24 November 2025

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा आचार्य जी  लिखते  हैं  --- ' आज  सबसे  बड़ी  आवश्यकता   आस्था  और  विचारों  को  बदलने  की  है  l  इन  दिनों  आस्था  संकट  सघन  है  l  लोग  नीति और  मर्यादा  को  तोड़ने  पर  बुरी  तरह  उतारू  हैं  l  अनाचार  की  वृद्धि  से  अनेकों  संकटों  का  माहौल  बन  गया  है  l  न  व्यक्ति  सुखी  है  न  समाज  में  स्थिरता  है  l  समस्याएं  , विपत्तियाँ  निरंतर  बढ़ती  जा  रही  हैं  l  स्थिर  समाधान  के  लिए  जनमानस   के  द्रष्टिकोण  में  परिवर्तन  , चिन्तन  का  परिष्कार   और  सत्प्रवृत्ति  संवर्द्धन  ,प्रमुख  उपाय  है  l  "    संसार  में  विभिन्न देशों  की  सरकारें  सामाजिक  सुधार  और  कल्याण  के  लिए  अनेकों  नियम , कानून   बनाती   हैं  लेकिन  यदि   जनमानस  के  विचार  श्रेष्ठ  नहीं  हैं  , चिन्तन  परिष्कृत  नहीं  है   तो  उन  नियमों   से  कोई  विशेष  समाज  में  परिवर्तन  नहीं  होता  l   मानसिकता  नहीं  बदलने  से   मनुष्य   ऐसे  कार्य  जो  कानून  द्वारा  प्रतिबंधित  हैं  , वह   उन्हें  छिपकर  करने  लगता  है  l   अच्छाई  में  बढ़ा आकर्षण  होता  है  इसलिए  बड़े  से  बड़ा  पापी  भी  स्वयं  को  समाज  में  बहुत  सभ्य  और  प्रतिष्ठित  दिखाना  चाहता  है  l  वह  अपनी  मानसिक   विकृतियों    और  पापकर्मों  को   समाज  और  परिवार  से  छिपकर  अंजाम  देता  है  l  संचार  के  साधनों  ने  पाप  और  अपराध  का  भी  वैश्वीकरण  कर  दिया  l   आचार्य श्री  कहते  हैं  --- ' यदि  समस्याओं  का  समाधान  निकालना है  तो  अपने  जीवन  का  लक्ष्य   ' जीवन ' को  बनाना  चाहिए   l  व्यक्ति  के  जीवनक्रम  और   चरित्र  को  बनाने  के  लिए   आस्तिकता  और  ईश्वर  भक्ति  की  आवश्यकता   है  ताकि  मनुष्य  जाति  का  व्यक्तिगत  और  सामाजिक   जीवन   श्रेष्ठ  व  समुन्नत  बना  रहे  l  "  

20 November 2025

WISDOM -------

 संसार  में  आज  जितनी  भी समस्याएं  हैं  उनका  एकमात्र    कारण  मनुष्य  की दुर्बुद्धि  है  l  इस  दुर्बुद्धि  के  कारण  मनुष्य  स्वयं  अपने  पतन  के  साधन  जुटा  लेता  है  l  इस  दुर्बुद्धि  के  कारण  मनुष्य  ने  भूमि , जल , वायु  , नदी तालाब   सबको  प्रदूषित  कर  दिया  l  अपने स्वार्थ  के  लिए समुद्र  को  गहराई  तक  खोद  कर  वहां  असंतुलन  कर  दिया  l  पहाड़ों  पर  पिकनिक  मनाकर  वहां  गंदगी  फैला  दी  l   अब  तीर्थ  जाने  के  पीछे  कोई  पुण्य  प्रयोजन  नहीं  है  ,  वहां    एन्जॉय  करना  , वीडियो  बनाना ----  दुर्बुद्धि  है  l  इस  कारण  प्रकृति   के   क्रोध  का  सामना  करना  पड़ता  है  l  ' अन्य  क्षेत्रे  कृतं पापं  ,  तीर्थ  क्षेत्रे  विनश्यति  l  तीर्थ  क्षेत्रे  कृतं  पापं  , वज्रलेपो  भविष्यति  l l   अर्थात  --अन्य  क्षेत्र  में  किया  गया  पाप  तीर्थ  क्षेत्र  में  नष्ट  हो  जाता  है  ,  किन्तु  तीर्थ  क्षेत्र  में  किया  गया  पाप   अकाट्य  होकर   जन्म -जन्मान्तर  तक  दुःखदायी  होता  है   l  जीवन  के  प्रत्येक  क्षेत्र  में  मनुष्य   दुर्बुद्धि  से  ही  प्रेरित  है  l  l  अब  'जियो  और  जीने  दो '   को लोग  भूल  गए  अब  तो  स्वार्थ , अहंकार  और  महत्वाकांक्षा   इतनी  है  कि  ' मारो -काटो , धक्का  दो  ---- की  स्थिति  है  l  जब  स्वयं  का  जीवन  अशांत  है  तो  बाहर  शांति  कैसे  होगी  ?  ------- एक  महातम  नाव  पर  यात्रा  कर  रहे  थे  , प्रभु  कीर्तन  कर  रहे  थे  l  l  नाव  में  ही  कुछ  दुष्ट  बैठे थे  l   उन्हें  मसखरी  सूझी  l   वे  उनकी  गंजी  खोपड़ी   पर  चपत लगाने  लगे  l  दूसरे  लोग  जो  बैठे  थे  उनकी  हिम्मत  नहीं  हुई  कि  उन्हें  रोकते  l  आकाश  के  देवता  यह  द्रश्य  देख  रहे  थे  ,  बड़े  क्रुद्ध  हुए  l  उन्होंने  महात्मा  से  कहा  ----  "  हे  भद्र  पुरुष  !  आप  अति  सहनशील  हैं  l  आप  कहें  तो  नाव  उलट  दें  ,  इन  सबको  डुबो  दें  l  आप  बताएं  क्या  दंड  दें  ? "   महात्मा  हँसते  हुए  बोले  --- "  उलटना  और  डुबोना  तो  सब  जानते  हैं  l  आपको  देवता  कहा  जाता  है  l  इन्हें  उलटकर  सीधा  कर  दीजिए  l  इनकी  बुद्धि  बदल  दीजिए  l  डुबाने  की  अपेक्षा  उबार  दीजिए  l  "  देवताओं  ने  वही  किया  l    संसार  में  उलटी  बुद्धि  को  उलटकर  सीधा  करने  की  ज्यादा  जरुरत  है  l   ईश्वर  ने  बार -बार  अवतार  लेकर  असुरों  का  अंत  किया  ,  लेकिन  असुरता  का  अंत  नहीं  हुआ  l   वह  तो  संस्कार  के  रूप  में  पीढ़ी -दर -पीढ़ी   चली  आ  रही  है   और   नीचे  गिरना  अधिक  आसान  होता  है  इसलिए  संक्रामक  रोग  की  भांति   फैलती  जा  रही  है  l  इसलिए  इस  युग  में  ईश्वर की  यही  प्रेरणा  है  कि  अपनी  दुर्बुद्धि  को  सद्बुद्धि  में  बदलो  ,  असुरता  से  देवत्व  की  ओर  कदम   बढ़ाओ  "  इसका  केवल  एक  ही  रास्ता है  ' गायत्री -मन्त्र  '  जिसमें  ईश्वर  से  सद्बुद्धि  की  याचना  की  गई  है  l  गायत्री  मन्त्र  के  जप  के  साथ   इसमें  बताये  गए  विधान  के  अनुसार  आचरण  करो   तभी  संसार  का  कल्याण  संभव  है  l  

15 November 2025

WISDOM -----

   संसार  में  अँधेरे  और  उजाले  का संघर्ष  तो   आदिकाल  से  ही  रहा  है    लेकिन  अब  जो  स्थिति  है   उससे  यही  स्पष्ट  होता  है   कि   अंधकार    सम्पूर्ण  धरती  पर  अपना  एकछत्र  साम्राज्य  स्थापित  करने  की  पूरी  तैयारी  में  l  मनुष्य  की  कामना , वासना , महत्वाकांक्षा , स्वार्थ , लालच  ,  ईर्ष्या , द्वेष  अपने  चरम  पर  पहुँच  गया  है    इस  कारण  नकारात्मक  शक्तियों   के  लिए  अपना  काम  करना  बहुत  आसान  हो  गया  है  l   भूत , प्रेत , पिशाच , जिन्न  ------ आदि  के  पास  अपना  शरीर  नहीं  होता   , ये  किसी  न  किसी  प्राणी  के  शरीर  में  प्रवेश  कर  अपना  काम  करती  हैं  l  यदि  ये  नकारात्मक  शक्ति  किसी  परिवार  के  मुखिया  के  शरीर  में  प्रवेश  कर  गईं  तो  वह  अपने  साथ  पूरे  परिवार  को  पतन  की  गर्त  में  धकेल  देगा  l  यदि  ऐसा  कोई  डीमन  किसी  पावरफुल  व्यक्ति  ,  किसी  साम्राज्य  के  अधिपति    में  प्रवेश  कर  गया   , तो   जो  दास्ताँ  सामने  होगी  वह  बहुत  दर्दनाक  होगी  l  ऐसा  कहते  हैं  हिटलर  के   भीतर    कोई   डीमन  था   l   जो  परिणाम  हुआ  वह  संसार  के  सामने  है  l  प्राकृतिक  आपदाएं  तो  आकस्मिक  होंगी  l  मनुष्य  ने  परिस्थितियों  को  सुधारने  का  कोई  प्रयास  नहीं  किया    तो  वह  रोता  हुआ  तो  इस  धरती  पर  आया  है  और  चीखते -चिल्लाते , कराहते   और  पछताते  हुए  धरती  से  जायेगा  l  अंधकार  को  पराजित  करने  के  लिए  यदि  बहुत  छोटे  स्तर  पर  भी  प्रयास  हों  , तो  ऐसे  सामूहिक  प्रयास  से  नकारात्मक  शक्तियों  को  पराजित  किया  जा  सकता  है  l   वर्तमान  समय  लोक कल्याणकारी  राज्य  का  है  l  प्रत्येक  सरकार   अपनी  प्रजा  को  खुश  करने  के  लिए   नि :शुल्क  भोजन , अन्न , शिक्षा , चिकित्सा आदि   विभिन्न  कल्याणकारी  कार्य  करती  है  l  जैसे  कोरोना  का  इंजेक्शन  अनिवार्य  था  ,  वैसे  ही   संसार  में  सभी    सरकारें  यह  अनिवार्य  कर  दें  कि  इन  सुविधाओं  के  लेने  से  पहले  प्रत्येक  व्यक्ति  चाहे  वह  किसी  भी  धर्म  का  हो  ,  अपने  ईश्वर  का  नाम , उनका  कोई  मन्त्र  अनिवार्य  रूप  से  एक  पेज  पर  लिखकर  जमा  करे  l  चाहे  कोई  वेतनभोगी  हो , मजदूर   हो , बुजुर्ग  हो  , कोरोना  इंजेक्शन  की  तरह  यह  लिखकर  जमा  करना  अनिवार्य  हो  l  आचार्य श्री  कहते  हैं  मन्त्र  को  लिखने  का  प्रभाव   कई  गुना  अधिक  होता  है  और  जब  यह  प्रयास  सामूहिक  होगा   तो  यह  अंधकार  की शक्तियां  बुरी तरह   पराजित  होंगी  l  सारे  पापकर्म  तो  इसी  धरती  पर  होते  हैं , सोचिये  , धरती  माता  को  कितना  कष्ट  होता  होगा  l  ऐसे  छोटे -छोटे  प्रयासों  से   जो लोग  न  चाहते  हुए , मजबूरीवश   विभिन्न  पापकर्मों  में  सम्मिलित  हैं   उनका  कल्याण  होगा  ,  अनेकों  आत्माएं  जो  भटक  रही  हैं  उनकी   मुक्ति  होगी  l  नकारात्मक  शक्तियों  की वजह  से  जो  अद्रश्य    प्रदूषण   होता है ,  वह  सब   साफ़  हो  जायेगा  और  संसार  में  चारों  ओर  खुशहाली  होगी  l  

