30 June 2026

WISDOM ------

 आज  संसार  में  इतनी  अशांति  , इतनी  उथल -पुथल  क्यों  हैं  ?  इसका  एक  ही  कारण  समझ  में  आता  है  कि  अब  लोग  नास्तिक  हो  गए  हैं  l  l  अब  मनुष्य  ईश्वर  से  दूर  हो  गया  है  ,  जिसके  पास  थोड़ी  भी  शक्ति  है  , वह  स्वयं  को  ही  ईश्वर  समझने  लगा  है  l  यदि  व्यक्ति  को  ईश्वर  की  सत्ता  में  विश्वास  हो  तो  वह  ईश्वर  से  डरे  , प्रत्येक  कदम  फूंक -फूंक  कर  रखे  , कहीं  कोई  गलती  न  हो  जाए   ईश्वर    हमें  सहस्त्र  आँखों  से  देख  रहे  हैं , वे  हमारे  प्रत्येक  कर्म  को   ,  उसके  पीछे  छुपे  भाव  को  ,  हमारे  मन  की  गहराई  में  जो  सच  छुपा  है  उसे  भी  देख  रहे  हैं  l  लेकिन  जब  स्वयं  को  ही  भगवान  समझना  है   तो  फिर  डर  किस  बात  का  l  जब  पाप  का  घड़ा  फूटता  है ,  जीवन  में  कोई  भयंकर  परेशानी  आती  है  तब  भी  व्यक्ति  सुधरता  नहीं  है  l    वह   धन  खर्च  कर  के  उस  फूटे  घड़े  को  जोड़ने  का  प्रयास  करता  है   और   अपने  विभिन्न  तरीकों  से  इस  बात  की  जी -तोड़  कोशिश  करता  है  कि   घड़े  के  फूटने  से  जो  पाप  बिखर  कर   दुनिया  के  सामने  आ  गए  ,  उन्हें  किसी  तरह  दूसरे  पर  उड़ेल  दे   और  फिर  से  भोग -विलास  में  मगन  हो  जाये  l  इसी  का  नाम  संसार  है  l   दुर्योधन  के  सामने  तो  स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  थे  , उसने  उन्हें  माना  नहीं  , उन्हें  ग्वाला  और मायावी  कहता  था  ,  वह  तो  उन्हें  ही  जंजीरों  से  बाँधने  चला  l  शिशुपाल  ने  तो  भरी  सभा  में   श्रीकृष्ण  को  सौ   गालियाँ  दीं  l  जब  भगवान  का  सुदर्शन  चक्र  उसका  गला  काटने  आ  गया  , तब  भागा , बचाओ -बचाओ  l  तब  कोई  नहीं  बचाता  l    चाहें  कितनी  ही  बड़ी  रियासत  के  मालिक  हो  ,   अपार  धन -संपदा  हो  ,  अपने  कष्ट  तो  स्वयं   ही    भोगने  पड़ते  हैं  ,  उसमें  कोई  भी  साझेदार  नहीं  होता  l  जब  मनुष्य  अनैतिक   और  मर्यादाहीन  आचरण  करता  है  ,  ईश्वर  की  सत्ता  को  चुनौती  देता  है   तब  प्रकृति स्वयं  न्याय  करती  है   ताकि  संसार  में  संतुलन  बना  रहे  l   संसार   तो    इसी  तरह  चलता  रहता  है  ,  मनुष्य    व्यक्तिगत  स्तर  पर  ईश्वर  की  सत्ता  की  स्वीकार  कर   अपने  जीवन  को  सार्थक  करना  चाहे    तो  उसके  लिए  ईश्वर  हैं   और  वो  हर  पल  उसके  साथ  हैं  l  

28 June 2026

WISDOM -----

   भगवान  श्रीराम  के नाम  की  इतनी  महिमा  है  कि  उसे  कुछ शब्दों  में  नहीं  समझाया  जा  सकता  है  l  ऋषियों  ने  बड़े  विस्तार  से   'राम ' नाम  की  महिमा  का  गान  किया  है  l  कहते  हैं  यदि  श्रद्धा  से  एक  बार  ही  'राम 'नाम  ले  लिया  जाए  तो  भवसागर  पार  हो  जाता  है  l  छोटे  बच्चे  भी  जब  अन्ताक्षरी  खेलते  हैं  तो  उसकी  शुरुआत  राम  नाम  से  करते  हैं  l   एक  बच्चा  शुरू  करता  है  ---' राम नाम  की  लूट  है  , लूट  सके  तो  लूट  , अंत  काल  पछताएगा  , प्राण  जाएंगे  छूट  l  ' उठते , बैठते , चलते  -फिरते   हम   राम -राम  करते  ही  हैं  l  कहते  हैं इस  संसार  में  कुछ  भी  अकारण  नहीं  होता  , एक  पत्ता  भी हिलता  है  तो  वह  ईश्वर  की    मरजी  से  l  यदि  हमारी  सोच  सकारात्मक  हो  तो  नकारात्मक  घटनाओं  के  पीछे  छुपी   सकारात्मकता   को  आसानी  से  समझा  जा  सकता  है  l कलियुग  में  राम  का  नाम  लेना  बहुत  जरुरी  है  , फिर  चाहे  वह  किसी  भी  ढंग  से , किसी  भी  उदेश्य  से  लिया  जाये  l  जब  एक  व्यक्ति  राम नाम  लेकर  अपना  कल्याण  कर  सकता  है   तो  वर्तमान  में   उदय  हुई  परिस्थितियों  में  लाखों - करोड़ों    लोग   ' राम '  नाम  ले  रहे  हैं  ---राम  के  गहने , राम  के  खडाऊं , राम  के  ---, राम  के  ---- -- लाखों , करोड़ों  लोग  किसी  न  किसी  बहाने  ' राम  ' का  नाम  ले  रहे  हैं  , इससे  सामूहिक  कल्याण  होगा  , प्रकृति  का  पोषण  होगा  l  l   सामूहिक  नाम  जप  की  महिमा  को  ज्ञानी  संत   विस्तार  से  समझा  सकते  है  ' कलियुग  केवल  नाम  अधारा  '  l  कोई  भी  घटना  भौतिक  जगत  में    जैसी  दिखाई  पड़ती  है  , आध्यात्मिक  जगत  में   उसके  पीछे  कोई  बड़ा   उद्देश्य   होता  है  l  

