31 May 2024

WISDOM

   ऋषि   प्रवर  अपने  शिष्यों  को   महर्षि  वाल्मीकि  के  डाकू  से  ऋषि  बनने  की   कथा  सुना  रहे  थे  l  कथा  सुनकर  एक  शिष्य  के  मन  में  प्रश्न  उठा  ,  वह  उठकर  पूछने  लगा ----- "  गुरुवर  !   गुरुकुल  की  परंपरा  के  अनुसार    हम  नित्य  कर्म  में  वेदोक्त  उपासना -पूजा  का  क्रम  अपनाते  हैं,  तब  भी  कुछ  आध्यात्मिक  प्रगति  होती  नहीं  दिखाई  देती  ,  जबकि  केवल  ' मरा -मरा  '  का  जाप  करने  से  महर्षि  वाल्मीकि  को  परम  पद  की  प्राप्ति  कैसे  हुई   ?  "   ऋषि  बोले  ---- " वत्स  ! श्रद्धा  एवं  आस्था   अंत:करण  की  प्रवृत्तियों  हैं  ,  पर  ये  तभी  फलदायी  होती  हैं  ,  जब  ये  विधेयात्मक  हों  l  अचल  श्रद्धा  और    अडिग  विश्वास  हो  तो   मिटटी  की  मूर्ति  भी  एकलव्य  को   विद्या  प्रदान  कर  सकती  है  l  उपासना  और  कर्मकांड  का  महत्त्व   तभी  तक  है  ,  जब  तक  उसके  साथ  भावनात्मक   परिष्कार  की  प्रक्रिया   जुड़ी  हो  , अन्यथा   सिर्फ  दिखावे  के  प्रयोजन  से   कुछ  सार्थक  लाभ  मिल  पाना  संभव  नहीं  है   l  "                                                                                                                  वर्तमान  युग   में  हम  देखें  तो  सभी  धर्मों  में  लोग   अपने  अनुसार   पूजा -उपासना  करते  हैं    लेकिन  अपने  मन  में  जमी  बुराइयों   छल , कपट , ईर्ष्या , द्वेष  , स्वार्थ , लोभ , लालच , तृष्णा , अहंकार  , झूठ -फरेब ---- आदि  बुराइयों  को  त्यागने  का  जरा  भी  प्रयास  नहीं  करते    l  इसलिए  संसार  में  अशांति , युद्ध , तनाव , दंगे ,  प्राकृतिक  प्रकोप  , सामाजिक , पारिवारिक  बुराइयाँ  , अपराध   चारों  ओर  है  l  विकास  तो  बहुत  हुआ  लेकिन  मनुष्य  की  चेतना  परिष्कृत  नहीं  है   इस  कारण  मनुष्य   अपने  द्वारा  किए  गए  विकास  का   दुरूपयोग  कर   स्वयं  ही  मानव सभ्यता  का  विनाश  करने  को  आतुर  है  l  

30 May 2024

WISDOM -----

   यह  संसार  कर्म -फल  विधान  से  चल  रहा  है  l  जिसने  अच्छे -बुरे  जैसे  भी  कर्म  किए  हैं  ,  उनका  फल  उसे  अवश्य  मिलता  है  l  व्यक्ति  संसार  के  किसी  भी  कोने  में  चला  जाये  , अपने  कर्मों  के  परिणाम  से  वह  बच  नहीं  सकता  l  एक  बात  यह  भी  देखने   में  आती  है  कि  जो  लोग  सन्मार्ग  पर  चलते  हैं , सच्चाई  की  राह  पर  हैं  उनके  जीवन  में  अनेक  कष्ट , परेशानियाँ  अवश्य  आती  हैं  ,   इन  कष्टों  के  माध्यम  से  ईश्वर  उन्हें  और  निखारना  चाहते  हैं    ताकि  वे  मजबूत  बनकर  अपने  सत्य  के  प्रकाश  से  संसार  के  अंधकार  को  दूर  करें  l   ईश्वर  को  यह  संसार  रूपी  बगिया  बहुत  प्रिय  हैं  ,  वे  चाहते  हैं  कि  दुष्ट  लोग   अपनी  बुरी  प्रवृत्तियों  को  छोड़कर   देवत्व  की  राह  पर  चलें   l  असुरता    का  देवत्व  में  रूपांतरण  हो   l  यही  कारण  है  कि   आसुरी  प्रवृत्ति  के  लोगों  के  अनेक  गलतियों  को  ईश्वर  बार -बार   अनदेखा  कर  देते  हैं   l  ऐसा  कर  के  वे  उन्हें  सुधरने  का  मौका  देते  हैं  l  उनकी  हर  गलती  पर  उन्हें  चेतावनी   ईश्वर  की  ओर  से  अवश्य  मिलती  है  कि  ' अब  भी  सुधर  जाओ   l '  जो  इस  चेतावनी  को  समझ  जाते  हैं    वे  बुराई  का  मार्ग  छोड़कर   अच्छाई  की  राह  पर  चलने  लगते  हैं , अपनी  गलतियों  को  सुधारने  के  लिए  साधना  करते  हैं   लेकिन  जो  ईश्वर  की  चेतावनी  को  नहीं  समझते   , एक  के  बाद  एक  अपराध  करते  ही  रहते  हैं   फिर  उनके  लिए   ईश्वर  का  सुदर्शन  चक्र , उनकी  गदा  तैयार  है  या  फिर  शिवजी  का  तृतीय  नेत्र  खुल  जाता  है   l  इस  सत्य  को  समझाने  वाला  महाभारत  का  प्रसंग  है  ----- राजसूय  यज्ञ   के  समय  भगवान  श्री  कृष्ण   को  सबसे  सम्मान  मिलते  देख  शिशुपाल  बहुत    ईर्ष्या  से  भर  गया   और  भरी  सभा  में  भगवान  को  गालियाँ  देने  लगा  l  भगवान  श्रीकृष्ण  मुस्करा  कर  सब  सुनते  रहे   और  बीच -बीच  में  उसे  समझाते  भी  रहे  कि  शिशुपाल  तुम  संभल  जाओ  ,  मैं  तुम्हारे  केवल  सौ  अपराधों  को  क्षमा  करूँगा  l  लेकिन  शिशुपाल  कहाँ  समझने  वाला  था   ' विनाशकाले  विपरीत  बुद्धि  '  l  जैसे  ही  उसकी  सौ  गालियाँ  हुईं   भगवान  श्रीकृष्ण  के  हाथ  में  सुदर्शन  चक्र  आ  गया  ,  फिर  तो  वह  तीनो  लोकों  में  भागता   फिरा  l  किसी  ने  उसे  शरण  नहीं  थी  , उसका  पाप  का  घड़ा  भर   चुका    था  ,  उसकी  मृत्यु  से  ही  उसके  पाप  का  अंत  हुआ  l   यदि  शिशुपाल  80 -90  गालियाँ  देकर  रुक  जाता   तो  उसके  प्राण  बच  जाते  , भगवान  सबको  सुधरने  का  मौका  देते  हैं  , उनका  कहना  है  अपनी  गलतियों  को  सुधारने  का  और  उन्हें  बार -बार  न  दोहराने  का  संकल्प  लो  l  जो  पाप   व्यक्ति  कर  चुका  है  , उनका  प्रायश्चित  तो  करना  ही  पड़ेगा  ,  उन  पापों  का  परिणाम  तो  भोगना  ही  पड़ेगा   लेकिन  जब  व्यक्ति  सन्मार्ग  पर  चलने  का  संकल्प  लेता  है  ,  अच्छाई  के  मार्ग  पर  आगे  बढ़ता  है  तब  सम्पूर्ण  प्रकृति  उसकी  मदद  करती  है  , उसे  पाप  के  गड्ढे  में  गिरने  से  बचाती  है  l  

29 May 2024

WISDOM -------

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- " कृपणता  ( कंजूसी ) एक  ऐसी  मानसिकता  है  ,  जो  धन  को  संग्रह  तो  करवाती  है , लेकिन   उसका  उपयोग  करना   नहीं  सिखाती  l  कृपणता  एक  ऐसा  असुरक्षा  का  भाव  है  , जिसमें  बैंक  एकाउंट  में   पर्याप्त  धन  होने  के  बावजूद   कहीं  वह  कम  न  हो  जाये  ,  यह  मानकर   व्यक्ति  छोटी -छोटी  चीजों  के  लिए   औरों  के  आगे  हाथ  पसारता  रहता  है  l  कृपण  व्यक्ति   आवश्यकता  की  सभी  वस्तुएं   उपलब्ध  होने  के  बावजूद   उसका  उपभोग  न  तो  स्वयं  करता  है   और  न  ही   औरों  को   उसका  किंचित  अंश  उपलब्ध  कराता  है  l  सारी  सुविधाएँ  होते  हुए  भी   स्वयं  क्षुद्रता  के  साथ  जीता  है     और  किसी  अन्य  का  भी  कोई  लाभ  नहीं  करता  l  "   एक  कथा  है --------- एक  गाँव  में  एक  वृद्ध  महिला   अपने  परिवार  के  साथ  रहती  थी  l  परिवार  में  उसका  बेटा , बहू , पोता -पोती    थे  l  उसके  पास  इतना  खेत  था   कि  एक  वर्ष  की  फसल  तैयार  हो   जाती  थी  l  उस  फसल  से  एक  वर्ष  का  गुजारा  आसानी  से  हो  जाता  था  l  एक  बार  चावल  की  फसल  इतनी  हुई  कि  उससे  364  दिनों  के  भोजन  का  प्रबंध  हो  जाता  केवल  एक  दिन  के  लिए  अन्न  कम  पड़  रहा  था  l  वृद्ध  महिला  को  बड़ी  चिंता  हो  गई  ,  इसी  उधेड़ -बुन  में  लगी  रही   कि  कैसे  क्या  किया  जाए  कि  इस  एक  दिन  की  भी  व्यवस्था  हो  जाए  l   उसने  सोचा  कि  क्यों  न  एक  दिन  धान  की  भूसी   का  भोजन  कर  लिया  जाये  l  उसने  सोचा  कि  क्यों  न  आज  ही  भूसी  खा  ली  जाए  ताकि  शेष  364  दिन  आराम  से  बीतें  l  इस  सोच  में  उसने   भरपेट  भूसी  खाई  और  पानी  पीकर  सो  गई  l  वृद्ध  महिला  के  पेट  में  भूसी  इतनी  फूल  गई  कि   वह  पचा  नहीं  सकी   और  वही  मर  गई  l  कृपणता  एक  ऐसी  ही  बुद्धिहीनता  है  ,  जहाँ  पर  संसाधनों  के  होते  हुए  भी   मनुष्य  अभाव  के  मार्ग  का  चयन  करता  है  l  

