27 December 2025

WISDOM ------

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- "  सद्विचार  और  सत्कर्मों  का  जोड़  होना  बहुत  आवश्यक  है l  विचारों की  शक्ति  जब  तक  कर्म  में  अभिव्यक्त  नहीं  होती   उसका  पूरा  लाभ  नहीं  होता   l '       वर्तमान  युग  कलियुग  इसी  लिए  है  कि  यहाँ  सद्विचार  और  सत्कर्म  का  जोड़  नहीं  है  l  लोग  बहुत   आदर्श  की  बात  करते  हैं लेकिन  उनका  वैसा  आचरण  नहीं  है  इसलिए   जनता  उनसे  प्रभावित  नहीं  होती  ,  उनकी चेतना  में  विचारों  में  कोई  परिवर्तन  नहीं  होता  l   एक  नशा  करने  वाला   अपने  साथ  सैकड़ों  नशेड़ी  जोड़  लेता  है   क्योंकि पहले  वह  स्वयं  नशा  करता  है  ,  उसके  बाद  ही  दूसरों  को  नशा करने  के  लिए  प्रेरित  करता  है  l  वह  जो कहता  है , वैसा  ही  स्वयं  भी  करता  है   इसलिए  वह  अनेकों  को  अपने  साथ  जोड़  लेता  है  l  

25 December 2025

WISDOM -----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- " व्यक्ति  का  चरित्र  और  उसकी  उच्च  भावनाएं  ही  उसे  महान  और यशस्वी   बनती  हैं  , पद , सम्मान  नहीं  l  "    अथाह  धन -संपदा  जोड़  लेने  से , उच्च  पद  प्राप्त  कर  लेने  से ,  प्रवचन  से   कोई व्यक्ति  महान  नहीं  बनता  l  महत्वपूर्ण  यह  है  कि  इस  स्थिति तक  पहुँचने का  सफ़र  कैसे तय  किया   ?   आचार्य जी  लिखते  हैं  - ' गलत   रास्ते  से  प्राप्त  की  गई  सफलता  अंत  में कलंकित  हो  जाती  है   l '    कलियुग  की  सबसे  बड़ी  त्रासदी  यही  है  कि   समाज  को  सही  दिशा  देने   वाले  ही  दिशा भ्रमित  हैं  l  तृष्णा , कामना , वासना  , महत्वाकांक्षा  ----का  जाल  इतना  घना  है  कि  व्यक्ति  उसमें  एक  बार  फँस  गया  तो  निकलना  मुश्किल  है  !  लेकिन  इस  संसार  में  असंभव  कुछ  भी  नहीं  l  व्यक्ति  की  आत्मा  में  इतनी  शक्ति  है   कि  वह  संकल्प  ले  तो  असंभव  को  भी  संभव  कर  सकता  है  l  आचार्य श्री कहते हैं  ---भूल समझ  आने  पर  उल्टे  पैरों  लौट  आने  में  कोई  बुराई  नहीं  l  ' विचारों  में परिवर्तन  और  परिमार्जन  से  जीवन की  दिशा  कैसे  बदल जाती  है   इसका  उदाहरण  लियो टालस्टाय  का  जीवन  है  l  l  वे  रूस  के  सामंती  वंश  के  राजकुमार  थे  l सामंत  सेनापतियों  की  सारी  बुराइयाँ  उनमें  भरी  पड़ी  थीं  लेकिन  सत्य  का  प्रकाश  आते  ही , विचारों  में  परिवर्तन  होते  ही   उनके जीवन  की  दिशा  धारा ही  बदल  गई  l   मद्यपान , क्रूरता , हत्या  , व्यसन  और  विलासिता  का  जीवन  जीने  वाले   टालस्टाय   अब  प्रेम , करुणा , सह्रदयता , सहानुभूति  और  त्याग , तपस्या  की  मूर्ति   महात्मा टालस्टाय  बन  गए  l  लियो टालस्टाय  कहते  हैं --- "  दुनिया  की  हर  बुराई  और  बेइंसाफी  की  अधिकतम  जिम्मेदारी से  विद्वान , साहित्यकार  और  कलाकार  बच  नहीं  सकता  l  आरम्भ  में  मैं  भी  साहित्यकार  की  जिम्मेदारी को  नहीं  समझा  था  l  मैं  नहीं  जानता  था  कि  मैं  क्या  लिख  रहा  हूँ   और  क्या  शिक्षा  दे  रहा  हूँ  l  मेरी  एक  ही  अभिलाषा थी  कि  अधिक  से  अधिक  धन  और यश  का   संपादन  किया  जाए  l  यह  मेरा  पागलपन  था   और  इस  पागलपन  को  दूर  करने  में   मुझे  पूरे  छह  वर्ष  लग  गए  l "   टालस्टाय  ने  जब  अपने  साहित्यिक  दायित्व  को  समझा  तो  वे  महात्मा  बन  गए  l  

21 December 2025

19 December 2025

WISDOM ------

   बर्नार्ड  शा  एक  प्रसिद्ध  आलोचक  और  नाटककार  थे  l    उनका  एक  प्रसिद्ध  नाटक  था   ' मिसेज  वारेंस  प्रोफेशन '    इसमें  समाज  में  फैली  विकृतियों  पर  आक्रमण  किया   गया  था  l   इसमें  दिखाया  गया  था  कि  जो  लोग  समाज  में  ऊपर  से  ' सज्जन  और  सभ्य '  बने  रहते  हैं   , उनमे  से  कितनों  का  ही  भीतरी  जीवन   कितना  पतित  होता  है  l  यह  रचना  प्रकाशित  होते  ही  अश्लील  बताकर जब्त  कर  ली  गई  l  लेकिन  बाद  में  यह  प्रतिबन्ध  हटा  लिया  गया   और  इसे  सच्चरित्रता   की  शिक्षा  देने  वाला  माना  गया   l                                                                                                                     मनुष्य  नाम  का  प्राणी  जब  से  इस  धरती  पर  आया  तभी  से  विकृतियां  उसमें  हैं  , मनुष्य  ने  उन्हें  दूर  करने  का  , अपने  मन  पर  नियंत्रण  करने  का  कभी  प्रयास  नहीं  किया   इसलिए  मानव  चेतना  परिष्कृत  नहीं  हो  सकी  ,  भौतिक  रूप  से  मनुष्य  सम्रद्ध  होता  गया  लेकिन  चेतना  के  स्तर  पर   पशु  से  भी  निम्न  स्तर  का हो  गया  l  पशु  तो  अपनी  आयु  और  मौसम  के  अनुसार  आचरण  करते  हैं  लेकिन  बुद्धिमान  होने  के  कारण   और  सद्बुद्धि  न  होने  के  कारण   मनुष्य     मनुष्यता  को  ही  भूल    जाता  है   और  समाज  से  छिपकर  , मुखौटा  लगाकर   अपनी  विकृतियों  को  पोषण  देता  है  l   मनुष्य  की  सबसे  बड़ी  भूल  यह  है  कि   वह  सोचता  है  कि  समाज  से  , परिवार  से  छिपकर  वह  जो  कुकृत्य  करता  है  उसे  कोई  भी  नहीं  जान  सकेगा  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- ' सत्य   को   कभी   छुपाया  नहीं  जा  सकता  l  मनुष्य  के  व्यक्तित्व  में  इतने  छिद्र  हैं  कि  सत्य  उनमें  से  होकर  बाहर  आ  ही  जाता  है  l  '  फिर   परमात्मा  हजार  आँखों  से  देख  रहा  है  , यह  सम्पूर्ण  प्रकृति  , यूनिवर्स  व्यक्ति  के  प्रत्येक  कार्य  का  , उसके  मन  में   छिपे  अच्छे-बुरे  विचारों  का  गवाह  है  l  यदि  मनुष्य  प्रकृति  के  हर  कण  में  ईश्वर  की  सत्ता  को  स्वीकार  कर  ले   तभी  वह  पापकर्म  करने  से  डरेगा  ,   ईश्वर  के  न्याय  से उसे  भय  होगा   और  यहीं  से  उसकी  चेतना  के  परिष्कृत  होने  का  मार्ग  खुल  जायेगा  l   

17 December 2025

WISDOM ------

   जरथुस्त्र  जब  जन्में  तो  हँसते  हुए  पैदा  हुए  l  अन्य  बालकों  की  तरह  रोए  नहीं  l  सभी  आश्चर्यचकित  थे  कि  यह  रोए  क्यों  नहीं  l  जब  जरथुस्त्र  बड़े  हुए  तो  तो  लोगों  ने  जन्म  के  समय  हँसने  का  वृतांत  उन्हें  सुनाया   और  इसका  रहस्य  जानना  चाहा  l  वे  बोले  ---- "  हम  तो  मर  रहे  थे  ,  तब  भी  हँस  रहे  थे  l  तब  से  ही  परदे  के  पीछे  से  हँसते  चले  आ  रहे  हैं  l  हम  जन्म  के समय ही  नहीं  हँसे  ,  हर परिवर्तन   हँसकर  ही  झेला  जाता  है  l  "  जरथुस्त्र  अंतिम  समय  भी  हँसे   तो  लोगों  की समझ  में  नहीं  आया  कि  अब  क्यों  हँसे  ?  पूछा  गया  तो  बोले  ----- "  लोगों  को  रोते  देखकर    हँसी  आ  गई  कि  कितने  नादान  हैं  ये  ,  हम  मकान  बदल  रहे  हैं  ,  तो  इन्हें  क्यों  परेशानी  हो  रही  है  l "  आचार्य श्री  कहते हैं  ----' यदि  हम  परिवर्तन  को   इसी  तरह  मुस्करा कर  स्वीकार  कर  लें   तो  जीवन  जीने  का  मन्त्र  आ  जाए  l '

