श्रुतायुध ने भगवान शिव की तपस्या कर के उनसे ऐसी गदा प्राप्त की , जिसका प्रहार त्रिलोक में किसी के लिए सह पाना संभव नहीं था l गदा देते समय भगवान शिव ने श्रुतायुध को आगाह किया कि गदा का उपयोग मात्र सत्कार्यों में किया जा सकता है , यदि व्यक्तिगत राग -द्वेष की पूर्ति के लिए इसका उपयोग हुआ तो यही गदा उसकी मृत्यु का कारण बनेगी l महाभारत के युद्ध में श्रुतायुध को अर्जुन के सामने युद्ध के लिए आना पड़ा l भगवान श्रीकृष्ण को श्रुतायुध की गदा के विषय में ज्ञात था और वे जानते थे कि यदि वह गदा चली तो अर्जुन उस प्रहार को झेल न सकेगा l भगवान श्रीकृष्ण श्रुतायुध को देखकर हँस पड़े l श्रुतायुध को लगा कि भगवान कृष्ण उसे कुरूप समझकर उस पर हँस रहे हैं l क्रोध में वह अपना संयम खो बैठा और भगवान शिव की चेतावनी भूल गया l उसने वह गदा भगवान कृष्ण को लक्ष्य कर के फेंकी , परन्तु गदा ने लौटकर श्रुतायुध का ही वध कर दिया l शक्तियों का उपयोग विवेकसम्मत तरीके से ही किया जाना चाहिए , अन्यथा दंड का भागी बनना पड़ेगा l
Omkar....
18 May 2026
17 May 2026
WISDOM ----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है कि --- ' शक्ति के साथ यदि विवेक न हो तो वह शक्ति उसी के लिए घातक हो सकती है l ' पुराण में इस संबंध में अनेक कथाएं हैं l रावण , भस्मासुर , हिरन्यकश्यप जैसे अनेक असुरों ने घोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किए और बहुत शक्तिशाली हो गए लेकिन विवेक न होने से उन्होंने अपनी शक्ति का दुरूपयोग किया l अपनी शक्ति का अहंकार ही उनके अंत का कारण बना l असुरों की यह परंपरा समाप्त नहीं हुई l आज भी जिसके पास धन का , पद का बल है वह उसका दुरूपयोग कर रहा है l भस्मासुर तो जिसके सिर पर हाथ रख दे केवल वही भसम होता था लेकिन आज तो लाखों भस्मासुर की ताकत का मिलकर परमाणु बम है l जिस दिन क्रोध में बुद्धि भ्रष्ट हो गई और बटन दब गया तो परिणाम क्या होगा ? भस्मासुर अपने साथ लाखों , करोड़ों को ले डूबेगा l कलियुग की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि मनुष्य के पास सब कुछ है , हर तरह की सुख -सुविधाएँ , भोग -विलास के साधन सब कुछ है लेकिन सद्बुद्धि नहीं है , विवेक नहीं है l वह जाने -अनजाने स्वयं अपने और अपने परिवार के , इस सम्पूर्ण प्रकृति के विनाश की ओर बढ़ रहा है l अपनी कष्टदायक मृत्यु की तैयारी स्वयं ही कर रहा है l असुरों ने जो सबसे बड़ी चालाकी की वह यह कि धन -वैभव आदि हर तरह से स्वयं को शक्तिशाली बनाने तक ही ईश्वर को माना l जब उन्हें वरदान मिल गया तब वे स्वयं को ही भगवान समझने लगे l ईश्वर की सत्ता को चुनौती देना ही उनकी सबसे बड़ी भूल है l ईश्वर का न्याय कैसे होगा , यह तो वक्त ही बताएगा l
16 May 2026
WISDOM -------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " इस दुनिया में इतना अधर्म है , उसका कारण यह नहीं कि नास्तिक दुनिया में ज्यादा हो गए हैं , बल्कि कारण यह है आस्तिकों ने एक दूसरे को गलत सिद्ध कर के ऐसी हालत पैदा कर दी है कि कोई भी सही नहीं रह गया l मंदिर मस्जिद को गलत कह देता है और मस्जिद मंदिर को गलत कह देती है l दोनों एक दूसरे को गलत इसलिए कहते हैं , ताकि वे अपने आप को सही साबित कर सकें l पूरी दुनिया में लगभग तीन सौ धर्म हैं और एक धर्म को दो सौ निन्यानवे गलत कह रहे हैं l हर एक के खिलाफ दो सौ निन्यानवे हैं l इन तीन सौ ने मिलकर तीन सौ को गलत सिद्ध कर दिया है और धरती की ऐसी बदतर हालत हो गई है l ये सभी एक दूसरे की लाशें बिछाने और गला काटने में लगे हैं l हिन्दू मुसलमानों को गलत कहते हैं और मुस्लमान हिन्दुओं को गलत कहते हैं l ऐसे लोगों के अनुसार ---बाइबिल कुरान के खिलाफ है , कुरान गीता के खिलाफ है , वेद तालमुद के खिलाफ हैं , तालमुद जिंदे अवेस्ता के खिलाफ है l बस ! इस तरह खिलाफत और झगड़ों का सिलसिला जारी है और पूरी दुनिया लाशों से पटी पड़ी है l सब ओर एक दूसरे का खून बहाया जा रहा है l ऐसी दशा में भगवान श्रीकृष्ण बहुत ही क्रांतिकारी सूत्र देते हैं l वे कहते हैं विपरीतताएँ कितनी ही क्यों न हों , झगड़े कितने ही खड़े कर लो , पर यदि तुम चलना शुरू करोगे तो पहुंचोगे एक ही मंजिल तक l ईश्वर तक पहुँचने के अनेक मार्ग हैं , हम किसी भी पथ से चलें , पहुंचेंगे भगवान तक ही l "
14 May 2026
WISDOM ------
इस धरती पर अनेक ऐसी आत्माओं ने जन्म लिया जिन्होंने अपने आचरण से संसार को शिक्षा दी l अपनी नीति -कुशलता से वे इतिहास में अमर हो गए l ---- दूसरे देश से आया शिष्टमंडल महामात्य चाणक्य से मिलने पहुंचा l उसे आया देख चाणक्य ने कक्ष में रखा दीपक बुझा कर दूसरा दीपक जला दिया l शिष्टमंडल के प्रमुख ने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा तो चाणक्य ने उत्तर दिया ---- ' जब आप लोगों ने प्रवेश किया तब मैं व्यक्तिगत कार्यों में संलग्न था और जो दीपक जल रहा था , वह मेरे निजी धन से लाए गए तेल से जल रहा था l अब जल रहा ये दीपक राजकोष के धन से जल रहा है , क्योंकि हमारा वार्तालाप शासकीय मुद्दों पर है l हमें राष्ट्रीय संपदा का व्यक्तिगत कार्यों पर खर्च करने का अधिकार नहीं है और न ही मैं ऐसा करूँगा l शिष्टमंडल चाणक्य की ईमानदारी से अभिभूत हो गया l आज परिवार में , समाज और राष्ट्र में इतनी समस्या और तनाव है उसका कारण यही है की व्यक्ति अपने कार्यों के प्रति , अपने कहे गए शब्दों के प्रति यहाँ तक की स्वयं अपने जीवन के प्रति और ईश्वर के प्रति भी ईमानदार नहीं है l
4 May 2026
WISDOM ------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ----- " कौन कितने दिन जिया , इसका लेखा -जोखा जन्म दिन से लेकर मरणपर्यंत के दिन गिनकर नहीं , वरन इस आधार पर लगाया जाना चाहिए कि किसने अपने समय का उपयोग महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए किया l आदि शंकराचार्य मात्र बत्तीस वर्ष जिए l विवेकानंद ने छत्तीस वर्ष की अल्प आयु पाई l स्वामी रामतीर्थ तैंतीस वर्ष की आयु में ही चले गए l ऐसे अनेक व्यक्ति इस संसार में हुए हैं , जिन्हें लंबी अवधि तक जीने का अवसर नहीं मिला , पर उन्होंने अपने समय का श्रेष्ठतम प्रयोजनों के लिए उपयोग किया और इतनी उपलब्धियां अर्जित कर सके , जितनी सौ -दो सौ वर्ष जीकर भी नहीं पाई जातीं l कितने ही लोग लंबी आयु तक जीते हैं , पर उस अवधि का लेखा -जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि वह पेट भरने , प्रजनन के जंजाल में उलझे रहने तथा दुर्गुणों के कारण जलते -झुलसते मौत के मुँह में चले गए l प्राय; आधा समय कुचक्रों की उलझन में और लगभग उतना ही आलस्य -प्रमाद में लगाने वाले को लंबी आयु तक जीने का क्या संतोष -आनंद मिला l इसे वे उनींदी अवस्था में तो जान ही नहीं पाते , किन्तु जब विदाई के दिन आते हैं तो आँखें खुलती हैं और हाथ मलते हुए , रुधे कंठ और भरी आँखों से इतना ही कह पाते हैं कि उन्होंने बहुमूल्य अवसर निरर्थक कामों में गँवाया और जिससे काल का त्रास देने वाला अंधकार भरा भविष्य कमाया l "
3 May 2026
WISDOM ------ लघु कथा