26 June 2026

WISDOM ------

   ' पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं ---- ' भक्ति  से  जीवन  रूपांतरित  होता  है  l    ईश्वर  को  फूल माला , मिष्ठान , धूप -दीप  , बहुमूल्य  धातुएं  ये  सब  चढ़ाना  भक्ति  नहीं  है  l  ईश्वर  तो  सर्व समर्थ  हैं  , वे  इन  सब  आडम्बर  से  प्रसन्न  नहीं  होते  l  उन्हें  तो  चाहिए  कि  मनुष्य  अपने  विकारों  को  दूर  करे  , सद्गुणों  को  जीवन  में  अपनाएं  और  सन्मार्ग  पर  चले  l  ' आचार्य  जी  ने  अपने  साहित्य  में  इसे   साधना , उपासना  और  आराधना   से  विस्तार  से  समझाया  है  l  '   हमें  भक्ति  सीखनी  है   तो   भक्त  प्रह्लाद  जैसे  भक्त  बने   जिन्होंने  निरंतर  ईश्वर  का  नाम  स्मरण  करते  हुए  ईमानदारी  और  कुशलता  से  शासन  किया  l  श्री  हनुमान जी  जैसे  भक्त  बनो   l                 इस  कलियुग  में    जहाँ  देवता  और  आसुरी  प्रवृति  के  लोग  एक  साथ  समाज  में  घुलमिलकर  रहते  हैं  , वहां  हमें  विभीषण  से  भक्ति  सीखनी  चाहिए  l  असुर  परिवार  में  ही  पैदा  होते  हैं  , परिवार  से  ही  समाज  बनता  है  l  विभीषण  ने  जब  समझा  कि   रावण  का  आचरण   मर्यादाहीन  है  , अनैतिक  है  तब  उसने  रावण  को  बहुत  समझाया   लेकिन  रावण  अहंकारी  था  , वह  विभीषण  पर  ही  दोष  लगाने  लगा  कि  उसकी  नियत  ख़राब  है  l  तब  विभीषण  ने  उससे  बहस  करना  उचित  नहीं  समझा   और  उसने  रावण  को  त्याग  दिया   और  भगवान  श्रीराम  की  शरण  में  चला  गया  l  संसार  विभीषण  को  चाहे  जो  कहे  लेकिन  विभीषण  ने  इस  सत्य  को  समझाया  कि   एक  साथ  दो  नाव  की  सवारी  संभव  नहीं  है  कि  आप    भगवान  के  भक्त  होने  का  भी  नाटक  करें  और  पापी , अत्याचारी   मर्यादाहीन  आचरण  करने  वाले  का  भी  साथ  दें  l  कोई  एक  मार्ग  चुनना  होगा   l  यदि  ईश्वर  की  शरण  में  जाते  हैं   तो  लाभ  ही  लाभ  है  लेकिन  यदि  किसी  पापी , आततायी  का  सहारा  लेते  हैं  तो   जीते  जी  स्वयं  का  और  परिवार  का  शोषण  है   और  सर्वनाश  तो  निश्चित  है   l  विभीषण  का  चरित्र  हमें  यह  भी  सिखाता  है  कि   मोह  के  धागे  को   तोड़ना  जरुरी  है   l  यदि  आप  रिश्ते -नातों  के  मोह  में  फंसे  रहेंगे  , अपने  ही  परिवार  के  पापियों   का  समर्थन  करेंगे , उनकी  गलतियों  पर  परदा  डालेंगे  तो  असुरता  का  अंत  कभी  नहीं  होगा  l  ऐसे  लोगों  को  त्याग  दो  और  ईश्वर  की  शरण  में  रहो   भगवान  कभी  किसी  को  निराश  नहीं  करते   l  