14 November 2025

WISDOM ------

पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- ' अच्छे -बुरे वातावरण  से  अच्छी -बुरी  परिस्थितियां  जन्म  लेती  हैं   और  वातावरण  का  निर्माण   पूरी  तरह  मनुष्य  के  हाथ  में  है  ,  वह  चाहे  तो   उसे  स्वच्छ , सुन्दर  और  स्वस्थ  बनाकर   स्वर्गीय  परिस्थितियों  का  आनंद  ले  सकता  है   अथवा  उसे  विषाक्त  बनाकर   स्वयं  अपना  दम  तोड़े  l  "   आज  संसार  में  जितनी  अशांति , युद्ध  , अस्थिरता  और  तनाव    है   उसके  लिए   स्वयं  मनुष्य  ही  दोषी  है  l  मनुष्य  ने  अपनी   अनंत  इच्छाओं  , कामना  और  सुख -भोग  की  लालसा  के  लिए   भूमि , जल , वायु  सम्पूर्ण  प्रकृति  को  प्रदूषित  कर  दिया  है  l  इच्छाएं , महत्वाकांक्षा  एक  ऐसा  नशा  है   जो  कभी  समाप्त  नहीं  होता   l  उम्र  चाहे  ढल  जाए   लेकिन  मन  ललचाता  ही  रहता  है  l  और जब  प्रत्यक्ष  उपलब्ध  साधनों  से    संतुष्टि  नहीं  मिलती  तब  मनुष्य  अपनी   दमित  इच्छा  , महत्वाकांक्षा , कामना ----- आदि  की  पूर्ति  के  लिए  नकारात्मक  शक्तियों  की  मदद  लेता  है  l  तंत्र -मन्त्र ,  भूत  -प्रेत , पिशाच  आदि  को  सिद्ध  कर  अपने  मनोरथ  पूरे  करना   ,  प्राणियों  की  ऊर्जा  का  गलत  इस्तेमाल  करना  ----- इन  सबसे  अद्रश्य  वातावरण  प्रदूषित  हो  जाता  है  l  नकारात्मक  शक्तियों  को  भी  अपनी  खुराक  चाहिए  l  और  यही  कारण  है  कि  हत्याएं , दुर्घटनाएं  , युद्ध , ह्रदयविदारक  घटनाएँ   , प्राकृतिक  आपदाओं   की  तीव्रता बढ़  जाती है  l  इन  नकारात्मक  शक्तियों  की  मदद  से  व्यक्ति   अपनी  इच्छाओं  को  पूरा  कर  लेता  , बहुत  सुख -भोग  और  धन  लाभ  भी    हो  जाता  है   लेकिन  यह  कभी  भी  स्थायी  नहीं  होता  l  एक  निश्चित  समय  तक  ही  इनसे  लाभ  उठाया  जा  सकता  है   ,  ईश्वर  से  बड़ा  कोई  नहीं  है   l  किसी     का  अहित  करने  के  लिए   जब  इन  शक्तियों  का  इस्तेमाल  किया  जाता  है  ,  तब  निश्चित  समयानुसार   इनका   स्वत:  ही   पलटवार  भी  होता  है  l    आचार्य श्री  कहते  हैं  ---- ' गलत  रास्ते  से  प्राप्त  की  गई  सफलता  कभी  स्थायी  नहीं  होती  ,  यह  अंत  में  कलंकित  हो  जाती  है  l '  सच्ची  सफलता   जिसके  साथ  व्यक्ति में  उदारता , करुणा ,  भाईचारा  हो  ,  अहंकार  न  हो  ,  तब  व्यक्ति   को  जो  सम्मान  मिलता है  , वह  बड़ी  कठिन  तपस्या  से  संभव  है  l   

10 November 2025

WISDOM -----

 रामकृष्ण  परमहंस  कहते  हैं  ---- भक्त  तीन  तरह  के  होते  हैं  l  एक  तमोगुणी  भक्त  ,  जो  आज  बहुतायत  में  पाए  जाते  हैं  ,  जोर -जोर  से  चिल्लाते  हैं   भगवान  का  नाम  ,  लेकिन  जीवन  में  भगवान  कहीं  भी  नहीं  l  2 . दूसरे  रजोगुणी  भक्त  --जो बहुत  सारे  पूजा  उपचार  करता  है  , दिखाता  भी  है  , खरच  भी  करता  है  ,  पर  जीवन  में  अध्यात्म  कम  है  l  3.  तीसरे हैं  ---सतोगुणी  भक्त  --वे  जो  भी  कर  रहे  हैं   वह  पूजा  है  l  वे  ढेरों  अच्छे  काम   करते  हैं , परमार्थ  के  कार्यों  में  उनकी  भागीदारी  है  लेकिन  दंभ  जरा  भी  नहीं   करते  हैं  l  वे  अहंकार  करना  ही  नहीं  चाहते  l  वे  मात्र  प्रभु  के  विनम्र  भक्त  बने  रहना  चाहते  हैं  l                                             भक्ति  के  लिए  जाति  का  कोई  महत्व  नहीं  है  l  निषादराज , शबरी   सदन  कसाई , रसखान , रैदास  --- इनकी  जाति  भगवान  ने  नहीं   देखी  l  भगवान  कहते  हैं  --भक्त  का  कल्याण  तो  मेरी  भक्ति  से  हो  जाता  है  l  भक्त  के  लिए  रूपवान  होना , न  होना  महत्वहीन  है  l  विभीषण  बदसूरत  थे , राक्षस  थे  l  श्री  हनुमानजी  , सुग्रीव  वानर  थे  ,  पर  सभी  ईश्वर  के  भक्त  थे  l  

8 November 2025

WISDOM ------

 ऋषियों का  वचन  है  --- 'सत्य  बोलो , प्रिय  बोलो  l  लेकिन  ऐसा  सत्य  कभी  न  बोलो  जिससे  किसी का  अहित  होता  है  l  क्योंकि  जिस  सत्य  को  बोलने  से   दूसरों  का  अहित होता  है ,  उस सत्य  का  पुण्य  फल  प्राप्त  नहीं  होता   l  एक  कथा  है  ----प्राचीन  काल  में  एक  सत्यनिष्ठ  ब्राह्मण  रहा  करते  थे  l  एक बार  वे  नदी  के  किनारे  बैठकर  तपस्या  कर  रहे  थे  l  उसी  समय  कुछ  व्यक्ति  भागते  हुए  आए  उन्होंने  उस  ब्राह्मण  से  कहा   कि  डाकू   हमें  लूटने  के  लिए  हमारा पीछा  कर रहे  हैं  ,  हम  यहाँ  झाड़ियों  के  पीछे  छुप  रहे  हैं  l  यदि  कोई  हमारे  बारे  में  पूछे  तो  बताना  नहीं  l  कुछ  समय  बाद   डाकू  वहां  आए  और  ब्राह्मण  से उन  व्यक्तियों   के  विषय  में  पूछा  l  अपने  सत्य  बोलने  की  प्रतिज्ञा   को  ध्यान  में  रखते  हुए   ब्राह्मण  ने  डाकुओं  को   उन  व्यक्तियों  की  ओर  भेज  दिया  l  डाकुओं  ने  उन  व्यक्तियों  को  लूटकर  उनकी    वहीं  हत्या  कर  दी   l   कुछ  समय  बाद  ब्राह्मण  की  भी  मृत्यु  हो  गई   और  वे  यमलोक  पहुंचे   l   यमराज  ने  उन्हें  देखकर  कहा ------ " महाराज  आपने  एक  धर्मपरायण  व्यक्ति  का जीवन  जिया  l  आपके  पूरे  जीवन का  पुण्य  तो  बहुत  है  ,  लेकिन   एक   अप्रिय   सत्य  बोलने  के  कारण  आप     पाप  के  भागीदार  बने  l  इस  कारण  आपको  नरक  में  निर्धारित   समय  व्यतीत  करना  होगा  l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              

4 November 2025

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 संत  एकनाथ  जिस  रास्ते  स्नान  को  जाया  करते  थे  , एक  उद्दंड  व्यक्ति  का  घर  उधर  ही  था  l  वह  छत  पर  खड़ा  ताकता  रहता  , जैसे  ही  संत  एकनाथ  उधर  से  गुजरते  , वह  व्यक्ति  ऊपर  से  कूड़ा  पटककर  उन्हें  गन्दा  कर  देता  l  उन्हें  दुबारा  नहाने  के  लिए  विवश  करने  में   उसे  बहुत  मजा  आता  था  l  बहुत  दिन  ऐसे  ही  बीत  गए  l  संत  बहुत  सहनशील  थे  ,  उन्होंने  कभी  क्रोध  नहीं  किया  l  इसके  बाद  अचानक  परिवर्तन  आया  , कूड़ा  गिरना  बंद  हो  गया  l  संत को  चिंता  हुई  l  उन्होंने  इधर -उधर  पूछताछ  की   तो  मालूम  हुआ  कि  वह  व्यक्ति  बीमार  पड़ा  है  l  संत  ने  कहा  ---- 'मित्र  !  तुम  मेरा  रोज  ध्यान  रखते  थे  l  तुम्हारे  प्रयास  से  मुझे   दिन  में कई  बार  नहाने  का  मौका  मिला  l  अब  मेरी  बारी  है  कि  इस  कठिन  समय  में  मैं  तुम्हारा  ध्यान  रखूं  l  '  जब  तक  वह  व्यक्ति  बीमार  रहा  ,  संत   उसकी  सहायता  करते  और  आवश्यक  साधन  जुटाते  l  जब  वह  व्यक्ति  बीमारी  से  उठा   तो  उसका  स्वभाव बिलकुल  बदल  गया  l  

1 November 2025

WISDOM -------

 