14 December 2025

WISDOM -----

    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- " संसार  में  बुराई  और  भलाई  का  , हानि -लाभ  का  , प्रिय -अप्रिय  का  और  सुख -दुःख   अस्तित्व  है  और  वह  बना   ही  रहेगा  l  हमें  किसी  का  भी  प्रभाव  अपने  ऊपर  ऐसा  नहीं  पड़ने  देना  चाहिए   जो  मानसिक  संतुलन  बिगाड़  कर  रख  दे  l  यदि  हमारा  द्रष्टिकोण  सकारात्मक  है   तो  विपत्ति  का प्रत्येक  धक्का   हमें  अधिक  साहसी , बुद्धिमान   और  अनुभवी  बनाता  है  l "  आचार्य श्री  कहते  हैं  ---- " जीवन  एक  कला  है   और  इसे  आनंदपूर्वक   सीखना  एवं  जीना  चाहिए  l  जो  जीवन  जीना  जानता  है  वही  सही  मायने  में  कलाकार  एवं  प्रतिभावान है  l  "   विभिन्न  सर्वेक्षणों  से  यह  तथ्य  प्रकट  होता  है   अपने  विषय  के   विद्वान , प्रतिभावान ,  धन-वैभव  संपन्न  , , उच्च पदों  पर  बैठे  व्यक्ति  ---- अनेक  ऐसे  हैं  जिनका  निजी  जीवन  विखंडित  और  विभाजित  है   l  उन्हें  अपनी  सामान्य  सी  जिन्दगी  को  चलाने  के  लिए   नशा , मादक  द्रव्य ------ आदि  का  सहारा  लेना  पड़ता  है  l  कारण  यही  है  कि  लोगों  की  सोच  सकारात्मक  नहीं  है  ,  जो उन्हें  मिला  है  वे  उसमें  खुश  नहीं  हैं  ,  उनका  मन  कामनाओं  , वासना  के  पीछे  भाग  रहा  है   ऐसे  में  दुःख  का  ,  कष्ट    का  एक  छोटा  सा  झटका  भी  उन्हें  विचलित  कर  देता  है  l  हमें  इस  सत्य  को  स्वीकार  करना  होगा  कि  ईश्वर  कभी  किसी  को  पूर्ण  रूप  से   दुःख  नहीं  देते  l  अपने  मन  के  तराजू  में तोल  कर  देखें  कुछ न कुछ  सुख  तो  होता  ही  है  l  और  यदि  हम  ध्यान  से  देखें  तो  उस  दुःख  में  भी  कोई  सुख  अवश्य  छिपा  होता  है  l  यदि  हम  उस  सुख    पर  अपनी  द्रष्टि  केन्द्रित  करेंगे   तो  हमारा  मन  शांत  रहेगा ,  तनाव  नहीं  होगा  l    संत  तुकाराम  ने  लिखा  है ------ "  हे  भगवान  !  अच्छा  ही  हुआ  ,  मेरा  दिवाला  निकल  गया  l  अकाल  भी  पड़   गया  ,  यह  भी  अच्छा  ही  हुआ  l  स्त्री  और  पुत्र  भी  भोजन  के  अभाव  में  मर  गए   और  मैं  भी  हर  तरह  से  दुर्दशा  भोग  रहा  हूँ  ,  यह  भी  ठीक  ही  हुआ  l  संसार  में  अपमानित  हुआ  ,  यह  भी  अच्छा  हुआ  l  ग्राम , बैल , द्रव्य  सब  चला  गया  ,  यह  भी  अच्छा  ही  हुआ  l  लोक -लाज  भी  जाती  रही  ,  यह  भी  अच्छा  हुआ   क्योंकि  इन्ही  सब  कारणों  के  फलस्वरूप   तुम्हारी  मधुरिमामय ,  शांतिपूर्ण  गोद  मुझे  मिली  l  "  

12 December 2025

WISDOM -----

महान  दार्शनिक  संत  अगस्तीन  के  पास    एक  जिज्ञासु   पहुंचा  l  उसे  अपने  जीवन  के  सत्य  को  समझने  की  बहुत जिज्ञासा  थी  l  उसने  संत  से  कहा  -- आप  मुझे  बहुत  कुछ  कहने -समझाने  की  बजाय  ,  केवल  एक  शब्द  में  उपदेश  दें  l  संत  अगस्तीन  उसकी  ओर  देख  रहे  थे  ,  वह  व्यक्ति  उनसे  कहे जा  रहा  था  कि  आप  मुझे  बहुत  आज्ञाएँ  न  देना  ,  क्योंकि  मैं  भूल  जाऊँगा  l  आप  तो  मुझे  एक  शब्द  में  ही  सार  की  बात  बता  दें  l  मैंने  शास्त्रों  को  भी  नहीं  पढ़ा  है   और  न  ही  पढ़ने  की  इच्छा  है l  संत  अगस्तीन मुस्कराते  हुए  बोले  ---- "  तुम्हारे  लिए  वह एक  शब्द  है  ' प्रेम  ' l  पर  यह  तथ्य  ध्यान  रखना  कि  प्रेम  वही   कर  सकते  हैं  ,  जिन्होंने   स्वार्थ , वासना  और  अहंता  की  क्षुद्रता  का   पूरी  तरह  से  त्याग  कर  दिया  है  l  यदि  तुम  सचमुच  ही  प्रेम  कर  सको  ,  तो  शेष  सब  अपने  आप  ही  हो  जायेगा  l "  

11 December 2025

WISDOM ------

  मनुष्य  के  जीवन  में  ' मौन  ' का  बहुत  महत्त्व  है  l  इमर्सन  कहते  हैं --- "  आओ  हम  चुप  रहें  , ताकि  फरिश्तों  के  वार्तालाप  सुन  सकें  l  "   पं . श्रीराम   शर्मा   आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " शांत  और  एकाग्र  मन  से  ही   ईश्वर  से  वार्तालाप  संभव  है  l  मौन  रहकर  ही   अपने  अन्तराल  में  उतरने  वाले  ईश्वर  के  दिव्य  संदेशों  , प्रेरणाओं  को  सुना  समझा  जा  सकता  है  l  "  मानव  जीवन  में  अनेक  समस्याएं  हैं  ,  इन  समस्याओं  का  कभी  अंत  नहीं  होता    क्योंकि  मनुष्य  इनके  समाधान   बाहर  खोजता  है   और  बाहर  के  संसार  में  स्वार्थ  है  , कामनाएं , वासना , लालच , अहंकार  सभी  बुराइयाँ   हैं   l  इन  बुराइयों , विकृतियों  से  घिरा  व्यक्ति  आपको  कभी  सच्चा  समाधान  दे  ही  नहीं  सकता  l  इसलिए  हमारे  आचार्य , ऋषियों  ने  कहा  है  --- यदि  समाधान  चाहिए  तो  उसे  अपने  भीतर  ही  खोजो  l  संसार  में  ऐसी  कोई  समस्या  नहीं ,  जिसका  समाधान  न  हो  l  यदि  अपने  प्रश्नों  का  उत्तर  चाहिए   तो  कुछ  समय  मौन  रहो  ,  सच्चे  ह्रदय  से  ईश्वर  को  पुकारो  ,  प्रत्येक  समस्या  का  समाधान अपने  भीतर  से  ही  आएगा  l  ईश्वर  हमें  कभी  स्वप्न  में या  किन्ही  भी   माध्यम  से  संकेत  देते  हैं   , जब   हमारा  मन  शांत  होगा  तभी  हम  उन  संकेतों  को  समझ  पाएंगे  ,  फिर  उन्हें   उन  संकेतों  को  समझकर  स्वीकार  करना , उसके  अनुरूप  आचरण  करना  हमारी  इच्छा  पर  निर्भर  करता  है  l  ---- महाभारत  का  महायुद्ध  होना  निश्चित  हो  गया  , उसे  रोकने  के  सारे  प्रयत्न  असफल  हो  गए  थे  l  महारथी  कर्ण   दुर्योधन   के  पक्ष  में  था  l   सूर्य  देव  को  अपने  पुत्र  की  चिंता  थी  ,  उस  समय  तक  कर्ण  स्वयं  को  सूत पुत्र  ही  समझता  था  l  लेकिन  पिता  तो  अपनी  संतान  को   नहीं    भूलते  l  एक  रात्रि   सूर्य  देव  कर्ण  के  स्वप्न  में  आए   और  उससे  कहा  ---- 'तुम्हारे  शरीर  पर  जन्मजात  कवच -कुंडल  है  ,  इन  कवच -कुंडल  के  रहते  किसी  भी  अस्त्र -शस्त्र  से  तुम्हारा  अहित  नहीं  होगा  l  कल  देवराज  इंद्र  तुमसे  यह  कवच -कुंडल  मांगने  आयेंगे ,  तुम उनकी  बातों  में  न  आना  l  मैं  जानता  हूँ  तुम  महादानी  हो  लेकिन  इन  कवच -कुंडल  का  दान  मत  करना  l  l इतना  कहकर  सूर्य देव  चले  गए  l    कर्ण  ने  उनकी  बात  नहीं  मानी   और  दूसरे  दिन  जब  ब्राह्मण  वेश  में   देवराज  इंद्र  उसके  पास  आए   तो  वह  यही  सोचकर  खुश  हुआ  कि  आज  स्वर्ग  उसके  द्वार पर  भिक्षा  मांगने  आया  है  ,  उसने  व्यवहारिक  पक्ष  को  समझा  ही  नहीं   और   बड़ी  प्रसन्नता  से   तलवार  से  अपने कवच -कुंडल  को  शरीर  से  अलग  कर  इंद्र  को  सौंप  दिया  l   यह  उसके  अंत  की   एक  और कील  थी  l   इसी  तरह  परम  पिता  परमेश्वर  हम  सभी  को   समय -समय  पर  विभिन्न  संकेत  देते  हैं  ,  हमें  जीवन  जीने  का  सही  मार्ग  सुझाते  हैं  l  ईश्वर  ने  हमें  चयन  की  स्वतंत्रता  दी  है  ,  हम  सही  राह  चुने  या  खाई  में  गिरें , यह  हमारा चुनाव  है  l  आज  जब  घोर कलियुग  है  l  देवत्व  को  मिटाकर ,  असुरता  अपना साम्राज्य स्थापित  करने  को  बेताब  है  ,  ऐसे  में  सुरक्षा  का  एक  ही  मार्ग  है  ---- स्वयं  को  ईश्वर  के  प्रति  समर्पित  करें और  प्रार्थना  करें  कि  वे  हमें  सद्बुद्धि  दें  ताकि  हम  ईश्वर  के  दिए  संकेतों  को  समझ  कर    सही  मार्ग  का  चयन  करें  l  संसार  में  आकर्षण  का  मायाजाल  इतना  घना  है  कि  मनुष्य  उस  आकर्षण  के  पीछे  दिन -रात  भागता  है  l  जब  मौन  रहकर   ईश्वर  से  प्रार्थना  करते  हैं  उस  समय  यदि  पल  भर  के  लिए  भी   यह  माया  का   परदा  हट  जाए   तो   हमारी  आत्मा  , हमारा  ईश्वर  हम  से  क्या  कहना  चाहते  हैं  ,  उसे हम  समझ  सकते  हैं  l  