25 June 2026

WISDOM -------

 हमारे पुराणों  की  कथाएं  केवल  मनोरंजन  के  लिए  नहीं  हैं  , उनके  भीतर  प्रत्येक  युग  के  अनुरूप  ज्ञान  है  , महत्वपूर्ण  संकेत  हैं  l  एक  कथा  है  ---महाराज  ययाति  की  ----ययाति  की  मृत्यु  का  समय  आया  तो  यमराज  उन्हें  लेने  गए  l  अब  तो  ययाति  बहुत  रोए , गिडगिडाए  कि  अभी  तो  मेरी  कामनाएं , वासनाएं  ही  पूरी नहीं  हुईं  , मुझे कुछ  समय  और  दो  l  यमराज  को  दया  आ  गई  , उन्होंने  कहा  ---यदि  तुम्हारा  कोई   पुत्र   तुम्हे  अपना  यौवन  दे  दे   तो  तुम्हे  उतने  वर्ष  का  जीवन  मिल  जायेगा l  महाराज  ययाति  अपने  सभी  पुत्रों  के  पास  गए  , उनसे  याचना  की  l  सभी  ने  उन्हें  अपना  यौवन  देने  से  इनकार  कर  दिया   लेकिन   ' छोटे पुत्र '  को  दया  आ   गई  , उसने  अपना  यौवन  उन्हें  दे  दिया  l  ययाति  को  पुत्र  की  परवाह  नहीं  थी  वे  तो  भोग -विलास  में  मगन  हो  गए  l  कहते  हैं   ऐसा  दस  बार  हुआ  , ययाति  ने  हजारों  वर्षों  तक  सुख   भोगा  लेकिन  इच्छाएं  शांत  नहीं  हुईं  l  मृत्यु  तो  आखिर  होनी  ही  थी  , उन्हें  गिरगिट  की  योनि  मिली  l  इस  कथा  का  संकेत  यही  है  की  यह  'छोटा  पुत्र '   जागरूक  नहीं  था  , पिता  के  प्रति  कर्तव्यपालन  तो  उचित  है   लेकिन  उसकी  अंध  भक्ति  से  पिता  का  ही  पतन  हो  गया  , वे  गिरगिट  की  योनि  में  न  जाने  कितने  वर्षों  तक  रहे  l    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  लिखते  हैं  ----  ' वासना  कभी  समाप्त  नहीं  होती  , देह  पर  देह  बदलती  है  लेकिन  वासना  समाप्त  नहीं  होती  l  आचार्य  जी कहते  हैं  ---- वासना  का  रूपांतरण  संभव  है  और  भक्ति  वासना  का  दिव्य  रूपांतरण  है  l '   इस  ज्ञान  की  कलियुग  में  सबसे  ज्यादा  जरुरत  है  , संसार  में  हजारों , लाखों  की  संख्या  में  यायाति  भर  गए  हैं  जिनकी  इच्छाएं  किसी  तरह   पूरी  ही  नहीं  हो  रही  हैं  l  कलियुग  की  मार  ऐसी  है  कि  लोग  विवेकशून्य  हैं  , उनमें  जागरूकता  नहीं  है  , वे  स्वयं  ही  यायातियों  का  पोषण  करते  हैं  l  सतयुग  इतनी  आसानी  से  नहीं  आता  ,  या  तो  ययातियों  में  विवेक   जागे  या  पुत्रों  में  विवेक  जागे   तभी  संसार  में  सुख -शांति  होगी  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने   ' गायत्री मन्त्र '  को  संसार  के  लिए    ही  सरल  ढंग  से  समझा  दिया  l  केवल  यही  एक  रास्ता  है   l  गायत्री  मन्त्र   सद्बुद्धि  का  ही  मन्त्र  है  , इससे  विवेक  जाग्रत  होगा   तभी  संसार  में    सुख-शांति  होगी  l  

