  जब  मन  का   मैल   साफ़  हो  गया  तो   मनुष्य  सही  राह  चुनेगा  , देवत्व  की  ओर  कदम  बढ़ाएगा  l 

9 June 2026

WISDOM -----

  आज  संसार  में   छल , कपट , फरेब , धोखा , लालच , अहंकार  , कायरता , अतृप्त  इच्छाएं  ----- आदि  नकारात्मक  शक्तियों  का  जाल  इतना  सघन  हो  गया  है  कि  मन  में प्रश्न  उत्पन्न  होता  है  कि  ईश्वर  कहाँ  हैं  ?  यदि  ईश्वर  हैं  तो  असुरता  इतनी  हावी  क्यों  है  ?  आसुरी  शक्तियों  का  साम्राज्य  इतना  क्यों  बढ़ता  जा  रहा  है  ?   ययाति  की  तरह  भोग -विलास  की  इच्छाएं  कभी  समाप्त  ही  नहीं  हो  रहीं  हैं  l  अब  मनुष्य  पर  स्वार्थ , अहंकार   इतना  अधिक  हावी  हो  गया  है  कि  वे  त्याग , ईमानदारी , सत्य बोलना  जैसे  सद्गुण  भूल  गये  हैं  l  अनेक  विद्वान  कहते  हैं  कि  भगवान  कलिक  का  अवतार  होगा  , फिर  सतयुग  आएगा  l   अत्याचार , अन्याय  और  अधर्म     को  मिटाने ,  आसुरी  शक्तियों  का  अंत  करने  के लिए   भगवान  श्रीराम  और  श्रीकृष्ण  इस  धरती  पर  अवतरित  हुए   l  आसुरी  शक्तियों  का  अंत  भी  हुआ   , कुछ  समय  शांति  भी  रही   लेकिन  संस्कार  नहीं   मिटे , रावण , कंस , दुर्योधन , दु:शासन  , हिरन्यकश्यप  जैसे     आसुरी  तत्वों  ने  सम्पूर्ण  संसार  पर   अपना  साम्राज्य  स्थापित  कर  लिया  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- 'असुरता  को  मिटाने  के  लिए  अब  ईश्वर  का  अंशावतार  होगा  l  इसका  अर्थ  है  कि  एक  व्यक्ति  विशेष  के  रूप  में  ईश्वर  नहीं  आयेंगे  ,  वे  लाखों , करोड़ों  लोगों  के  मन  में  , ह्रदय  में   अंश रूप  में  प्रवेश  करेंगे   l  जिससे  व्यक्ति  की  चेतना  जाग्रत  हो ,  उसका  विवेक   जागे  ,  वह  अपना  मूल्य  समझे  की  वे  ईश्वर  के  राजकुमार  हैं ,  बंदरों  के  वंशज  नहीं  हैं  l  जब  लोग   जागरूक  होंगे  , अपनी   सोयी  हुई  शक्तियों  को  जाग्रत  करेंगे   तब  असुरता   को  मिटने  में  देर  न  लगेगी  l 