8 December 2025

WISDOM ----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- "  ईर्ष्या  वह  काली  नागिन  है   जो  समस्त  पृथ्वी  -मंडल  में  जहरीली  फुफकारें  छोड़  रही  है  l  यह  गलतफहमियों   की  एक  गर्म  हवा  है  ,  जो  शरीर  के  अंदर   ' लू ' की  तरह  चलती  है   और  मानसिक  शक्तियों  को  झुलसाकर   राख  बना    देती  है  l "  आज  सम्पूर्ण  संसार  में   युद्ध , तनाव , धक्का -मुक्की  की  जो  विकट  स्थिति है   , उसका  कारण  ईर्ष्या  का  रोग  है  l व्यक्ति  धन संपन्न  हो , उच्च  पद  पर  हो  ईर्ष्या  के  रोग  से  उसका  पीछा  नहीं  छूटता  l  ईर्ष्या  की आग  इतनी  भयंकर  है   कि  इससे ईर्ष्यालु  व्यक्ति   का   तो  सुख -चैन समाप्त  हो  ही  जाता  है    और  जिससे  वह  ईर्ष्या  करता  है   उसका सुख -चैन  छीनने  में  वह  कोई  कसर  बाकी  नहीं  रखता  l पारिवारिक झगड़े , मुकदमे ,  संस्थाओं   में अशांति  , दूसरे  को  धक्का  देकर  आगे  बढ़ने  की  होड़  ,  इन  सबका  कारण  परस्पर  ईर्ष्या  ही  है  l  जीवन  जीने  की  कला कहती  है   कि  जो  ईर्ष्या  करता  है   उसे  उसका  काम  करने  दो  l यदि  वह  ईर्ष्यावश  तुम्हारी  ओर  पत्थर  फेंकता  है  ,  तो  उन  पत्थरों  से  सीढ़ी बनाकर  ऊपर  चढ़  जाओ  l  अपनी  प्रगति  पर , अपने  जीवन  को  व्यवस्थित  बनाने  पर  ध्यान  केन्द्रित  करो  l  अपने  मन  को  इतना  मजबूत  बनाओ  कि  दूसरे  हमारे  लिए  क्या  कहते  हैं  , हमारे  विरुद्ध  क्या  षड्यंत्र  रचते  हैं  , उससे  जरा  भी  विचलित  न  हो  l  वे  अपनी  ऊर्जा  व्यर्थ  के  कार्यों  में  बरबाद कर  रहे  हैं   तो  इसमें  उनका  ही  नुकसान  है  l  यदि  स्वयं  की  सोच  सकारात्मक  हो  तो  नकारात्मक  शक्तियों  का  आक्रमण  एक  चुनौती   बन  जाता है  l  चुनौती  का सकारात्मक  तरीके  से सामना  करने  में  ही   मनुष्य की  भलाई  है  l 

6 December 2025

WISDOM ------

 पुराणों  में  अनेक  कथाएं  हैं  , जिनमें  प्रत्येक  युग  और  प्रत्येक  परिस्थिति  के  लिए  मार्गदर्शन  है  l  ---- दुष्ट  और  जहरीले  व्यक्तियों   से  मित्रता   या  ऐसे  लोगों  को  आश्रय  देना  या  किसी  भी  तरह  का  संबंध   स्वयं  उसके  लिए  ही  कितना  घातक  होता  है  , यह  इस  कथा  से  स्पष्ट  है ----- राजा  जनमेजय  को   जब  यह  ज्ञात  हुआ  कि  उनके  पिता  महाराज  परीक्षित  की  तक्षक नाग  के  डसने  से  मृत्यु  हुई  , तो   उन्होंने  संकल्प  लिया  कि  वे  ' सर्प यज्ञ ' कर  के  इस  सम्पूर्ण  जाति  को  ही  नाश  कर  देंगे  l  सर्प यज्ञ  आरम्भ  हुआ  , प्रत्येक  आहुति  के  साथ   दूर -दूर  से  नाग -सर्प  आकर  उस  यज्ञ  अग्नि  में  भस्म  होने  लगे  l  तक्षक  नाग  को  जब  यह  पता  चला  तो  वह   स्वर्ग  के  राजा  इंद्र  के  सिंहासन  से  लिपट  गया   , कहने  लगा -रक्षा  करो  l  इंद्र  ने  बिना  सोचे -समझे  उसे  शरण  दी  और  उसकी  रक्षा  का  वचन  दिया  l  उधर  जब  यज्ञ  में  तक्षक  नाग  के  नाम  की  आहुति  दी  जाने  लगी   तो  मन्त्र  शक्ति  के  प्रभाव  से    सिंहासन  पर  विराजमान  इंद्र  के  साथ  ही   वह   तक्षक  नाग  उस  यज्ञ   की  ओर  खिंचा  जाने  लगा  l  सम्पूर्ण  स्रष्टि  में  हाहाकार  मच  गया  कि  क्या   तक्षक  नाग  के  साथ  देवराज  इंद्र  की  भी  आहुति  हो  जाएगी   l  सभी देवी -देवता  वहां  एकत्र  हो  गए   और  जनमेजय  से  निवेदन  किया  कि  वह  इस  यज्ञ  को  अब  समाप्त  कर  दे  l  देवताओं  के  दखल  से  इंद्र  और  तक्षक  दोनों,  की  ही  रक्षा  हुई  l    कथा  कहती  है  कि   कलियुग  में  जब  असुरता  अपने  चरम  पर  है   तब  परिवार  हो , समाज  हो  या  कोई  भी   सरकार या  संगठन  हो   यदि  असुरता  को   शरण  दी  है , उससे  मित्रता  की  है  तो  परिणाम  घातक  होगा  l  इस  युग  की  मानसिकता  ऐसी  है  कि  सत्संग  का  असर  चाहे  न   हो  दुष्टता   अपना  रंग  दिखा  ही  देती  है  l  

2 December 2025

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " मनुष्य  की  अंतरात्मा  उसे  ऊँचा  उठने  के  लिए  कहती  है   लेकिन  सिर  पर  लदी   दोष  दुर्गुणों  की   भारी  चट्टानें   और  दुष्प्रवृत्तियों   उसे  नीचे  गिरने  को  बाधित  करती  हैं  l  स्वार्थ  सिद्धि  की  ललक  उसकी  बुद्धि  को  भ्रमित  कर   देती  है l  वह  लाभ  को  हानि  और  हानि  को  लाभ  समझता  है   l  आचार्य श्री  कहते  हैं ----- ' भूल  समझ  आने  पर   उलटे  पैरों  लौट  आने  में  कोई  बुराई  नहीं  है  l  मकड़ी  अपने  लिए  अपना  जाल  स्वयं  बुनती  है  l  उसे  कभी -कभी  बंधन  समझती  है   तो  रोती - कलपती  भी  है  ,  किन्तु  जब  भी  वस्तुस्थिति   की  अनुभूति  होती  है   तो  वह  समूचे  मकड़जाल  को  समेटकर  उसे  गोली  बना  लेती  है   और  पेट  में  निगल  जाती  है   और  अनुभव  करती  है  कि  सारे  बंधन  कट  गए  और  वेदनाएं सदा -सदा  के  लिए   समाप्त  हो  गईं  l  इसी  तरह  मनुष्य  भी  अपने  स्तर  की  दुनिया   अपने  हाथों  रचता  है  , वही अपने  हाथों  गिरने  के  लिए  खाई  खोदता  है  l  वह  चाहे  तो  उठने  के  लिए    समतल  सीढ़ियों  वाली  मीनार  भी  चुन  सकता  है  l " 

WISDOM ----

 वैष्णव  सम्प्रदाय  के  आचार्य  संत  रामानुज  को  गुरु  मन्त्र  देते  हुए  उनके  गुरु  ने  सावधान किया  कि  --'मन्त्र  को  गोपनीय  रखना  l  संत  रामानुज   मन्त्र जप  के  साथ  ही  यह  विचार  करने लगे  --यह  अमोघ  मन्त्र   मृत्युलोक  की   संजीवनी  है  , यह  जन -जन  की  मुक्ति  का  साधन  बन  सकता  है  , तो  गुप्त  क्यों  रहे  ?   उन्होंने  गुरु  की  अवज्ञा  कर  के  वह  मन्त्र  सभी  को  बता  दिया   l  एक  स्थान  पर  गुरु  ने  अपने  शिष्य  को  सामूहिक  पाठ  करते  हुए  सुना   तो  वे  क्रुद्ध  हो  गए  और  बोले  ---"  रामानुज ,  तूने  गोपनीय  मन्त्र  को  प्रकट  कर  पाप  अर्जित  किया  है  l  तो  नरकगामी  होगा  l "  रामानुज  ने  गुरु  के  चरण  पकड़  लिए   और  पूछा  --- " देव  !  मैंने  जिन्हें मन्त्र  बताया  , क्या  वे  भी  नरकगामी  होंगे  ? "   गुरु ने  कहा  ---- " नहीं  ये  तो  मृत्युलोक  के  आवागमन  से  मुक्त  हो  जाएंगे  l  उन्हें  तो  पुण्य  लाभ  ही  होगा  l "  रामानुज  के  मुख -मंडल  पर  संतोष  की  आभा  चमक  उठी   "  यदि  इतने  लोग   मन्त्र  के  प्रभाव  से  मोक्ष  प्राप्त  करेंगे  

30 November 2025

WISDOM ----

 सभी  प्राणियों  में  मनुष्य  ही  एकमात्र  ऐसा  है   जिसके पास  वह  क्षमता  है  कि  वह  चेतना  के  उच्च  स्तर  तक  पहुँच  सकता है ,  नर  से  नारायण  l     लेकिन  दुर्बुद्धि  ऐसी  हावी  है  कि    उसे  नीचे  गिरना  अधिक  सरल  प्रतीत  होता  है   और  वह  विभिन्न  पापकर्मों  में  लिप्त  होकर   नर  से  नराधम  और  नर- पिशाच  बनने  की  दिशा  में  निरंतर  प्रयत्नशील  है  l  खुदाई  में  मिलने  वाले  विभिन्न  सभ्यताओं  के  अवशेष  यही  बताते  हैं   कि  ये पहले  कभी  बहुत  उन्नत  सभ्यताएं  थीं  लेकिन  कोई  एक  ऐसी  आपदा  आई  कि  वे   धूल  में  मिल  गईं  l  ये  आपदाएं  प्राकृतिक  और  वैज्ञानिक  कारणों  से  ही  नहीं  आतीं  ,  इसके  लिए    मनुष्यों  द्वारा  किए  जाने  वाले  पापकर्म , अत्याचार , अनाचार ,   ईश्वरीय  नियमों  की  अवहेलना  करना  , अनैतिकता , अपराध   उत्तरदायी  हैं  l  धरती  बेजान  नहीं  है  ,  यह  माँ  हैं  , सृजन  करती  हैं  l हमें  सभी  खाद्य  पदार्थ , खनिज   आदि  जीवन  के  लिए  आवश्यक  सभी  कुछ   धरती  के  गर्भ  से  ही  मिलता  है  l  धरती  माँ  के  सामने  ही   जब  मनुष्य  के  पापकर्मों  की  अति  हो  जाती  है   तो  ये  प्राकृतिक  आपदाएं   उनका  क्रोध  और  रौद्र  रूप  है  l  अनेकों  सभ्यताओं  के  अवशेष  देखकर  भी  मनुष्य  सुधरता  नहीं  है , सन्मार्ग  पर  नहीं  चलता  ,  स्वयं  ही  अवशेष  बनने  की  दिशा  में  गतिशील  है   l  