23 June 2026

WISDOM ------

 आज  संसार  में     लोगों  के  जीवन  में  अनेक  समस्याएं  हैं   इसके  लिए  सम्पूर्ण  मानव  समुदाय  ही  उत्तरदायी  है  l  इसका  मूल  कारण  यही  है  कि  सभी  धर्मों  में  आडम्बर  और  दिखावा  तो  बहुत  है   लेकिन  नैतिकता  और  मानवीय  मूल्यों   की  अनिवार्यता   की  सभी  ने  उपेक्षा  कर  दी  है  l  धन  के  लालच  ने  मानवीय  गरिमा  को  ही  समाप्त  कर  दिया  है  l  जीवन  के  सभी  क्षेत्र  अब   व्यापार    बन  गए  हैं  l  वैज्ञानिक  तो  बड़े -बड़े  अविष्कार  कर  देते  हैं  ,  उन्हें  समाज  में  लाना  , लोगों  के  हाथों  में  पहुँचाना  , यह  व्यापारी  और   धनाढ्य  लोगों  की  जिम्मेदारी  है  l  लेकिन  यदि  उन्हें  मानवीय  मूल्यों  का  ज्ञान  नहीं  है  तो  वे  इसे  अधिकाधिक  धन  कमाने  के  लिए इस्तेमाल  करेंगे  जैसे  कृषि  में  रासायनिक  खाद ,  कीटनाशक  , उन्नत  बीज  आदि  का  प्रयोग  करने  से  फसल  तो  ज्यादा  हो  गई  लेकिन  ऐसे  जहरीले  रसायन  से  चील , गिद्ध  भी  नहीं  दीखते , मनुष्यों  को  खतरनाक  बीमारियाँ  हो  गईं  l  सब  छोटे  -बड़े  अस्पताल  बीमारों  से  भरे  हैं   लेकिन  दूसरी  ओर  एक  वर्ग  ऐसा  भी  है   जो  दिन -दूनी   रात   चौगुनी   गति  से  अमीर  हो  रहा  है  l  वैज्ञानिकों  को  तो  ईश्वर  ने  बुद्धि  दी  है  तो  वे  नए -नए  अविष्कार  करते  ही  हैं  लेकिन  उन्हें  संसार  में  क्रियाशील  करने  वालों  में  विवेक , करुणा , दया  , मानवीयता  नहीं  है   तो  वे   उन  आविष्कारों  की  मदद  से  कहीं  बेरोजगारी  फैला  देंगे , कभी  महामारी  फ़ैल  जाएगी  l  धरती  आकाश  सब  प्रदूषित  कर  दिया  , इस  धन  के  लालच  ने  l  धन  जीवन  के  लिए  बहुत  जरुरी  है  लेकिन  इसकी  भी  एक  सीमा  , एक  मर्यादा  होनी  चाहिए  l  यह  मर्यादा  अब  नहीं  रही   , कला  और  साहित्य  में  इस  लालच  ने  लोगों  की  मानसिकता  को  प्रदूषित  कर  दिया  l  ईमानदारी  , सच्चाई  सब  समाप्त  होने  से  मनुष्य  एक  वस्तु  बन  गया  है  , जीवन  सुरक्षित  नहीं  है  l  फिर  भी  लोग   आशावादी  हैं  कि  भगवान  आएंगे  और  सब  ठीक  हो जायेगा  l    अब  धर्म  और  अधर्म  के  बीच  युद्ध  नहीं  है   कि  ईश्वर  धर्म  की  रक्षा  के  लिए  आयेंगे  l  अब  तो  सभी  अधर्म  की  राह  पर  हैं  l  अब  जरुरत  है  लोगों  की  चेतना  को  जगाने  की  l  जिन  लोगों  में  सद्गुण  हैं , सन्मार्ग  पर  हैं  , ईश्वर  उन्ही  की  चेतना  में  प्रवेश  कर  के  उन्हें  अध्यात्म  पथ  पर  आगे  बढ़ाते  हैं   और  उनके  प्रकाश  से  अन्य  लोगों  के  जीवन  का  अँधेरा  भी  दूर  होने  लगता  है  l  l  आचार्य श्री  कहते  हैं  ---ईश्वर  तो  हर  पल  हमारी  मदद  को  तैयार  हैं  ,  हम  सन्मार्ग  पर  चलने  का  संकल्प  तो  ले , उस  दिशा  में  एक  कदम  तो  आगे  बढ़ाएं  l  लेकिन  हमें  एक  बात  अवश्य  ध्यान  रखनी  होगी  कि  अध्यात्म  की  राह  पर  झूठ , फरेब , धोखेबाजी  नहीं  चलती  l  

19 June 2026

WISDOM -----

हमारे  महाकाव्य  हमें  बहुत कुछ  सिखाते  हैं  l  प्रत्येक  व्यक्ति  के  अपने  संस्कार   हैं  कि  वह  क्या  सीखता  है    और  सीखकर    वैसा  ही  आचरण  करता  है  l   अनेक  लोग  महाभारत  के  मामा  शकुनि  और  दुर्योधन  की  तरह  छल , कपट , षडयंत्र  सीख  लेते  हैं  l  अनेक  दु:शासन  की  तरह  नारी  का  अपमान  और  उत्पीड़न  करना  सीख  जाते  हैं  l  जो  ज्यादा  बुद्धिमान  हैं  वे  शल्य  मामा  की  तरह    अपने  प्रतिद्वंदी  का  मनोबल  गिराने  का  हर  संभव  प्रयास  करते  हैं  ,  जिसने  उन  पर  विश्वास  किया  , उसी  के  साथ  धोखा  करते  हैं  l  बुराई  सीखना  बहुत  सरल  है  इसलिए  लोग  इन्ही  सब  तरीकों  से  आज  के  युग  में   धन  कमाने  और  सफलता  प्राप्त  करने  का  प्रयास  करते  हैं  l    इसी  कारण  संसार  में  इतनी  अशांति  और  तनाव  है    l  यदि  महाभारत  से  मनुष्य  कर्मफल  विधान  की  सत्यता  को  समझ  ले   तो  जीवन  की  सारी  उलझने  समाप्त  हो  जाएँ  और  संसार  में  भी  सुख -शांति  आ  जाए  l  l  दुर्योधन  आदि  कौरवों  ने  बिना  किसी  वजह  के  , केवल  ईर्ष्यावश  ही  पांडवों  पर  इतने  अत्याचार  किए  l   पांडवों  ने  उनका  कुछ  नहीं  बिगाड़ा  था  , फिर  भी    दुर्योधन  ने  उन्हें  मारने  के  लिए  और  उनका  अस्तित्व  मिटाने  के  लिए   छल , कपट  और  षडयंत्र  की  अति  कर  दी  l  इसका  परिणाम   सबके  सामने  है    , कौरव  वंश  का  नामोनिशान  मिट  गया  l    पांडव  सन्मार्ग  पर  थे  , उन्होंने  नैतिकता  के  विरुद्ध  कोई  आचरण  नहीं  किया   इसलिए  स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  उनके  रथ  की  बागडोर   संभाली  l  उन्होंने  पांडवों  को  हर  मुसीबत  से  बचाया   और  जब  अश्वत्थामा  ने  अभिमन्यु  की  पत्नी   उत्तरा   के  गर्भ  को  लक्ष्य  करके  ब्रह्मास्त्र  चलाया    तब  भगवान  ने  उत्तरा  के  गर्भ  में  प्रवेश  कर   पांडवों  के  वंश  की  रक्षा  की  l  पांडवों  के  वंशज  परीक्षित  का  जन्म  भगवान  श्रीकृष्ण  की  कृपा  से  ही  हुआ  l  यह  सब  आज  भी  इस  धरती  पर  है  जिन्होंने  भी  अपने  जीवन  की  सही  राह  चुनी  है  , उन्हें  ईश्वर  की  कृपा  प्राप्त  होती  है  l  यह  मनुष्य  का  अज्ञान  और  अहंकार  है  कि  वह  इस  कृपा  को  देख  और  समझ  नहीं  पाता  l  

