21 July 2026

WISDOM ----

   देवता  और  असुर  तो  प्रत्येक  युग  में  रहे  हैं   लेकिन  कलियुग  में  एक  विशेष  बात  यह  है  कि  असुर  समाज  में  घुल-मिलकर  रहते  हैं  , उन्हें  अलग  से  पहचानना  कठिन  है  l  व्यक्ति  के  काम  करने  के  तरीके , बोलचाल  और  उसके  स्वभाव  से  ही   समझा  जा  सकता  है  कि  वे  किस  श्रेणी  के  असुर  हैं  l   ऐसे  व्यक्तियों  में  करुणा , संवेदना , दया , प्रेम  जैसी  कोई  भावना  नहीं  होती  , ये  बहुत  निर्दयी   होते  हैं   l  उनका  यह  निर्दयता  का  व्यवहार   उन  सभी  के  साथ  होता  है   जिसने  उनके  अहंकार  को  चोट  पहुंचाई  है  , उनकी  निरंकुशता  में  रहने  से  इनकार  कर  दिया  l रिश्ते -नातों  से  भी  वे  ऐसा  कठोरता  का  व्यवहार  करने  से  नहीं   चूकते  l  हिरण्यकश्यप   ने  अपने  पुत्र  प्रह्लाद  को सताने  में  कोई  कोर -कसर    नहीं  छोड़ी    असुरों  के  पास  धन -वैभव   और  इसके  बल  पर  प्राप्त  शक्ति  की  कोई  कमी  नहीं  होती  है  l    कलियुग  में  यह  असुरता  इतनी  दुखदायी  इसलिए  हो  जाती  है   क्योंकि   सामान्य जन  अपने  हितों  को  पूरा  करने  के  लिए   इस  असुरो  के  अहंकार  को  पोषित  करते  हैं  ,  उनकी  चापलूसी  कर  अपना  स्वार्थ  सिद्ध  करते  हैं   और  उनकी  कमजोरियों  का  पता  लगाकर  उन की  कमजोर  नस  भी  दबाकर  रखते  हैं  इसलिए  असुरता  एक  श्रंखलाबद्ध  तरीके  से  बढ़ती  जाती  है  l  इसका  अंत  कौन  करे  ?  यह  बहुत  बड़ी  समस्या  है  l 

17 July 2026

WISDOM -----

   कभी  -कभी  ऐसा  वक्त  आता  है  कि  दो  पक्षों  में  युद्ध  जैसी  स्थिति  होती  है   l  एक  पक्ष  आक्रमण  पर  आक्रमण  करता  जाता  है   लेकिन  दूसरा  पक्ष     वार  नहीं  करता  , केवल   अपनी  सुरक्षा  का  ही  प्रयास  करता  है  l  जैसे  मथुरा  का  राजा  कंस  कितना  शक्तिशाली  था  ,  उसके  पास  सब  कुछ  था  लेकिन  वह   भयभीत  था   और  भयभीत  भी   था  तो   छोटे  से   दूध  पीते  बच्चे  कृष्ण  से  l  मृत्यु  का  भय , सत्ता  को  खोने  का  भय  ऐसा  ही  होता  है  l  कंस  आयु  में   कृष्ण  से  कितना  बड़ा  था , उसके  पास  विशाल  सेना  थी , अनेक  मायावी  राक्षस  थे  , अनेक  शक्तिशाली  राजा  उसके  मित्र , संबंधी  थे  l  क्या  आश्चर्य  है  कि  फिर  भी  वह  डरता  था  l   उसने  पूतना  को   और  अनेक  राक्षसों  को  भेजा  कि  वे  किसी  तरह  कृष्ण  का  अंत  कर  दें  l  श्रीकृष्ण  तो  स्वयं  ईश्वर  थे  , वे  बाल रूप  में  थे  तो  क्या  , उन्हें  पता  था  कि  ये  सब  राक्षस  कंस  के  भेजे  हुए  हैं  ,  उन्होंने  केवल  अपनी  सुरक्षा  के  लिए  उन  राक्षसों  को  मारा  ,  उन्होंने  कंस  को  मारने  का  कोई  प्रयास  नहीं  किया  l  कंस  के  सिर  पर  जब  मृत्यु  का  साया   मंडराने  लगा    तब  उसने  स्वयं  ही  कृष्ण  और  बलराम  को  मथुरा  बुला  लिया  ,  अपनी   मृत्यु    की  व्यवस्था  स्वयं  ही  कर  ली  l   इस  प्रसंग  का  अर्थ  यही  है  कि   इस  संसार  में  सभी  के  जन्म , मृत्यु  , सत्ता , प्रतिष्ठा ,  धन-वैभव , सुख  ---     आदि  प्रत्येक  घटना  का  समय  निश्चित  है  ,  इन  सब  को  खोने  के  भय  से  किसी  को  सताना , उसको  मारने  का  प्रयास  करना   व्यर्थ  है  l    लोग  इसी  भय  से  न  तो  स्वयं  चैन  से  रहते  हैं  और  न  ही  दूसरे  को  चैन  से  रहने देते हैं  l  कंस  ने  काल  को  समझा  नहीं  , स्वयं  को  ही  भगवान   समझा   , समय रहते  चेता  नहीं  इसलिए  काल  ने  उसे  पटक -पटक  कर  मारा  l  

