लघु कथा ---- बिना नाव की सहायता के योगी ने जल पर चलकर नदी को पर किया l उसे अपनी सिद्धि पर बहुत गर्व हुआ और संतोष भी l अहंकार से तने हुए उस योगी को एक बूढ़े मछियारे ने देखा l उसने समीप जाकर प्रणाम करते हुए उनसे पूछा ---- " भगवन ! जल पर चलने की यह सिद्धि आपने कितने समय में प्राप्त की ? " योगी ने गर्व से अपना मस्तक ऊँचा उठाते हुए कहा ---- " पूरे बीस वर्ष कठोर तपस्या कर के मैंने यह सिद्धि प्राप्त की है l " बूढ़े ने खिन्न होकर कहा ---- " आपका इतना लम्बा समय व्यर्थ ही चला गया l जो काम नाव वाले को दो पैसा देकर पूरा हो सकता था , उसके लिए इतना कष्ट उठाने की क्या जरुरत थी ? आचार्य श्री कहते हैं --- ' मनुष्य को तपस्या , साधना विचारों के परिष्कार और सद्बुद्धि के लिए करनी चाहिए l क्योंकि सद्बुद्धि ही प्रत्येक कार्य में प्रकाशित है l