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  -----' ईर्ष्या  एक  प्रकार  की  मनोविकृति  है  l  इससे  भौतिक  क्षेत्र  में  विफलता   और  आध्यात्मिक  क्षेत्र  में  अवगति  प्राप्त  होती  है  l  जो  इस  मानसिक  बीमारी  से  ग्रस्त  हो  गया  , समझा  जाना  चाहिए  कि   उसने   अपनी  प्रगति  के  सारे  द्वार  बंद  कर  लिए  l  "    जिसके  पास  सभी  भौतिक  सुख -सुविधाएँ  है  ,  वह  भी  अपने  जीवन  से  संतुष्ट  नहीं  है  l  उसे  दूसरे  को  सुखी  देखकर  ईर्ष्या  होती  है   l  जो  बहुत  ईर्ष्यालु  हैं  , उनकी  बुद्धि  काम  करना  बंद  कर  देती  है   l  उन्हें  अपनी  आगे  की  तरक्की  का  कोई  रास्ता  नहीं  दीखता   इसलिए  वे  अपनी  सारी  ऊर्जा  दूसरों  की  जिंदगी  में  झाँकने  में  लगा  देते  हैं   l  कोई  खुश  है  तो  क्यों  खुश  है  ?  कोई  हँस  रहा  है  तो  क्यों  ?   वे   हर  संभव  तरीके  से  दूसरे  को  कष्ट  देने  का  हर  संभव  प्रयास करते  हैं  l  ऐसा  करने  से  ही  उनको  सुकून  मिलता  है  l  ईर्ष्या  का  एक  दुःखद   पहलू  भी  है  l  व्यक्ति  जिससे  ईर्ष्या  करता  है  ,  उसे  नीचा  गिराने  के  हर  संभव  प्रयास  भी  करता  है   लेकिन  उसका  प्रतिद्वंदी  उस  पर  कोई  ध्यान  ही  न  दे   और  अपनी  प्रगति  के  पथ  पर  आगे  बढ़ता  जाए   तो   ईर्ष्यालु  व्यक्ति  का  अहंकार  चोटिल  होता  है  ,  घाव  की  भांति  रिसने  लगता  है  l   उसके  सारे  प्रयास  असफल  हो  गए  l  आचार्य जी  ने  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाई  है  कि  संसार  से  मिलने  वाले  मान -अपमान , प्रशंसा -निंदा  की  परवाह   न  करो  , उस  पर  कोई  प्रतिक्रिया  न  दो  ,  अपने  पथ  पर  आगे  बढ़ो  l 

29 October 2025

WISDOM ------

  इस  संसार  में  तंत्र -मन्त्र , ब्लैक मैजिक , भूत =प्रेत , पिशाच आदि  को  सिद्ध  कर  उनका  अपने  स्वार्थ  के  लिए  इस्तेमाल  करना , मनुष्य  आदि  प्राणियों  की  ऊर्जा  का  नकारात्मक  प्रयोग   अर्थात  एक  शब्द  में  कहें  तो  मायावी  विद्याओं  का  प्रयोग   अति  प्राचीन  काल  से  हो  रहा  है  l  रावण  मायावी  विद्याओं    का  जानकार  था , वेश  बदल   लेता  था  l  महाभारत  में  घटोत्कच   ने  अपनी  मायावी  विद्या  से  कौरव  सेना  में  हाहाकार  मचा  दिया  , तब  कर्ण  को  देवराज  इंद्र  द्वारा  प्रदत्त  शक्ति  से  उसका  वध  करना  पड़ा  l  घटोत्कच  भीम  का  पुत्र  था   और  रावण  के  बराबर  ज्ञानी  तो  इस  संसार  में  दूसरा  नहीं  है  लेकिन    तंत्र  आदि  नकारात्मक  शक्तियों  के  प्रयोग  से  प्रकृति  को  कष्ट  होता  है ,  प्रकृति  का   कुपोषण  होता  है   इसलिए ईश्वर  इनका  अंत  कर  देते  हैं  l  इस  विद्या  का  सकारात्मक  प्रयोग  भी संभव  है   लेकिन  इस  कलियुग  में  कायरता  बढ़  जाने  के कारण  अब  लोग  अपने  स्वार्थ  और  महत्वाकांक्षा  की  पूर्ति  के  लिए   और  ईर्ष्यावश  दूसरों  को  कष्ट  पहुँचाने  के  लिए   ऐसी  नकारात्मक  शक्तियों  का  प्रयोग  बड़े  पैमाने  पर  करते  हैं  l  ऐसे  कार्यों  का  कोई  सबूत  नहीं  होता  ,  इसलिए  कानून  भी  इसे   मान्यता  नहीं  देता  l  इसका  सबसे  बड़ा  फायदा  यह  होता  है  कि   बड़े -बड़े  , समर्थ  लोगों  की  कायरता  पर  परदा  पड़ा  रहता  है  लेकिन ईश्वर से  बड़ा  कोई  नहीं  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----- "  तंत्र  चाहे  कितना  ही  बड़ा  क्यों  न  हो  ,  वह  भक्ति  और  भक्त  से  सदैव  कमजोर  होता  है  l  भक्त की  रक्षा  स्वयं  भगवान  करते  हैं   और  तंत्र  भगवान  से  श्रेष्ठ  कभी  नहीं  हो  सकता  l  आचार्य श्री  कहते  हैं  ----' तांत्रिक  अपनी  ही  विद्या  के  अपराधी  होते  हैं  ,  यही  वजह  है  कि  अधिकतर  तांत्रिकों  का  अंत  बड़ा  भयानक  होता  है  l  "    तांत्रिकों  को  अपनी  विद्या  का  बड़ा  अहंकार  होता  है  ,   वे  किसी भक्त  पर  इसका  प्रयोग  कर  ईश्वर  से  भी  प्रत्यक्ष  लड़ाई  मोल  ले  लेते हैं  l  इस  संबंध  में  आचार्य श्री  का  कहना  है  कि   तंत्र  का  प्रयोग  भक्त  पर  लगता  तो  है  , परन्तु  वह  विधान  के  अनुरूप  ही  l  "   इसे  हम  सरल  शब्दों  में  ऐसे  भी  कह  सकते  हैं  कि  तंत्र  मन्त्र  आदि  नकारात्मक  शक्तियों  के  भी  देवी  -देवता  होते  हैं  ,  जिन्होंने  बड़ी  तपस्या  कर  उन्हें  सिद्ध  किया  है  ,  उन्हें  उस  तांत्रिक  का  भी  मान  रखना  पड़ता  है  , इसलिए  भक्त  को  विधान  के  अनुरूप थोडा -बहुत  कष्ट  हो  ही  जाता  है  l  लेकिन  ईश्वर  उन्हें  कभी  क्षमा  नहीं  करते  , जन्म -जन्मांतर  तक  उन्हें  इसका  परिणाम  भोगना  पड़ता  है  l  इस  संदर्भ  में  एक  घटना  है  ------जगद्गुरु  शंकराचार्य  पर  एक  कापालिक  ने  भीषण  तंत्र  का  प्रयोग  किया  l  इसके  प्रभाव  से   उनको  भगंदर  हो  गया   और अंत  में  उन्हें  अपनी  देह  को  त्यागना  पड़ा  l  कापालिक  के  इस  पापकर्म  से  उसकी  आराध्या  एवं  इष्ट  भगवती  उससे  अति  क्रुद्ध  हुईं   और  कहा  कि  तूने  शिव  के  अंशावतार   मेरे  ही  पुत्र  पर   अत्याचार  किया  है  l  इसके  प्रायश्चित  के  लिए  तुझे   अपनी  भैरवी  की  बलि  देनी  पड़ेगी  l '  कापालिक  अपनी  भैरवी  से  अति  प्रेम  करता  था  ,  परन्तु  उसे  उसको  मारना  पड़ा  l   उसको  मारने  के  बाद  वह  विक्षिप्त  हो  गया   और  अपना  ही  गला  काट  दिया  l  इस  प्रकार  उस  तांत्रिक  का  अंत  बड़ा  भयानक  हुआ  l     प्रकृति  में  क्षमा  का  प्रावधान  नहीं  है   l  ईश्वर  ऐसे  पापियों  को  भी  अनेकों  बार  संकेत  भी  देते   हैं  कि  इस  पाप  के  रास्ते  को  छोड़  दो  , सन्मार्ग  पर  चलो  l  परन्तु  अपने  अहंकार  के  आगे  वे  विवश  होते  हैं  ,  जिसने   उनका  जितना  भी  साथ  दिया  है   उसे ईश्वर  के  तराजू  में  तोलकर  उतना  परिणाम  भुगतना  ही  पड़ता  है  l  

25 October 2025

WISDOM ------

  समर्थ  रामदासजी  सतारा  जा  रहे  थे  l  मार्ग  में  उनका  शिष्य  भोजन  लेने  पास  के  गाँव  में  गया  l  गाँव  से  भोजन   लाने   में  देर  हो  सकती  थी  इसलिए  वह  खेत  से  चार  भुट्टे  तोड़  लाया   और  उनको   भूनकर   स्वामीजी  को  दे  दिया  l   धुंआ  उठता  देख  खेत  का  मालिक  भागा -भागा  आया   और  समर्थ  स्वामी  के  हाथ  में  भुट्टे  देखकर  उन्हें  डंडे  से  मारने  लगा  l  शिष्य  कुछ  बोलता  तो उसे   चुपकर     स्वामी रामदासजी  ने  मार  खा  ली  l   दूसरे  दिन  वे  सतारा  पहुंचे  ,  उनकी  पीठ  पर  डंडे  के  निशान  थे  l   छत्रपति  शिवाजी  महाराज  तक   विवरण  पहुंचा  ,  उन्होंने  सेनानायक  से  पता  लगवा  लिया  कि  कहाँ  की  घटना  है   और  किसके  द्वारा  यह  अपराध  हुआ  है  l  शिवाजी  महाराज   स्वामीजी  को  प्रणाम  करने  आए   तो  खेत  का  मालिक  भी   वहां  लाया  गया  l  छत्रपति  शिवाजी  महाराज  ने  पूरे  राज्य  की  ओर  से  क्षमा  क्षमा  मांगते  हुए  पूछा  --- "  गुरुवर  !  क्या  दंड  दूँ  ? '  वह  किसान  समर्थ  के  चरणों  में  गिर  गया  l  समर्थ  रामदासजी  बोले  ----"  इसने  हमारे  धैर्य  और  सहन शक्ति  की  परीक्षा  ली   है  l  इसने  अपना  कर्तव्य  निभाया  है  l  इसे  दंड  न  देकर  चार  भुट्टे  की  हरजाना   नगद  राशि  के  रूप  में  दिया  जाए   तथा  एक  कीमती  वस्त्र  देकर  सम्मानित  करना  चाहिए  l  "   न्याय  का  यह  विलक्षण  रूप  देखकर   छत्रपति   गुरु  के  चरणों  में  गिर  गए  ,  धन्य  हैं  गुरुवर  आप  l  