28 May 2024

WISDOM ------

 हमारे  धर्म  ग्रन्थ  हमें  बहुत  कुछ  सिखाते  हैं  ,  लेकिन  मनुष्य  सीखता  वही  है  जैसे  उसके  संस्कार  होते  हैं  l  ईश्वर  ने  धरती  पर  अवतार  लेकर  अपने  आचरण  से  मनुष्य  को   शिक्षा  दी  लेकिन   मनुष्य  ने  उन्हें  केवल   पूजने  और  कर्मकांड  तक  ही   सीमित    कर  दिया  ,  उनकी  शिक्षा  से  कोई  लेना -देना  नहीं  है  l  राम -रावण  का  युद्ध  हो  या  कौरव -पांडव  का  महाभारत  हो  यह   धर्म  और  अधर्म  की  लड़ाई  थी  ,  अनीति  और  अत्याचार  को  मिटाकर  धर्म  और  न्याय  की  स्थापना    के  लिए  यह  युद्ध  था  कहते  हैं  बुराई  का  मार्ग  सरल  और  जल्दी  लाभ  देने  वाला  होता  है   इसलिए  लोगों  ने  अपने  मन -विचारों  में  रावण  के  दुर्गुणों  को  स्थान  दिया  ,  उसके  गुणों  की  उपेक्षा  कर  दी  l  यही  कारण  है  कि   चारों  ओर  अनीति , अत्याचार    , शोषण  है  l  इसी  तरह   महाभारत  में   कर्ण , अर्जुन , युधिष्ठिर , भीम , स्वयं  भगवान  श्री  कृष्ण   जैसे   महामानव  थे  जिनसे  व्यक्ति  बहुत  कुछ  सीखकर  अपना  जीवन  सुख -शांति  से  व्यतीत  कर  सकता  है   लेकिन  लोगों  ने  दुर्योधन  से  छल , कपट , षड्यंत्र  रचना ,  धोखा  देना , गुट  बनाकर   निहत्थे  को  मारना  , शोषण  करना , उत्पीड़ित   करना    जैसे  पाप  कर्म  सीख   लिए  l   इससे  समाज  में  तो अशांति  होती  है  , ऐसे  व्यक्तियों  का  जीवन   भी   दुःख  और  तनाव  से  घिर  जाता  है  l  महाभारत  का  एक  प्रसंग  है ------ अर्जुन  ने  जब  खांडव वन  को  जलाया  , तब  अश्वसेन  नमक  सर्प  की  माता   बेटे  को  निगलकर  आकाश  में  उड़  गई  , लेकिन  अर्जुन  ने  उसका  मस्तक  बाणों  से  काट  डाला  l  सर्पिणी  तो  मर  गई   पर  अश्वसेन  बचकर  भाग  गया  l  इसी  वैर  का  बदला  लेने  वह  कुरुक्षेत्र  की  रणभूमि  में  आया  l  कर्ण  और  अर्जुन   में    युद्ध  हो  रहा  था  l  अश्वसेन  ने  कर्ण  से  कहा ---- "  मैं  विश्रुत  भुजंगों  का  स्वामी  हूँ  l  जन्म  से  ही  पार्थ  का  शत्रु  हूँ  l  तेरा  हित  चाहता  हूँ  l  बस  एक  बार   अपने  धनुष  पर   मुझे   चढ़ाकर   मेरे  महा शत्रु  तक  मुझे  पहुंचा  दे  l  तू  मुझे  सहारा  दे  , मैं  तेरे  शत्रु  को  मारूंगा  l "  कर्ण  ने  कहा ----- " विजय  का  समस्त  साधन  नर   की  बाँहों  में  रहता  है  ,  उस  पर  भी  मैं  तेरे  साथ  मिलकर  , सांप  के  साथ  मिलकर  मनुज  के  साथ  युद्ध  करूँ  , निष्ठा  के  विरुद्ध  आचरण  करूँ  l   ऐसा  कर  के  मैं  मानवता  को  क्या  मुँह   दिखाऊंगा  ? "  इसी  प्रसंग  पर   रामधारी  सिंह  ' दिनकर '  ने  अपने   प्रसिद्ध    काव्य  ' रश्मिरथी  '   में  लिखा  है  ----- ' रे  अश्वसेन  !  तेरे  अनेक  वंशज  हैं, छिपे   नरों  में  भी  ,   सीमित   वन  में  ही  नहीं  , बहुत  बसते   पुर -ग्राम -घरों  में  भी  l '  यह  सत्य  ही  है  ,  आज  सर्प  रूप  में  कितने  ही   अश्वसेन   मनुष्यों  के  बीच , अपने  ही  परिवारों  में  और  राष्ट्र विरोधी  गतिविधियों  में  लीन   हैं   l  

27 May 2024

WISDOM -----

   बालक      सैंडो   अत्यंत  दुर्बल  और  रोगी  था  l  अपनी  बुरी  आदतों  के  कारण  उसने  बचपन  में  ही  अपना  स्वास्थ्य  ख़राब  कर  लिया  था  l  एक  दिन  सैंडो  अपने  पिता  के  साथ  अजायबघर  देखने  गया  l  रोम  की  गैलरी  में   उसने   प्राचीन  काल  के  बलिष्ठ  पुरुषों  की  मूर्तियाँ  देखीं  l  उसे  विश्वास  न  हुआ  कि   ऐसे  मांसल  भुजाओं  वाले  स्वस्थ   और  बलवान   लोग  भी   इस  संसार  में  हो  सकते  हैं   l   सैंडो  इन  प्रतिमाओं  को  देखकर  बड़ा  प्रभावित  हुआ  l   उसने  पिता  से  पूछा ---- " क्या  ये  प्रतिमाएं  काल्पनिक  हैं   ?  क्या  ऐसा  स्वास्थ्य  संभव  हो  सकता  है  ? "  पिता  ने  कहा ---"  संसार  में  संभव  क्या  नहीं  है  ,  यदि  तुम  भी   नियमित  व्यायाम  करो , परिश्रम  करो  , संयमित  बनो  ,  आलस  न  करो , नियमित  दिनचर्या  हो    तो  तुम  भी  ऐसा  स्वास्थ्य  प्राप्त  कर  सकते  हो  l "  यह  बात  सैंडो  के  मन  में   बैठ  गई  l  उसने  संकल्प  कर  के  अपनी  पिछली  जिन्दगी   का  चोला  उतार  फेंका   और  नियमपूर्वक  व्यायाम  और  कठोर  श्रम  करना  प्रारम्भ  कर  दिया   l  इसका  परिणाम  हुआ  कि   वह  एक  प्रख्यात  पहलवान  बन  गया  l  उसने  व्यायाम  की  अनेक  विधियाँ  भी  निकली  , जिन्हें  सैंडो  की  कलाएं  कहा  जाता  है  l  

WISDOM -------

   एक  जल  पूरित  नदी  कल -कल  करती  हुई   आनंद  और  उल्लास  के  साथ  बही  जा  रही  थी  l  उसके  किनारे  बड़े -बड़े  सुन्दर  नगर , उपनगर  बसे  हुए  थे  l  खेती  और   दैनिक  जीवन  में  इसके  जल  का  लोग  उपयोग  करते करते  थे  l  नदी  के  जल  से  विद्युत  उत्पादन  होता  था  , इस  बिजली  से  बड़े -बड़े   उद्योग  लाभान्वित  होते  थे  l  नदी  के  माध्यम  से  व्यापर  भी  होता  था , असंख्य  लोगों  को  रोजगार  मिला  था  l  नदी   अपने  गंतव्य  की  ओर  बहती  हुई  जा  रही  थी  , तब   उसके  निकट  एक  छोटी  तलैया  , जिसका  पानी  प्रवाह हीन   होने  के  कारण  दुर्गन्ध  दे  रहा  था  ,  उसने  नदी  से  कहा ---- " बहिन  बताओ  ,  अपने  इस  दिन -रात  के  बहते  हुए  जीवन  में   आखिर  तुम्हे  किस  बात  का  अनुभव  होता  है  ,  जो  तुम   निरंतर  कल -कल  करती  हुई   किलोले  क्रिया    करती  हो  ?  मुझे  क्यों  नहीं  देखतीं  , जो  एक  जगह  ठहरकर   अपने  जीवन   को  प्रगति  और  प्रवाह  से   दूर  कर  के  , स्थिर  होकर   यहाँ  पड़ी -पड़ी   आराम  के  साथ  अपने   दिन  गुजार  रही  हूँ   l "  नदी   ने  तलैया  से  कहा ---- " प्रगति  और  प्रवाह  का  पथ   अपनाने  से  ही   मेरा  जल   स्वच्छ  और  निर्मल  बना  हुआ  है   और  इसीलिए  मेरी  हर  बूंद  का   सदुपयोग  किया  जाता  है  l  प्रगति  और  प्रवाहहीन  होने  के  कारण   ही  तुम  गंदगी  का   आगार  बनी  हुई  हो  l  औरों  के  उपयोग  में  न  आने  वाले   तुम्हारे  जीवन  का  इस  दुनिया  में   अधिक  अस्तित्व  नहीं  है  l "  

24 May 2024

WISDOM ----

   एक  बार   रानी  रासमणि  के  गोविन्द जी  की  मूर्ति  पुजारी  के  हाथ  से  गिरने  से  खंडित  हो  गई  l  रानी  रासमणि  ने  ब्राह्मणों  से  उपाय  पूछा  l  ब्राह्मणों  ने  खंडित  मूर्ति  को   गंगा जी  में  विसर्जित  कर  नई   मूर्ति  बनवाने  का  सुझाव  दिया   l  यह  सुनकर  रानी  बहुत  दुःखी  हुईं  कि  अब  तक  जिन  ठाकुर जी  को  इतनी  श्रद्धा  और  भक्ति  के  साथ   पूजा  जाता  रहा  , उन्हें  अब  गंगा  में  विसर्जित  करना  पड़ेगा  l  उन्होंने  रामकृष्ण  परमहंस जी  से  पूछा    तो  वे  बोले  ---- "  यदि  आपके  किसी  सम्बन्धी  का  पैर  टूट  जाता   तो  आप  उसकी  चिकित्सा  करवातीं  या  नदी  में  प्रवाहित  करतीं  ? "  रानी  रासमणि  उनका  आशय  समझ  गईं  l  उन्होंने  खंडित  मूर्ति  को  ठीक  करवाया   और  पहले  की  भांति  पूजा  आरम्भ  कर  दी  l  एक  दिन  किसी  ने  स्वामी    रामकृष्ण  परमहंस जी  से  पूछा  ---- "  मैंने  सुना  है  कि  इस  मूर्ति  का  पैर  टूटा  है   l "  इस  पर  वे  हँसकर  बोले  ---- "  जो  सबके  टूटे  को  जोड़ने  वाले  हैं  ,  वे  स्वयं  टूटे  कैसे  हो  सकते  हैं  l  ' 

WISDOM -----

  मनुष्य  के  लिए  सबसे  कठिन  कार्य  है  ---अपने  मन  पर  नियंत्रण  करना  l  यह  मन  हमारे  शरीर  में  कहाँ  है , कैसा  है  , उसकी  बनावट  क्या  है  कोई  नहीं  जानता  , लेकिन  यह  बड़ी  तेजी  से  बेलगाम  घोड़े  की  तरह  भागता  है   और  मनुष्यों  में  तनाव  का  सबसे  बड़ा  कारण  यह  मन  ही  है  l  यदि  मन  पर  नियंत्रण  हो  जाये  तो  जीवन  की  अधिकांश   समस्याएं  स्वत:  ही  हल  हो  जाएँ   l   ------- जापान  का  एक  युवा  तीरंदाज  स्वयं  को  दुनिया  का  सबसे  बड़ा  तीरंदाज  समझता  था  l  वह  जहाँ  भी  जाता  ,  लोगों  को  मुकाबले  की  चुनौती  देता   और  उस  मुकाबले  में   उन्हें  हराकर   उनका  खूब  मजाक  उड़ाता  l   एक  बार  उसने   झेन  गुरु   बोकोशु  को  चुनौती  दी  l  गुरु  ने  चुनौती  स्वीकार   कर  ली  l   युवक  ने  प्रतिस्पर्धा  प्रारम्भ  होते  ही   लक्ष्य  के   बीचोबीच   निशाना  लगाया   और  पहले  ही  तीर  में   उस  लक्ष्य  को  बेध  दिया  l  वह  झेन  गुरु  से  दंभ पूर्वक  बोला  ------ " क्या  आप  इससे  बेहतर   कर  सकते  हैं  ? "      झेन  गुरु  मुस्कराए   और  उसे  लेकर   ऐसे  स्थान  पर  गए  , जहाँ   दो  पहाड़ियों  को  जोड़ने  के  लिए  लकड़ी  का  कामचलाऊ  पुल  बना  था  l  उस  पर  कदम  रखते  ही   वह  पुल  चरमराने  लगा  l  बोकोशु  ने   उसे  पुल  पर   अपने  पीछे   आने  को  कहा   l  बोकोशु   ने  पुल  के  बीच   में  पहुंचकर   सामने  दूर  खड़े  एक  पेड़  के  तने   पर  निशाना  लगाया  l  इसके  बाद  उन्होंने  उस  युवक  से   निशाना  लगाने  को  कहा  ,  परन्तु   कई    बार  के  प्रयास  के  बाद  भी   वह  निशाना  न  लगा  सका  l  उसे  निराशा  में  डूबा  देख  झेन  गुरु  ने  कहा --- " वत्स  ! तुमने  निशाना  लगाना  तो  सीख  लिया  ,  पर  मन  पर  नियंत्रण  करना  नहीं  सीखा  ,  जो  किसी  भी  परिस्थिति  में   शांत  रहकर  निशाना  साध  सके  l  "  युवक  को  बात  समझ  में  आ  गई  l  उसने  अब  अहंकार   छोड़कर   मन  को  साधने  का  प्रयास  आरम्भ  किया  l   उसे  यह  बात  समझ  में  आ  गई  कि  अहंकार  सारी  बुराइयों  की  जड़  है  , अहंकार  के  आते  ही  अन्य  बुराइयाँ  अपने  आप  खिंची  चली  आती  है  l  इसलिए  यदि  जीवन  में  स्थायी  सफलता  प्राप्त  करनी  है   तो  अहंकार  को  त्यागना  होगा  l  

