प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की यात्रा उसके परिवार से ही आरम्भ होती है l संस्कार तो उसके होते ही हैं और परिवार जीवन की प्रथम पाठशाला है इसलिए गुण -दुर्गुण के बीज परिवार में ही बोये जाते हैं जो उसकी उम्र के साथ बढ़कर विशाल वृक्ष बन जाते हैं l बाहरी परिस्थितियां और संगत उसमें अपना प्रभाव डालती हैं l ये परिवार ही हैं जो मनुष्य को देवता या असुर बना देते हैं l यह कलियुग का दुर्भाग्य है कि इस समय असुरता परिवार , समाज , संस्थाएं और सम्पूर्ण संसार में अपना आधिपत्य स्थापित करने में अपनी पूरी शक्ति लगा रही है l असुरों का अहंकार और महत्वाकांक्षा रावण से भी ज्यादा है इसलिए संसार में तनाव और युद्ध है l अब यदि निष्पक्ष रूप से इसकी जिम्मेदारी की बात कहें तो मानव जाति में बच्चे हैं , युवा हैं , प्रौढ़ और उम्र की ढलान पर पहुँचने वाले वृद्ध हैं l बच्चे मन के सच्चे हैं , वे अहंकर और महत्वाकांक्षा से दूर हैं , वे निश्छल और मासूम हैं , युद्ध , पारिवारिक कलह से उन्हें कोई मतलब नहीं है l जो युवा पीढ़ी है उनके सपने हैं , वे सुख से जीना चाहते हैं , उन्हें सही दिशा देने वाला कोई नहीं है इसलिए चालाक लोग उनकी ऊर्जा का अपने स्वार्थ के लिए उपयोग कर लेते हैं l अब शेष बचे प्रौढ़ और उम्र की ढलान वाले लोग , इनकी कामना , वासना , महत्वाकांक्षा , अहंकार कम नहीं हो रहा l इन लोगों को लगता है क्या -क्या , भोग लें , कोई सुख छूट न जाए , अहंकार की पताका नीची न हो जाये l इसके लिए ये लोग धन , वैभव यानि भौतिक शक्तियों के साथ हर तरह की नकारात्मक शक्तियों का भी भरपूर उपयोग करते हैं l संसार में , परिवार में , हर क्षेत्र में अशांति , तनाव , शारीरिक , मानसिक उत्पीड़न के लिए यही लोग उत्तरदायी हैं l इन्हें कौन समझा सकता है , न्याय करने अब ईश्वर को ही आना पड़ेगा l संसार में यदि कहीं कुछ अच्छा है , तो उसके लिए भी इसी उम्र के त्यागी , महात्मा हैं लेकिन उनकी संख्या सागर में एक बूंद के समान है l आचार्य श्री कहते हैं -- अंधकार को मिटाने के लिए एक किरण ही पर्याप्त है l इसलिए हमें निराश नहीं होना है , हर रात के बाद सुबह होती है , वो सुबह अवश्य होगी l