14 October 2025

WISDOM ------

   यदि  मनुष्य  की  चेतना  परिष्कृत  नहीं  हुई   तो  इस  वैज्ञानिक  प्रगति  का  कोई  अर्थ  नहीं  है  l  ऐसी  प्रगति  केवल  तबाही  ही  ला  सकती  है  l  मनुष्य  अभी  भी  जाति , धर्म , ऊँच -नीच  की  बेड़ियों  में  उलझा  है  l  इस  भेदभाव  ने  लोगों  के  मन  में  इतना  जहर  भर  दिया  है  कि  वे  अपने  जीवन  का  उदेश्य  ही  भूल  गए  हैं  l  उन्हें  यह  सब  सोचने  की  फुर्सत  ही  नहीं  है  कि  वे  इस  धरती  पर  क्यों  आए  हैं  l  मन  में  यदि  जहर  भरा  है  तो  वह  जीवन  के  प्रत्येक  क्षेत्र   के  लिए  घातक  है  l  मनुष्य  यदि  सच्चे  अर्थों  में  ईश्वर  को  माने   और  ईश्वर  ने  धरती  पर  जन्म  लेकर  अपने  आचरण  से  मनुष्यों  को  जो  शिक्षा  दी  ,   वैसा  ही  मनुष्य  आचरण  करे   तभी  संसार  में  सुख -शांति  आ  सकती  है  l    भगवान  श्रीराम  ने  शबरी  के  झूठे  बेर  खाए   l  वनवास  में  उनके  सर्वप्रथम  सहायक  निषादराजगुह  थे  l  उनकी   गणना    नीची  जाति  के  शूद्रों  में  की  जाती  थी   लेकिन  भगवान  श्रीराम  ने  उन्हें  अपना  मित्र  बनाया   l   भगवान  श्रीराम  ने  तो  बन्दर , भालू , पशु -पक्षी , गिलहरी  और  सम्पूर्ण  प्रकृति  से  प्रेम  किया  l  प्रत्येक  मनुष्य  खाली  हाथ  आया  है  और  खाली  हाथ  ही  जाना  है  l  फिर  इस  बीच  के  समय  में  इतना  लड़ाई   झगड़े , भेदभाव    से  क्या  हासिल  हुआ   ?  ,  कोई  सिंहासन  मिला  क्या  ?  केवल  अपनी  ऊर्जा  और  अनमोल  जिन्दगी  गँवा  दी  l  लोग  जब  जागरूक  होंगे   तभी  संसार  में  सुख -शांति  होगी  l 

12 October 2025

WISDOM ------

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----- "  मनुष्य  को  भगवान  ने  बहुत  कुछ  दिया   है  l  बुद्धि  तो  इतनी  दी  है  कि  वह  संसार  के  सम्पूर्ण  प्राणियों  का  शिरोमणि  हो  गया  l   बुद्धि  पाकर  भी  मनुष्य  एक  गलती  सदैव  दोहराता  रहता  है   और  वह  यह  है  कि  उसे  जिस  पथ  पर  चलने  का  अभ्यास  हो  गया  है  ,  वह  उसी  पर  चलते  रहना  चाहता  है  l  रास्ते  न  बदलने  से  जीवन  के  अनेक   पहलू   उपेक्षित  पड़े  रहते  हैं  l  "  आचार्य श्री  कहते हैं  ---- " धनी  धन  का  मोह  छोड़कर   दो  मिनट  त्याग  और  निर्धनता  का  जीवन  बिताने  के  लिए  तैयार  नहीं  ,  नेता  भीड़  पसंद  करता  है    वह  दो  क्षण   भी  एकांत  चिन्तन  के  लिए  नहीं  देता  l  डॉक्टर  व्यवसाय  करता  है   , ऐसा  नहीं  कि  कभी  पैसे  को  माध्यम  न  बनाए  और  सेवा  का  सुख  भी  देखे   l  व्यापारी  बेईमानी  करते  हैं  ,  कोई  ऐसा  प्रयोग  नहीं  करते  कि  देखें  ईमानदारी  से  भी  क्या  मनुष्य    संपन्न  और  सुखी  हो  सकता  है   l  जीवन  में  विपरीत  और  कष्टकर  परिस्थितियों  से  गुजरने  का  अभ्यास  मनुष्य  जीवन  में  बना  रहा  होता   तो  अध्यात्म  और  भौतिकता  में  संतुलन  बना  रहता  l "  -------  जार्ज  बर्नार्डशा   को  अपने  जीवन  में  नव -पथ  पर चलने  की  आदत  थी  l  उनका  जन्म  एक  व्यापारी  के  घर  में  हुआ   लेकिन  उन्होंने  साहित्यिक  जगत  में  उच्च  सम्मान  पाया  l  पाश्चात्य  जीवन  में   भी  उन्होंने   अपने  आपको  शराब , सुंदरी   और  मांसाहार  से  बचाकर  रखा  l  उन्होंने  यह  सिद्ध  कर  दिखाया  कि  मनुष्य  बुरी  से  बुरी   स्थिति  में  भी   अपने  आपको  शुद्ध   और  निष्कलुष  बनाए  रख  सकता  है  ,  शर्त  यह  है  कि  वह  अपने  सिद्धांत  के  प्रति   पूर्ण  निष्ठावान  हो  l  

10 October 2025

WISDOM -----

   शेख  सादी    अपने  अब्बा  के  साथ   हजयात्रा  पर  निकले  l  मार्ग  में  वे  विश्राम  करने  के  लिए  एक  सराय  में  रुके  l  शेख  सादी  का  यह  नियम  था  कि  वे   रोज  सुबह  उठकर  अपने  नमाज  आदि  के  क्रम  को  पूर्ण  करते  थे  l  जब  वे  सुबह  उठे  तो   उन्होंने  देखा  कि  सराय  में  अधिकांश  लोग  सोए  हुए  हैं  l  शेख  सादी  को  बड़ा  क्रोध  आया  l  क्रोध  में  उन्होंने  अब्बा  से  कहा  ---- "  अब्बा   हुजूर  !   ये  देखिए  !  ये  लोग  कैसे  जाहिल  और   नाकारा  हैं  l  सुबह  का  वक्त  परवरदिगार  को  याद  करने  का  होता  है   और  ये  लोग  इसे  किस  तरह   बरबाद  कर  रहे  हैं  l  इन्हें  सुबह  उठाना  चाहिए  l "    शेख  सादी  के  अब्बा  बोले  ---- "  बेटा  !  तू  भी  न  उठता  तो  अच्छा  होता  l  सुबह  उठकर  दूसरों  की  कमियाँ  निकालने  से  बेहतर  है   कि  न  उठा  जाए  l  "      बात  शेख  सादी  की  समझ  में  आ  गई  l  उन्होंने  उसी  दिन  निर्णय  लिया  कि   वे  अपनी  सोच  में  किसी  तरह  की  नकारात्मकता  को  जगह  नहीं  देंगे  l  अपनी  इसी  सोच  के  कारण   शेख  सादी  महामानव  बने  l  

6 October 2025

WISDOM ------

    कर्मफल    का  नियम  अकाट्य  है  ,  यदि  बबूल  का  पेड़  बोया  है  तो  काँटे  ही  मिलेंगे  ,  आम  नहीं  l   यदि  कोई  अपनी  चालाकी  से   किसी  की  ऊर्जा  चुरा  ले  ,  किसी  का  आशीर्वाद  लेकर   कुछ  समय  के  लिए  अपने  कुकर्मों  के  दंड  से  बच  भी  जाए  ,  तो  यह  भी  ईश्वर  का  विधान  ही  है  l  प्रत्येक  व्यक्ति  पर  जन्म -जन्मांतर  के  कर्मों  का  लेन  -देन  होता  है   ,  यह  हिसाब  किस  तरह  चुकता  होगा   यह  सब  काल  निश्चित  करता  है  l   मनुष्य  ने  जो  भी  अच्छे -बुरे  कर्म  किए  हैं  ,  उनके  परिणाम  से  वह  बच  नहीं  सकता  l  चाहे  वह  दुनिया  के  किसी  भी  कोने  में  चला  जाए  ,  उसके  कर्म  उसे  ढूंढ  ही  लेते  हैं  ,  जैसे  बछड़ा  हजारों  गायों  के  बीच  अपनी  माँ  को  ढूंढ  लेता  है  l    मनुष्य  अपनी  ओछी  बुद्धि  से  सोचता  है  कि     सिद्ध  महात्माओं  का  आशीर्वाद  लेकर , गंगा  स्नान  कर  के  उसे  अपने  पापकर्मों  से  छुटकारा  मिल  जायेगा  l  दंड  संभवतः  कुछ  समय  के  लिए  स्थगित   भले  ही  हो  जाए  लेकिन  टल  नहीं  सकता  l  ' ईश्वर  के  घर  देर  है ,   अंधेर  नहीं  l '   दुर्योधन  ने   पांडवों  का  हक  छीनने  , उन्हें  कष्ट  देने  के  लिए    जीवन  भर  छल , कपट , षड्यंत्र  किए  l    वह  तो  एक  से  बढ़कर  एक  धर्मात्माओं   गंगापुत्र  भीष्म ,  द्रोणाचार्य , कृपाचार्य  और  विदुर  की  छत्रछाया  में  था  ,  सूर्यपुत्र  कर्ण  उसका  मित्र  था   लेकिन  अधर्मी  और  अन्यायी  का  साथ  देने  के  कारण    उनका  कोई  ज्ञान  , धर्म  कुछ  काम  न  आया  l  उन  सबका  अंत  हुआ   और  दुर्योधन  तो  समूचे  कौरव  वंश  को  ही  ले  डूबा  l  

5 October 2025

WISDOM -----

   श्रीमद् भगवद्गीता  में  भगवान  कहते  हैं  कि   मनुष्य  कर्म  करने  को  स्वतंत्र  है   लेकिन  उस  कर्म  का  परिणाम  कब  और  कैसे  मिलेगा  यह  काल  निश्चित  करता  है  l  कलियुग  में  मनुष्य  बहुत  बुद्धिमान  हो  गया  है  ,  वह  अपनी  बुद्धि  लगाकर  इस  विधान  में  थोड़ी  बहुत  हेराफेरी  कर  ही  लेता  है  l  इसे  इस  तरह  समझ  सकते  हैं  ---- कहते  हैं  प्रत्येक  मनुष्य  के    दो  घड़े  --एक  पाप  का  और  एक  पुण्य  का  चित्रगुप्त जी  महाराज  के  पास  रखे  रहते  हैं  l  जब  कोई   निरंतर  पापकर्म  करता  रहता  है  तो  उसका  पाप  का  घड़ा  भरता  जाता  है  l  यदि  वह  कुछ  पुण्य  कर्म  भी  करता  है   तो  उन  पुण्यों  से  उसके  कुछ  पाप  कटते  जाते  हैं  लेकिन  यदि  पुण्यों  की  गति  बहुत  धीमी  है  तो  एक  न  एक  दिन  उसका  पाप  का  घड़ा  भर  जाता  है  l  जो  बहुत  होशियार  हैं  उन्हें    बीमारी , अशांति  , व्यापार  में  घाटा  आदि  अनेक  संकेतों  से   इस  बात  का  एहसास  होने  लगता  है  कि अब  उनके  पापों  का  फल  मिलने  का  समय  आ  रहा  है  l  ऐसे  में  वे  बड़ी  चतुराई  से  किसी  पुण्यात्मा  का  , किसी  साधु -संत  का  पल्ला  पकड़  लेते  हैं  l  उनके  चरण  स्पर्श  करना  ,  आशीर्वाद  लेना  ,  उन्हें  धन , यश , प्रतिष्ठा  का  प्रलोभन  देकर  उनसे  आशीर्वाद  के  रूप  में  उनके  संचित  पुण्य  भी  ले  लेते  हैं   l  सुख -वैभव , यश  की  चाह  किसे  नहीं  होती  ,  निरंतर  चरण  स्पर्श   कराने   और  आशीर्वाद  देते  रहने  से    उनकी  ऊर्जा  पुण्य  के  रूप  में   उस  व्यक्ति  की  ओर  ट्रान्सफर  होती  जाती  है  l  इसका  परिणाम  यह  होता  है  कि   उस  पापी  के  पुण्य  का  घड़ा  फिर  से  भरने  लगता  है   जिससे  उनके  पाप  कटने  लगते  हैं  और  साधु  महाराज  का  पुण्य  का  घड़ा  खाली  होने  लगता  है  l  अब  या  तो  वे  महाराज  तेजी  से  पुण्य  कार्य  करें  लेकिन  सुख -भोग  और  यश    मिल  जाने  से   अब  पुण्य  कर्म  करना  संभव  नहीं  हो  पाता  l  पुण्य  का  घड़ा  रिक्त  होते  ही   उन  महाराज  का  पतन  शुरू  होने  लगता  है  ,   कभी  एक  वक्त  था  जब  लोग  सिर  , आँखों  पर  बैठाए  रखते  थे    लेकिन  अब  -------- l    केवल  साधु  -संत  ही  नहीं  सामान्य  मनुष्यों  को  भी  प्रतिदिन  कुछ  -  कुछ  पुण्य  अवश्य  करते  रहना  चाहिए   ताकि  जाने -अनजाने  हम  से  जो  पाप  कर्म  हो  जाते  हैं  , उनसे  इस  पाप -पुण्य  का  संतुलन  बना  रहे  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  कहते  हैं  ---- हमें  पुण्य  का  कोई  भी  मौका  हाथ  से  जाने  नहीं  देना  चाहिए  l  पुण्यों  की  संचित  पूंजी  ही    हमारी   बड़ी -  बड़ी  मुसीबतों  से  रक्षा  करती  है  l  