23 May 2024

WISDOM -----

   इस  धरती  पर  समय -समय  पर  अनेक  महान  आत्माओं  ने  शांति  और  अहिंसा  का  सन्देश  दिया   लेकिन   शांति  आई  ही  नहीं   हर  तरफ  युद्ध , दंगे , उन्माद  है  l  इन्सान  का  इन्सान  और  इंसानियत  पर  से  भरोसा  उठ  गया  है  l  इसका  एक  कारण  यह  भी  है  कि  शांति  का  उपदेश  देने  वाले   और  उन   उपदेशों  के  अनुसार  आचरण  करने  के  लिए  नियम , कानून  बनाने  वालों  में  बहुत   दूरी   थी  , कोई  तालमेल  नहीं  था  l  एक  ओर  त्याग  था   तो  दूसरी  ओर  स्वार्थ  और  महत्वाकांक्षा  थी  l  परस्पर  संतुलन  नहीं  था   इसलिए  उन  महान   शांति  दूतों  के  सच्चे  अनुयायी  भी  समय  के  साथ  भीड़  में  कहीं  खो  गए   l  वर्तमान  समय  में  अशांति  का  कारण   मनुष्य  की  दुर्बुद्धि  है  l  लोगों  के  मन में  शांति , संतोष  नहीं  है  , हर  व्यक्ति   धन , सुख -वैभव  जल्दी  से  जल्दी  प्राप्त  करने  के  लिए  भाग  रहा  है  l   जाति  और  धर्म  के  नाम  पर  होने  वाले  दंगों  की  बात  नहीं  करें ,  तो  स्वार्थ , ईर्ष्या , द्वेष  , अहंकार  जैसे  दुर्गुणों  के  कारण  परिवारों  में  अशांति   है  l  सबसे  ज्यादा  मुकदमे  तो  पारिवारिक  संपत्ति , भूमि विवाद  और  तलाक   के  हैं  l  यह  एक  कटु  सत्य  है   कि   दूर  देश  में  बैठा  एक   अनजान    व्यक्ति  किसी  को  सताने , उत्पीड़ित  करने  नहीं  आता  , ईर्ष्या , द्वेष , अहंकार  जैसे  दुर्गुणों  के  कारण   सबसे  ज्यादा  शोषण , उत्पीड़न  परिवारों  में  ही  होता  है  l  परिवार  के  ही  लोग   अपनी  दुर्बुद्धि  के  कारण  अपनों  को  ही  सताने  के  लिए , उनकी  भूमि , संपत्ति  आदि---- पर  अपना  कब्ज़ा  जमाने  के  लिए  गैरों  की  मदद  लेते  हैं   और  'खानदान ' के  नाम  पर  मुंह  बंद  रखने  की  बात  करते  हैं  l  ऐसे  ही  अशांत  मन  के  लोग   इकट्ठे  होकर  अपनी  दुर्बुद्धि  से  समाज  में  अशांति  फैलाते  हैं  l  भौतिक  प्रगति  तो   बहुत   हुई  ,  बौद्धिक  विकास  बड़ी  तेजी  से  हुआ   लेकिन  अध्यात्म  से  न  जुड़ने  के  कारण   इस  बुद्धि  का  सदुपयोग  नहीं  हो  रहा  ,  धवल  वस्त्रों  में  नर -पिशाच   परिवार  और  समाज  सबके  लिए  खतरा  हैं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  लिखते  हैं  ---- "  आज  सबसे  बड़ी  जरुरत  सद्बुद्धि  की  है   l  गायत्री मन्त्र  सद्बुद्धि   का  मन्त्र  है   l  जब  समाज  को  दिशा  देने  वाले  ही  दिशाहीन  हों   तब  हम  गायत्री  मन्त्र  के  माध्यम  से  ईश्वर  को  पुकारें   और  सद्बुद्धि  की  प्रार्थना  करें   तभी  संसार  में  शांति  होगी  l '

22 May 2024

WISDOM -------

 संसार  में  आसुरी  और  दैवी  शक्तियों  में  स्रष्टि  के  आरम्भ  से  ही  संघर्ष  चला  आ  रहा  है  l  इस  संघर्ष  की  शुरुआत  परिवार  से  ही  होती  है  क्योंकि  परिवार  से  मिलकर  समाज  बना  , समाज  से  राष्ट्र   और  राष्ट्रों  से  मिलकर  ही  यह  संसार  है  l  एक  परिवार  में  ही  दैवी  और  आसुरी  दोनों  प्रवृत्तियों  के  सदस्य  होते  हैं  l  बुराई  का  मार्ग  सरल  है  और  इसमें  लाभ  भी  बड़ी  तेजी  से  होता  है  l  किसी  परिवार  में   यदि  सब  अपराधिक  गतिविधियों  में  लगे  हैं  और  एक  व्यक्ति   यदि   सरल  है , सन्मार्ग  पर  चलता  है   तो  सब  लोग   उसकी  उपेक्षा  करेंगे    और  साम , दाम , दंड , भेद   हर  तरीके  से  यह  प्रयास  करेंगे  कि  वह  भी  उनके  जैसा  अपराधी  बन  जाये   l  अधिकांशत:  वे  अपने  इस  उदेश्य  में  सफल  भी  हो  जाते  हैं   इसलिए  असुरता  का  साम्राज्य  बड़ी  तेजी  से  बढ़ता  है  l  यदि  कोई  अपनी  सच्चाई  पर  , सन्मार्ग  पर  अडिग  रहे  तो  पापी  उसका  जीना  मुश्किल  कर  देते  हैं  l  इसी  तरह  विभिन्न  परिवारों  में  , संस्थाओं  में  , समाज  में  जब   दैवी  प्रवृत्ति  के  लोगों  पर  अत्याचार  होता  है  ,  सारे  असुर  मिलकर  उन्हें  बुराई  के  दलदल  में  घसीटने  का  प्रयास  करते  हैं   तब   भगवान  शिव  का  तृतीय  नेत्र  खुल  जाता  है  l  विभीषण  असुर  कुल  में  पैदा  होकर  भी  दैवी  प्रवृत्ति  का  था , भगवान  का  भक्त  था  l  रावण  ने  चाहा  कि  विभीषण  उसके  जैसा  ही  बन  जाये   लेकिन  जब  विभीषण  उसे  नेक  सलाह  देता  है  कि  सीता हरण  करना  , श्रीराम  से  बैर  रखना  उचित  नहीं  है  तब  रावण  से  उसे  लंका  से  बाहर  कर  दिया  l  इसी  तरह  दुर्योधन  का  सबसे  छोटा  भाई  विकर्ण  था   उसने  दुर्योधन  की  अनीति  के  विरोध  में  आवाज  उठाई ,  द्रोपदी  के  चीर हरण  के  समय   भी  उसने  विरोध  किया   , बड़ों  को  समझाना  चाहा   लेकिन  उसकी  बात  को  सबने  अनसुना  कर  दिया  l  असुरों  का  भी  परिवार  होता  है   इसलिए  पीढ़ी -दर -पीढ़ी   असुरता  बढ़ती   जाती  है  और   यही  कारण  है  कि  कलियुग  में  यह  चरम   स्तर    पर  पहुँच  गई  l  असुरता  इसलिए  भी  बढ़ती  जाती  है  क्योंकि  शक्तिशाली  होने  के  कारण   क़ानूनी  प्रक्रिया  में  ऐसे  लोग  दंड  से  बड़ी  आसानी  से  बच  जाते  हैं   और  समाज  में  खुलकर  घूमते  हैं  ,  अनेक  छिपे  हुए  अपराधी  हैं  जो  तंत्र , काला  जादू  जैसी  नकारात्मक  शक्तियों  के   बल  पर  लोगों  को  सताते  हैं   वे  कानून  की  नजर  में  ही  नहीं  आते  l  फिर  ईश्वर  के  दरबार  में  भी   पाप -पुण्य  के  लेखा -जोखा  से   काल  निश्चित  करता  है  कि  पापी  को  दंड  कब  मिलेगा  ,  इसमें  भी  बहुत  लंबा  समय  गुजर  जाता  है  , असुर  और  आतंक  मचाते  हैं  l  दु;शासन  ने  भरी  सभा  में  द्रोपदी  का  अपमान  किया  , चौदह  वर्ष  तक  द्रोपदी  अपने  केश  खोले  रहीं  , पापी  को  दंड  मिले  इसका  बहुत  इंतजार  किया   l  चौदह  वर्ष  बाद  जब  महाभारत  हुआ   तब  दु;शासन  को  अपने  किए  की  सजा  मिली  l  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  द्रोपदी  की  लाज  रखी   लेकिन  पापी  को  दंड  तो   उसका  समय  आने  पर  ही  मिला  l  इस  अवधि  में  दुर्योधन , दु:शासन  ने  और  षड्यंत्र  रचकर  अपने  पाप  के  घड़े  को   अच्छी  तरह  भर  लिया  l  यही  सब   इस  संसार  में  हो  रहा  है  ,  पापियों  को  पता  नहीं  है  कि  वे  अपने  दुष्कर्मों  द्वारा  अपना  ही  पाप  का  घड़ा  भर  रहे  हैं ,  स्वयं  अपना  दुर्भाग्य  लिख  रहे  हैं  l  यदि  शिक्षा  के  आरम्भ  से  ही  बच्चों  को  गीता  के  कर्म-फल  विधान  को  पढ़ाया  , समझाया  जाए  तो  असुरता  में  कमी  होना  संभव  हो  सकता  है  l  