24 November 2025

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा आचार्य जी  लिखते  हैं  --- ' आज  सबसे  बड़ी  आवश्यकता   आस्था  और  विचारों  को  बदलने  की  है  l  इन  दिनों  आस्था  संकट  सघन  है  l  लोग  नीति और  मर्यादा  को  तोड़ने  पर  बुरी  तरह  उतारू  हैं  l  अनाचार  की  वृद्धि  से  अनेकों  संकटों  का  माहौल  बन  गया  है  l  न  व्यक्ति  सुखी  है  न  समाज  में  स्थिरता  है  l  समस्याएं  , विपत्तियाँ  निरंतर  बढ़ती  जा  रही  हैं  l  स्थिर  समाधान  के  लिए  जनमानस   के  द्रष्टिकोण  में  परिवर्तन  , चिन्तन  का  परिष्कार   और  सत्प्रवृत्ति  संवर्द्धन  ,प्रमुख  उपाय  है  l  "    संसार  में  विभिन्न देशों  की  सरकारें  सामाजिक  सुधार  और  कल्याण  के  लिए  अनेकों  नियम , कानून   बनाती   हैं  लेकिन  यदि   जनमानस  के  विचार  श्रेष्ठ  नहीं  हैं  , चिन्तन  परिष्कृत  नहीं  है   तो  उन  नियमों   से  कोई  विशेष  समाज  में  परिवर्तन  नहीं  होता  l   मानसिकता  नहीं  बदलने  से   मनुष्य   ऐसे  कार्य  जो  कानून  द्वारा  प्रतिबंधित  हैं  , वह   उन्हें  छिपकर  करने  लगता  है  l   अच्छाई  में  बढ़ा आकर्षण  होता  है  इसलिए  बड़े  से  बड़ा  पापी  भी  स्वयं  को  समाज  में  बहुत  सभ्य  और  प्रतिष्ठित  दिखाना  चाहता  है  l  वह  अपनी  मानसिक   विकृतियों    और  पापकर्मों  को   समाज  और  परिवार  से  छिपकर  अंजाम  देता  है  l  संचार  के  साधनों  ने  पाप  और  अपराध  का  भी  वैश्वीकरण  कर  दिया  l   आचार्य श्री  कहते  हैं  --- ' यदि  समस्याओं  का  समाधान  निकालना है  तो  अपने  जीवन  का  लक्ष्य   ' जीवन ' को  बनाना  चाहिए   l  व्यक्ति  के  जीवनक्रम  और   चरित्र  को  बनाने  के  लिए   आस्तिकता  और  ईश्वर  भक्ति  की  आवश्यकता   है  ताकि  मनुष्य  जाति  का  व्यक्तिगत  और  सामाजिक   जीवन   श्रेष्ठ  व  समुन्नत  बना  रहे  l  "  

20 November 2025

WISDOM -------

 संसार  में  आज  जितनी  भी समस्याएं  हैं  उनका  एकमात्र    कारण  मनुष्य  की दुर्बुद्धि  है  l  इस  दुर्बुद्धि  के  कारण  मनुष्य  स्वयं  अपने  पतन  के  साधन  जुटा  लेता  है  l  इस  दुर्बुद्धि  के  कारण  मनुष्य  ने  भूमि , जल , वायु  , नदी तालाब   सबको  प्रदूषित  कर  दिया  l  अपने स्वार्थ  के  लिए समुद्र  को  गहराई  तक  खोद  कर  वहां  असंतुलन  कर  दिया  l  पहाड़ों  पर  पिकनिक  मनाकर  वहां  गंदगी  फैला  दी  l   अब  तीर्थ  जाने  के  पीछे  कोई  पुण्य  प्रयोजन  नहीं  है  ,  वहां    एन्जॉय  करना  , वीडियो  बनाना ----  दुर्बुद्धि  है  l  इस  कारण  प्रकृति   के   क्रोध  का  सामना  करना  पड़ता  है  l  ' अन्य  क्षेत्रे  कृतं पापं  ,  तीर्थ  क्षेत्रे  विनश्यति  l  तीर्थ  क्षेत्रे  कृतं  पापं  , वज्रलेपो  भविष्यति  l l   अर्थात  --अन्य  क्षेत्र  में  किया  गया  पाप  तीर्थ  क्षेत्र  में  नष्ट  हो  जाता  है  ,  किन्तु  तीर्थ  क्षेत्र  में  किया  गया  पाप   अकाट्य  होकर   जन्म -जन्मान्तर  तक  दुःखदायी  होता  है   l  जीवन  के  प्रत्येक  क्षेत्र  में  मनुष्य   दुर्बुद्धि  से  ही  प्रेरित  है  l  l  अब  'जियो  और  जीने  दो '   को लोग  भूल  गए  अब  तो  स्वार्थ , अहंकार  और  महत्वाकांक्षा   इतनी  है  कि  ' मारो -काटो , धक्का  दो  ---- की  स्थिति  है  l  जब  स्वयं  का  जीवन  अशांत  है  तो  बाहर  शांति  कैसे  होगी  ?  ------- एक  महातम  नाव  पर  यात्रा  कर  रहे  थे  , प्रभु  कीर्तन  कर  रहे  थे  l  l  नाव  में  ही  कुछ  दुष्ट  बैठे थे  l   उन्हें  मसखरी  सूझी  l   वे  उनकी  गंजी  खोपड़ी   पर  चपत लगाने  लगे  l  दूसरे  लोग  जो  बैठे  थे  उनकी  हिम्मत  नहीं  हुई  कि  उन्हें  रोकते  l  आकाश  के  देवता  यह  द्रश्य  देख  रहे  थे  ,  बड़े  क्रुद्ध  हुए  l  उन्होंने  महात्मा  से  कहा  ----  "  हे  भद्र  पुरुष  !  आप  अति  सहनशील  हैं  l  आप  कहें  तो  नाव  उलट  दें  ,  इन  सबको  डुबो  दें  l  आप  बताएं  क्या  दंड  दें  ? "   महात्मा  हँसते  हुए  बोले  --- "  उलटना  और  डुबोना  तो  सब  जानते  हैं  l  आपको  देवता  कहा  जाता  है  l  इन्हें  उलटकर  सीधा  कर  दीजिए  l  इनकी  बुद्धि  बदल  दीजिए  l  डुबाने  की  अपेक्षा  उबार  दीजिए  l  "  देवताओं  ने  वही  किया  l    संसार  में  उलटी  बुद्धि  को  उलटकर  सीधा  करने  की  ज्यादा  जरुरत  है  l   ईश्वर  ने  बार -बार  अवतार  लेकर  असुरों  का  अंत  किया  ,  लेकिन  असुरता  का  अंत  नहीं  हुआ  l   वह  तो  संस्कार  के  रूप  में  पीढ़ी -दर -पीढ़ी   चली  आ  रही  है   और   नीचे  गिरना  अधिक  आसान  होता  है  इसलिए  संक्रामक  रोग  की  भांति   फैलती  जा  रही  है  l  इसलिए  इस  युग  में  ईश्वर की  यही  प्रेरणा  है  कि  अपनी  दुर्बुद्धि  को  सद्बुद्धि  में  बदलो  ,  असुरता  से  देवत्व  की  ओर  कदम   बढ़ाओ  "  इसका  केवल  एक  ही  रास्ता है  ' गायत्री -मन्त्र  '  जिसमें  ईश्वर  से  सद्बुद्धि  की  याचना  की  गई  है  l  गायत्री  मन्त्र  के  जप  के  साथ   इसमें  बताये  गए  विधान  के  अनुसार  आचरण  करो   तभी  संसार  का  कल्याण  संभव  है  l  

15 November 2025

WISDOM -----

   संसार  में  अँधेरे  और  उजाले  का संघर्ष  तो   आदिकाल  से  ही  रहा  है    लेकिन  अब  जो  स्थिति  है   उससे  यही  स्पष्ट  होता  है   कि   अंधकार    सम्पूर्ण  धरती  पर  अपना  एकछत्र  साम्राज्य  स्थापित  करने  की  पूरी  तैयारी  में  l  मनुष्य  की  कामना , वासना , महत्वाकांक्षा , स्वार्थ , लालच  ,  ईर्ष्या , द्वेष  अपने  चरम  पर  पहुँच  गया  है    इस  कारण  नकारात्मक  शक्तियों   के  लिए  अपना  काम  करना  बहुत  आसान  हो  गया  है  l   भूत , प्रेत , पिशाच , जिन्न  ------ आदि  के  पास  अपना  शरीर  नहीं  होता   , ये  किसी  न  किसी  प्राणी  के  शरीर  में  प्रवेश  कर  अपना  काम  करती  हैं  l  यदि  ये  नकारात्मक  शक्ति  किसी  परिवार  के  मुखिया  के  शरीर  में  प्रवेश  कर  गईं  तो  वह  अपने  साथ  पूरे  परिवार  को  पतन  की  गर्त  में  धकेल  देगा  l  यदि  ऐसा  कोई  डीमन  किसी  पावरफुल  व्यक्ति  ,  किसी  साम्राज्य  के  अधिपति    में  प्रवेश  कर  गया   , तो   जो  दास्ताँ  सामने  होगी  वह  बहुत  दर्दनाक  होगी  l  ऐसा  कहते  हैं  हिटलर  के   भीतर    कोई   डीमन  था   l   जो  परिणाम  हुआ  वह  संसार  के  सामने  है  l  प्राकृतिक  आपदाएं  तो  आकस्मिक  होंगी  l  मनुष्य  ने  परिस्थितियों  को  सुधारने  का  कोई  प्रयास  नहीं  किया    तो  वह  रोता  हुआ  तो  इस  धरती  पर  आया  है  और  चीखते -चिल्लाते , कराहते   और  पछताते  हुए  धरती  से  जायेगा  l  अंधकार  को  पराजित  करने  के  लिए  यदि  बहुत  छोटे  स्तर  पर  भी  प्रयास  हों  , तो  ऐसे  सामूहिक  प्रयास  से  नकारात्मक  शक्तियों  को  पराजित  किया  जा  सकता  है  l   वर्तमान  समय  लोक कल्याणकारी  राज्य  का  है  l  प्रत्येक  सरकार   अपनी  प्रजा  को  खुश  करने  के  लिए   नि :शुल्क  भोजन , अन्न , शिक्षा , चिकित्सा आदि   विभिन्न  कल्याणकारी  कार्य  करती  है  l  जैसे  कोरोना  का  इंजेक्शन  अनिवार्य  था  ,  वैसे  ही   संसार  में  सभी    सरकारें  यह  अनिवार्य  कर  दें  कि  इन  सुविधाओं  के  लेने  से  पहले  प्रत्येक  व्यक्ति  चाहे  वह  किसी  भी  धर्म  का  हो  ,  अपने  ईश्वर  का  नाम , उनका  कोई  मन्त्र  अनिवार्य  रूप  से  एक  पेज  पर  लिखकर  जमा  करे  l  चाहे  कोई  वेतनभोगी  हो , मजदूर   हो , बुजुर्ग  हो  , कोरोना  इंजेक्शन  की  तरह  यह  लिखकर  जमा  करना  अनिवार्य  हो  l  आचार्य श्री  कहते  हैं  मन्त्र  को  लिखने  का  प्रभाव   कई  गुना  अधिक  होता  है  और  जब  यह  प्रयास  सामूहिक  होगा   तो  यह  अंधकार  की शक्तियां  बुरी तरह   पराजित  होंगी  l  सारे  पापकर्म  तो  इसी  धरती  पर  होते  हैं , सोचिये  , धरती  माता  को  कितना  कष्ट  होता  होगा  l  ऐसे  छोटे -छोटे  प्रयासों  से   जो लोग  न  चाहते  हुए , मजबूरीवश   विभिन्न  पापकर्मों  में  सम्मिलित  हैं   उनका  कल्याण  होगा  ,  अनेकों  आत्माएं  जो  भटक  रही  हैं  उनकी   मुक्ति  होगी  l  नकारात्मक  शक्तियों  की वजह  से  जो  अद्रश्य    प्रदूषण   होता है ,  वह  सब   साफ़  हो  जायेगा  और  संसार  में  चारों  ओर  खुशहाली  होगी  l  