WISDOM -----

   श्रीमद भगवद्गीता  संन्यास  की  पाठ्य -पुस्तक  नहीं  , यह  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाती  है  l  जीवन  समर  में  सभी  प्रकार  की  उथल -पुथल   का  सामना  करते  हुए  जीना  ,  सक्रिय    हो  उद्यमी   बने  रहना  ही   मनुष्य  को  शोभा  देता  है  l  कर्म  करो ,  सक्रिय  होकर  जियो   एवं  निर्भय  होकर  रहो  , परिश्रम  से  मत  डरो  l  निराशाओं  का  सामना  करने  से  हिचकिचाओ  मत  l  जब  तक  जीवित  हो  , वास्तव  में  जीवन  का  एक -एक  पल  जिओ  l  कर्मों  द्वारा  ऊँचे  उठो  , कर्मों  द्वारा  ही  उन्नति  करो  ,  कर्मों  से  ही  अपना  विस्तार  करो  l  जीवन  को  कलाकार  की  तरह  जीने  का  ,  हँसती -हँसाती ,  खिलती -खिलखिलाती  ,  मस्ती  भरी  जिन्दगी   जीने  का  संदेश   गीता  हमें  देती  है  l    गीता  का  संदेश  बड़ा  स्पष्ट  है  ---- कभी  भी  कर्म  किए  बिना  न  रहो   l  जीते  हुए  धरना देना  ,  धीमे  काम  करना  , हड़ताल  करना  , भाग  खड़े  होना  ,  कर्तव्य  त्याग  देना  , अनुपस्थित  रहना  ,  यह  सब  उपाय   जीवन  को  धीमी  मृत्यु  की  ओर  ले  जाते  हैं  ,  सौन्दर्य  छीन  लेते  हैं   और  जीवन  का  क्षरण  कर  डालते  हैं  l  जो  कर्म  किए  बिना  जीता  है  ,  वह  अपने  अस्तित्व  को  खो  बैठता  है  l  