21 May 2024

WISDOM ------

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " ईश्वर  ने  मनुष्य  को  अतुलनीय  संपदाओं  से  भरा-पूरा  जीवन  दिया  है   और  वह  सफल  तभी  हो  पाता  है  , जब  वह  संपदाओं  का  सदुपयोग  करना   जानता  है  l  यह  तभी  संभव  है  जब  मनुष्य  के  पास  विवेक  होगा , सद्बुद्धि  होगी  l  विवेक  असंभव  को  संभव   बनाता  है  l    एक  प्राचीन  कहानी  है ----- यूनान  में  एक  हमला  हुआ   और  एथेंस  के  सारे  प्रतिष्ठित  लोग  पकड़  लिए  गए  l  सौ  प्रतिष्ठित  लोगों  को   जंजीरों  में  बांधकर   बेड़ियाँ   पहनाकर  जंगलों  में  फेंकने  की  तैयारी  की  जाने  लगी  l  यह  सोचा  गया  कि  जंगली  जानवर  उन्हें  खा  लेंगे  l    उन  बेड़ियों  में  वहां  के  प्रतिष्ठित  लोहार  का  जोड़  था  l  वह  जोड़  आसानी  से   टूटता  नहीं  था  l  सैनिक  सभी  को  जंगल  की  ओर  ले  जा  रहे  थे  l  सभी  दुःखी   थे , रो  रहे  थे   l  उनमें  एक  लोहार  था  जो  गीत  गुनगुना  रहा  था  l  उनमें  से  एक  ने  पूछा ---- " तू  हँस  रहा  है  , पागल  हो  गया  है  ?  हम  मरने  की  तरफ  जा  रहे  हैं  , तू  होश  में  तो  है  ? "  लोहार  ने  कहा ---- " मैं  लोहार  हूँ  l  जीवन  भर  मैंने  जंजीरें  ही  बनाई  हैं  l  जो  बना  सकता  है  वह  मिटा  भी  सकता  है  l  घबराओ  मत  !  मैं  अपनी  जंजीरें  तोड़  लूँगा  , साथ  ही  तुम्हारी  भी  तोड़  दूंगा  l  तुम  चिंता  न  करो  l  एक  बार  इनको  हमें  फेंक  कर  जाने  दो  l  बस !  फिर  मैं  जंजीरें  तोड़  दूंगा  और  हम  सब   इन  जंजीरों  से  आजाद  हो  जाएंगे  l  l "  सब  में  हिम्मत  आ  गई  l  दुश्मन  उन्हें  जंगल  में  छोड़कर  भाग  गए  l  रात  होने  को  थी , जंगली  जानवरों  की  आवाज  आ  रही  थी  l  सब  लोग  घिसट   कर  लोहार  के  पास  इकट्ठे  होने  लगे  ,  सभी  को  उन जंजीरों  से  मुक्त  होने  की  चाह  थी  l  लेकिन  यह  क्या  ?  उन्होंने  देखा  कि  लोहार  तो  रो  रहा  है  l  उन्होंने  पूछा  --- "  क्या  हुआ  ?  अभी  तो  तुम  गीत  गा रहे  थे  ,  अब  तुम  रो  रहे  हो  l "  लोहार  ने  कहा --- "  ये  जंजीरें  नहीं  टूटेंगी  l   ये   तो   मेरी  ही  बनाई  हुई  हैं  , इन  पर  मेरे  हस्ताक्षर  हैं  l  इन्हें  कोई  भी  नहीं  तोड़  सकता  , मैं  भी   नहीं  l  इन्हें   तोड़ना    असंभव  है  l  "  अपनी  ही  बनाई  हुई  जंजीरों  में  वह  लोहार  भी  फँसा  रहा  ,  और  वे  सब  भी ,  कोई  भी  मुक्त  नहीं  हो  पाया  l    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी   लिखते  हैं ---- ' लोहार  का  काम  अच्छा  था  , पर  असली  कुशलता  इसमें  है   कि  हम  यह  भी  जान  लें  कि  जो  जंजीरें  बनाई  हैं  , उन्हें  तोड़ना  कैसे  है  ?  हम  सब  लोभ , मोह , कामना , वासना , लालच  की  जंजीरों  से   स्वयं  ही  बंधे  हुए  हैं , ये  जंजीरें  ही  हमारी  समस्या  बन   जाती  हैं  l  इसका  एक  ही  समाधान  है ----- विवेक  !   विवेक  असंभव  को   संभव  करता  है  l  यदि  हमारे  पास  विवेक  होगा    तो   हम  जब  तक  चाहें  इन  सांसारिक  सुख  रूपी  जंजीरों  में  बंधे  भी  रहेंगे   और  जब  चाहेंगे  इनसे  मुक्त  भी  हो  सकेंगे  l  ' विवेक  ' जरुरी  है  l  श्रीमद भगवद्गीता  में  कहा  गया  है -- निष्काम  कर्म  से , सन्मार्ग  पर  चलने  से  मन  निर्मल  होता  है   फिर  हम  अपनी  आत्मा  की  आवाज  को  सुन  पाते  हैं  l  आत्मा  पवित्र  होती  है , आत्मा  ही  परमात्मा  है  ,  हमें  उसकी  आवाज  को  सुनने  की  जरुरत  है  l  

19 May 2024

WISDOM -----

   श्री रामकृष्ण  परमहंस  कहते  हैं ---- भक्त  तीन  तरह  के  होते  हैं  l  एक  तमोगुणी  भक्त  , जो  आज  बहुतायत  में  पाए  जाते  हैं  l चिल्लाकर  भगवन  का  नाम  लिया  , जप  भी  किया  लेकिन  फिर  सस्ते  मजाक  किए , ठहाके  लगाए , मनोरंजन  और  खान -पान  में  दिन  गुजार  दिया  l  एक  रजोगुणी  भक्त ---- बहुत  सारे  पूजा - उपचार , कर्मकांड  करता  है  , दिखाता  भी  है , खरच  भी  करता  है   पर  जीवन  में  अध्यात्म  कम  ही  है  l     सतोगुणी  भक्त  सबसे  ऊँचा  है  l  वे  ढेरों  अच्छे  काम  करते  हैं  ,  पर  उनका  दंभ  जरा  भी  नहीं  करते  l  ढेरों  पारमार्थिक  कार्यों  में  उनकी  भागीदारी  है  ,  पर  उनका  उन्हें  अहं  नहीं  है  ,  वे  उसके  बदले  में  कुछ  चाहते  नहीं  हैं  l  वे  तो  मात्र  प्रभु  के  विनम्र  भक्त   बने  रहना  चाहते  हैं  l  '                 ऐसे  सात्विक  भक्त  ईश्वर  के  प्रति  पूर्ण  रूप  से  समर्पित  होते  हैं  l   अपने  किसी  भी  सुख  के  लिए  वे  संसार  पर  आश्रित  नहीं  होते  ,  उनके  लिए  ' परमात्मा  पर्याप्त  है  l '    ईश्वर  के  प्रति  यह  विश्वास   हर  प्रकार  के  तनाव  को  समाप्त  कर  देता  है  ,  व्यक्ति  अंदर  से  संतुष्ट  और  आनंद  में  रहता  है  l  ------- एक  कथा  है --- किसी   चारण  ने  सम्राट  की  बहुत  तारीफ  की  l  उसकी  प्रशंसाओं  से  सम्राट  बहुत  प्रसन्न  हुए   और  उस  चारण  को  सोने  की  बहुत  सी   मुहरें  भेंट  की  l   उस  चारण  ने  उन  मुहरों  पर  निगाह  डाली    तो  अचानक  से  उसकी  चेतना  जाग  गई  ,  उसने  ईश्वर  को  धन्यवाद  दिया   , वे  मुहरें  फेंक  दीं  और  नाचने  लगा  l  अब  वह  चारण  न  रहा , संत  हो  गया  l  अब  उसकी  चेतना   में  कोई  कामना  न  थी   l  कामना  , प्रार्थना  में  परिवर्तित  हो  गई   l  बहुत  वर्षों  बाद  किसी  ने  उससे  पूछा  --- ऐसा  क्या  था   उन  मुहरों  में  , क्या  वे  जादुई  थीं  ?   संत  ने  कहा ---- वे  मुहरें  जादुई  नहीं  थी  , उन  पर  लिखे  वाक्य  ने  मेरी  चेतना  को  झकझोर  दिया  , वह  वाक्य  था ---- ' जीवन  की  सभी  आवश्यकताओं  के  लिए   परमात्मा  पर्याप्त  है   l '     जो  इस  सत्य  को  समझ  जाते  हैं   उनके  पास  सब  कुछ  है , सारा  ऐश्वर्य  है  l  

18 May 2024

WISDOM -----

   मानव  जीवन   समस्याओं  से  घिरा  हुआ  है  , हम  सब  के  जीवन  में   एक  न  एक  समस्या  निरंतर  बनी  रहती  है  l  स्थिति  विकट   तब  हो  जाती  है  जब  हम  निरंतर  समस्या  पर  ही  चिंतन करते  रहते  हैं  , उसी  की  चर्चा  करते  हैं  l  यदि  समस्याएं  हैं  तो  उनका  समाधान  भी  है  l  हम  समस्या  को  प्रश्न  समझें  और  समाधान  उस  प्रश्न  का  उत्तर  है  l  अब  हम  अपना  सारा  ध्यान  उस  उत्तर  को  खोजने  में  यानि  उस  समस्या  का  क्या  हल  हो  सकता  है , उसका  समाधान  क्या  है  , इस  पर   हर  पल  चिन्तन  करें ,  अपना  ध्यान  केन्द्रित  करें   तो  बड़ी  से  बड़ी  समस्या  का  हल  हमें  मिल  जाएगा   l  हमें  अपनी  समस्याओं  का  समाधान  ढूँढने  कहीं  बाहर  नहीं  भटकना  है  l  हर  समस्या  का  , हर  प्रश्न  का  उत्तर  हमारे  ही  भीतर  है   l  बस  , हमें  अपनी  अंतरात्मा  की  आवाज  को  सुनना  है   और  ईश्वर  से  प्रार्थना  करनी  है   कि  वे  हमें  इतनी  शक्ति  दें  कि  कुछ  समय  मौन  रहकर  हम  अपनी  अंतरात्मा  की  आवाज  को  सुन  सकें  l  --------------एक  जमीदार  का  घोड़ा  बूढ़ा  हो  गया  था  l  एक  दिन  घास  चरते  हुए  वह  सूखे  कुएं  में  गिर  गया  l  जमीदार  को  पता  चला  तो  उसने  सोचा  कि   अब  वह   घोड़ा  उसके  किसी  काम  का  नहीं  है    तो  उसने  उसे  कुएं  में  ही  दफ़नाने  के  लिए   मजदूरों  को  बुलाया   और  कहा  कि  वे  घोड़े  के  ऊपर  मिटटी  डालकर   उसे  वहीँ  मरने  के  लिए  छोड़  दें  l  जब  घोड़े  पर  मिटटी  पड़ने  लगी   तो  वह  अपने  मालिक  की  मंशा  को  समझ  गया    और  उसने  बचने  की  तरकीब  ढूंढ  ली  l  जब  भी  उस  पर  मिटटी  पड़ती  वह  उछल  पड़ता   इससे  मिटटी   उसके  नीचे  पहुँच  जाती  और  वह   मिटटी  के  ऊपर  l   उस  पर  मिटटी  पड़ती  रही  और  वह  उछल  कर  ऊपर  आता  रहा  l  अंततः  कुआं  मिटटी  से  भर  गया   और   घोड़ा  कुएं  से  बाहर  आ  गया  l  इस  कथा  से  हमें  यह  शिक्षा  मिलती  है   परिस्थितियां  चाहे  कितनी  भी  प्रतिकूल  हों  ,  हमेशा  उनसे  बचाव  का  कोई  न  कोई  उपाय  अवश्य  होता  है  ,  हमें  हिम्मत  नहीं  हारनी  चाहिए  l  