14 November 2025

WISDOM ------

पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- ' अच्छे -बुरे वातावरण  से  अच्छी -बुरी  परिस्थितियां  जन्म  लेती  हैं   और  वातावरण  का  निर्माण   पूरी  तरह  मनुष्य  के  हाथ  में  है  ,  वह  चाहे  तो   उसे  स्वच्छ , सुन्दर  और  स्वस्थ  बनाकर   स्वर्गीय  परिस्थितियों  का  आनंद  ले  सकता  है   अथवा  उसे  विषाक्त  बनाकर   स्वयं  अपना  दम  तोड़े  l  "   आज  संसार  में  जितनी  अशांति , युद्ध  , अस्थिरता  और  तनाव    है   उसके  लिए   स्वयं  मनुष्य  ही  दोषी  है  l  मनुष्य  ने  अपनी   अनंत  इच्छाओं  , कामना  और  सुख -भोग  की  लालसा  के  लिए   भूमि , जल , वायु  सम्पूर्ण  प्रकृति  को  प्रदूषित  कर  दिया  है  l  इच्छाएं , महत्वाकांक्षा  एक  ऐसा  नशा  है   जो  कभी  समाप्त  नहीं  होता   l  उम्र  चाहे  ढल  जाए   लेकिन  मन  ललचाता  ही  रहता  है  l  और जब  प्रत्यक्ष  उपलब्ध  साधनों  से    संतुष्टि  नहीं  मिलती  तब  मनुष्य  अपनी   दमित  इच्छा  , महत्वाकांक्षा , कामना ----- आदि  की  पूर्ति  के  लिए  नकारात्मक  शक्तियों  की  मदद  लेता  है  l  तंत्र -मन्त्र ,  भूत  -प्रेत , पिशाच  आदि  को  सिद्ध  कर  अपने  मनोरथ  पूरे  करना   ,  प्राणियों  की  ऊर्जा  का  गलत  इस्तेमाल  करना  ----- इन  सबसे  अद्रश्य  वातावरण  प्रदूषित  हो  जाता  है  l  नकारात्मक  शक्तियों  को  भी  अपनी  खुराक  चाहिए  l  और  यही  कारण  है  कि  हत्याएं , दुर्घटनाएं  , युद्ध , ह्रदयविदारक  घटनाएँ   , प्राकृतिक  आपदाओं   की  तीव्रता बढ़  जाती है  l  इन  नकारात्मक  शक्तियों  की  मदद  से  व्यक्ति   अपनी  इच्छाओं  को  पूरा  कर  लेता  , बहुत  सुख -भोग  और  धन  लाभ  भी    हो  जाता  है   लेकिन  यह  कभी  भी  स्थायी  नहीं  होता  l  एक  निश्चित  समय  तक  ही  इनसे  लाभ  उठाया  जा  सकता  है   ,  ईश्वर  से  बड़ा  कोई  नहीं  है   l  किसी     का  अहित  करने  के  लिए   जब  इन  शक्तियों  का  इस्तेमाल  किया  जाता  है  ,  तब  निश्चित  समयानुसार   इनका   स्वत:  ही   पलटवार  भी  होता  है  l    आचार्य श्री  कहते  हैं  ---- ' गलत  रास्ते  से  प्राप्त  की  गई  सफलता  कभी  स्थायी  नहीं  होती  ,  यह  अंत  में  कलंकित  हो  जाती  है  l '  सच्ची  सफलता   जिसके  साथ  व्यक्ति में  उदारता , करुणा ,  भाईचारा  हो  ,  अहंकार  न  हो  ,  तब  व्यक्ति   को  जो  सम्मान  मिलता है  , वह  बड़ी  कठिन  तपस्या  से  संभव  है  l   

10 November 2025

WISDOM -----

 रामकृष्ण  परमहंस  कहते  हैं  ---- भक्त  तीन  तरह  के  होते  हैं  l  एक  तमोगुणी  भक्त  ,  जो  आज  बहुतायत  में  पाए  जाते  हैं  ,  जोर -जोर  से  चिल्लाते  हैं   भगवान  का  नाम  ,  लेकिन  जीवन  में  भगवान  कहीं  भी  नहीं  l  2 . दूसरे  रजोगुणी  भक्त  --जो बहुत  सारे  पूजा  उपचार  करता  है  , दिखाता  भी  है  , खरच  भी  करता  है  ,  पर  जीवन  में  अध्यात्म  कम  है  l  3.  तीसरे हैं  ---सतोगुणी  भक्त  --वे  जो  भी  कर  रहे  हैं   वह  पूजा  है  l  वे  ढेरों  अच्छे  काम   करते  हैं , परमार्थ  के  कार्यों  में  उनकी  भागीदारी  है  लेकिन  दंभ  जरा  भी  नहीं   करते  हैं  l  वे  अहंकार  करना  ही  नहीं  चाहते  l  वे  मात्र  प्रभु  के  विनम्र  भक्त  बने  रहना  चाहते  हैं  l                                             भक्ति  के  लिए  जाति  का  कोई  महत्व  नहीं  है  l  निषादराज , शबरी   सदन  कसाई , रसखान , रैदास  --- इनकी  जाति  भगवान  ने  नहीं   देखी  l  भगवान  कहते  हैं  --भक्त  का  कल्याण  तो  मेरी  भक्ति  से  हो  जाता  है  l  भक्त  के  लिए  रूपवान  होना , न  होना  महत्वहीन  है  l  विभीषण  बदसूरत  थे , राक्षस  थे  l  श्री  हनुमानजी  , सुग्रीव  वानर  थे  ,  पर  सभी  ईश्वर  के  भक्त  थे  l  

8 November 2025

WISDOM ------

 ऋषियों का  वचन  है  --- 'सत्य  बोलो , प्रिय  बोलो  l  लेकिन  ऐसा  सत्य  कभी  न  बोलो  जिससे  किसी का  अहित  होता  है  l  क्योंकि  जिस  सत्य  को  बोलने  से   दूसरों  का  अहित होता  है ,  उस सत्य  का  पुण्य  फल  प्राप्त  नहीं  होता   l  एक  कथा  है  ----प्राचीन  काल  में  एक  सत्यनिष्ठ  ब्राह्मण  रहा  करते  थे  l  एक बार  वे  नदी  के  किनारे  बैठकर  तपस्या  कर  रहे  थे  l  उसी  समय  कुछ  व्यक्ति  भागते  हुए  आए  उन्होंने  उस  ब्राह्मण  से  कहा   कि  डाकू   हमें  लूटने  के  लिए  हमारा पीछा  कर रहे  हैं  ,  हम  यहाँ  झाड़ियों  के  पीछे  छुप  रहे  हैं  l  यदि  कोई  हमारे  बारे  में  पूछे  तो  बताना  नहीं  l  कुछ  समय  बाद   डाकू  वहां  आए  और  ब्राह्मण  से उन  व्यक्तियों   के  विषय  में  पूछा  l  अपने  सत्य  बोलने  की  प्रतिज्ञा   को  ध्यान  में  रखते  हुए   ब्राह्मण  ने  डाकुओं  को   उन  व्यक्तियों  की  ओर  भेज  दिया  l  डाकुओं  ने  उन  व्यक्तियों  को  लूटकर  उनकी    वहीं  हत्या  कर  दी   l   कुछ  समय  बाद  ब्राह्मण  की  भी  मृत्यु  हो  गई   और  वे  यमलोक  पहुंचे   l   यमराज  ने  उन्हें  देखकर  कहा ------ " महाराज  आपने  एक  धर्मपरायण  व्यक्ति  का जीवन  जिया  l  आपके  पूरे  जीवन का  पुण्य  तो  बहुत  है  ,  लेकिन   एक   अप्रिय   सत्य  बोलने  के  कारण  आप     पाप  के  भागीदार  बने  l  इस  कारण  आपको  नरक  में  निर्धारित   समय  व्यतीत  करना  होगा  l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              

4 November 2025

WISDOM -------

 संत  एकनाथ  जिस  रास्ते  स्नान  को  जाया  करते  थे  , एक  उद्दंड  व्यक्ति  का  घर  उधर  ही  था  l  वह  छत  पर  खड़ा  ताकता  रहता  , जैसे  ही  संत  एकनाथ  उधर  से  गुजरते  , वह  व्यक्ति  ऊपर  से  कूड़ा  पटककर  उन्हें  गन्दा  कर  देता  l  उन्हें  दुबारा  नहाने  के  लिए  विवश  करने  में   उसे  बहुत  मजा  आता  था  l  बहुत  दिन  ऐसे  ही  बीत  गए  l  संत  बहुत  सहनशील  थे  ,  उन्होंने  कभी  क्रोध  नहीं  किया  l  इसके  बाद  अचानक  परिवर्तन  आया  , कूड़ा  गिरना  बंद  हो  गया  l  संत को  चिंता  हुई  l  उन्होंने  इधर -उधर  पूछताछ  की   तो  मालूम  हुआ  कि  वह  व्यक्ति  बीमार  पड़ा  है  l  संत  ने  कहा  ---- 'मित्र  !  तुम  मेरा  रोज  ध्यान  रखते  थे  l  तुम्हारे  प्रयास  से  मुझे   दिन  में कई  बार  नहाने  का  मौका  मिला  l  अब  मेरी  बारी  है  कि  इस  कठिन  समय  में  मैं  तुम्हारा  ध्यान  रखूं  l  '  जब  तक  वह  व्यक्ति  बीमार  रहा  ,  संत   उसकी  सहायता  करते  और  आवश्यक  साधन  जुटाते  l  जब  वह  व्यक्ति  बीमारी  से  उठा   तो  उसका  स्वभाव बिलकुल  बदल  गया  l  

1 November 2025

WISDOM -------

 

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  -----' ईर्ष्या  एक  प्रकार  की  मनोविकृति  है  l  इससे  भौतिक  क्षेत्र  में  विफलता   और  आध्यात्मिक  क्षेत्र  में  अवगति  प्राप्त  होती  है  l  जो  इस  मानसिक  बीमारी  से  ग्रस्त  हो  गया  , समझा  जाना  चाहिए  कि   उसने   अपनी  प्रगति  के  सारे  द्वार  बंद  कर  लिए  l  "    जिसके  पास  सभी  भौतिक  सुख -सुविधाएँ  है  ,  वह  भी  अपने  जीवन  से  संतुष्ट  नहीं  है  l  उसे  दूसरे  को  सुखी  देखकर  ईर्ष्या  होती  है   l  जो  बहुत  ईर्ष्यालु  हैं  , उनकी  बुद्धि  काम  करना  बंद  कर  देती  है   l  उन्हें  अपनी  आगे  की  तरक्की  का  कोई  रास्ता  नहीं  दीखता   इसलिए  वे  अपनी  सारी  ऊर्जा  दूसरों  की  जिंदगी  में  झाँकने  में  लगा  देते  हैं   l  कोई  खुश  है  तो  क्यों  खुश  है  ?  कोई  हँस  रहा  है  तो  क्यों  ?   वे   हर  संभव  तरीके  से  दूसरे  को  कष्ट  देने  का  हर  संभव  प्रयास करते  हैं  l  ऐसा  करने  से  ही  उनको  सुकून  मिलता  है  l  ईर्ष्या  का  एक  दुःखद   पहलू  भी  है  l  व्यक्ति  जिससे  ईर्ष्या  करता  है  ,  उसे  नीचा  गिराने  के  हर  संभव  प्रयास  भी  करता  है   लेकिन  उसका  प्रतिद्वंदी  उस  पर  कोई  ध्यान  ही  न  दे   और  अपनी  प्रगति  के  पथ  पर  आगे  बढ़ता  जाए   तो   ईर्ष्यालु  व्यक्ति  का  अहंकार  चोटिल  होता  है  ,  घाव  की  भांति  रिसने  लगता  है  l   उसके  सारे  प्रयास  असफल  हो  गए  l  आचार्य जी  ने  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाई  है  कि  संसार  से  मिलने  वाले  मान -अपमान , प्रशंसा -निंदा  की  परवाह   न  करो  , उस  पर  कोई  प्रतिक्रिया  न  दो  ,  अपने  पथ  पर  आगे  बढ़ो  l 