3 October 2025

WISDOM ----

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- "  स्वार्थ  के  वशीभूत  मनुष्य  इतना  लालची  हो  जाता  है   कि  उसे  घ्रणित  कर्म  करने  में  भी  लज्जा   नहीं आती  l  तृष्णा  के  वशीभूत  हो  कर   लोग  अनीति  का  आचरण  करते  हैं   और  वह  अनीति  ही   अंततः  उनके  पतन  एवं  सर्वनाश  का  कारण  बनती  है  l   कोई  कितना  ही  शक्तिशाली  , बलवान  क्यों  न  हो  ,   स्वार्थपरता  एवं  दुष्टता  का  जीवन  बिताने  पर   उसे  नष्ट   होना   ही  पड़ता  है  l "         रावण  के  बराबर  पंडित , वैज्ञानिक , कुशल  प्रशासक , कूटनीतिज्ञ   कोई  भी  नहीं  था  ,  लेकिन  पर-स्त्री  अपहरण  , राक्षसी  आचार -विचार   एवं   दुष्टता  के  कारण  कुल  सहित  नष्ट  हो  गया  l  कंस  ने  अपने  राज्य  में     हा -हाकार  मचवा  दिया  l  अपनी  बहन  और  बहनोई  को  जेल  में  बंद  कर  दिया  ,  उनके  नवजात  शिशुओं   को  शिला  पर  पटक -पटक  मार  दिया  l  अपने  राज्य  में   छोटे -छोटे  बालकों  को  कत्ल  करा  दिया  l  लोगों  में  भय  और  आतंक  का  वातावरण  पैदा  किया  ,  लेकिन  वही  कंस   भगवान  कृष्ण   द्वारा  बड़ी  दुर्गति  से  मार  दिया  गया  l  दुष्ट  व्यक्ति  अपने  ही  दुष्कर्मों  द्वारा   मारा  जाता  है  l    -------  रावण  का  मृत  शरीर पड़ा  था   l   उसमें  सौ  स्थानों  पर  छिद्र  थे  l  सभी  से  लहु  बह  रहा  था  l  लक्ष्मण जी  ने   राम  से  पूछा  --- 'आपने  तो  एक  ही  बाण  मारा  था  l  फिर  इतने  छिद्र  कैसे  हुए  ? ' भगवान  श्रीराम  ने  कहा ---  मेरे  बाण  से  तो  एक  ही  छिद्र  हुआ  l  पर  इसके  कुकर्म   घाव  बनकर   अपने  आप  फूट  रहे  हैं  और  अपना  रक्त  स्वयं  बहा  रहे  हैं  l  

1 October 2025

WISDOM -----

 अहंकार  एक  ऐसा  दुर्गुण  है  जो  व्यक्ति  के  सद्गुणों  पर  पानी  फेर  देता  है  और  अनेक  अन्य  दुर्गुणों  को  अपनी  ओर  आकर्षित  कर  लेता  है  l   रावण  महापंडित , महाज्ञानी  और  परम  शिव  भक्त  था   लेकिन  बहुत  अहंकारी  था  l  उसमें  गुण  तो  इतने  थे  कि  उसकी  मृत्यु  के  समय   भगवान  राम  ने  भी  लक्ष्मण  को  उसके  पास  ज्ञान  प्राप्त  करने  के  लिए  भेजा  l  लेकिन  उसके  अहंकार  ने   उसके  सारे  गुणों  पर  परदा  डाल  दिया  ,  उसके  अहंकार  को  मिटाने  के  लिए  स्वयं  ईश्वर  को  अवतार  लेना  पड़ा  l  रावण  स्वयं  को  असुरराज  कहने  में  ही  गर्व  महसूस  करता  था  l  सम्पूर्ण  धरती  पर  उसका  आतंक  था  l  अनेक  छोटे -बड़े  और  सामान्य  असुर  ऋषियों  को  सताते  थे , उनके  यज्ञ  और  धार्मिक  अनुष्ठानों  का  विध्वंस  करते  थे  l   रावण  सभी  असुरों  का  प्रमुख  था    जिसे  वर्तमान  की  भाषा  में  ' डॉन '  कहते  हैं   l      माता  सीता  का  हरण  कर   उसने  स्वयं  ही  अपना  स्तर  गिरा  लिया  l  वह  ज्ञानी  था  और  जानता   था  कि   ऐसे  कार्य  से  उसका  समाज  में  सम्मान  कम  हो  जायेगा   इसलिए  वह  वेश  बदलकर  भिक्षा  का  कटोरा  लेकर  सीताजी  के  पास  गया  l   रावण  वध   यही  संदेश  देता  है  कि    छोटे और  साधारण  असुरों  को  मारने  से , उनका  अंत  करने  से  असुरता  के  साम्राज्य  का  अंत  नहीं  होगा   क्योंकि  वे  तो  रावण  के  टुकड़ों  पर  पलने  वाले , अपना   जीविकापार्जन  करने  वाले  थे  l  इन  सबके  मुखिया  रावण  का  अंत  करो  तभी  इस  धरती  से  अधर्म  और  अन्याय  के  साम्राज्य  का  अंत  होगा  l  इसी  उदेश्य  को  ध्यान  में  रखकर  यह  ईश्वरीय  विधान  रचा  गया  l  ईश्वर  चाहते  हैं  कि  धरती  पर  सभी  प्राणी  शांति  और  सुकून  से  रहें  लेकिन  जब  मनुष्यों  की  आसुरी  प्रवृत्ति  प्रबल  हो  जाती  है   तब  ईश्वर  कोई  विधान  अवश्य  रचते  हैं  l  

30 September 2025

WISDOM ------

   प्राचीन  काल  के  हमारे  ऋषि  त्रिकालदर्शी  थे  l  उन्होंने  जो   रचनाएँ  की  उन  का    प्रत्येक  युग  के  अनुरूप   भिन्न -भिन्न  अर्थ  था  l  जैसे  हमारे  महाकाव्य  हैं  --रामायण  और  महाभारत  l  इनके  विभिन्न  प्रसंगों  में   कलियुग  की  भयावह  परिस्थितियों  में  स्वयं  के  व्यक्तित्व  को   सुरक्षित  और  विकसित   करने    के  लिए   उचित  मार्ग  क्या  है  ,  इसे  गूढ़  अर्थ  में  समझाया  गया  है  l    रामायण  का  एक  प्रसंग  है  ----- बाली  और  सुग्रीव  दो  भाई  थे  ,  दोनों  ही  बहुत  वीर  थे  लेकिन  बाली  को  यह  वरदान  प्राप्त  था  कि  कोई  भी  उसके  सामने  आकर  उससे  युद्ध  करेगा  तो  उसकी  आधी  शक्ति  बाली  को  मिल  जाएगी  l  इस  कारण  किसी  से  भी  युद्ध  हो  बाली  की  ही  विजय  होती  थी  l  किसी  कारण  से  बाली  और  सुग्रीव  दोनों  भाइयों  में  विवाद हो  गया  ,  युद्ध  की  नौबत  आ  गई  l  बाली  को   जीतना    असंभव  था  , अत:  सुग्रीव  पराजित  होकर  ऋष्यमूक  पर्वत  पर  छिपकर  रहने  लगा  l  बाली  की  यह  विशेष  योग्यता  त्रेतायुग  में  उसका  वरदान  थी  लेकिन  इस  कलियुग  में  जब  कायरता   और  मानसिक  विकृतियाँ  अपने  चरम  पर  हैं  ,  तब  ऐसी  विशेष  योग्यता  प्राप्त  लोग  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  कर  रहे  हैं  l  शक्ति  के  दुरूपयोग  के  कारण  यह  वरदान  नहीं  ,  समाज  के  लिए  अभिशाप  है  और  इस  युग  में  इन्हें  कहते  हैं '  एनर्जी  वैम्पायर  "  l  हमारे  जीवन  में  अनेकों  बार  हमारा  सामना  ऐसे  लोगों  से  होता  है   , जिनसे  बात  करके  भी  ऐसा  महसूस  होता  है   जैसे  बिलकुल  थक  गए  ,  शरीर  में  कोई  शक्ति  नहीं  रही  ,  निराशा  सी  आने  लगती  है  l  ऐसे  ही  लोग  एनर्जी  वैम्पायर  होते  हैं   जो  अपनी  बातों  से  या  किन्ही  अद्रश्य  शक्तियों  की  मदद  से   अपने  विरोधियों  को   या  जिससे  वे  ईर्ष्या  और  प्रतियोगिता  रखते  हैं   उसे  विभिन्न  तरीके  से  कष्ट  देते  हैं  , परेशान  करते  हैं  और  उसकी  एनर्जी  को  खींचकर  स्वयं  बड़ी  उम्र  तक  भी  भोग विलास  का  जीवन  जीते  हैं  l  इस  युग  में  तंत्र -मन्त्र   विज्ञान  के  साथ  मिलकर   इतना  शक्तिशाली   हो  गया  है    की  अद्रश्य  शक्तियों  की  मदद  से   एनर्जी  की  सप्लाई  और  व्यापार  भी  संभव  है  l  ऐसे  वैम्पायर  समाज  में  सभ्रांत  लोगों  की  तरह  शान  से  रहते  हैं  l  जिसकी  एनर्जी  को  वे  खींच  लेते  हैं   उसका  शरीर  बिना  किसी  बीमारी  के  सूख  जाता  है  ,  उम्र  से  पहले  बुढ़ापा  दीखने  लगता  है  ,  कोई  दवा  फायदा  नहीं  करती  l  ये  एनर्जी  वैम्पायर   अपने  धन  और  शक्ति  के  बल  पर   अमर  रहना  चाहते  हैं  l  ऐसे  लोगों  को  कोई  सुधार  नहीं  सकता  l  इस  कथा   की  यही  शिक्षा  है  कि   जब  इन्हें  पहचान  लें  तो  ऐसे  लोगों  से  सुग्रीव  की  तरह  दूर  रहे  ,  ईश्वर  की  शरण  में  रहें  l  शक्ति  का  दुरूपयोग  करने  वालों  का  न्याय  ईश्वर  ही  करते  हैं  l  