17 May 2024

WISDOM ------

    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- " संपदा  बाहर  भी  है  और   भीतर  भी  l   बाहर  की , द्रश्य , भौतिक  संपदा  मिलने  पर   उसका  खोना  सुनिश्चित  है  ,  लेकिन  भीतर  की  संपदा  मिल  जाने  पर  वह  सदा   बनी  रहती  है  l  उसे  पा  लेने  के  बाद   कुछ  और  पा  लेना  शेष  नहीं  रह  जाता  l  "  समय  कितना  बदल  गया   !   एक  समय  था  जब   ऋषि , मुनि   तपस्या , यम , नियम , साधना  आदि  के  द्वारा  आंतरिक  संपदा  के   धनी  थे , समृद्ध  थे  l  भौतिक  सुख -साधनों  की  उनकी  कोई  मांग  नहीं  थी  , उन्होंने  अपना  जीवन  संसार  के  कल्याण  में  और   मनुष्य  की  चेतना  को  कैसे  परिष्कृत  किया  जाए , इन  खोजों  में  व्यतीत  किया  था  l  लेकिन   अब  इस  वर्ग  के  लोग  केवल  बाना   पहनकर  स्वयं  को  आध्यात्मिक  दिखाते  हैं  , उनके  पास   आंतरिक    संपदा  नहीं   है  और  बाहरी  सुख - भोग  के  अपार  साधन  हैं  l  इसलिए  अब  वे  समाज  को  दिशा  नहीं  दे  पाते  बल्कि   शक्तिशाली  लोग  उन्हें  अपने  स्वार्थ  के  लिए  इस्तेमाल  कर  लेते  हैं  l  अपवाद  स्वरुप  प्राचीन  ऋषियों  की  श्रेणी  के  भी   हैं  लेकिन  उनकी  संख्या  बहुत  कम  है  l बुराई  ने  अच्छाई  को  ढक  दिया  है  l  ---- महर्षि  कणाद  केवल  अन्न  के  कण  बीनकर  अपनी  गुजर  कर  लेते  थे  l  राजा  को  जब  इस  बात  का  पता  चला  तो  उन्होंने  प्रचुत  धन सामग्री  उनके  पास  भेजी  l   मंत्री  सब  लेकर  पहुंचा  तो  महर्षि  ने  कहा --- "  मैं  सकुशल  हूँ  l  इस  धन  को  तुम  उन्हें  बाँट  दो  जिन्हें  इसकी  जरुरत  है  l "  ऐसा  तीन  बार  हुआ  , अंत  में  राजा  स्वयं  बहुत  सा  धनधन  लेकर  उनके  पास  पहुंचे  तो  महर्षि  ने  कहा ---- " देखो  मेरे  पास  तो  सब  कुछ  है  l  यह  धन  उन उन  लोगों  में  वितरित  कर  दो  जिनके  पास  कुछ  नहीं  है  l "   राजा  ने  चकित  होकर  महर्षि  को  देखा  कि  जिनके  तन  पर   केवल  एक  लंगोटी  है  और  कह  रहे  हैं  कि  उनके  पास  सब  कुछ  है  l  राजा  ने  महर्षि  से  कुछ  नहीं  कहा  लेकिन  महल  पहुंचकर  रानी  को   सब  कथा  कह  सुनाई  l  रानी  विवेकवान  थी  , उसने  कहा ---" आपने  भूल  की  l  जिनके  पास  भीतर  की  संपदा  है  ,  वे  ही  बाहर  की  संपदा   छोड़ने  में  समर्थ  होते  है  l  आप  महर्षि  को  कुछ  देने  नहीं , उनसे    अनमोल  ज्ञान  प्राप्त  करने  जाएँ  l"    रानी  की  बात  सुनकर   राजा  महर्षि  के  पास  गए  और  उनसे  ज्ञान  प्राप्त  कर  अपने  जीवन  को  सार्थक  किया   l   

16 May 2024

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- ' कथनी  और  करनी  का  अंतर   समाज  की  बहुत  बड़ी  विडंबना  है  l  इस  समय  ऐसे  बहुत  से  ऐसे   शूरवीर  मिलेंगे   जो  बातें  तो  बहुत  बढ़ -चढ़  कर  करते  हैं  ,  किन्तु  जब  कार्य  को   सिद्धांत  रूप  में  अपनाने   की  बात  आती  है   तो  पीछे  हट  जाते  हैं  l  महापुरुष  वही  होते  हैं   जो  कहने  से  पहले   किसी  भी  सिद्धांत  को   अपने  जीवन  में  उतारते  हैं  l  ऐसे  महामानवों  की  वाणी  में   वह  शक्ति  आ   जाती  है   कि  वह  दूसरों  को   जो  भी  उपदेश  देते  हैं  , जनता  उनकी  बात  मानती  है   l  '  पर  उपदेश  कुशल  बहुतेरे  '  के  अनुसार  दूसरों  को  उपदेश  देना  बहुत  सरल  है  ,  पर  उस  सिद्धांत  पर  आचरण  करना  बहुत  कठिन  है  l  --------- एक  बालक  मिठाई  बहुत  खाता  था  l  उसकी  यह  आदत  उसके  स्वास्थ्य  को  बिगाड़  रही  थी   l  बालक  मानता  ही  नहीं  था  l  उसकी  माता  उसे   रामकृष्ण  परमहंस  के  पास  ले  गई  l  उसे  विश्वास  था  कि  परमहंस जी  के  उपदेश  से  ,  उनकी  शिक्षा  से    बालक  की  आदत  सुधर  जाएगी  , उसके  जीवन  को  सही  दिशा  मिलेगी  l   परमहंस जी  ने  उसे  एक  सप्ताह  बाद  आने  को  कहा  l  महिला  चली  गई  l  एक  सप्ताह  बाद  वह  पुन: बालक  को  लेकर  उनके  पास  आई  l  परमहंस जी  ने  बालक  को  उपदेश  दिया  और  समझाया  तो  बालक  ने   मिठाई  छोड़  दी   l  महिला  ने  एक  सप्ताह  विलंब   लगाने  का  कारण  पूछा   तो  परमहंस जी  ने  कहा  --- तब  तो  मैं  स्वयं  मिठाई  खाता  था  l  जब  बालक  को  उपदेश  देना  आवश्यक  प्रतीत  हुआ  ,  तो  पहले  मैंने  स्वयं  मिठाई  छोड़ी   , तब  बालक  को  कहा  l  जो  स्वयं  करता  है , उसी  की  शिक्षा  का  प्रभाव  पड़ता  है  l 

15 May 2024

WISDOM -------

  लघु -कथा ---- एक  बार  एक  बड़े  त्यागी  महात्मा   कहीं  धर्मोपदेश   करने  गए   और  वहां  से  एक  सोने  का  हार  चुरा  लाए  l  तीसरे  दिन   वे  बड़े  दुःखी  मन  से   वहां  पहुंचे   और  हार  लौटाते  हुए  क्षमा  मांगी  l  गृहस्थ  को  बड़ा  आश्चर्य  हुआ   कि  इतने  त्यागी  और  विद्वान  होते  हुए  भी   क्यों  इन्होने  हार  चुराया   और  क्यों  लौटाने  आए  ?  महात्मा जी  ने  बताया   कि  उस  दिन  उन्होंने   जिस  व्यक्ति  के  यहाँ  से  भिक्षा  ली  थी  ,  वह  चोर  था  l  उसका  अन्न  भी  चोरी  से  लाया  हुआ  था  l  उसे  खाने  से   मेरी  बुद्धि  में   चोरी  के  संस्कार  पैदा  हुए  l  इसके  बाद  पेट  खराब  हो  गया  ,  जब  वह  सारा  विकार , चोरी  का  अन्न  बाहर  निकल  गया   तब  सुबुद्धि  लौटी    तब  मैं  आपका  हार  लौटाने  आया  हूँ  l  

 ऋषि  कहते  हैं  --मनुष्य  की  सब  इन्द्रियों  में  जिह्वा  सबसे  महत्वपूर्ण  है   l  हाथ , पैर , आँख , कान   सभी  दो  हैं  ,  पर  उनका  काम  एक  ही  है   l  पर  जिह्वा  एक  है   पर  उसके  काम  दो  हैं  --- एक  भोजन  का  स्वाद  लेना  और  दूसरा  बोलना  l  इन  दोनों  का  संयम  मनुष्य  के  जीवन  को   प्रभावित  करने  वाला  है   l  भोजन  का  असंयम   शरीर  को  अस्वस्थ    बनाता  है  ,  तो  दूसरी  ओर  मन  के  विचार  को  भी  प्रभावित  करता  है  l  जैसा  होगा  अन्न , वैसा  होगा  मन  l  वर्तमान  समय  में   तो  स्थिति  अत्यंत  विकट  है  l  कृषि   उपज  में  इतनी  रासायनिक  खाद , रासायनिक उर्वरक , विशेष  किस्म  के  बीज  और   ऐसे  कीटनाशकों  का   प्रयोग  होता  है   कि  व्यक्ति  कितने  भी  नियम , संयम  से  रहे  ,  कोई  बुरी  लत  भी  न  हो  , तब  भी  कोई  न  कोई  बीमारी  घेरे  रहती  है  l  बड़े -छोटे  सभी  अस्पताल  बीमारों  से  भरे  हैं l  अब  सामान्य  मृत्यु  तो  बहुत  कम  होती  हैं ,  अधिकांश  बीमारी  से  मरते  हैं  l  इसके  साथ  संसार  में   अपराध , बेईमानी , भ्रष्टाचार  इतना  बढ़  गया  है   कि   हर  प्रकार  के  भोज्य  पदार्थ  में  सात्विकता  की  कल्पना  ही  नहीं  की  जा  सकती   l  वैचारिक   प्रदूषण    बढ़  गया  है   l   

14 May 2024

WISDOM ------

  लघु कथा ----- चारुदत्त  एक  सज्जन  व्यक्ति  था , जिसकी  ईमानदारी एवं  सत्यता  पर  हर  एक  को  विश्वास  था  l उसकी  प्रमाणिकता   की  कथाएं  पूरे  नगर  में  विख्यात  थीं  l  एक  बार  इसी  विश्वास  के  आधार  पर   एक  व्यक्ति   अपने  बहुमूल्य   रत्न  उसके  पास  धरोहर  के  रूप  में   रख  गया  l  दुर्भाग्यवश  चारुदत्त  के  घर  चोरी  हो  गई    और  वे  रत्न  चोरी  चले  गए  l  चोर  बहुत  सा  सामान  चारुदत्त  का  भी  ले  गया  था  ,  पर  उसके  जाने  से  ज्यादा  दुःख   चारुदत्त  को   उन  रत्नों  के  चोरी  होने  का  था  l  उसने  अपना  दुःख  अपने  मित्र  से  साझा  किया    तो  उसके  मित्र  ने  उससे  पूछा  ---- '  जब  वह  व्यक्ति  जो  रत्नों  का  मालिक  था  ,  अपने  रत्न  तुम्हारे  पास  रखकर  गया    तो  उसका  साक्षी  कौन  था  ? "  चारुदत्त  ने  उत्तर  दिया  --- " साक्षी  तो  कोई  नहीं  था  ,  वह  तो  मात्र  विश्वास  के  आधार  पर   ही  मेरे  यहाँ  रत्न  रख  गया  l "  चारुदत्त  के  मित्र  ने  कहा ---- "  तो  फिर  इतना  परेशान  होने  की  क्या  बात  है  ?  जब  वह  पूछने  आए   तो  मुकर  जाना   और  कह  देना   कि  तुमने  मेरे  पास  कोई  रत्न  नहीं  रखे  थे  l  "  यह  सुनकर  चारुदत्त  ने  उत्तर  दिया  ---- "  चाहे  मुझे  भीख  मांगनी  पड़े  ,  पर  मैं   धरोहर  के  रत्नों  के  बराबर   धन  उत्पन्न  कर  के   उसे  लौटा  दूंगा  ,  किसी  भी  स्थिति  में   चरित्र  को  कलंकित  करने  वाले  असत्य  का  प्रयोग  नहीं  करूँगा  ,  झूठ  नहीं  बोलूँगा  l "   चारुदत्त  के  इस  वार्तालाप  को  जिसने  भी  सुना  सब  उसकी  ईमानदारी  और  सत्यता  से  बहुत  प्रभावित  हुए  l   व्यक्ति  की  प्रमाणिकता  ऐसे   विषम  समय  में  ही   सिद्ध  होती  है  l  