29 October 2025

WISDOM ------

  इस  संसार  में  तंत्र -मन्त्र , ब्लैक मैजिक , भूत =प्रेत , पिशाच आदि  को  सिद्ध  कर  उनका  अपने  स्वार्थ  के  लिए  इस्तेमाल  करना , मनुष्य  आदि  प्राणियों  की  ऊर्जा  का  नकारात्मक  प्रयोग   अर्थात  एक  शब्द  में  कहें  तो  मायावी  विद्याओं  का  प्रयोग   अति  प्राचीन  काल  से  हो  रहा  है  l  रावण  मायावी  विद्याओं    का  जानकार  था , वेश  बदल   लेता  था  l  महाभारत  में  घटोत्कच   ने  अपनी  मायावी  विद्या  से  कौरव  सेना  में  हाहाकार  मचा  दिया  , तब  कर्ण  को  देवराज  इंद्र  द्वारा  प्रदत्त  शक्ति  से  उसका  वध  करना  पड़ा  l  घटोत्कच  भीम  का  पुत्र  था   और  रावण  के  बराबर  ज्ञानी  तो  इस  संसार  में  दूसरा  नहीं  है  लेकिन    तंत्र  आदि  नकारात्मक  शक्तियों  के  प्रयोग  से  प्रकृति  को  कष्ट  होता  है ,  प्रकृति  का   कुपोषण  होता  है   इसलिए ईश्वर  इनका  अंत  कर  देते  हैं  l  इस  विद्या  का  सकारात्मक  प्रयोग  भी संभव  है   लेकिन  इस  कलियुग  में  कायरता  बढ़  जाने  के कारण  अब  लोग  अपने  स्वार्थ  और  महत्वाकांक्षा  की  पूर्ति  के  लिए   और  ईर्ष्यावश  दूसरों  को  कष्ट  पहुँचाने  के  लिए   ऐसी  नकारात्मक  शक्तियों  का  प्रयोग  बड़े  पैमाने  पर  करते  हैं  l  ऐसे  कार्यों  का  कोई  सबूत  नहीं  होता  ,  इसलिए  कानून  भी  इसे   मान्यता  नहीं  देता  l  इसका  सबसे  बड़ा  फायदा  यह  होता  है  कि   बड़े -बड़े  , समर्थ  लोगों  की  कायरता  पर  परदा  पड़ा  रहता  है  लेकिन ईश्वर से  बड़ा  कोई  नहीं  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----- "  तंत्र  चाहे  कितना  ही  बड़ा  क्यों  न  हो  ,  वह  भक्ति  और  भक्त  से  सदैव  कमजोर  होता  है  l  भक्त की  रक्षा  स्वयं  भगवान  करते  हैं   और  तंत्र  भगवान  से  श्रेष्ठ  कभी  नहीं  हो  सकता  l  आचार्य श्री  कहते  हैं  ----' तांत्रिक  अपनी  ही  विद्या  के  अपराधी  होते  हैं  ,  यही  वजह  है  कि  अधिकतर  तांत्रिकों  का  अंत  बड़ा  भयानक  होता  है  l  "    तांत्रिकों  को  अपनी  विद्या  का  बड़ा  अहंकार  होता  है  ,   वे  किसी भक्त  पर  इसका  प्रयोग  कर  ईश्वर  से  भी  प्रत्यक्ष  लड़ाई  मोल  ले  लेते हैं  l  इस  संबंध  में  आचार्य श्री  का  कहना  है  कि   तंत्र  का  प्रयोग  भक्त  पर  लगता  तो  है  , परन्तु  वह  विधान  के  अनुरूप  ही  l  "   इसे  हम  सरल  शब्दों  में  ऐसे  भी  कह  सकते  हैं  कि  तंत्र  मन्त्र  आदि  नकारात्मक  शक्तियों  के  भी  देवी  -देवता  होते  हैं  ,  जिन्होंने  बड़ी  तपस्या  कर  उन्हें  सिद्ध  किया  है  ,  उन्हें  उस  तांत्रिक  का  भी  मान  रखना  पड़ता  है  , इसलिए  भक्त  को  विधान  के  अनुरूप थोडा -बहुत  कष्ट  हो  ही  जाता  है  l  लेकिन  ईश्वर  उन्हें  कभी  क्षमा  नहीं  करते  , जन्म -जन्मांतर  तक  उन्हें  इसका  परिणाम  भोगना  पड़ता  है  l  इस  संदर्भ  में  एक  घटना  है  ------जगद्गुरु  शंकराचार्य  पर  एक  कापालिक  ने  भीषण  तंत्र  का  प्रयोग  किया  l  इसके  प्रभाव  से   उनको  भगंदर  हो  गया   और अंत  में  उन्हें  अपनी  देह  को  त्यागना  पड़ा  l  कापालिक  के  इस  पापकर्म  से  उसकी  आराध्या  एवं  इष्ट  भगवती  उससे  अति  क्रुद्ध  हुईं   और  कहा  कि  तूने  शिव  के  अंशावतार   मेरे  ही  पुत्र  पर   अत्याचार  किया  है  l  इसके  प्रायश्चित  के  लिए  तुझे   अपनी  भैरवी  की  बलि  देनी  पड़ेगी  l '  कापालिक  अपनी  भैरवी  से  अति  प्रेम  करता  था  ,  परन्तु  उसे  उसको  मारना  पड़ा  l   उसको  मारने  के  बाद  वह  विक्षिप्त  हो  गया   और  अपना  ही  गला  काट  दिया  l  इस  प्रकार  उस  तांत्रिक  का  अंत  बड़ा  भयानक  हुआ  l     प्रकृति  में  क्षमा  का  प्रावधान  नहीं  है   l  ईश्वर  ऐसे  पापियों  को  भी  अनेकों  बार  संकेत  भी  देते   हैं  कि  इस  पाप  के  रास्ते  को  छोड़  दो  , सन्मार्ग  पर  चलो  l  परन्तु  अपने  अहंकार  के  आगे  वे  विवश  होते  हैं  ,  जिसने   उनका  जितना  भी  साथ  दिया  है   उसे ईश्वर  के  तराजू  में  तोलकर  उतना  परिणाम  भुगतना  ही  पड़ता  है  l  

25 October 2025

WISDOM ------

  समर्थ  रामदासजी  सतारा  जा  रहे  थे  l  मार्ग  में  उनका  शिष्य  भोजन  लेने  पास  के  गाँव  में  गया  l  गाँव  से  भोजन   लाने   में  देर  हो  सकती  थी  इसलिए  वह  खेत  से  चार  भुट्टे  तोड़  लाया   और  उनको   भूनकर   स्वामीजी  को  दे  दिया  l   धुंआ  उठता  देख  खेत  का  मालिक  भागा -भागा  आया   और  समर्थ  स्वामी  के  हाथ  में  भुट्टे  देखकर  उन्हें  डंडे  से  मारने  लगा  l  शिष्य  कुछ  बोलता  तो उसे   चुपकर     स्वामी रामदासजी  ने  मार  खा  ली  l   दूसरे  दिन  वे  सतारा  पहुंचे  ,  उनकी  पीठ  पर  डंडे  के  निशान  थे  l   छत्रपति  शिवाजी  महाराज  तक   विवरण  पहुंचा  ,  उन्होंने  सेनानायक  से  पता  लगवा  लिया  कि  कहाँ  की  घटना  है   और  किसके  द्वारा  यह  अपराध  हुआ  है  l  शिवाजी  महाराज   स्वामीजी  को  प्रणाम  करने  आए   तो  खेत  का  मालिक  भी   वहां  लाया  गया  l  छत्रपति  शिवाजी  महाराज  ने  पूरे  राज्य  की  ओर  से  क्षमा  क्षमा  मांगते  हुए  पूछा  --- "  गुरुवर  !  क्या  दंड  दूँ  ? '  वह  किसान  समर्थ  के  चरणों  में  गिर  गया  l  समर्थ  रामदासजी  बोले  ----"  इसने  हमारे  धैर्य  और  सहन शक्ति  की  परीक्षा  ली   है  l  इसने  अपना  कर्तव्य  निभाया  है  l  इसे  दंड  न  देकर  चार  भुट्टे  की  हरजाना   नगद  राशि  के  रूप  में  दिया  जाए   तथा  एक  कीमती  वस्त्र  देकर  सम्मानित  करना  चाहिए  l  "   न्याय  का  यह  विलक्षण  रूप  देखकर   छत्रपति   गुरु  के  चरणों  में  गिर  गए  ,  धन्य  हैं  गुरुवर  आप  l  

14 October 2025

WISDOM ------

   यदि  मनुष्य  की  चेतना  परिष्कृत  नहीं  हुई   तो  इस  वैज्ञानिक  प्रगति  का  कोई  अर्थ  नहीं  है  l  ऐसी  प्रगति  केवल  तबाही  ही  ला  सकती  है  l  मनुष्य  अभी  भी  जाति , धर्म , ऊँच -नीच  की  बेड़ियों  में  उलझा  है  l  इस  भेदभाव  ने  लोगों  के  मन  में  इतना  जहर  भर  दिया  है  कि  वे  अपने  जीवन  का  उदेश्य  ही  भूल  गए  हैं  l  उन्हें  यह  सब  सोचने  की  फुर्सत  ही  नहीं  है  कि  वे  इस  धरती  पर  क्यों  आए  हैं  l  मन  में  यदि  जहर  भरा  है  तो  वह  जीवन  के  प्रत्येक  क्षेत्र   के  लिए  घातक  है  l  मनुष्य  यदि  सच्चे  अर्थों  में  ईश्वर  को  माने   और  ईश्वर  ने  धरती  पर  जन्म  लेकर  अपने  आचरण  से  मनुष्यों  को  जो  शिक्षा  दी  ,   वैसा  ही  मनुष्य  आचरण  करे   तभी  संसार  में  सुख -शांति  आ  सकती  है  l    भगवान  श्रीराम  ने  शबरी  के  झूठे  बेर  खाए   l  वनवास  में  उनके  सर्वप्रथम  सहायक  निषादराजगुह  थे  l  उनकी   गणना    नीची  जाति  के  शूद्रों  में  की  जाती  थी   लेकिन  भगवान  श्रीराम  ने  उन्हें  अपना  मित्र  बनाया   l   भगवान  श्रीराम  ने  तो  बन्दर , भालू , पशु -पक्षी , गिलहरी  और  सम्पूर्ण  प्रकृति  से  प्रेम  किया  l  प्रत्येक  मनुष्य  खाली  हाथ  आया  है  और  खाली  हाथ  ही  जाना  है  l  फिर  इस  बीच  के  समय  में  इतना  लड़ाई   झगड़े , भेदभाव    से  क्या  हासिल  हुआ   ?  ,  कोई  सिंहासन  मिला  क्या  ?  केवल  अपनी  ऊर्जा  और  अनमोल  जिन्दगी  गँवा  दी  l  लोग  जब  जागरूक  होंगे   तभी  संसार  में  सुख -शांति  होगी  l 