15 July 2026

WISDOM ------

   वर्तमान  समय  में  विभिन्न  क्षेत्रों  में  जितना  भी  ज्ञान  है  ,  उसके  बीज   हमें  पूर्व  के  युगों  में  भी  मिलते  हैं  l  उनमें  अंतर  केवल  अभिव्यक्ति  का  है  l  इसे  सरल  रूप  में  समझें  तो   दो  कहावतें  हैं  ---- ' अंधे  के  आगे  रोवे , अपना  दीदा  खोवे  l '  और  दूसरी  कहावत  है  --- ' भैंस  के  आगे  बीन  बजाए  , भैंस   खड़ी  डकराये  l '           त्रेतायुग  में  जब  भगवान  श्री  राम  को  समुद्र  पार  कर  लंका  जाना  था  तब  उन्होंने  तीन  दिन  तक  समुद्र  से  प्रार्थना  की  कि  वह  उन्हें   लंका  जाने  का  रास्ता  दे  , लेकिन  समुद्र  ने  एक  न  सुनी  l  लक्ष्मण जी  को  बहुत  क्रोध  आया  , उनका  कहना  था  -- दैव -दैव  आलसी  पुकारा  l '  आखिर  श्री  राम  ने  समुद्र  को  सुखाने  के  लिए  जैसे  ही  धनुष  बाण  उठाया  ,  समुद्र  देव  प्रकट  हो  गए   और  नल -नील  के  माध्यम  से  समुद्र  पर  सेतु  बनाने  का   सुझाव  दिया  l  द्वापर  युग  में  पांडवों  पर  दुर्योधन , शकुनि  आदि  ने  इतना  अत्याचार  किया  , हर  तरह  से  उन्हें  उत्पीड़ित  किया  लेकिन  पांडवों  ने  कभी  भी   दुर्योधन  से  , भीष्म  पितामह  से  , धृतराष्ट्र  से  कभी  भी  दया  की  भीख  नहीं  मांगी   क्योंकि  उन्हें  यह  ज्ञान  था  कि   जिनकी आसुरी  प्रवृति  होती  है  उनमें  करुणा , संवेदना  नहीं  होती  , उनसे  दया  की  उम्मीद  करना  , अपनी  ऊर्जा  को  बरबाद  करना  है  l  इसलिए  पांडवों  ने   अपने  शरीर  को  मजबूत  बनाया  , तप  से  और  ज्ञान  से  शारीरिक   और  मानसिक  बल  अर्जित  किया  , दिव्य  अस्त्र -शस्त्र  प्राप्त  किए    l  उनके  ऐसा  करने  पर  पूरी  कायनात  ने  उनकी  मदद  की  , स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  उनके  सारथि  बने   और  वीरता  से  उन्होंने  अपना  हक  प्राप्त  किया  l  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  अर्जुन  को   गीता  का  उपदेश  दिया  कि  कर्म  करो  , परिस्थिति  चाहे  कैसी  भी  हो  कर्म  करना  नहीं   छोड़ो  ,  कर्म  से  भागो  मत  l  गीता  का  ज्ञान  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाता  है  l   चारों  तरफ  कांटे  हैं  , घोर  अंधकार  है  , ऐसी  कठिन  परिस्थिति  से  हम  कैसे  सकुशल  बाहर  निकल सकते  हैं  ,  यह  ज्ञान  हमें  गीता  से  मिलता  है  l  इस  ज्ञान  को  सही  ढंग  से  न  समझ  पाने  के  कारण    अनेक  लोग   बड़ी  मुश्किल  से  मिले  इस  मानव  तन  की उपेक्षा  कर  देते  हैं  l   संसार  के  सारे  काम  इस    देह  से  ही  होते  हैं  ,  जब  यह  शरीर  ही  कमजोर   हो  गया    तो  क्या   करोगे  ?  आज  संसार  को  गीता  के  ज्ञान  की  जरुरत  है  l  

13 July 2026

WISDOM

  युग  परिवर्तन  के  साथ  लोगों  के  विचार  और  सोचने -समझने  का  तरीका  भी  बदल  जाता  है  l  यहाँ  तक  कि  समाज  में  जो  संघर्ष  होते  हैं  , उनके  कारण  भी  बदल  जाते  हैं  l  त्रेतायुग  में  धर्म  और  अधर्म  के  बीच  युद्ध  था  l  रावण  के  आतंक  और  अत्याचार  का  अंत  करने  के  लिए  यह  युद्ध  हुआ  था  l  इसी  तरह  द्वापरयुग  में  पांडव  सत्य  और  धर्म  के  मार्ग  पर  थे   लेकिन  दुर्योधन  आदि  कौरवों  ने  षड्यंत्र  और  अन्याय  की  अति  कर  दी  थी   , इसलिए  महाभारत  हुआ  l  लेकिन  कलियुग  में   लोग  सत्य , धर्म , नैतिकता  , न्याय   को  भूल  गए  हैं  l  लोगों  पर  कामना , अहंकार  और  महत्वाकांक्षा  हावी  है  l  सभी  अनीति  की  राह  पर  हैं  तो  कौन  किस  को  मिटाए ,  किसे  सजा  दें  l  सभी  को  अपनी -अपनी  कमियां  उजागर  होने  का  भय  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी लिखते  हैं  ----' समाज  में  फैले  संघर्षों  का  मूल  मुख्यतः  ईर्ष्या  होती  है  l  आज  की  परिस्थिति  पर  द्रष्टिपात  करें   तो  चारों  ओर  ईर्ष्या  का  ही  साम्राज्य  फैला  दिखाई  देगा  l  भाई -भाई  से  ईर्ष्या  करता  है ,  पड़ोसी -पड़ोसी  से  l  जातियों , संगठनों , दलों , सम्प्रदाय  और  राष्ट्रों  के  बीच  ईर्ष्या  की  आग  फैली  हुई  है   l '  आचार्य श्री  कहते  हैं  --- ' उच्च  स्थिति  में  पहुँचने  के  बाद  भी   यदि  किसी  में   ईर्ष्यालु  वृत्ति  आ  गई  है  ,  तो  वह  उसके  पतन  का  कारण   ही  बनेगी  l  l  इसलिए  ईर्ष्या  की  अग्नि  को  शांत  करना  ही  सच्ची  बुद्धिमत्ता  है  l "   