13 May 2024

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- ' भागवत पुराण  की  कथा , सत्य नारायण कथा , एकादशी  कथा  आदि  धार्मिक  कथाएं  इस  उदेश्य  से  लिखी  गईं  हैं   कि  उन  कथाओं  की  शिक्षा  को  व्यक्ति  अपने  जीवन  में  उतार  कर    श्रेय   पथ  पर   चले  ,  ईश्वर  ने  जो  शक्तियां  दीं  हैं  उनका  सदुपयोग  करे  l   किन्तु  आज  कथा  को  लोग   मनोरंजन  के  लिए  अथवा  धर्म लाभ  के  लिए  सुनते  हैं  l  "  ------------- एक  बार  संत  ज्ञानेश्वर  कथा  सुना  रहे  थे   कि  ज्ञान , भक्ति  , विवेक  और  शक्ति   परमात्मा  सत्पात्रों  को  देता  है  l  संत  ज्ञानेश्वर  के  ऐसा  कहने  पर  एक  महिला  नाराज  हो  उठी   और  बोली  ----- " तो  इसमें  भगवान  की  क्या  विशेषता   ?  उन्हें  तो  सबको  समान  अनुदान  देने   चाहिएं  l '  संत  उस  समय  तो  चुप  हो  गए  l  दूसरे  दिन  प्रात:काल  संत  ने  मोहल्ले  के  एक  मूर्ख   व्यक्ति  को   बुलाकर  कहा  कि   अमुक  स्त्री  से  जाकर   आभूषण  मांग  लाओ  l  मूर्ख  व्यक्ति  गया   और  आभूषण  मांगे  तो  उस  स्त्री  ने  उसे  झिड़क  कर  भगा  दिया  ,  उसे  कुछ  न  दिया  l  थोड़ी  देर  बाद  संत   ज्ञानेश्वर  स्वयं   उस  महिला  के  यहाँ  पहुंचे   और  बोले  ---- '  आप  एक  दिन  के  लिए  अपने  आभूषण   दे  दें  l  आवश्यक  काम  कर  के  लौटा  देंगे   l "  महिला  ने  बिना  कोई  प्रश्न   पूछे   संदूक  खोला   और  सहर्ष  आभूषण  सौंप  दिए  l  आभूषण  हाथ  में  लिए  संत  ज्ञानेश्वर  ने  उस  महिला  से  पूछा  ---- " अभी -अभी  दूसरा  व्यक्ति   आया  था  आपने  उसे  आभूषण   क्यों  नहीं  दिए  ?  '  महिला  बोली ---- "  उस  मूर्ख  को   कैसे  अपने  मूल्यवान  आभूषण  दे  देती   l "   संत  ज्ञानेश्वर  ने  कहा ---- "  बहन  !  जब  आप  अपने  सामान्य  से  आभूषण  बिना  सोचे -विचारे   कुपात्र  को  नहीं  दे  सकतीं  , तो  फिर  परमात्मा   अपने  दिव्य  अनुदानों  को   कुपात्रों  को  कैसे  सौंप  सकता  है  ?  वह  तो  बारंबार  इस  बात  की  परीक्षा  करता  है  कि   जिसको  अनुदान  दिया  जा  रहा  है  ,  उसमें  पात्रता  है  अथवा  नहीं  ,  वह  इस  अनुदान  का  सदुपयोग  कर  रहा  है  अथवा  नहीं  l '  

WISDOM -----

   पुराण  की  कथा  है  ---- वृत्रासुर  ने  तपस्या  करके  अनेकों  वर  प्राप्त  किए  और  वह  बहुत  शक्तिशाली  हो  गया  था  l  कोई भी  तपस्या  कर  के  बहुत  शक्तिशाली  हो  जाये   तो   वह  देवराज  इंद्र  के  लिए  बहुत  बड़ा  खतरा  बन  जाता  था   और  तब  इंद्र  के  लिए  अपना  सिंहासन  बचाने  हेतु  उसका  अंत  करना  अनिवार्य  हो  जाता  था   लेकिन  वृत्रासुर  को  पराजित  करना  इतना  आसान  नहीं  था  l  महान  तपस्वी  महर्षि   दधीची  की  हड्डियों  से  बने  वज्र  से  ही   वृत्रासुर  का  अंत  हो  सकता  था   लेकिन  जब  तक  महर्षि  दधीची  की  धर्मपत्नी   भगवती  वेदवती  उपस्थित  थीं  ,  तब  तक  उनके  आश्रम  में  प्रवेश  करना   देवराज  इंद्र  के  लिए  भी  असंभव  था  l  इंद्र  सबसे  छिप  सकते  थे  , पर  सती  के  अपूर्व  तेज  के  समक्ष   छद्दम वेष  छिपा  सकना   उनके  लिए  संभव  नहीं  था  l  इसलिए  जव  वेदवती  जल  भरने  के  लिए  आश्रम  से  बाहर  निकलीं   तब  इंद्र  ने  आश्रम  में  प्रवेश  किया   और   संसार  के  कल्याण  के  लिए  महर्षि  से  अस्थिदान  का  निवेदन  किया  l  असुरों  के  अंत  और  लोक कल्याण  के  लिए  महर्षि  दधीची  ने  तुरंत  प्राण त्याग  कर  अस्थिदान  कर  दिया  l  वेदवती  जल  भरकर  लौटीं  तो  एक  क्षण  में  ही  सारी  स्थिति  को  समझ  गईं  l  वे  इंद्र  को  शाप  देने  ही  जा  रहीं  थीं   कि  दिव्य  देहधारी  महर्षि  ने  परावाणी  में  उन्हें  समझाया  ---- " भद्रे  !   देवत्व  की  रक्षा  के  लिए   यह  दान  मैंने  स्वेच्छा  से  किया  है   इसलिए  शाप  देना  उचित  नहीं  है  l  अब  तुम  अपने  गर्भस्थ  शिशु    का  ऐसा  निर्माण  करो   कि           ' तत्वशोध  '   की     हमारी  साधना  अधूरी  न  रह  जाये  l  "   वेदवती  ने  महर्षि  की  आज्ञा  को  स्वीकार  किया  और  इतिहास  साक्षी  है   कि  वेदवती  की  तपस्या  से  उनके  गर्भ  से    पिप्पलाद  जैसे  महान  ऋषि  का  जन्म  हुआ  और  उनके  तपस्वी  पति  महर्षि  दधीची  की  अंतिम  कामना  पूर्ण  हुई  l  

11 May 2024

WISDOM -----

   दो  बन्दर  एक  दिन  घूमते -घूमते  एक  गाँव  के  समीप  पहुंचे  l  उन्होंने  वहां  फलों  से  लदा    पेड़  देखा  l  एक  बन्दर  ने  दूसरे  से   कहा ----"  इस  पेड़  को  देखो  l  ये  फल  कितने  सुन्दर  दिख  रहे  हैं  l  ये  अवश्य  ही  स्वादिष्ट  होंगे  l  चलो  हम  दोनों  पेड़  पर  चढ़कर  फल  खाएं  l  ये  अवश्य  ही  स्वादिष्ट  होंगे  l "  दूसरा  बन्दर  बुद्धिमान  था  , उसने  कहा---- " नहीं , नहीं  , जरा  ठहरो  l  यह  पेड़  गाँव  के  समीप  है  ,  यदि  ये  फल  अच्छे  होते  तो  गांववाले  इन्हें  तोड़कर  खा  लेते  , इन्हें  पेड़  पर  नहीं  लगे  रहने  देते  l  हमें  जल्दबाजी  में  कोई  भी  निर्णय  नहीं  लेना  चाहिए  l  अचानक  कहीं  से  भी  मिली  भोजन  सामग्री  को  देख -परख  कर  ही   इस्तेमाल  करना  चाहिए  l "  पहले  बन्दर  को  फलों  को  देखकर  लालच  आ  गया  था  , स्वयं  पर  नियंत्रण  नहीं  रख  पा  रहा  था  ,  वह  तेजी  से  पेड़  पर  चढ़  गया   और  फल  खाने  लगा  l   वह  फल  उसका  अंतिम  भोजन   बन  गए  क्योंकि  वे  जहरीले  थे  l  दूसरा  बन्दर  जब  पेड़  के  समीप  पहुंचा  तो  उसने  अपने  साथी  को  मरा  पाया  l  उस  बन्दर  ने  अपने  अन्य  साथियों  को  इकट्ठा  किया  और  समझाया   कि  बाहर  से  अच्छा  दिखने  वाला   भीतर  से  हमारे  लिए  जहरीला   और   घातक  हो  सकता  है  l  हर  चमकने  वाली  चीज  सोना  नहीं  होती  l  जल्दबाजी  न  करें  , सोच -समझकर  ही  निर्णय  लें  l " 

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  कहते हैं  एक  बार  गोस्वामी  तुलसीदास जी   रात्रि  को  कहीं  से  लौट  रहे  थे   कि   सामने  से  कुछ  चोर  आते  दिखाई  दिए  l  चोरों  ने  तुलसीदास जी  से  पूछा  --- " कौन  हो  तुम  ? "  तुलसीदास जी  तो  ईश्वर  के  परम  भक्त  थे   और  हर  जीव  को   ईश्वर  का  अंश  मानते  थे  , इस  द्रष्टि  से  उन्होंने  कहा ---" भाई  !  जो  तुम  सो  मैं  l '  चोरों  ने  अपनी  द्रष्टि  से  इसका  अर्थ  लगाया  कि  जैसे  वे  सब  चोर  हैं  वैसे  ही  ये  भी  चोर  हैं  l  इसलिए  चोरों  ने  तुलसीदास जी  को  चोर  मानते  हुए   कहा  -- मालूम  होता  है   तुम  अभी  नए  निकले  हो  , चलो  तुम  भी  हमारे  साथ  चोरी  में  साथ  दो  l  तुलसीदास जी  उनके  साथ  चल  पड़े  l  चोरों  ने  उनसे  कहा  --- तुम  घर  के  बाहर  खड़े  रहना  ,  कोई  आता -जाता  दिखे  तो  हमें  सावधान  कर  देना  , जब  तक  हम  कीमती  सामान   उठाते  हैं  l  अभी  चोरों  ने  अन्दर  जाकर  सामान  खंगालना   शुरू  ही  किया  था   तभी  तुलसीदास जी  ने  अपनी  झोली  से  शंख  निकाला  और  बजाना  शुरू  कर  दिया  l  चोरों  ने  शंख  की  आवाज  सुनी  तो  डरकर  बाहर  निकल  आए  l  बाहर  तो  और  कोई  नहीं  था  , चोरों  ने  तुलसीदास जी  से  कहा ---- " जब  आसपास  कोई  नहीं  है  , फिर  तुमने   शंख   क्यों  बजाया  ? "   तुलसीदास जी  ने  कहा --- मुझे  तो  सर्वत्र  [प्रभु  श्रीराम  दिखाई  दिए  , उन्होंने  तुम  लोगों  को  भी  देख  लिया  होगा  ,  चोरी  करना  पाप  है  प्रभु  अवश्य  दंड  देंगे  ,  इसलिए  मैंने  आप  लोगों  को  सावधान  करना  उचित  समझा  l "    चोर  समझ  गए  कि  ये  तुलसीदास  कोई  चोर  नहीं  हैं  , ये  तो  महात्मा   हैं  l   उनकी  बातों  का  चोरों  पर  ऐसा  असर  हुआ   कि  वे  सब  तुलसीदास जी  के  चरणों  पर  गिर  पड़े   और  कहने  लगे   ---आपने  हमारी  आँखें  खोल   दीं  l  प्रभु  ने  न  जाने  कितनी  बार  हमें  पापकर्म  करते  हुए  देखा  होगा   l  अब  हम  कभी  कोई  बुरा  कर्म  नहीं  करेंगे  l  वे  सब  तुलसीदास जी  के  शिष्य  बन  गए   और  ईश्वर  की  भक्ति  करने  लगे  l  