12 October 2025

WISDOM ------

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----- "  मनुष्य  को  भगवान  ने  बहुत  कुछ  दिया   है  l  बुद्धि  तो  इतनी  दी  है  कि  वह  संसार  के  सम्पूर्ण  प्राणियों  का  शिरोमणि  हो  गया  l   बुद्धि  पाकर  भी  मनुष्य  एक  गलती  सदैव  दोहराता  रहता  है   और  वह  यह  है  कि  उसे  जिस  पथ  पर  चलने  का  अभ्यास  हो  गया  है  ,  वह  उसी  पर  चलते  रहना  चाहता  है  l  रास्ते  न  बदलने  से  जीवन  के  अनेक   पहलू   उपेक्षित  पड़े  रहते  हैं  l  "  आचार्य श्री  कहते हैं  ---- " धनी  धन  का  मोह  छोड़कर   दो  मिनट  त्याग  और  निर्धनता  का  जीवन  बिताने  के  लिए  तैयार  नहीं  ,  नेता  भीड़  पसंद  करता  है    वह  दो  क्षण   भी  एकांत  चिन्तन  के  लिए  नहीं  देता  l  डॉक्टर  व्यवसाय  करता  है   , ऐसा  नहीं  कि  कभी  पैसे  को  माध्यम  न  बनाए  और  सेवा  का  सुख  भी  देखे   l  व्यापारी  बेईमानी  करते  हैं  ,  कोई  ऐसा  प्रयोग  नहीं  करते  कि  देखें  ईमानदारी  से  भी  क्या  मनुष्य    संपन्न  और  सुखी  हो  सकता  है   l  जीवन  में  विपरीत  और  कष्टकर  परिस्थितियों  से  गुजरने  का  अभ्यास  मनुष्य  जीवन  में  बना  रहा  होता   तो  अध्यात्म  और  भौतिकता  में  संतुलन  बना  रहता  l "  -------  जार्ज  बर्नार्डशा   को  अपने  जीवन  में  नव -पथ  पर चलने  की  आदत  थी  l  उनका  जन्म  एक  व्यापारी  के  घर  में  हुआ   लेकिन  उन्होंने  साहित्यिक  जगत  में  उच्च  सम्मान  पाया  l  पाश्चात्य  जीवन  में   भी  उन्होंने   अपने  आपको  शराब , सुंदरी   और  मांसाहार  से  बचाकर  रखा  l  उन्होंने  यह  सिद्ध  कर  दिखाया  कि  मनुष्य  बुरी  से  बुरी   स्थिति  में  भी   अपने  आपको  शुद्ध   और  निष्कलुष  बनाए  रख  सकता  है  ,  शर्त  यह  है  कि  वह  अपने  सिद्धांत  के  प्रति   पूर्ण  निष्ठावान  हो  l  

10 October 2025

WISDOM -----

   शेख  सादी    अपने  अब्बा  के  साथ   हजयात्रा  पर  निकले  l  मार्ग  में  वे  विश्राम  करने  के  लिए  एक  सराय  में  रुके  l  शेख  सादी  का  यह  नियम  था  कि  वे   रोज  सुबह  उठकर  अपने  नमाज  आदि  के  क्रम  को  पूर्ण  करते  थे  l  जब  वे  सुबह  उठे  तो   उन्होंने  देखा  कि  सराय  में  अधिकांश  लोग  सोए  हुए  हैं  l  शेख  सादी  को  बड़ा  क्रोध  आया  l  क्रोध  में  उन्होंने  अब्बा  से  कहा  ---- "  अब्बा   हुजूर  !   ये  देखिए  !  ये  लोग  कैसे  जाहिल  और   नाकारा  हैं  l  सुबह  का  वक्त  परवरदिगार  को  याद  करने  का  होता  है   और  ये  लोग  इसे  किस  तरह   बरबाद  कर  रहे  हैं  l  इन्हें  सुबह  उठाना  चाहिए  l "    शेख  सादी  के  अब्बा  बोले  ---- "  बेटा  !  तू  भी  न  उठता  तो  अच्छा  होता  l  सुबह  उठकर  दूसरों  की  कमियाँ  निकालने  से  बेहतर  है   कि  न  उठा  जाए  l  "      बात  शेख  सादी  की  समझ  में  आ  गई  l  उन्होंने  उसी  दिन  निर्णय  लिया  कि   वे  अपनी  सोच  में  किसी  तरह  की  नकारात्मकता  को  जगह  नहीं  देंगे  l  अपनी  इसी  सोच  के  कारण   शेख  सादी  महामानव  बने  l  

6 October 2025

WISDOM ------

    कर्मफल    का  नियम  अकाट्य  है  ,  यदि  बबूल  का  पेड़  बोया  है  तो  काँटे  ही  मिलेंगे  ,  आम  नहीं  l   यदि  कोई  अपनी  चालाकी  से   किसी  की  ऊर्जा  चुरा  ले  ,  किसी  का  आशीर्वाद  लेकर   कुछ  समय  के  लिए  अपने  कुकर्मों  के  दंड  से  बच  भी  जाए  ,  तो  यह  भी  ईश्वर  का  विधान  ही  है  l  प्रत्येक  व्यक्ति  पर  जन्म -जन्मांतर  के  कर्मों  का  लेन  -देन  होता  है   ,  यह  हिसाब  किस  तरह  चुकता  होगा   यह  सब  काल  निश्चित  करता  है  l   मनुष्य  ने  जो  भी  अच्छे -बुरे  कर्म  किए  हैं  ,  उनके  परिणाम  से  वह  बच  नहीं  सकता  l  चाहे  वह  दुनिया  के  किसी  भी  कोने  में  चला  जाए  ,  उसके  कर्म  उसे  ढूंढ  ही  लेते  हैं  ,  जैसे  बछड़ा  हजारों  गायों  के  बीच  अपनी  माँ  को  ढूंढ  लेता  है  l    मनुष्य  अपनी  ओछी  बुद्धि  से  सोचता  है  कि     सिद्ध  महात्माओं  का  आशीर्वाद  लेकर , गंगा  स्नान  कर  के  उसे  अपने  पापकर्मों  से  छुटकारा  मिल  जायेगा  l  दंड  संभवतः  कुछ  समय  के  लिए  स्थगित   भले  ही  हो  जाए  लेकिन  टल  नहीं  सकता  l  ' ईश्वर  के  घर  देर  है ,   अंधेर  नहीं  l '   दुर्योधन  ने   पांडवों  का  हक  छीनने  , उन्हें  कष्ट  देने  के  लिए    जीवन  भर  छल , कपट , षड्यंत्र  किए  l    वह  तो  एक  से  बढ़कर  एक  धर्मात्माओं   गंगापुत्र  भीष्म ,  द्रोणाचार्य , कृपाचार्य  और  विदुर  की  छत्रछाया  में  था  ,  सूर्यपुत्र  कर्ण  उसका  मित्र  था   लेकिन  अधर्मी  और  अन्यायी  का  साथ  देने  के  कारण    उनका  कोई  ज्ञान  , धर्म  कुछ  काम  न  आया  l  उन  सबका  अंत  हुआ   और  दुर्योधन  तो  समूचे  कौरव  वंश  को  ही  ले  डूबा  l  

5 October 2025

WISDOM -----

   श्रीमद् भगवद्गीता  में  भगवान  कहते  हैं  कि   मनुष्य  कर्म  करने  को  स्वतंत्र  है   लेकिन  उस  कर्म  का  परिणाम  कब  और  कैसे  मिलेगा  यह  काल  निश्चित  करता  है  l  कलियुग  में  मनुष्य  बहुत  बुद्धिमान  हो  गया  है  ,  वह  अपनी  बुद्धि  लगाकर  इस  विधान  में  थोड़ी  बहुत  हेराफेरी  कर  ही  लेता  है  l  इसे  इस  तरह  समझ  सकते  हैं  ---- कहते  हैं  प्रत्येक  मनुष्य  के    दो  घड़े  --एक  पाप  का  और  एक  पुण्य  का  चित्रगुप्त जी  महाराज  के  पास  रखे  रहते  हैं  l  जब  कोई   निरंतर  पापकर्म  करता  रहता  है  तो  उसका  पाप  का  घड़ा  भरता  जाता  है  l  यदि  वह  कुछ  पुण्य  कर्म  भी  करता  है   तो  उन  पुण्यों  से  उसके  कुछ  पाप  कटते  जाते  हैं  लेकिन  यदि  पुण्यों  की  गति  बहुत  धीमी  है  तो  एक  न  एक  दिन  उसका  पाप  का  घड़ा  भर  जाता  है  l  जो  बहुत  होशियार  हैं  उन्हें    बीमारी , अशांति  , व्यापार  में  घाटा  आदि  अनेक  संकेतों  से   इस  बात  का  एहसास  होने  लगता  है  कि अब  उनके  पापों  का  फल  मिलने  का  समय  आ  रहा  है  l  ऐसे  में  वे  बड़ी  चतुराई  से  किसी  पुण्यात्मा  का  , किसी  साधु -संत  का  पल्ला  पकड़  लेते  हैं  l  उनके  चरण  स्पर्श  करना  ,  आशीर्वाद  लेना  ,  उन्हें  धन , यश , प्रतिष्ठा  का  प्रलोभन  देकर  उनसे  आशीर्वाद  के  रूप  में  उनके  संचित  पुण्य  भी  ले  लेते  हैं   l  सुख -वैभव , यश  की  चाह  किसे  नहीं  होती  ,  निरंतर  चरण  स्पर्श   कराने   और  आशीर्वाद  देते  रहने  से    उनकी  ऊर्जा  पुण्य  के  रूप  में   उस  व्यक्ति  की  ओर  ट्रान्सफर  होती  जाती  है  l  इसका  परिणाम  यह  होता  है  कि   उस  पापी  के  पुण्य  का  घड़ा  फिर  से  भरने  लगता  है   जिससे  उनके  पाप  कटने  लगते  हैं  और  साधु  महाराज  का  पुण्य  का  घड़ा  खाली  होने  लगता  है  l  अब  या  तो  वे  महाराज  तेजी  से  पुण्य  कार्य  करें  लेकिन  सुख -भोग  और  यश    मिल  जाने  से   अब  पुण्य  कर्म  करना  संभव  नहीं  हो  पाता  l  पुण्य  का  घड़ा  रिक्त  होते  ही   उन  महाराज  का  पतन  शुरू  होने  लगता  है  ,   कभी  एक  वक्त  था  जब  लोग  सिर  , आँखों  पर  बैठाए  रखते  थे    लेकिन  अब  -------- l    केवल  साधु  -संत  ही  नहीं  सामान्य  मनुष्यों  को  भी  प्रतिदिन  कुछ  -  कुछ  पुण्य  अवश्य  करते  रहना  चाहिए   ताकि  जाने -अनजाने  हम  से  जो  पाप  कर्म  हो  जाते  हैं  , उनसे  इस  पाप -पुण्य  का  संतुलन  बना  रहे  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  कहते  हैं  ---- हमें  पुण्य  का  कोई  भी  मौका  हाथ  से  जाने  नहीं  देना  चाहिए  l  पुण्यों  की  संचित  पूंजी  ही    हमारी   बड़ी -  बड़ी  मुसीबतों  से  रक्षा  करती  है  l  