29 September 2025

WISDOM ------

   हमारे  पुराणों  की कथाएं   मात्र  मनोरंजन  नहीं  हैं  , उनमें  गूढ़  अर्थ  छिपा  रहता  है  l  उस  अर्थ  को  समझ  कर  ,  उसके  अनुसार  आचरण  कर  पारिवारिक , सामाजिक , राजनीतिक  सभी  क्षेत्रों  में  सुधार  संभव  है  ----  एक  कथा  है  ----- पांडवों  ने    अभिमन्यु  के  पुत्र  परीक्षित  को  राजगद्दी  सौंपकर  वनगमन  किया  l  महाराज  परीक्षित  के  काल  में  ही  धरती  पर  कलियुग  का  आगमन  हुआ  l  एक  बार  महाराज  परीक्षित  शिकार  खेलने  वन  में  गए  , राह  भटक  गए  ,  उन्हें  बहुत  प्यास  लगी  l   वहां  एक  आश्रम  था  l  राजा  बड़ी  तेजी  से  आश्रम  गए  और  ऋषि  ने  पानी  माँगा  l  ऋषि  समाधि  में  थे  , उन्होंने  सुना  नहीं  l  कलियुग  के  प्रभाव  के  कारण  राजा  की  भी  बुद्धि  भ्रष्ट  हो  गई   और  उन्होंने  ऋषि  के  गले  में  एक  मृत  सांप  डाल  दिया  ,  और  महल  वापस  लौट  आए  l  ऋषि  का  पुत्र  जब  आश्रम   में  आया  तो  उसने  अपने  पिता  के  गले  में  मृत  सांप  देखा  तो  उसे  बहुत  क्रोध  आया  l  कलियुग  सभी  की  बुद्धि  भ्रष्ट  कर  देता  है  ,  ऋषि  पुत्र  ने  बिना  सोचे -समझे   हाथ  में  जल  लेकर   यह  श्राप  दिया  कि  जिसने  भी  मेरे  पिता  के  गले  में  मृत  सर्प  डाला  है  , उसे  आज  से  सांतवें  दिन  तक्षक  नाग  डस   लेगा  l  श्राप  कभी  विफल  नहीं  होता  समाधि  से  जागने  पर  ऋषि  ने  ही  राजा  को  सलाह  दी  कि  वे  शुकदेव  मुनि   से  भागवत  कथा  सुने  , इससे  उन्हें  मोक्ष  प्राप्त  होगा  l  ऐसा  ही  हुआ  और  सांतवे  दिन   महाराज  परीक्षित  को  मोक्ष  मिलने  के  बाद  उनके  पुत्र  जनमेजय  सिंहासन  पर  बैठे  l  उन्हें  जब  यह  सब  मालूम  हुआ  कि  तक्षक  नाग  के  डसने  से  उनके  पिता  की  मृत्यु  हुई  है  , तो  उन्हें  बहुत  क्रोध  आया  और  उन्होंने   ऋषि -मुनियों  की  मदद  से  ' सर्पयज्ञ  '  का  आयोजन  किया  , जिससे  उस  यज्ञ  में  सब  सर्पों  की  आहुति  दी  जाए  ,  और  इस  तरह  से  संसार  से  यह  प्रजाति  ही  समाप्त  हो  जाए  l  यज्ञ  शुरू  हुआ   और  मन्त्रों  के  साथ   आहुती  में  दूर -दूर  से  सर्प  आकर  उस  हवन  कुंड  में  गिरने  लगे  l  चारों  ओर  हाहाकार  मच  गया  ,  जब  तक्षक  को  पता  चला   तब  वह  भाग  कर  स्वर्ग  के  राजा  इंद्र  की  शरण  में  गया ,  इंद्र  ने  उसको  शरण  दी   और  वह  उनके  सिंहासन  से  लिपट  गया  l  इधर  जब  तक्षक  के  नाम  से  आहुति  के  लिए  मन्त्र  उच्चारण  किया  गया  तब  वह  मन्त्र  इतना  शक्तिशाली  था  कि  इंद्र  के  साथ  ही   सिंहासन  समेत  तक्षक  नाग  यज्ञ  मंडप  की  ओर  जाने  लगा  l  सारे  देवता  वहां  एकत्रित  हो  गए  , जन्मेजय  को  बहुत  समझाया  कि  जो  हुआ  वह  विधि  का  विधान था  ,  यह  यज्ञ  बंद  करो  ,  देवराज  इंद्र  ने  उसे  शरण  दी  है  l  इस  तरह  इंद्र  की  शरण  लेने  से  तक्षक  नाग  की  रक्षा  हुई  l   ------यह  कथा  स्पष्ट  रूप  से  इस  बात  का  संकेत  करती  है   कि  परिवार  और  समाज  के  जहरीले  ,  अपराधी   इसी  तरह  किसी  शक्तिशाली   का   संरक्षण  पाकर   पलते  हैं  और   अपने  जहर  से  परिवार  को  समाज  को  दूषित  करते  हैं   और   अपने  को  संरक्षण  देने  वाले  का  जीवन  भी  संकट  में  डाल  देते  हैं   l  शक्तिशाली  और  पद -प्रतिष्ठा  वालों  के  लिए  भी  संकेत  है   कि  अपनी  गलत  इच्छाओं  के  लिए  ऐसे  जहरीले  लोगों  से  मित्रता  न  करें  ,  वे  तो  डूबेंगे  ही  साथ  में  उन्हें  भी  ले  डूबेंगे ,  अब  देवता  नहीं  आएंगे  बचाने  के  लिए   l  

26 September 2025

WISDOM ------

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- "  ज्ञान  चक्षुओं  के  आभाव  में   हम  परमात्मा  के  अपार  दान  को  देख  और  समझ  नहीं  पाते   और  सदा  यही  कहते   रहते  हैं  हमारे  पास   कुछ  नहीं  है  l  पर  यदि  जो  नहीं  मिला  है   उसकी  शिकायत  करना  छोड़कर   जो  मिला  है  ,  उसकी  महत्ता  को  समझें   तो  मालूम  होगा  कि  जो  मिला  है   वह  अद्भुत  है  l  "    ईश्वर  ने  जो  दिया  है   उसे  न  देख  पाने  के  कारण  ही  व्यक्ति  के  मन  में  दूसरों  के  प्रति  ईर्ष्या -द्वेष  का  भाव  पनपता  है   प्रत्येक  व्यक्ति  की  मानसिक  स्थिति  भिन्न -भिन्न  होती  है  l  कोई  ईर्ष्या -द्वेष  के  कारण   छल , कपट , षड्यंत्र , धोखा  जैसे  कायरतापूर्ण  अपराधिक  कार्यों  में  संलग्न  हो  जाता  है  l  कहीं  कोई  डिप्रेशन  में  चला  जाता  है , इतनी  निराशा  कि  आत्महत्या  को  तत्पर  हो  जाता  है  क  जीवन  जीने  की  कला  का  ज्ञान  न  होने  के  कारण  ही   ऐसी  स्थिति  निर्मित  होती  है  l  प्राचीन  काल  में  हमारे  गुरुकुल  थे  , वहां  कोई  राजकुमार  हो  या  गरीब  सबको  ज्ञान -अर्जन  के  साथ    जीवन  कैसे  जिया  जाता  है  यह  भी  सिखाया  जाता  था  l  वहां  से  अध्ययन  के  उपरांत  वे  विद्यार्थी   शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  इतने  मजबूत  , इतने  सक्षम  हो  जाते  थे  कि  बड़ी  से  बड़ी  विपरीत  परिस्थिति  उन्हें  विचलित  नहीं  कर  सकती  थी  l  लेकिन  अब  केवल  पुस्तकीय  ज्ञान  है  ,  इससे  विवेक  जागृत   नहीं  होता  l  इस  कलियुग  में  अजीबोगरीब  स्थिति  है  --- कहीं  स्वार्थी  तत्व    युवा  पीढ़ी  की   ऊर्जा  का  उपयोग  अपने  स्वार्थ  के  लिए  करते  हैं  ,  एक  तरीके  से  अपना  गुलाम  बना  लेते  हैं  l  ऐसी  भी  स्थिति  है  कि  शिक्षा  ही  कुछ  ऐसी  दो  कि  वे  यही  न  समझ  पायें  कि  जागरूकता  क्या  होती  है  ,  दिशाहीन  कर्म  करते   रहो  l  वर्तमान  स्थिति  में  न  केवल  युवा   बल्कि  प्रौढ़  और  वृद्ध  व्यक्तियों  को  भी   सही  दिशा  की  जरुरत  है   क्योंकि  ईश्वर  के  दरबार  में  पेशी  तो  अवश्य  होगी  कि  परमात्मा  ने  उन्हें   जो  विशेष  योग्यता  दी  थी    ,  उसका  उन्होंने  लोक कल्याण  के  लिए  क्या  उपयोग  किया  ?  और  इस  धरती  रूपी  बगिया  को  सुन्दर   बनाए  रखने  के  लिए  युवा  पीढ़ी  को  क्या  सिखा  कर  आए  ?  