9 May 2024

WISDOM -----

   एक  बार  महात्मा  आनंद  स्वामी  के  पास   एक  धनपति  आए  l  उनके  कई  कारखाने  थे , सभी  पुत्र  काम  पर  लगे  थे  l  पत्नी  का  स्वर्गवास  हो   चुका  था  l  वैभव  का  साम्राज्य  था  उनके  पास  ,  लेकिन  उनके  अंतर  में  शांति  नहीं  थी   l  भूख  , नींद  सब  चली  गई  थी  l   सेठ जी  ने  अपनी  यह  व्यथा  महात्मा जी  को  सुनाई  l  महात्मा  आनंद स्वामी जी  ने  कहा ---- "  आपने  जीवन  में  कर्म  और  श्रम  को  तो  महत्त्व  दिया  , पर  भावना  को  नहीं  l  सत्संग , कथा श्रवण  से  तो  विचारों  को  पोषण  मिलता  है  l  अन्दर  की  शुष्कता  दूर  करने  के  लिए   अब  प्रेम , धन  और  श्रम  लुटाना  शुरू  कीजिए  l  सबको  स्नेह  दीजिए  ,  अनाथों , निर्धनों  के  बीच  जाइए  ,  उन्हें  स्वावलंबी  बन   सकने  योग्य  सहायता  दीजिए  ,  अपना  शरीर  श्रम  भी   जितना  इस  पुण्य  कार्य  में  लगा  सकें  लगाइए  l  फिर  देखिए  आपकी  भूख  लौट  आएगी   तथा  नित्य  चैन  की  नींद  सोएंगे  l " सेठ जी  ने  ऐसा  ही  किया  , फिर  चमत्कारी  परिवर्तन  ने  उन्हें  जो  शांति  और  प्रसन्नता  दी  ,  वह  पहले  कभी  नहीं  मिली  थी  l 

7 May 2024

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- "जो  तृष्णा  और  सुख  की  लालसा  से   अपने  आपको  जितना  भरता  जाता  है  ,  वह  उतना  ही   अपने  अहंकार  को  तुष्ट  और  पुष्ट  करता  है  l  संसार  में , दुनियादारी  में   व्यक्ति  स्वामित्व  की  चाहत  रखता  है  ,  लेकिन  यह  चाहत  स्वयं  का  स्वामी  बनने  की  नहीं  होती   l  यह  चाहत  होती  है   धन , साधन , भवन -संपत्ति  का  स्वामी  बनने  की  l  संसार  में  शक्ति  के  मायने   अहंता  के  पोषण  के  सिवाय  और  कुछ  नहीं  है   और  अहंता  का  पोषण   अशांति  से  ज्यादा  और  कुछ  भी  नहीं  दे  सकता  l  धन , दुकान , भूमि , भवन , संपत्ति   का  मालिक  बनकर  भी   मनुष्य  केवल  गुलाम  बनता  है   l  इस  सत्य  को  समझाने  वाली   सूफी  संत  फरीद  के  जीवन  की  एक  घटना  है ----  बाबा  फरीद  अपने  शिष्यों  के  साथ   एक  गाँव  से  गुजर  रहे  थे  l  वहीँ  रास्ते  में  एक  आदमी  अपनी  गाय  को   रस्सी  से  बांधे  लिए  जा  रहा  था   l  फरीद  ने  उस  आदमी  से  थोड़ी  देर  रुकने  की  प्रार्थना  की  l  उनकी  प्रार्थना  पर  वह  रुक  गया  l  अब  बाबा  फरीद  ने  अपने  शिष्यों  से  पूछा  ---- "  इन  दोनों  में  मालिक  कौन  है  ----गाय  या  आदमी  ? "  शिष्यों  ने  कहा ---- "  यह  भी  कोई  बात  हुई  , जाहिर  है   कि  आदमी  गाय  का  मालिक  है   l "  फरीद  ने  फिर  कहा  --- "  यदि  गाय  के  गले  की  रस्सी  काट  दी  जाए  तो  कौन  किसके   पीछे  दौड़ेगा  ---- गाय  आदमी  के  पीछे  या   फिर  आदमी  गाय  के  पीछे  l "  शिष्यों  ने  कहा --- " जाहिर  है   आदमी  गाय  के  पीछे  भागेगा   l "  तो  फिर  फरीद  ने  शिष्यों  से  कहा ----- "  तो  फिर  मालिक  कौन  हुआ  ? " फरीद  ने  शिष्यों  से  कहा ---- ' तो  फिर  मालिक  कौन  हुआ ? "  फरीद  ने  अपने  शिष्यों  से  कहा ----" यह  जो  रस्सी  तुम्हे  दिखाई  पड़ती  है   गाय  के  गले  में  ,  यह  दरअसल  आदमी  के  गले  में  है  l  हर  संपत्ति  हमारे  गले  का  फंदा  बन   जाती  है  l "  आज  मनुष्य   सुख  साधनों  के  पीछे  भाग  रहा  है  ,  इस  अंधी  दौड़  में  वह  स्वयं  को  ही  भूल  गया  है  l  

6 May 2024

WISDOM ----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " जहाँ  राह  गलत   होती  है  वहां  जीवन  के  सार्थक  होने  का  प्रश्न   ही  नहीं  उठता  l  सिकंदर  विश्व विजेता   बनना  चाहता  था  l  इसके  लिए  उसने  हजारों   आदमियों  का  रक्त  बहाया  ,  कितनी  ही  माताओं  की  गोद  सूनी  कर  दी   और  कितने  ही  बच्चों  को  अनाथ  कर  दिया  l  विश्व -विजय  करने  के  पागलपन  में  न  तो  स्वयं  कभी   चैन  से  बैठा   और  न  अपने  सैनिकों  को  चैन  से  बैठने  दिया  l "      अहंकार  ने  उसकी   मति  भ्रष्ट  कर  दी  l    वह  इस  सत्य  को  न  समझ  सका  कि   नेक  कर्म  कर  के  , लोगों  का  दिल  जीतकर  भी  विश्व  विजेता  बना  जा  सकता  है  l    अहंकारी  व्यक्तियों  को    ईश्वर   समय -समय  पर  सबक  सिखाते  हैं  ,   उनका  सामना   कभी  इतने  सामान्य  व्यक्ति  से  हो  जाता  है  , जिसके  सामने  वे  स्वयं  को  बौना  महसूस  करते  हैं  ,  लेकिन  फिर  भी  अहंकार  सिर  पर  ऐसा  चढ़ा  है  कि  जाता  ही  नहीं  l  ------------------- शहरों , कस्बों  और  गांवों  को  रौंदता  हुआ   सिकंदर  का  काफिला   आगे  बढ़ता  जा  रहा  था  l  रास्ते  में  एक  गाँव  पड़ा , सिकंदर  के  भोजन  का   समय  हो  गया  था  ,  एक  दरवाजा  खटखटाया  , बूढ़ी  महिला  निकली  l  उसे  देख  सिकंदर  चीख  कर  बोला  --- " मैं  विश्व विजयी  सिकंदर  हूँ  , मुझे  भूख  लगी  है  , जा  जल्दी  से  मेरे  लिए  कुछ  खाने  को  ला  l "   महिला  अन्दर  गई  और  कुछ  देर  बाद  एक  थाली  को  कपड़े  से  ढककर  लौटी  l  सिकंदर  ने  कपड़ा  उठाकर  देखा   तो  उसमें  सोने  के  जेवर  रखे  थे  l  सिकंदर  चिल्लाया  ---- " ओ  बेवकूफ   औरत  !  मैंने  खाने  की  रोटियां   मांगी  और  तू  ये  जेवर  ले  आई  l  इन्हें  खाकर  मैं  अपना  पेट  भरूँगा  क्या  ? "  महिला  बोली  ---- " बेवकूफ  मैं  नहीं   तू    है  सिकंदर  !  यदि  तेरा  पेट  रोटियों  से   भर  जाता  तो   तू  अपने  देश  में  ही  सुखी   नहीं  रहता  क्या  ?  रोटियां  तो  वहां  भी  बनती  होंगी  l  तेरी  भूख  जिससे  मिटती   नजर  आती  है  ,  मैं  वही  तेरे  लिए  रखकर  लाई  हूँ  l "   सिकंदर  के  पास  जवाब  में  कोई  शब्द  नहीं  थे  , वह  विक्षिप्त   सा  हो  गया  l  जब  उसका  अंतिम  समय  आया  , तब  उसे  यह  घटना  याद  आ  रही  थी  , उसने  अपने  सेनापति  को  बुलाकर  कहा  --- " देखो  मित्र  !  जब  मेरी  अर्थी  बनाई  जाये   तो  मेरे  दोनों  हाथ  अर्थी  से   बाहर  निकाल  देना   ताकि  दुनिया  वाले  यह  जान  सकें  कि   विश्व  विजेता  सिकंदर  इस  दुनिया  से  खाली  हाथ  जा  रहा  है  l 

5 May 2024

WISDOM ----

   एक  बार  एक  जिज्ञासु  आदि  शंकराचार्य  से  मिलने  पहुंचा  l  उसने  शंकराचार्य जी  से  प्रश्न  किया  --- " दरिद्र  कौन  है  ? " आचार्य  शंकर  ने  उत्तर  दिया --- " जिसकी  तृष्णा  का  कोई  पार  नहीं  है  , वही  सबसे  बड़ा  दरिद्र  है  l "    उस  जिज्ञासु  ने  पुन: प्रश्न  किया  ---- "धनी  कौन  है  ? "  शंकराचार्य  बोले  ---- " जो  संतोषी  है  , वही  धनि  है  l संतोष  से  बड़ा  धन  दूसरा  नहीं  है  l "    जिज्ञासु  ने  पुन: एक  प्रश्न  किया  ---- " वह  कौन  है  ,  जो  जीवित  होते  हुए  भी  मृतक  के  समान  है  ? "  उन्होंने  उत्तर  दिया  --- " वह  व्यक्ति  जो  उद्यमहीन  है   और  निराश  है  ,  उसका  जीवन  एक  जीवित  मृतक  के  समान  है  l  "  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- 'आदि  शंकराचार्य  के  ये  वचन  मनुष्य  के  आंतरिक  उत्कर्ष  के  लिए  बहुत   मूल्यवान  हैं  l  मनुष्य  अनंत  तृष्णाओं  को  पार  करने  के  प्रयत्न  में   दरिद्रता  को  प्राप्त  करता  है   और  संतोष  धन  को  पाते  ही   ऐसे  खजाने  का   स्वामी  हो  जाता  है  ,  जो  कभी  चुक  नहीं  सकता  l '  