3 June 2026

WISDOM -------

  यह  स्रष्टि  कर्मफल  विधान  से  ही  संचालित  है  ,  यदि  आम  बोया  है  तो  आम  ही  मिलेगा  और  यदि  बबूल  बो  दिया  तो  कांटे  ही  मिलेंगे  l  स्वयं  ईश्वर  भी  इस  विधान से  बंधे  है  l  किसी  को  अपने  अच्छे -बुरे  कर्मों  का  फल  इसी  जन्म  में  मिल  जाता  है  लेकिन  कभी  -कभी  किसी  को  अपने  कर्मों  का  फल  कई  जन्मों  के  बाद  मिलता  है  l  हमारे  द्वारा  किए   गए   अच्छे -बुरे  कर्मों  का  फल  हमें  कब , कैसे  और  किस  रूप  में  मिलेगा  , इसे  काल  निश्चित  करता  है  l  इस  विधान  को  समझना  बहुत  कठिन  है  l    हम  महाभारत  में  देखें  तो     धृतराष्ट्र   और  भीष्म पितामह    को  अपने  पिछले  किसी  जन्म  में  किए  पापकर्म  का  यह  परिणाम  यह  मिला  कि  धृतराष्ट्र  नेत्रहीन  हुए  और  भीष्म पितामह  को  शर -शैया   का  कष्ट  सहन  करना  पड़ा  l  महारानी  द्रोपदी  को   भरी  सभा  में  अपमानित  करने  वाले   दु :शासन  को  कठोर  दंड  भोगते  हुए  देखने  के  लिए  तेरह  वर्ष  तक  अपने  खुले  केशों  के  साथ  इंतजार  करना  पड़ा  l  व्यक्ति  संसार  के  किसी  भी  कोने  में  छुप  जाये  , अपने  किए  गए  कर्मों  के  परिणाम  से  वह  बच  नहीं  सकता  l  जो  पापकर्म  व्यक्ति   छिपकर , अँधेरे  में  करता  है  , योजनाबद्ध  तरीके  से  लोगों  को  उत्पीड़ित  करने  के  लिए  करता  है   और  सोचता  है  कि  उसे  किसी  ने  नहीं  देखा   , तो  यह  उसकी  भूल  है  l  यह  सम्पूर्ण  प्रकृति   और  कण -कण  में     ईश्वर  है    जो  उसे  देख  रहे  हैं  l  उनके  पास   प्रत्येक   प्राणी  के  कर्मों  का  हिसाब  है  l  कलयुगी  संसार  में  तो  न्याय  पर  बड़ा  प्रश्न चिन्ह  है   लेकिन   भगवान   के  दरबार  में  ' देर  है  , पर  अंधेर नहीं  l '  ऋषि  कहते  हैं  -- ' जैसे  हजारों  गायों  के  मध्य  बछड़ा  अपनी  माँ  को  स्वत:  ढूंढ  निकालता  है  , वैसे  ही  अपने  किए  गए  कर्म   आपको  किसी  भी  योनि  में  सहजता  से  ढूंढ  निकालते  हैं  l  इसलिए  सदा  शुभ  कर्म  ही  करना  चाहिए  l "

20 May 2026

WISDOM -----

 प्रकृति  का  प्रकोप विभिन्न  रूपों  में  होता  है    और  वैज्ञानिक  तरीके  से  देखें  तो  उसके  अनेक  कारण  हैं  l  लेकिन  आध्यात्मिक  द्रष्टि  से  देखें  तो    यह  एक  प्रकार  का  सामूहिक  दंड  है  l  कहते  हैं  पापकर्म  करने  वाला , उस  कार्य  में  सहयोग  करने  वाला , ,  उसे  देखने  वाला  और  देखकर  चुप  रहने  वाला   सभी  दंड  के  भागी  होते  हैं  l  वर्तमान  का  समय  लगभग  सभी  देशों  में  ऐसा  है  की  लोग  बड़े -बड़े  अपराध  करते  हैं  ,  और  अपनी  शक्ति  और  सामर्थ्य  से  दंड  से  बच  जाते  हैं  l   व्यवस्थाएं   ही  कुछ  ऐसी  हैं  कि  अपरा'नेक  ऐसे  भी  हैं  जो  समाज  से  छिपकर   अनैतिक  और  अमानवीय  कार्य  करते  हैं  l  संसार  के  किसी  भी  धर्म  में  लोगों  को  अपराध  करने  की  छूट  नहीं  है ,  नैतिकता  और  मानवता  को  ही  श्रेष्ठ  कहा  गया  है  l  जब  मानव  समाज  का  नैतिक  पतन  अति  का  हो  जाता  है   तब  प्रकृति  स्वयं  दंड  देती  है  l  संसार  को  सुधारना  संभव  नहीं  है   यदि  प्रत्येक  व्यक्ति  स्वयं  को  सुधारे , सन्मार्ग  पर  चले  ,  ईश्वर  का  नाम जप  और  निस्स्वार्थ  सेवा  के  कोई  कार्य  करे   तो  ये  सत्कर्मों  को  पूंजी  ही  उसकी   इन  आपदाओं  से  रक्षा  करती  है  , अकाल  मृत्यु  नहीं  होती  l  पं , श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- 'पिछले  जन्मों  में  हमने  क्या  किया   उस  पर  अब  हमारा  कोई  वश  नहीं  है  लेकिन  वर्तमान  समय  हमारे  हाथ  में  है   l  हम  सत्कर्म  कर  के  अपने  प्रारब्ध  के  कर्मों  की  पीड़ा  को  कुछ  कम  कर  सकते  हैं   और  एक  सुन्दर  और  सुनहरे  भविष्य   की  तैयारी  भी  कर  सकते  हैं  l