10 July 2026

WISDOM ------

  असुरता  का  साम्राज्य  प्रत्येक  युग  में  रहा  है   और  यह  असुर  ईश्वर  से  वरदान  प्राप्त  कर   इतने  शक्तिशाली  हो  जाते  हैं  कि  फिर  अपने  साम्राज्य  में  ईश्वर  को  ही  टिकने  नहीं  देते  l इसका  एक  अर्थ  यह  भी  है  कि  जिस  भी  क्षेत्र  में  असुरता  का  साम्राज्य  होता  है  वहां   के  धार्मिक  स्थलों  में  दैवीय  ऊर्जा नहीं  होती  , वे  केवल  नाममात्र  के  होते  हैं  ,  ईश्वर  उस  स्थान  को  छोड़कर  चले  जाते  हैं  l  असुर  इतने  अहंकारी  होते हैं  कि  वे  इसे  भी    स्वयं  की  ताकत  ही  कहते  हैं  कि  उन्होंने  भगवान  को  वह  स्थान  छोड़ने  पर  मजबूर  कर  दिया   और  अब  वे    वे  स्वयं   को    भगवान  कहते  हैं  ,   प्रजा  को  मजबूर  करते  हैं  कि  वे  भी  उन्हें  भगवान  समझकर  पूजें  , उनका  गुणगान  करे  l  शिवजी  से  वरदान  प्राप्त  कर  रावण   इतना  शक्तिशाली  हो  गया  था  कि  सम्पूर्ण  धरती  पर  उसका   आतंक  था  l  अपनी  मृत्यु  के  समय  भी  वह  श्रीराम  से  कहता  है  --- मेरे  जीते  जी  आप  लंका  में  प्रवेश  न  कर  सके   लेकिन  मैं  तुम  से  पहले  तुम्हारे  धाम  जा  रहा  हूँ  l  इसी  तरह  मथुरा  के  लिए  कहा  जाता  है  कि  वहां   भगवान  कृष्ण  को  भी  कारावास  में   डाल  देने  वाले  लोग  राज  करते  रहे  l  कंस  का  तो  आतंक  इतना  था  कि  भगवान  श्रीकृष्ण  को  जन्म  लेते  ही   अँधेरी  रात्रि  में ,  इतनी   वर्षा    और  आंधी -तूफान   में   मथुरा   छोड़कर  गोकुल  जाना  पड़ा  l  कलियुग  का  समय  तो  बहुत  विकट  है   l   भगवान  श्रीराम  को  अयोध्या  से  वनवास  मिला  ,  रावण  के  रहते  वे  लंका  में  भी  नहीं  जा  सके  ,  तब  उन्हें  कम  से  कम  वन  में  रहने  का  तो  ठिकाना  मिला    l  इसी  तरह  भगवान  श्रीकृष्ण  को  मथुरा   छोडनी  पड़ी  तो  उन्हें  कम  से  कम  गोकुल  में  तो  रहने  की  जगह  मिली   लेकिन  इस  कलियुग  में  असुरता  इतनी  प्रबल  है  कि   सम्पूर्ण  धरती ,  आकाश , पाताल , वन   सब  जगह  असुरता  का  साम्राज्य  है  , भगवान  को  कहीं  भी  टिकने  की जगह  नहीं  है   जहाँ  से  वे  स्वयं  की  सेना  बनाकर  असुरता  पर  आक्रमण  कर  उसे  पराजित  कर  सकें  l  इसलिए  अब  भगवान  ने  मनुष्यों  की  चेतना  में  प्रवेश  करने  का  निश्चय  किया  है   ताकि  प्रत्येक  मनुष्य  व्यक्तिगत  रूप  से  जाग्रत  हो  ,  उसे  सही -गलत  की  समझ  हो  ,  भेड़ -चाल  न  चले  l  निजी  स्वार्थ  के  लिए  असुरता  का  पोषण  न  करें  l  इस  युग  में  असुरता  को  युद्ध  कर  के  नहीं , अपनी  बुद्धि  और  विवेक  से   और  अपने  ह्रदय  में  विराजमान  ईश्वर  के  विश्वास  से  ही  हराया   जा  सकता  है  l  