WISDOM --------

   बंधुवर  पुष्प  !  लो  सबेरा  हुआ  , माली  इधर  ही  आ  रहा  है  ,  अपनी  सज्जनता , सौम्यता  और  उपकार  की  सजा  भुगतने  के  लिए  तैयार  हो  जाओ  l  यदि  मेरी  सीख  मानते   और  कठोरता  व  कुटिलता  का   का  आश्रय  ग्रहण  किए  रहते  , तो  आज  यह  नौबत  नहीं  आती  l   फूल  कुछ  बोला  नहीं  , बस !  मुस्कराता  रहा   l  माली  आया  , उसने  फूल   तोड़ा  और  डलिया  में  रखा  l  काँटा  दर्प  से  हँसा  , माली  की  वृद्ध  उँगलियों  में  चुभा   और  अहंकार  में  ऐंठ  गया  l  माली  उसे  भला -बुरा  कहता  हुआ  वापस  लौट  गया  l  समय  बीता  l  एक  दिन  देव मंदिर   में  चढ़ाए  उस  फूल  की  सूखी  काया  को   उठाकर  कोई   उसी  वृक्ष  की  जड़ों  के  पास  डाल  गया  l  काँटे  ने  म्लान  मुख   फूल  को  देखा  ,  तो  हँसा  और  बोला  --- " कहो  तात  !  अब  तो  समझ  गए   कि  परोपकारी  होना   अपनी  ही  दुर्गति  कराना  है  l "   फूल  की  आत्मा  बोली ---- " बन्धु ,   यह  तुम्हारा  अपना  विश्वास  है  l  शरीरों  में  चुभकर   दूसरों  की  आत्मा  को  कष्ट  पहुँचाने   के  पाप  के  अतिरिक्त   तुम  अपयश  के  भी  भागी  बने  l  अंत  तो  सभी  का  सुनिश्चित  है  ,  किन्तु  अपने  प्राणों  को   देवत्व  में  परिणत  करने   और  संसार  को  प्रसन्नता   प्रदान  करने  का   जो  श्रेय  मुझे  मिला  ,  तुम  उससे  सदैव  के  लिए  वंचित  रह  गए  l  मैं  हर  द्रष्टि  से  फायदे  में  हूँ  और  तुम  घाटे  में  l "  

4 May 2024

WISDOM -----

  यह  संसार  विविधताओं  का  है , विभिन्न  मनोवृत्तियों  के  लोग  इस  धरती  पर  निवास  करते  हैं  l  अनेक  लोग  इस  धरती  पर  युद्ध , दंगे , आतंक ,  भेदभाव , अत्याचार , शोषण , उत्पीड़न,  छल , कपट , धोखा  -  ----जैसे   सम्पूर्ण  प्रकृति  और  मानवता  को  कष्ट   देने  वाले  कार्य  करते  हैं ,  नकारात्मकता  फैलाते  है   और  उन्हें  ऐसा  करके   अपने  अहंकार  को  पोषित  करने  की  झूठी  ख़ुशी  भी  मिलती  है  l  लेकिन  दूसरी  ओर  अनेक  ऐसे  लोग  भी  हैं  जो  सन्मार्ग  पर  चलते  हैं , उनके  ह्रदय  में  करुणा  है , संवेदना  है  , निष्काम  भाव  से  परोपकार  के  कार्य  करते  हैं  , श्रेष्ठ  मन्त्रों  के   जप  से  इस  धरती  और  प्रकृति  के  पोषण  का   और  सकारात्मकता  के  विस्तार  का  कार्य  करते  हैं    l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- " प्रकृति  कुपात्रों  का   दंड  एवं  विनाश  के  रूप  में  उपयोग  करती  है  और  सत्पात्रों  का  श्रेष्ठता , सृजन  एवं  विकास   हेतु  चयन  करती  है  l  अत:   भगवान  की  भक्ति  कर  के ,  सन्मार्ग  पर  चलकर    स्वयं  को   मनोविकारों  से  मुक्त  करना  चाहिए   और  भगवान  का  कृपा पात्र  बनना  चाहिए   l '    ताकि  हमारा  चयन  श्रेष्ठ  कार्यों  के  लिए  हो   l  संसार  में  जो  लोग  भी  श्रेष्ठ  और  सकारात्मक  कार्य  कर  रहे  हैं    ,  उनका    ईश्वर  ने  ही   चयन  किया  है  l  जैसी  व्यक्ति  की  मानसिक  प्रवृत्तियों  होती  हैं    उसी  के  अनुसार   कार्य  के  लिए  उसका  चयन  होता  है  l ------------------  त्रेतायुग  में   भगवान  राम  के  ही  परिवार  में  महारानी  कैकेयी   राम   पर    अपने  पुत्र   भरत    से  भी  ज्यादा   स्नेह , वात्सल्य   लुटाती  थीं  लेकिन  क्रोध , अहंकार  ,  अभिमान   और   मंथरा    जैसी  ईर्ष्यालु  दासी  का  कुसंग   के  कारण     वे  राजा  दशरथ  से  राम  के  लिए  वनवास   और  अपने  पुत्र  भरत  के  लिए  राजसिंहासन  मांगने  लगीं  l   भगवान  राम  के  अवतार  का  विशेष    उद्देश्य  था   लेकिन  अपने  क्रोध  और  अहंकार  जैसे  मनोविकार  के  कारण  महारानी  कैकेयी  राम , लक्ष्मण  और   सीताजी  के   चौदह  वर्ष  के  वनवास  के  लिए  उत्तरदायी  बनीं  l    इसी  तरह  द्वापर  युग  में  भीष्म  पितामह  ने  कौरव , पांडव   सभी  राजकुमारों  के  लिए   एक  जैसी  शिक्षा -दीक्षा  और  सुविधाएँ  उपलब्ध  कराएँ   l   पांडवों  ने  शालीनता , सहयोग  , सत्य  और  धर्म  का  मार्ग  चुना   जबकि  कौरवों  ने  ईर्ष्या , द्वेष , छल , कपट  षड्यंत्र  और  उद्दंडता  का  मार्ग  चुना  l  दुर्योधन  आदि  कौरव   वंश  के  अंत  के  लिए  उत्तरदायी  बने   जबकि  पांडव  संसार  में  धर्म  और   नीति   की  स्थापना  और  अत्याचार  व  अन्याय  के  अंत  के  लिए  जाने  जाते  हैं   l  

2 May 2024

WISDOM -------

   गुरु  नानक  ने  सोचा  कबीर  की  बुद्धि  की  परीक्षा  करनी  चाहिए  l  उन्होंने  एक  चवन्नी  कबीर  के  पास  भेजी   और  कहला  भेजा  कि  इस  चवन्नी  की  कोई  ऐसी  वस्तु  लेनी  चाहिए  , जिसे  खाकर  सौ  व्यक्ति  तृप्त  हो  जाएँ   l  कबीर  ने  चवन्नी  ले  ली  , बाजार  गए  और  चवन्नी  की  बढ़िया    हींग  लाये  l  उस  दिन  नगर  के  एक  सेठ  भोज  दे  रहे  थे  l  हींग  लेकर  कबीर  सेठ  के  पास  पहुंचे   और  उस  हींग  का  दाल  में  छौंक  लगवा  दिया  l  वह  दाल  जिस -जिसने  खाई  , कबीर  की  हींग  की  सबने  प्रशंसा  की  , हींग  ने  सबको  तृप्त  किया  l  अब  कबीर  ने  सोचा  कि  नानक  की  बुद्धि  की  परीक्षा  की  जाये  l  उन्होंने  एक  रुपया  नानक  के  पास  भेजा   और  कहलाया  कि  --- एक  रूपये  की  औषधि   से  सारे  संसार   के  रोगियों  को  अच्छा  कर  दो  l  नानक  ने  गंभीरतापूर्वक  विचार  किया   कि  सारे  संसार  में  तीन  अरब  मनुष्य  हैं  , उनको  एक  स्थान  पर  बुलाना  कहाँ  संभव  है  ?   फिर  भेड़ , बकरी  चूहे , खरगोश , मछली   आदि  न  जाने  कितने  जीव -जंतु   इस  पृथ्वी  पर  हैं  l  एक  रूपये  में  सबकी   औषधि   किस  प्रकार  हो   ?   उन्होंने  एक   रूपये  की  गुग्गुल , कपूर , छार -छरीला   आदि   अनेक  प्रकार   औषधियाँ   मंगाई  और  हवन  करने  लगे  l  औषधियाँ   जलकर  नष्ट  नहीं  हुईं   वायुभूत  होकर  सारे  संसार  में   फ़ैल  गईं  l  जलचर , , थलचर , नभचर  सबने  साँस  ली  , औषधि   सबके  शरीर  में  पहुंची  l   और  सबके  शरीर  से    रोग -- कीटाणु  नष्ट  हो   गए   l  कबीर  ने  नानक  की  बहुत   प्रशंसा  की   तो  नानक  ने  कहा ---- कबीर  !  यह  श्री   तो  उन  ऋषियों  का  है  , जिन्होंने  संसार  के  स्वास्थ्य   के  लिए  यग्य  जैसे  महान  विज्ञानं  की  खोज  की   थी  l " 

1 May 2024

WISDOM -------

  1 . राहगीर  ने  राह  में  गड़े  मील  के  पत्थर  की  ओर  देखा   और  ताना  दिया  ---- " भला  तुम्हारा  जीवन  भी  कोई  जीवन  है  , जो  एक  ही  जगह  स्थिर  है   l  मुझे  देखो  , मैं  सारी  दुनिया  के  भ्रमण  का  आनंद  लेता  हूँ और  तुम  हो  कि   एक  जगह  गड़  गए   तो  हिलने  का  नाम   नहीं  लेते  हो  l "  मील  का  पत्थर  हँसा  और  बोला  ------ " मित्र  !  पेंडुलम  हिलता -डुलता  तो  बहुत  है  , पर  पहुँचता  कहीं  नहीं  ,  वैसे  ही   उदेश्यहीन  भ्रमण  किसी  काम  का  नहीं  l  मैं  एक  उदेश्य  के  लिए  समर्पित  हूँ   और इसलिए  दूसरों  को  दिशा  दे  पाता  हूँ  ,  चाहे  स्वयं  कहीं  न  जाऊं  l  " 

2 .  महर्षि  जावालि  ने  पर्वत  पर  ब्रह्म कमल   खिला  देखा  l  शोभा  और  सुगंध  पर  मुग्ध  होकर   ऋषि  सोचने  लगे   कि  उसे   देवता  के  चरणों   में  चढ़ने  का  सौभाग्य  प्रदान  किया  जाये  l  ऋषि  को  समीप  आया  देख   पुष्प  प्रसन्न  तो  हुआ  , पर  साथ  ही  आश्चर्य  व्यक्त  करते  हुए   आगमन  का  कारण  भी  पूछा  l  जावालि  बोले --- " तुम्हे  देव  -सामीप्य  का   श्रेय  देने  की  इच्छा  हुई   तो  तोड़ने  आ  पहुंचा  l "  पुष्प  की  प्रसन्नता  खिन्नता  में  बदल  गई  l   महर्षि  ने  उदासी  का  कारण  पूछा   तो  फूल  ने  कहा ---- " देव -सामीप्य  का  लोभ  संवरण  न  कर  सकने  वाले   कम  नहीं  है  l  फिर  देवता  को  पुष्प  जैसी  तुच्छ  वस्तु  की  न  तो  कमी  है   और  न  इच्छा  l  ऐसी  दशा  में  यदि  मैं  तितलियों -मधुमक्खियों   जैसे  क्षुद्र   कीटकों   की  कुछ  सहायता  - सेवा  करता   रहता  , तो  क्या  बुरा  था  l  आखिर  इस  क्षेत्र  को   भी  तो  खाद   की  आवश्यकता   होती  , जहाँ  मैं  उगा  और  बढ़ा  l "     ऋषि  ने  पुष्प  की  भाव -गरिमा  को  समझा   और  वे   उसकी  प्रशंसा  करते  हुए   उसे   यथा स्थान  छोड़कर  वापस  लौट  आए  l