3 October 2025

WISDOM ----

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- "  स्वार्थ  के  वशीभूत  मनुष्य  इतना  लालची  हो  जाता  है   कि  उसे  घ्रणित  कर्म  करने  में  भी  लज्जा   नहीं आती  l  तृष्णा  के  वशीभूत  हो  कर   लोग  अनीति  का  आचरण  करते  हैं   और  वह  अनीति  ही   अंततः  उनके  पतन  एवं  सर्वनाश  का  कारण  बनती  है  l   कोई  कितना  ही  शक्तिशाली  , बलवान  क्यों  न  हो  ,   स्वार्थपरता  एवं  दुष्टता  का  जीवन  बिताने  पर   उसे  नष्ट   होना   ही  पड़ता  है  l "         रावण  के  बराबर  पंडित , वैज्ञानिक , कुशल  प्रशासक , कूटनीतिज्ञ   कोई  भी  नहीं  था  ,  लेकिन  पर-स्त्री  अपहरण  , राक्षसी  आचार -विचार   एवं   दुष्टता  के  कारण  कुल  सहित  नष्ट  हो  गया  l  कंस  ने  अपने  राज्य  में     हा -हाकार  मचवा  दिया  l  अपनी  बहन  और  बहनोई  को  जेल  में  बंद  कर  दिया  ,  उनके  नवजात  शिशुओं   को  शिला  पर  पटक -पटक  मार  दिया  l  अपने  राज्य  में   छोटे -छोटे  बालकों  को  कत्ल  करा  दिया  l  लोगों  में  भय  और  आतंक  का  वातावरण  पैदा  किया  ,  लेकिन  वही  कंस   भगवान  कृष्ण   द्वारा  बड़ी  दुर्गति  से  मार  दिया  गया  l  दुष्ट  व्यक्ति  अपने  ही  दुष्कर्मों  द्वारा   मारा  जाता  है  l    -------  रावण  का  मृत  शरीर पड़ा  था   l   उसमें  सौ  स्थानों  पर  छिद्र  थे  l  सभी  से  लहु  बह  रहा  था  l  लक्ष्मण जी  ने   राम  से  पूछा  --- 'आपने  तो  एक  ही  बाण  मारा  था  l  फिर  इतने  छिद्र  कैसे  हुए  ? ' भगवान  श्रीराम  ने  कहा ---  मेरे  बाण  से  तो  एक  ही  छिद्र  हुआ  l  पर  इसके  कुकर्म   घाव  बनकर   अपने  आप  फूट  रहे  हैं  और  अपना  रक्त  स्वयं  बहा  रहे  हैं  l  

1 October 2025

WISDOM -----

 अहंकार  एक  ऐसा  दुर्गुण  है  जो  व्यक्ति  के  सद्गुणों  पर  पानी  फेर  देता  है  और  अनेक  अन्य  दुर्गुणों  को  अपनी  ओर  आकर्षित  कर  लेता  है  l   रावण  महापंडित , महाज्ञानी  और  परम  शिव  भक्त  था   लेकिन  बहुत  अहंकारी  था  l  उसमें  गुण  तो  इतने  थे  कि  उसकी  मृत्यु  के  समय   भगवान  राम  ने  भी  लक्ष्मण  को  उसके  पास  ज्ञान  प्राप्त  करने  के  लिए  भेजा  l  लेकिन  उसके  अहंकार  ने   उसके  सारे  गुणों  पर  परदा  डाल  दिया  ,  उसके  अहंकार  को  मिटाने  के  लिए  स्वयं  ईश्वर  को  अवतार  लेना  पड़ा  l  रावण  स्वयं  को  असुरराज  कहने  में  ही  गर्व  महसूस  करता  था  l  सम्पूर्ण  धरती  पर  उसका  आतंक  था  l  अनेक  छोटे -बड़े  और  सामान्य  असुर  ऋषियों  को  सताते  थे , उनके  यज्ञ  और  धार्मिक  अनुष्ठानों  का  विध्वंस  करते  थे  l   रावण  सभी  असुरों  का  प्रमुख  था    जिसे  वर्तमान  की  भाषा  में  ' डॉन '  कहते  हैं   l      माता  सीता  का  हरण  कर   उसने  स्वयं  ही  अपना  स्तर  गिरा  लिया  l  वह  ज्ञानी  था  और  जानता   था  कि   ऐसे  कार्य  से  उसका  समाज  में  सम्मान  कम  हो  जायेगा   इसलिए  वह  वेश  बदलकर  भिक्षा  का  कटोरा  लेकर  सीताजी  के  पास  गया  l   रावण  वध   यही  संदेश  देता  है  कि    छोटे और  साधारण  असुरों  को  मारने  से , उनका  अंत  करने  से  असुरता  के  साम्राज्य  का  अंत  नहीं  होगा   क्योंकि  वे  तो  रावण  के  टुकड़ों  पर  पलने  वाले , अपना   जीविकापार्जन  करने  वाले  थे  l  इन  सबके  मुखिया  रावण  का  अंत  करो  तभी  इस  धरती  से  अधर्म  और  अन्याय  के  साम्राज्य  का  अंत  होगा  l  इसी  उदेश्य  को  ध्यान  में  रखकर  यह  ईश्वरीय  विधान  रचा  गया  l  ईश्वर  चाहते  हैं  कि  धरती  पर  सभी  प्राणी  शांति  और  सुकून  से  रहें  लेकिन  जब  मनुष्यों  की  आसुरी  प्रवृत्ति  प्रबल  हो  जाती  है   तब  ईश्वर  कोई  विधान  अवश्य  रचते  हैं  l  

30 September 2025

WISDOM ------

   प्राचीन  काल  के  हमारे  ऋषि  त्रिकालदर्शी  थे  l  उन्होंने  जो   रचनाएँ  की  उन  का    प्रत्येक  युग  के  अनुरूप   भिन्न -भिन्न  अर्थ  था  l  जैसे  हमारे  महाकाव्य  हैं  --रामायण  और  महाभारत  l  इनके  विभिन्न  प्रसंगों  में   कलियुग  की  भयावह  परिस्थितियों  में  स्वयं  के  व्यक्तित्व  को   सुरक्षित  और  विकसित   करने    के  लिए   उचित  मार्ग  क्या  है  ,  इसे  गूढ़  अर्थ  में  समझाया  गया  है  l    रामायण  का  एक  प्रसंग  है  ----- बाली  और  सुग्रीव  दो  भाई  थे  ,  दोनों  ही  बहुत  वीर  थे  लेकिन  बाली  को  यह  वरदान  प्राप्त  था  कि  कोई  भी  उसके  सामने  आकर  उससे  युद्ध  करेगा  तो  उसकी  आधी  शक्ति  बाली  को  मिल  जाएगी  l  इस  कारण  किसी  से  भी  युद्ध  हो  बाली  की  ही  विजय  होती  थी  l  किसी  कारण  से  बाली  और  सुग्रीव  दोनों  भाइयों  में  विवाद हो  गया  ,  युद्ध  की  नौबत  आ  गई  l  बाली  को   जीतना    असंभव  था  , अत:  सुग्रीव  पराजित  होकर  ऋष्यमूक  पर्वत  पर  छिपकर  रहने  लगा  l  बाली  की  यह  विशेष  योग्यता  त्रेतायुग  में  उसका  वरदान  थी  लेकिन  इस  कलियुग  में  जब  कायरता   और  मानसिक  विकृतियाँ  अपने  चरम  पर  हैं  ,  तब  ऐसी  विशेष  योग्यता  प्राप्त  लोग  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  कर  रहे  हैं  l  शक्ति  के  दुरूपयोग  के  कारण  यह  वरदान  नहीं  ,  समाज  के  लिए  अभिशाप  है  और  इस  युग  में  इन्हें  कहते  हैं '  एनर्जी  वैम्पायर  "  l  हमारे  जीवन  में  अनेकों  बार  हमारा  सामना  ऐसे  लोगों  से  होता  है   , जिनसे  बात  करके  भी  ऐसा  महसूस  होता  है   जैसे  बिलकुल  थक  गए  ,  शरीर  में  कोई  शक्ति  नहीं  रही  ,  निराशा  सी  आने  लगती  है  l  ऐसे  ही  लोग  एनर्जी  वैम्पायर  होते  हैं   जो  अपनी  बातों  से  या  किन्ही  अद्रश्य  शक्तियों  की  मदद  से   अपने  विरोधियों  को   या  जिससे  वे  ईर्ष्या  और  प्रतियोगिता  रखते  हैं   उसे  विभिन्न  तरीके  से  कष्ट  देते  हैं  , परेशान  करते  हैं  और  उसकी  एनर्जी  को  खींचकर  स्वयं  बड़ी  उम्र  तक  भी  भोग विलास  का  जीवन  जीते  हैं  l  इस  युग  में  तंत्र -मन्त्र   विज्ञान  के  साथ  मिलकर   इतना  शक्तिशाली   हो  गया  है    की  अद्रश्य  शक्तियों  की  मदद  से   एनर्जी  की  सप्लाई  और  व्यापार  भी  संभव  है  l  ऐसे  वैम्पायर  समाज  में  सभ्रांत  लोगों  की  तरह  शान  से  रहते  हैं  l  जिसकी  एनर्जी  को  वे  खींच  लेते  हैं   उसका  शरीर  बिना  किसी  बीमारी  के  सूख  जाता  है  ,  उम्र  से  पहले  बुढ़ापा  दीखने  लगता  है  ,  कोई  दवा  फायदा  नहीं  करती  l  ये  एनर्जी  वैम्पायर   अपने  धन  और  शक्ति  के  बल  पर   अमर  रहना  चाहते  हैं  l  ऐसे  लोगों  को  कोई  सुधार  नहीं  सकता  l  इस  कथा   की  यही  शिक्षा  है  कि   जब  इन्हें  पहचान  लें  तो  ऐसे  लोगों  से  सुग्रीव  की  तरह  दूर  रहे  ,  ईश्वर  की  शरण  में  रहें  l  शक्ति  का  दुरूपयोग  करने  वालों  का  न्याय  ईश्वर  ही  करते  हैं  l