17 June 2026

WISDOM ------

   असुरता  का  अस्तित्व  प्रत्येक  युग  में  रहा  है  l  आसुरी  प्रवृति , छल , कपट , षडयंत्र , धोखा , भ्रष्टाचार , अनैतिकता , पाशविक स्तर  के  घोर  अपराध  -----यह  सब  पीढ़ी -दर -पीढ़ी   चलते  ही  रहते  हैं  l  संस्कार  परिवर्तन  सबसे  कठिन  कार्य  है  , कोई  इस  कठिन  राह  पर  चलना  भी  नहीं  चाहता  है  l  संतान  सब  की  होती  हैं  , इसलिए  यह  असुरता   कभी  समाप्त  नहीं  होती  l  संसार  तो  अपनी  गति  से  चलता  है  l  अँधेरा  है , तभी  उजाले  का  महत्त्व  है  l  ईश्वर  ने  मनुष्य  को  चयन  की  स्वतंत्रता  दी  है  ,  यह  हमारी  इच्छा  है  कि  हम  असुरता  की  राह  चुनते  हैं  या  देवत्व  की  l  जब  मनुष्य  कोई  गलत  राह  चुनता  है ,  तब  दैवी  शक्तियां  उसे  विभिन्न  तरीके  से  संकेत  देती  हैं  कि  इस    गलत  मार्ग  पर  नहीं  जाओ  , ऐसी  गहरी  खाई  में  गिरोगे  कि   संभलना   मुश्किल  होगा  l  लेकिन  मनुष्य  अपने  अहंकार  में  इन  संकेतों  को  अनदेखा  कर  देता  है  ,  कुछ  पल  मौन  नहीं  रहता  कि  प्रकृति  के  संकेतों  को  समझ  सके  l  जैसे  कर्म  करता  है  उसका  परिणाम  उसे  भोगना  ही  पड़ता  है  l  मनुष्य  को  अपने  अच्छे -बुरे  कर्मों  का  फल  कब  और  कैसे  मिलेगा  , यह  काल  तय  करता  है  l  काल  की  गति  को  कोई  नहीं  समझ  सकता  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  है  ----'सत्कर्म  का  कोई  भी   मौका    हाथ  से  न  जाने  दो  l  यह  सत्कर्मों  की  पूंजी  हमारी  हर  तरह  से  रक्षा  करती  है  l  '  आसुरी  प्रवृति  क्या  है  ?  यह  मन  का  विकार  ही  तो  है  l   गीता  में  भगवान  ने  कहा  है  कि   निष्काम  कर्म  से  मन  के  विकार  दूर  होते  हैं  l  जब  मन  का   मैल   साफ़  हो  गया  तो   मनुष्य  सही  राह  चुनेगा  , देवत्व  की  ओर  कदम  बढ़ाएगा  l 

9 June 2026

WISDOM -----

  आज  संसार  में   छल , कपट , फरेब , धोखा , लालच , अहंकार  , कायरता , अतृप्त  इच्छाएं  ----- आदि  नकारात्मक  शक्तियों  का  जाल  इतना  सघन  हो  गया  है  कि  मन  में प्रश्न  उत्पन्न  होता  है  कि  ईश्वर  कहाँ  हैं  ?  यदि  ईश्वर  हैं  तो  असुरता  इतनी  हावी  क्यों  है  ?  आसुरी  शक्तियों  का  साम्राज्य  इतना  क्यों  बढ़ता  जा  रहा  है  ?   ययाति  की  तरह  भोग -विलास  की  इच्छाएं  कभी  समाप्त  ही  नहीं  हो  रहीं  हैं  l  अब  मनुष्य  पर  स्वार्थ , अहंकार   इतना  अधिक  हावी  हो  गया  है  कि  वे  त्याग , ईमानदारी , सत्य बोलना  जैसे  सद्गुण  भूल  गये  हैं  l  अनेक  विद्वान  कहते  हैं  कि  भगवान  कलिक  का  अवतार  होगा  , फिर  सतयुग  आएगा  l   अत्याचार , अन्याय  और  अधर्म     को  मिटाने ,  आसुरी  शक्तियों  का  अंत  करने  के लिए   भगवान  श्रीराम  और  श्रीकृष्ण  इस  धरती  पर  अवतरित  हुए   l  आसुरी  शक्तियों  का  अंत  भी  हुआ   , कुछ  समय  शांति  भी  रही   लेकिन  संस्कार  नहीं   मिटे , रावण , कंस , दुर्योधन , दु:शासन  , हिरन्यकश्यप  जैसे     आसुरी  तत्वों  ने  सम्पूर्ण  संसार  पर   अपना  साम्राज्य  स्थापित  कर  लिया  है  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- 'असुरता  को  मिटाने  के  लिए  अब  ईश्वर  का  अंशावतार  होगा  l  इसका  अर्थ  है  कि  एक  व्यक्ति  विशेष  के  रूप  में  ईश्वर  नहीं  आयेंगे  ,  वे  लाखों , करोड़ों  लोगों  के  मन  में  , ह्रदय  में   अंश रूप  में  प्रवेश  करेंगे   l  जिससे  व्यक्ति  की  चेतना  जाग्रत  हो ,  उसका  विवेक   जागे  ,  वह  अपना  मूल्य  समझे  की  वे  ईश्वर  के  राजकुमार  हैं ,  बंदरों  के  वंशज  नहीं  हैं  l  जब  लोग   जागरूक  होंगे  , अपनी   सोयी  हुई  शक्तियों  को  जाग्रत  करेंगे   तब  असुरता   को  मिटने  में  देर  न  लगेगी  l 