5 July 2026

WISDOM -----

  महाभारत  युद्ध   समाप्त  हुआ  और  अनेक  वर्ष   शासन  करने  के बाद  पांडवों  ने  महाराज  परीक्षित  को  राजगद्दी  सौंप  दी  और   वे  वन  में  चले  गए  l  महाराज  परीक्षित  के  शासनकाल  में  ही  कलियुग  का  धरती  पर  आगमन  हुआ  l  कलियुग  को  सम्पूर्ण  धरती  पर  उत्पात  मचाते  देख  महाराज  परीक्षित  ने  उसे  आदेश  दिया  कि  वह  केवल  पांच  स्थानों  पर  ही  रह  सकता  है   , इनमे  सबसे  प्रमुख  है  --- स्वर्ण  अर्थात  धन -संपदा  l  धन -संपदा  की  अति  होने  पर   वहां  कलियुग  रहता  है  जो  मनुष्यों  की  बुद्धि  भ्रष्ट  कर  देता  है  जिससे  अन्य  सभी  बुराइयाँ  वहां  खिंची  चली  आती  हैं   और   फिर  वह  व्यक्ति  हो  ,   परिवार  हो , संस्था  हो  , सरकार  हो  --उसे  पतन  के  गर्त  में  धकेल  देती  हैं  l  कलियुग  में  मनुष्यों  के  विकार  , मानसिक  विकृतियाँ  अपने  चरम  पर  होती  हैं    इसलिए  प्रकृति  की  एक  व्यवस्था  समझ  में  आती  है    कि  दाल  में  नमक  के  बराबर  आप  बेईमानी   कर    लो  , अपनी  इच्छाओं  को  पूरा  कर  लो   और  धन  का  एक  भाग  लोक कल्याण  में  लगाओ   तो  पाप -पुण्य  का  संतुलन  बना  रहेगा  l  आपका  भी  यश  बढ़ता  रहेगा  और  लोगों  का  भी  हित  होगा  l  लेकिन  यदि   दाल  के  नाम  पर  केवल  नमक  है  , उसमे  दाल   नहीं  है   तब  उसे  प्रकृति  बर्दाश्त  नहीं  करती  l  जैसे  कोई  एक  बड़ी  संस्था  है  उसको    अपने  उद्देश्य    के  लिए  अपार  धन  दिया  जाता  है   l अब  उसके  कार्यकर्त्ता  उस  धन  में  से  किसी  भी तरीके  से  अपनी  भी  इच्छाएं  पूरी  कर  लेते  हैं   और  अपने  उद्देश्य  के  अनुसार  शेष  धन  से  प्रजा  के  कल्याण  के  लिए  स्कूल , अस्पताल , धर्मशाला  आदि  का  निर्माण  करते  हैं  ,  निर्धनों  और  निम्न  वर्ग  के  लोगों  को  सिर  उठाकर  जीने  का  मौका  भी  देते  हैं  , पर्यावरण   प्रदूषण  को  दूर  करने  के  लिए   पेड़ -पौधे  लगाना  , सामाजिक  कुरीतियों  को  दूर  करना  आदि  कार्य  भी  करते  हैं    तो  यह  मानव  धर्म  कहलाया  ,  इससे  उनका  विस्तार  होगा  और  यश  भी  बढ़ेगा  l  अब  कलियुग  तो  है  ही    , हमें  अपने  जीवन  में  संतुलन  बनाकर  चलना   होगा  l