एक बार राजा ने अपने मंत्री से पूछा ---- " क्या गृहस्थ में रहकर भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है ? ' मंत्री ने उत्तर दिया ---- " हाँ , श्रीमान ! ऐसा हो सकता है l " राजा ने पूछा ---- "यह किस प्रकार संभव है ? " मंत्री ने कहा ---' इसका ठीक -ठीक उत्तर एक महात्मा जी दे सकते हैं , जो गोदावरी नदी के पास एक घने वन में रहते हैं l " राजा अपने प्रश्न का उत्तर पाने के लिए दूसरे दिन मंत्री को साथ लेकर महात्मा से मिलने चल दिए l कुछ दूर चलने पर मंत्री ने राजा से कहा -----" महाराज ! ऐसा नियम है कि जो उन महात्मा से मिलने जाता है , वह रास्ते में चलते हुए कीड़े -मकोड़ों को बचाता चलता है l यदि एक भी कीड़ा कुचल जाए तो महात्मा जी श्राप दे देते हैं l " राजा ने मंत्री की बात स्वीकार कर ली और खूब ध्यानपूर्वक आगे की जमीन देख -देखकर पैर रखने लगे l इस प्रकार चलते हुए वे महात्मा जी के पास पहुंचे l महात्मा ने दोनों को सम्मानपूर्वक बैठाया और राजा से पूछा ---- " आपने रास्ते में क्या -क्या देखा , मुझे बताएं l ' राजा ने कहा ---- " भगवन ! मैं तो आपके श्राप के डर से रास्ते के कीड़े -मकोड़ों को देखता आया हूँ l इसलिए मेरा ध्यान दूसरी ओर गया ही नहीं , रास्ते के द्रश्यों के बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं है l " इस पर महात्मा ने हँसते हुए कहा --- " राजन ! यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है l मेरे श्राप से डरते हुए जिस तरह तुम आए , उसी प्रकार ईश्वर के दंड से डरना चाहिए l कीड़ों को बचाते हुए जैसे चले , उसी प्रकार दुष्कर्मों से बचते हुए चलना चाहिए l रास्ते में अनेक द्रश्यों के होते हुए भी , वे दिखाई न पड़े l जिस सावधानी से तुम मेरे पास आए हो , उसी सावधानी से जीवन क्रम चलाओ तो गृहस्थ में रहते हुए भी ईश्वर को प्राप्त कर सकते हो l " राजा उत्तर पाकर संतोषपूर्वक लौट आया l
2 May 2026
WISDOM ----
इस संसार में शुरू से ही असुरता और देवत्व दोनों का ही अस्तित्व अँधेरे और उजाले की तरह रहा है l सतयुग , त्रेतायुग और द्वापर युग में यह स्पष्ट था कि असुर कौन है , कौन अत्याचारी , अनीति और अधर्म की राह पर है लेकिन कलियुग में सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि अब आसुरी प्रवृत्ति के लोग समाज में घुल-मिलकर , परिवारों में , संस्थाओं में , उच्च पदों पर -----धरती के प्रत्येक कोने में मुखौटा लगाकर रहते हैं l अब उनकी पहचान करना बड़ा कठिन है l किसी तरह पहचान हो भी जाए तो लोग पहचान करने वाले को ही मूर्ख कहेंगे , कोई उसकी बात का विश्वास ही नहीं करेगा l इसका कारण यही है कि इस असुरों ने लोगों की कमजोर नस को पकड़ लिया है l ये असुर शराफत का नकाब पहन कर स्वयं को समाज का , परिवार का हितैषी बताते हैं और लोगों को धन का , पद , प्रतिष्ठा , प्रमोशन , कामना , वासना ----- आदि अनेक प्रकार का लालच देकर , उनके अनेक बड़े -छोटे हित साधकर, कभी भय दिखाकर , ब्लैकमेल कर के उन्हें अपने वश में कर लेते हैं l इसलिए उनका सच जानने पर भी कोई उनके विरुद्ध मुँह नहीं खोलता l यही कारण है कि संसार में असुरता का साम्राज्य बढ़ता ही जा रहा है l लोभ -लालच के जाल में फँसने वाले वे लोग ही होते हैं जो बिना मेहनत के , योग्यता न होने पर भी अति शीघ्र सफलता चाहते हैं l इनकी दुर्गति जाल में फँसने वाले पक्षियों की तरह होती है --- दूर कौन उड़कर जाए , कौन परिश्रम पूर्वक दाना चुने l वे तो दाना ढूँढने की तुलना में जाल पर बिखरे दानों को एक सौभाग्य जैसा मानते हैं और उससे लाभ उठाने में चूकने की बात नहीं सोचते l l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- उन्हें यह सोचने की फुरसत नहीं होती कि लाभ उठाते समय उसके पीछे कोई दूरगामी संकट तो नहीं छिपा है , उसे भी देखने की आवश्यकता है l हर लोभी अधीर -आतुर होता है और तात्कालिक लाभ के कुछ दाने चुन लेने के बाद , उस पक्षी की तरह बेमौत मरता है , जिसे सामने बिखरे आकर्षण के उपरांत अन्य कोई बात सूझती ही नहीं l