3 June 2026

WISDOM -------

  यह  स्रष्टि  कर्मफल  विधान  से  ही  संचालित  है  ,  यदि  आम  बोया  है  तो  आम  ही  मिलेगा  और  यदि  बबूल  बो  दिया  तो  कांटे  ही  मिलेंगे  l  स्वयं  ईश्वर  भी  इस  विधान से  बंधे  है  l  किसी  को  अपने  अच्छे -बुरे  कर्मों  का  फल  इसी  जन्म  में  मिल  जाता  है  लेकिन  कभी  -कभी  किसी  को  अपने  कर्मों  का  फल  कई  जन्मों  के  बाद  मिलता  है  l  हमारे  द्वारा  किए   गए   अच्छे -बुरे  कर्मों  का  फल  हमें  कब , कैसे  और  किस  रूप  में  मिलेगा  , इसे  काल  निश्चित  करता  है  l  इस  विधान  को  समझना  बहुत  कठिन  है  l    हम  महाभारत  में  देखें  तो     धृतराष्ट्र   और  भीष्म पितामह    को  अपने  पिछले  किसी  जन्म  में  किए  पापकर्म  का  यह  परिणाम  यह  मिला  कि  धृतराष्ट्र  नेत्रहीन  हुए  और  भीष्म पितामह  को  शर -शैया   का  कष्ट  सहन  करना  पड़ा  l  महारानी  द्रोपदी  को   भरी  सभा  में  अपमानित  करने  वाले   दु :शासन  को  कठोर  दंड  भोगते  हुए  देखने  के  लिए  तेरह  वर्ष  तक  अपने  खुले  केशों  के  साथ  इंतजार  करना  पड़ा  l  व्यक्ति  संसार  के  किसी  भी  कोने  में  छुप  जाये  , अपने  किए  गए  कर्मों  के  परिणाम  से  वह  बच  नहीं  सकता  l  जो  पापकर्म  व्यक्ति   छिपकर , अँधेरे  में  करता  है  , योजनाबद्ध  तरीके  से  लोगों  को  उत्पीड़ित  करने  के  लिए  करता  है   और  सोचता  है  कि  उसे  किसी  ने  नहीं  देखा   , तो  यह  उसकी  भूल  है  l  यह  सम्पूर्ण  प्रकृति   और  कण -कण  में     ईश्वर  है    जो  उसे  देख  रहे  हैं  l  उनके  पास   प्रत्येक   प्राणी  के  कर्मों  का  हिसाब  है  l  कलयुगी  संसार  में  तो  न्याय  पर  बड़ा  प्रश्न चिन्ह  है   लेकिन   भगवान   के  दरबार  में  ' देर  है  , पर  अंधेर नहीं  l '  ऋषि  कहते  हैं  -- ' जैसे  हजारों  गायों  के  मध्य  बछड़ा  अपनी  माँ  को  स्वत:  ढूंढ  निकालता  है  , वैसे  ही  अपने  किए  गए  कर्म   आपको  किसी  भी  योनि  में  सहजता  से  ढूंढ  निकालते  हैं  l  इसलिए  सदा  शुभ  कर्म  ही  करना  चाहिए  l "

20 May 2026

WISDOM -----

 प्रकृति  का  प्रकोप विभिन्न  रूपों  में  होता  है    और  वैज्ञानिक  तरीके  से  देखें  तो  उसके  अनेक  कारण  हैं  l  लेकिन  आध्यात्मिक  द्रष्टि  से  देखें  तो    यह  एक  प्रकार  का  सामूहिक  दंड  है  l  कहते  हैं  पापकर्म  करने  वाला , उस  कार्य  में  सहयोग  करने  वाला , ,  उसे  देखने  वाला  और  देखकर  चुप  रहने  वाला   सभी  दंड  के  भागी  होते  हैं  l  वर्तमान  का  समय  लगभग  सभी  देशों  में  ऐसा  है  की  लोग  बड़े -बड़े  अपराध  करते  हैं  ,  और  अपनी  शक्ति  और  सामर्थ्य  से  दंड  से  बच  जाते  हैं  l   व्यवस्थाएं   ही  कुछ  ऐसी  हैं  कि  अपरा'नेक  ऐसे  भी  हैं  जो  समाज  से  छिपकर   अनैतिक  और  अमानवीय  कार्य  करते  हैं  l  संसार  के  किसी  भी  धर्म  में  लोगों  को  अपराध  करने  की  छूट  नहीं  है ,  नैतिकता  और  मानवता  को  ही  श्रेष्ठ  कहा  गया  है  l  जब  मानव  समाज  का  नैतिक  पतन  अति  का  हो  जाता  है   तब  प्रकृति  स्वयं  दंड  देती  है  l  संसार  को  सुधारना  संभव  नहीं  है   यदि  प्रत्येक  व्यक्ति  स्वयं  को  सुधारे , सन्मार्ग  पर  चले  ,  ईश्वर  का  नाम जप  और  निस्स्वार्थ  सेवा  के  कोई  कार्य  करे   तो  ये  सत्कर्मों  को  पूंजी  ही  उसकी   इन  आपदाओं  से  रक्षा  करती  है  , अकाल  मृत्यु  नहीं  होती  l  पं , श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- 'पिछले  जन्मों  में  हमने  क्या  किया   उस  पर  अब  हमारा  कोई  वश  नहीं  है  लेकिन  वर्तमान  समय  हमारे  हाथ  में  है   l  हम  सत्कर्म  कर  के  अपने  प्रारब्ध  के  कर्मों  की  पीड़ा  को  कुछ  कम  कर  सकते  हैं   और  एक  सुन्दर  और  सुनहरे  भविष्य   की  तैयारी  भी  कर  सकते  हैं  l  