25 September 2025

WISDOM -----

  संसार  में  अनेक  धर्म  हैं   और  सभी  धर्म  अपनी  जगह  श्रेष्ठ  हैं  ,  फिर  भी  धर्म  के  नाम  पर  झगड़े  हैं , प्रतियोगिता  है   अपने  धर्म  को  सर्वश्रेष्ठ  बताने  की  l  कलियुग  का  यही  लक्षण  है  कि  धर्म  के  नाम  पर  लड़ते -झगड़ते    धीरे -धीरे  धर्माधिकारी  स्वयं  को  दूसरे  से  श्रेष्ठ  कहलाने  के  लिए  लड़ेंगे   और  धर्म  ,  धर्म  न  रहकर  व्यापार  बन  जायेगा  l  व्यापार  लाभ  कमाने  के  लिए  किया  जाता  है   जिसमें  शोषण  हमेशा  कमजोर  पक्ष  का  होता  है   और  यह  श्रंखलाबद्ध  होता  है  l  यदि  कोई  नेता  किसी  ऐसे  धर्मगुरु  से  जुड़  जाए  जिसके  लाखों   अनुयायी  हैं  ,  तो  स्वाभाविक  है  कि  उसको  अपनी  गद्दी  पर  बने  रहने  के  लिए  उन  सबका  समर्थन  मिलेगा  l   और  उस  धर्म गुरु  को  भी  एक  छतरी  मिल  जाएगी  l  मन  तो  चंचल  होता  ही  है   जब  धन -वैभव   अति  का  है  और  छतरी  भी  मिल  गई   तो  मन  तो  कुलांचे  भरेगा  ही  ,  फिर  जो  कुछ  घटेगा   वह  समाज  देख  ही  रहा  है  l   यह  युग  मुखौटा  लगाकर  रहने  का  है  l  पाप  इतना  बढ़  गया  है  कि  मुखौटा  लगाकर  व्यक्ति  अपने  ही  परिवार  को   धोखा  देता  है  l  सामने  से  ऐसा  दिखाएंगे  कि  कितने  भगवान  के  भगत  हैं , समाजसेवी  हैं   लेकिन  उसके  पीछे  जो  कालिख  है  वो  उनकी  आत्मा  स्वयं  जानती  है  l  कई  लोगों  ने  तो  इतने  मुखौटे  लगा  लिए  हैं    कि  वे  अब  भूल  गए  कि  वे  वास्तव  में  हैं  कौन  ?   ऐसे  मुखौटों  में  सबसे  खतरनाक  साधु -संत  का  मुखौटा  है   क्योंकि  यह  गरीबों  और   इस  वेश  पर  विश्वास  करने  वालों  को  छलता  है  l  समाज  का  एक  बहुत  बड़ा  भाग  इनकी  चपेट  में  आ  जाता  है  l  इन  सब  समस्याओं  का  एक  ही  इलाज  है  कि  धर्म  सबका  व्यक्तिगत  हो  अपने  घर  में  अपने  भगवन  को  अपने  तरीके  से  पूजो   और  घर  के  बाहर  सामूहिक  रूप  से  ' मानव  धर्म  '  हो  ,  इंसानियत  ही  सबसे  बड़ा  धर्म  है  l  इन्सान  बनोगे  तभी  चेतना   परिष्कृत  होगी   अन्यथा  मनुष्य  तो  अब  पशु   और  पिशाच  बनने  की  दिशा  में  अग्रसर  है  l  

23 September 2025

WISDOM -----

   आज  संसार  की  सबसे  बड़ी  समस्या  ' तनाव ' की  है  l  यह  समस्या  अनेक   बीमारियों  और  मुसीबतों  को  जन्म  देती  है  l  सबसे  बड़ी  मुसीबत  है  नींद  न  आना  l  ईश्वर  ने  रात्रि  का  समय  निद्रा  के  लिए  बनाया  है  l  प्रात:काल  व्यक्ति  ताजगी  तभी  महसूस  करेगा  जब  उसे  रात  को  अच्छी  नींद  आए  l  गरीब  व्यक्ति  को  तो  पथरीली  जमीन  पर  भी  चैन  की  नींद  आती  है  लेकिन  दुनिया  के  ऐसे  देश  जहाँ   भौतिक  सुख -सुविधाओं  की  कोई  कमी  नहीं  है  , वहां  करोड़ों  लोग  ऐसे  हैं  जिन्हें  नींद  की  गोली  खाने  पर  भी  नींद  नहीं  आती  l  कारण  यही  है  कि   व्यक्ति  भौतिक  सुखों  के  पीछे  इतना  भाग  रहा  है  कि  वह  अध्यात्म  से  दूर  हो  गया  l  जीवन  का  संतुलन  बिगड़  गया  l  अध्यात्म  जीवन  जीने  की  कला  है  l  अध्यात्म  हमें  यही  सिखाता  है  कि  अपने  जीवन  की  बागडोर  ईश्वर  के  हाथ  में  सौंप  दो  और  निश्चिन्त  होकर  कर्म  करो  l  अपना  प्रत्येक  कर्म  ईश्वर  को  समर्पित  करो  , यहाँ  तक  कि  निद्रा  को  भी  l    श्रीदुर्गासप्तशती  में   निद्रा  को  भी  देवी  कहा  गया  है  --'              या  देवी   सर्वभूतेषु  निद्रारूपेण  संस्थिता  l  नमस्तस्यै l  नमस्तस्यै  l नमस्तस्यै नमो नम:  l '  जो  देवी  सब  प्राणियों  में  निद्रा  रूप  से  स्थित  हैं ,  उनको  बारंबार  नमस्कार  l  श्रद्धा  और  विश्वास  से  निद्रा  देवी  को  पुकारो  , वे  कभी  किसी  को  निराश  नहीं  करेंगी  l  

19 September 2025

WISDOM ------

 युग  बदलते  हैं  l  परिवर्तन  प्रकृति  का  नियम  है   l  अजीबोगरीब  घटनाएँ  देखने  को  मिलती  हैं  l   कहीं  लोगों  ने  स्वयं  को   ईश्वर  समझ  लिया  और  उस  अज्ञात  शक्ति  से  मुँह  मोड़कर   युद्ध  में  उलझ  गए  , ' मरो  और  मारो  '  पर  उतारू  हैं  l  कहीं  स्थिति  इसके  विपरीत  है   l  ईश्वर  लोगों  के  कर्मकांड  और  ढकोसलों  से  परेशान  हो  गए  ,  ईश्वर  माला , फूल , घंटी  से ---- परेशान   हो  गए  l  लोग  अपनी  बुराइयों  को  दूर  नहीं  कर  रहे , सन्मार्ग  को  भूल  गए  हैं  , तो  अब  भगवान  ने  ही  अपने  दरवाजे  बंद  कर  लिए  l  प्रकृति  माँ  परेशान  हो  गईं  l  सहन  शक्ति  की  अति  हो  गई  तो  अब  क्रोध  आना  स्वाभाविक  है  l  ' जब  नाश  मनुज  पर  छाता  है  ,  पहले  विवेक  मर  जाता  है  l '    समूचे  संसार  पर  दुर्बुद्धि  हावी  है  ,  बड़े -बड़े  लोग  जिनके  पास  दुनिया  के  सारे  सुख  हैं   लेकिन  मन  की  शांति  नहीं  है  ,  स्वयं  भी  लड़  रहे , निर्दोष  लोगों  को  अपने  अहंकार  की  खातिर  मरने  को  विवश  कर  रहे  l  दुर्बुद्धि  ने  धर्म  के  ठेकेदारों  को  भी  नहीं  छोड़ा  l  आसुरी  शक्तियां  यही  तो  चाहती  हैं   l   वर्षों  पहले  इंग्लॅण्ड  का  साम्राज्य  पूरी  दुनिया  में  था  , संसार  के  विभिन्न  देशों  में   स्वतंत्रता  के  लिए  आन्दोलन  हुए  और  साम्राज्यवाद  का  अंत  हुआ  l  यदि  किसी  एक  का  ही  सब  ओर  साम्राज्य  हो  तो   सारा  दोष  भी  उसी  के  माथे  पर  आता  है  ,  बुरा -भला  सब  सुनना  पड़ता  है  l  इसलिए  अब  आसुरी  शक्तियों  ने  नया  तरीका  खोजा  l  सारे  असुर  अब  एक  हो  गए  , संगठित  होकर   छुपकर   अपने  आसुरी  कार्य  करने  लगे  l  सब  एक  नाव  पर  सवार  हो  गए  , असली  'डॉन '  कौन  है  ?  यह  मालूम  करना  बहुत  कठिन  है  l  यह  स्थिति   परिवार  में , संस्थायों  में  , संसार  में  छोटे -बड़े  सब  स्तर  पर  है  l  जो  भी  असुरों  के  मापदंडों  से  अलग  है  ,  उस  पर   आसुरी  प्रवृति  के  लोग  गुट  बनाकर  आक्रमण  करते  हैं  , अपने  अपने  तरीकों  से  उसे  सताते  हैं  l  उन्हें  सबसे  ज्यादा  भय  अपनी  नाव  में   ' छेद '  होने  का  है  l    आसुरी  प्रवृति  ने  समूचे  संसार  को  अपनी  चपेट  में  ले  लिया  है   इसलिए  अब   भगवान   को  आना  पड़ा  है  l  गीता  का   वचन  निभाने  तो  आना  ही  पड़ेगा  l   कहीं  शिवजी  का  तृतीय  नेत्र  खुला  है ,  कहीं  परमात्मा  का  सुदर्शन  चक्र  तो  कहीं  हनुमानजी  की  गदा   प्रभावी  है  l  ईश्वर  भी  क्या  करें  ?  मनुष्य  सुधरता  ही  नहीं  है  ,  तब  यही  एक  मार्ग   है  इस  दुर्बुद्धि  को  ठिकाने  लगाने  का  l  