19 May 2026

WISDOM -----

   कर्मफल  का  विधान  सबके  लिए  एक  समान  है  l  चाहे  हम  राजा  हों , धर्मात्मा  हों  या  महात्मा ,  साधु  हों  या  शैतान  ,  कर्म   किसी  को  नहीं  छोड़ता  l   इस  विश्व  ब्रह्माण्ड  में  हम  जहाँ  कहीं  भी  हों  ,  हमारा  कर्म  हमारा  पीछा  करता  हुआ  हम  तक  पहुँच  ही  जाता  है  l  इस  जन्म  में  नहीं  तो    अगले  कई  जन्मों  तक  ये  कर्म  हमारा  पीछा  करते  ही  रहते  हैं   और  तब  तक  समाप्त  नहीं  होते  ,  जब  तक  हम  उन्हें  भोग  नहीं  लेते   l  एक  कथा  है  -----  देवराज  इंद्र  के  पुत्र  जयंत  ने   माँ  सीता  के  पैर  में   कौवे  के  रूप  में  चोंच  मार  दी  l  उनके  पैर  से  रक्त  निकल  आया  l  प्रभु  श्रीराम  ने  यह  देखकर  समीप  रखे  कुषा  के  एक  तिनके  को  उठाया   और  उसे  अभिमंत्रित  कर  के   जयंत  की  ओर  फेंक  दिया  l  कुषा  के  उस  तिनके  ने  अभेद्य  बाण  का  रूप   धारण  कर  लिया  l  जयंत  भाग  निकला  था  , उसे  लगा  था  कि  वो  बच  गया  l  उसने  पीछे  मुड़कर  देखा  तो  भगवान  श्रीराम   द्वारा  छोड़ा  गया  बाण  उसका  पीछा  कर  रहा  है  l  उस  बाण  से  बचने  के  लिए जयंत  ने  सभी  लोकों  की  परिक्रमा  की    लेकिन  स्वयं  उसके  पिता  देवराज  और  ब्रह्माजी  तक  ने   उसकी सहायता  करने  से  मना  कर  दिया  l  अंत  में  उसे  भगवान  श्रीराम की  शरण  में  आना  ही  पड़ा  l  उन्होंने  उसे  क्षमा  तो  किया  परन्तु  कर्मफल  के  रूप  में  उसे  अपनी  एक  आँख  गंवानी   ही  पड़ी  l  

18 May 2026

WISDOM -----

   श्रुतायुध  ने   भगवान  शिव  की   तपस्या  कर  के  उनसे   ऐसी  गदा  प्राप्त  की  , जिसका  प्रहार  त्रिलोक  में  किसी  के  लिए  सह  पाना  संभव  नहीं  था  l  गदा  देते  समय  भगवान  शिव  ने  श्रुतायुध  को  आगाह  किया   कि  गदा  का  उपयोग  मात्र  सत्कार्यों   में  किया  जा  सकता  है  ,  यदि  व्यक्तिगत  राग -द्वेष  की  पूर्ति  के  लिए  इसका  उपयोग  हुआ  तो   यही  गदा  उसकी  मृत्यु  का  कारण  बनेगी  l  महाभारत  के  युद्ध  में  श्रुतायुध  को  अर्जुन  के  सामने  युद्ध  के  लिए  आना  पड़ा  l    भगवान  श्रीकृष्ण  को  श्रुतायुध  की  गदा  के  विषय  में  ज्ञात  था   और  वे  जानते  थे  कि  यदि  वह  गदा  चली  तो  अर्जुन  उस  प्रहार  को  झेल  न  सकेगा  l  भगवान  श्रीकृष्ण  श्रुतायुध  को  देखकर  हँस  पड़े  l  श्रुतायुध  को  लगा    कि  भगवान  कृष्ण  उसे  कुरूप  समझकर  उस  पर  हँस  रहे  हैं  l  क्रोध  में  वह   अपना  संयम  खो  बैठा  और  भगवान  शिव  की  चेतावनी भूल  गया  l  उसने  वह  गदा  भगवान  कृष्ण  को  लक्ष्य  कर  के  फेंकी  ,  परन्तु  गदा  ने  लौटकर   श्रुतायुध  का  ही  वध  कर  दिया  l  शक्तियों  का  उपयोग   विवेकसम्मत  तरीके  से  ही  किया  जाना  चाहिए  , अन्यथा  दंड  का  भागी  बनना  पड़ेगा  l  