16 September 2025

WISDOM -----

कलियुग   में  दुर्बुद्धि  ने  धर्म  को  भी   नहीं  छोड़ा  l  धर्म  के  नाम  पर  पाखंड  है  , सभी  को  अपनी  दुकान  की  चिंता  है  l  संसार  में  इतनी  अशांति  का  कारण  यही  है  कि  अब  धर्म  और  धार्मिक  कार्य  एक  व्यवसाय  बन  गया  है  l  इस  क्षेत्र  में  सच्चे  लोगों  की  संख्या   बहुत  ही  कम  है   और  असुरता  का  साम्राज्य  बहुत  विशाल  है  l   यदि  केवल  धर्म  ही  दुनियाभर  के  दिखावे  और  आडम्बर  से  मुक्त  हो  जाये   तो  संसार  का  कल्याण  हो  सकता  है  l  हमारे  पुराणों  में  सत्संग  की  महिमा  बताने  वाली  एक  कथा  है  ---- एक  बार  देवर्षि  नारद  भगवान  विष्णु  के  पास  गए  और   बोले ---- " हे  प्रभु  !कृपा  करके  मुझे  सत्संग  की  महिमा   सुनाएँ   क्योंकि  भ्रमण  के  दौरान  लोग  मुझसे  सत्संग  की  महिमा  के  विषय  में  जानना  चाहते  हैं  l  इस  महिमा  का  वर्णन  आपसे  श्रेष्ठ  कौन  कर  सकता  है  ?  "  लोक कल्याण  की  द्रष्टि  से  नारद जी  की  इस  जिज्ञासा  को  सुनकर  भगवान  विष्णु  प्रसन्न  हुए  और  बोले ---"  सत्संग  की  महिमा   इतनी  ज्यादा  है  कि   इसकी  अनुभूति  की  जा  सकती  है   इसलिए  हे  नारद  !  तुम  यहाँ  से  कुछ  दूर  जाओ  l  वहां  एक  इमली  के  वृक्ष  पर   विविध  रंगों  वाला  गिरगिट  रहता  है  l  वह  तुम्हे  सत्संग  की  महिमा  सुना  सकता  है  l  '  नारद  जी  प्रसन्न  होकर  चल  पड़े  l  उस  वृक्ष  के  पास  पहुंचकर  उन्होंने  उस  गिरगिट  को  देखा   और  अपनी  योगविद्या  से  उस  गिरगिट  से  पूछा  --- "  क्या  तुम  मुझे  सत्संग  की  महिमा  बता  सकते  हो  ? "  नारद जी  का  यह  प्रश्न  सुनते  ही  गिरगिट  वृक्ष  से  नीचे  गिरकर  मर  गया  l  नारद जी  को  बड़ा  आश्चर्य  हुआ  कि  उनका  प्रश्न  सुनते  ही  गिरगिट  ने  अपने  प्राण  क्यों  त्याग  दिए  l  वे  भारी  मन  से  पुन:  भगवान  विष्णु  के  पास  पहुंचे   और  सारी  घटना  सुनाई  l  भगवान  ने  कहा ---- "  कोई  बात  नहीं   l  अब  तुम  नगर  सेठ  के  घर  जाओ  l  वहां  पिंजरे  में  एक  तोता  है  , वह  सत्संग  की  महिमा  जानता  है  l  "   नारद जी  उस  सेठ  के  घर  पहुंचे  और  योगबल  से  उस  तोते  से  पूछा  ---- " सत्संग  की  क्या  महिमा  है  ? "  यह  सुनते  ही  तोते  ने  भी  अपने  प्राण  त्याग  दिए  l  अब  तो  नारद जी  बड़े  परेशान  हुए   और  भगवान  से  कहा  --- " हे  प्रभु  !  क्या  सत्संग  का  नाम  सुनते  ही  प्राण  त्याग  देना  ही  सत्संग  की  महिमा  है  ? "l  भगवान  बोले  ---- "  इसका  मर्म  तुम्हे  शीघ्र  ही  समझ  में  आएगा  l  तुम  इस  बार  राजा  के  दरबार  में  जाओ   और  उसके  नवजात  पुत्र  से सत्संग  की  महिमा  पूछो  l  नारद  जी  सोचने  लगे    कि  यदि  सत्संग  का  नाम  सुनते  ही   राजा  का  नवजात  पुत्र  मर  गया  तो  मैं  कहीं  का  नहीं  रहूँगा  l  राजा  के  कोप  का  सामना  करना  पड़ेगा  ,  पर  भगवान  का  आदेश  था  , सो  नारद जी   राज महल  पहुंचे   , वहां  पुत्र  जन्म  का  उत्सव  मनाया  जा  रहा  था  l  नारद जी  ने  योगबल  से  उस  पुत्र  से  पूछा  --- "  क्या  आप  मुझे  सत्संग  की  महिमा  सुना  सकते  हैं  ? "   नवजात  शिशु  बोला  ---- "  चन्दन  को  अपनी  सुगंध  और  अमृत  को  अपने  माधुर्य  का  पता  नहीं  होता  l  ऐसे  ही  आप  अपनी  महिमा  नहीं  जानते  l  वास्तव  में  आपके  क्षण मात्र  के  संग  से  मैं   गिरगिट  की  योनि  से  मुक्त  हो  गया   और  पुन:  आपके  दर्शन  से  मैं  तोते  की  योनि  से  मुक्त  होकर   मनुष्य  का  जन्म  मिला  l  ईश्वर  की  कृपा  से  मुझे  आपका  सान्निध्य  मिला  ,  इससे  मेरे  कितने  ही  कर्मबंधन  कट  गए  ,  कितनी  ही  योनियाँ  बिना  भोगे  ही  कट  गईं   और  मैं  मनुष्य  तन  पाकर  राजकुमार  बना  l  हे  देवर्षि  !  आप  मुझे  आशीर्वाद  दें  कि  मैं  मनुष्य  जन्म  में  उत्तम  कर्म  करके  मोक्ष  पा  सकूँ  l "    नारद जी  उसे  आशीर्वाद  देकर  भगवान  के  पास  पहुंचे  औए  उन्हें   सब  घटना  सुनाई  l  भगवान  ने  कहा -- "  जैसी  संगति  होती  है  , जीव को  वैसी  ही  गति  मिलती  है  l "   गोस्वामी  तुलसीदास जी  ने  भी  कहा  है ---- " सत्संग  से  मनुष्य  को  उचित -अनुचित  का  ज्ञान बोध  हो  जाता  है  , विवेक  जाग  जाता  है  , मनुष्य  की  प्रकृति -प्रवृत्ति  बदल  जाती  है  l "  

15 September 2025

WISDOM ------

   इस  संसार  में  आदिकाल से  ही  देवताओं  और  असुरों  में  संघर्ष  रहा  है  l  असुरों  का  एक  ही  लक्ष्य  होता  है  कि   वह  हर  संभव  प्रयास  करो  जिससे  लोगों  को  अधिकाधिक  शारीरिक  , मानसिक  कष्ट  हो  ,  वे   थक -हार  कर  असुरता  के  राज्य  में  सम्मिलित  हो  जाएँ  ,  उनकी  कठपुतली  बनकर  ऐसे  ही  आतंक  मचाएं  l  इसमें  एक  बात  महत्वपूर्ण  है  कि  आसुरी  शक्तियां  चाहे  वे  प्रत्यक्ष  हों   या  विशेष  तरीकों  से  अप्रत्यक्ष  शक्तियों  को  वश  में  किया  गया   हो  ,  यह  दोनों  ही  प्रकार  की  आसुरी  शक्तियों  के  कार्य  करने  का  एक  विशेष  पैटर्न  होता  है   जैसे  हम  देखते  हैं  किन्ही  परिवारों  में  आकाल  मृत्यु  होती  हैं , कई  परिवारों  में  दुर्घटना  से   कई  सदस्यों  की  मृत्यु  होती  है  ,  किसी  परिवार  में  पिछली  पीढ़ियों  से  लेकर  कई   सदस्यों  का   घातक  बीमारियों  से    अंत  होता  है  , कहीं  पीढ़ी -दर -पीढ़ी  परिवार  के  सदस्य  ही  परस्पर  धोखा , जालसाजी  , षड्यंत्र  करते  हैं  l  यही  स्थिति  संसार  में  होती  है  l  जितना  शक्तिशाली  असुर  , उतने  हो  व्यापक  क्षेत्र  में  उसका  आतंक  होता  है   जैसे  हिरण्यकश्यप , भस्मासुर   l  उनके  पास  एक  ही  तरीका  था  --हिरण्यकश्यप  कहता  था , उसे  भगवान  की  तरह  पूजो , इसी  बात  पर  वह  सबको , यहाँ  तक  कि  अपने  पुत्र  को  भी  सताता  था   l भस्मासुर  के  लिए  लोगों  को  सताना   , उसके  मनोरंजन  का  साधन  था  , सबके  सिर  पर  हाथ  रखकर  वह  उन्हें  भस्म  कर  देता  था  l  वर्तमान  में  भी  मानवता  को  उत्पीड़ित  करने  वाली  जो  भी  घटनाएँ  हो  रही  हैं   , उनका  भी  एक  ही  पैटर्न  है  l  असुरता  बहुत  शक्तिशाली  है , उसे  पराजित  करना  आसान  काम  नहीं  है  l  जब  मनुष्य  जागरूक  होगा  , अध्यात्म  से  जुड़ेगा  ,  जीवन  के  प्रति  सकारात्मक  सोच  होगी   तभी  वह  अपने  अस्तित्व  को  बचा  सकेगा  l  असुरता  तो  पूरे  संसार  पर   ,  कृषि , चिकित्सा , उद्योग , निर्माण , शिक्षा , कला -साहित्य  -------- आदि  जीवन  के  प्रत्येक  क्षेत्र  पर , यहाँ  तक  कि  मनुष्य  के  मन  पर  भी  अपना  नियंत्रण   करने  को  उतारू  है  l  

13 September 2025

WISDOM -------

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- 'अहंकार  सारी  अच्छाइयों  के  द्वार  बंद  कर  देता  है  l "  अहंकार  एक  ऐसा  दुर्गुण  है  जिसके  पीछे  अन्य  बुराइयाँ  अपने  आप  खिंची  चली  आती  हैं  l   यहाँ  कोई  भी  अमर  होकर  नहीं  आया  ,  इसलिए  अहंकार  व्यर्थ  है  l  एक  कथा  है  ---- एक  फकीर  ने  किसी  बादशाह  से कहा  --- " खुद  को  बादशाह  कहते  हो  और  जीते  हो  दंभ  और  अहंकार  में  l  सच्चा  बादशाह  तो  वही  होता  है  ,  जो  जीवन  के  सब  रहस्यों  को  समझकर   इसके  आनंद  को  अनुभव  करे  l  "  बादशाह  को  फकीर  का  कहा  सच  अप्रिय  लगा  ,  सो  उसने   फकीर  को  कैद  कर  लिया  l  फकीर  के  एक  मित्र  ने  उससे  कहा  --- "  आखिर  यह  बैठे बैठाए   मुसीबत  क्यों  मोल  ले  ली  ?  न  कहते   वे  सब  बातें  ,  तो  तुम्हारा  क्या  बिगड़  जाता  l  "  मित्र  की  बात  सुनकर  फकीर  हँस  पड़ा   और  बोला  ---- "  मैं  करूँ  भी  तो  क्या करूँ  ?  जब  से  खुदा  का  दीदार  हुआ  है  ,  झूठ  तो  बोला  ही  नहीं  जाता  l "  मित्र  ने  कहा  --- "  यह  कैद  कितनी  कष्टप्रद  है   !  जाने  कब  तक  ऐसे  ही  रहना  पड़े  ? "   फकीर  ने  अपने  जीवन  को  परमात्मा  के  चरणों  में  समर्पित  कर  दिया  था  ,  उसने  बड़ी  निश्चिंतता  से  कहा  --- " इस  कैद  का  क्या  ?  यह  कैद  तो   बस   घड़ी  भर  की  है  l  "   फकीर  की  बात  एक  सिपाही  ने  सुन  ली   और  बादशाह  को  भी  बता  दिया  l  सिपाही  की  बात  सुनकर  बादशाह  ने  कहा  ---" उस  पागल  और  फक्कड़  फकीर  से  कहना   कि   यह  कैद  घड़ी  भर  की  नहीं  ,  बल्कि  जीवन  भर  की  है  l  उसे  जीवन  भर   इसी कालकोठरी  में  सड़ते  हुए  मरना  है  l  जीवन  भर   उसे   उसी  कैद  में   रहते  हुए   यह  याद  रखना  होगा  कि  मैं  भविष्य  को   अपनी  मुट्ठी  में  भर  सकता  हूँ  l "    फकीर  ने  जब  बादशाह  के  इस  कथन  को  सुना   तो  हँसने  लगा  l  फकीर  ने  कहा  --- "  ओ  भाई  !   उस  नादान  बादशाह  से  कहना  कि  उस  पागल  फकीर  ने  कहा  है  कि  क्या  जिन्दगी  उसकी  मुट्ठी  में   कैद  है  ?  क्या  उसकी  सामर्थ्य  समय  के  पहिए  को  थामने  की  ताकत  रखती  है  ?  क्या  उसे  पता  है  कि  पल  भर   के  बाद  क्या  घटने  वाला  है  ?    फकीर  की  बात  बादशाह  तक  पहुंचे  , तब  तक  अचानक  क्या  हो  गया   ?-------  नए  बादशाह  ने  फकीर  को  आजाद  कर  दिया   और  फकीर  के  उपदेशों  को  आत्मसात  किया  l