17 May 2026

WISDOM ----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है  कि --- ' शक्ति  के  साथ  यदि  विवेक  न  हो  तो  वह  शक्ति  उसी  के  लिए  घातक  हो  सकती  है  l ' पुराण  में  इस  संबंध  में  अनेक  कथाएं  हैं   l  रावण , भस्मासुर , हिरन्यकश्यप  जैसे  अनेक  असुरों  ने  घोर  तपस्या  कर  वरदान  प्राप्त  किए  और  बहुत  शक्तिशाली  हो  गए  लेकिन  विवेक  न  होने  से  उन्होंने  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  किया  l  अपनी  शक्ति  का  अहंकार  ही  उनके  अंत  का  कारण  बना  l  असुरों  की  यह  परंपरा  समाप्त  नहीं  हुई  l  आज  भी  जिसके  पास  धन  का , पद  का  बल  है  वह  उसका  दुरूपयोग  कर  रहा  है  l  भस्मासुर  तो  जिसके  सिर  पर  हाथ  रख  दे  केवल  वही  भसम  होता  था  लेकिन  आज  तो  लाखों  भस्मासुर  की  ताकत  का  मिलकर  परमाणु  बम  है  l  जिस  दिन  क्रोध  में  बुद्धि  भ्रष्ट  हो  गई  और  बटन  दब  गया   तो  परिणाम  क्या  होगा   ?   भस्मासुर  अपने  साथ  लाखों , करोड़ों  को  ले  डूबेगा  l                          कलियुग  की  सबसे  बड़ी  त्रासदी  यही  है  कि  मनुष्य  के  पास   सब  कुछ  है  , हर  तरह  की  सुख -सुविधाएँ , भोग -विलास  के  साधन  सब  कुछ  है    लेकिन  सद्बुद्धि  नहीं  है , विवेक  नहीं  है   l  वह  जाने -अनजाने  स्वयं  अपने   और  अपने  परिवार के  , इस  सम्पूर्ण  प्रकृति  के   विनाश  की  ओर  बढ़  रहा  है  l  अपनी  कष्टदायक  मृत्यु  की  तैयारी  स्वयं  ही  कर  रहा  है  l  असुरों  ने  जो  सबसे  बड़ी  चालाकी  की  वह  यह   कि   धन -वैभव  आदि  हर  तरह  से  स्वयं  को  शक्तिशाली  बनाने  तक  ही  ईश्वर  को  माना  l  जब  उन्हें  वरदान  मिल  गया  तब  वे  स्वयं  को  ही    भगवान    समझने  लगे   l  ईश्वर  की  सत्ता  को  चुनौती  देना  ही  उनकी  सबसे  बड़ी  भूल  है  l  ईश्वर  का  न्याय  कैसे  होगा  , यह  तो  वक्त  ही  बताएगा  l  

16 May 2026

WISDOM -------

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- " इस  दुनिया  में  इतना  अधर्म  है , उसका  कारण   यह  नहीं  कि  नास्तिक  दुनिया  में  ज्यादा  हो  गए  हैं  , बल्कि  कारण  यह  है  आस्तिकों  ने  एक  दूसरे  को  गलत  सिद्ध  कर  के  ऐसी  हालत  पैदा  कर  दी  है  कि  कोई  भी  सही  नहीं  रह  गया  l  मंदिर  मस्जिद  को  गलत  कह  देता  है   और  मस्जिद  मंदिर  को  गलत  कह  देती  है  l  दोनों  एक  दूसरे  को   गलत  इसलिए  कहते  हैं  ,  ताकि  वे  अपने  आप  को  सही  साबित  कर  सकें  l  पूरी  दुनिया  में  लगभग  तीन  सौ  धर्म  हैं   और  एक  धर्म  को  दो  सौ  निन्यानवे  गलत  कह  रहे  हैं  l  हर  एक  के  खिलाफ  दो  सौ  निन्यानवे  हैं  l  इन  तीन  सौ  ने  मिलकर  तीन  सौ  को  गलत  सिद्ध  कर  दिया  है   और  धरती  की  ऐसी  बदतर  हालत  हो  गई  है  l  ये  सभी  एक  दूसरे  की  लाशें  बिछाने  और  गला  काटने  में  लगे  हैं  l  हिन्दू मुसलमानों  को  गलत  कहते  हैं  और  मुस्लमान  हिन्दुओं  को  गलत  कहते  हैं  l  ऐसे  लोगों  के  अनुसार  ---बाइबिल   कुरान  के  खिलाफ  है  , कुरान  गीता  के  खिलाफ  है ,   वेद   तालमुद  के  खिलाफ  हैं  ,  तालमुद    जिंदे अवेस्ता  के  खिलाफ  है   l  बस  !  इस  तरह  खिलाफत  और  झगड़ों  का  सिलसिला  जारी  है   और  पूरी  दुनिया  लाशों  से  पटी  पड़ी  है  l  सब  ओर  एक  दूसरे  का  खून  बहाया  जा  रहा  है  l   ऐसी  दशा  में   भगवान  श्रीकृष्ण   बहुत  ही  क्रांतिकारी  सूत्र  देते  हैं  l  वे  कहते  हैं  विपरीतताएँ  कितनी  ही  क्यों  न  हों  , झगड़े  कितने  ही  खड़े  कर  लो  ,  पर  यदि  तुम  चलना  शुरू  करोगे   तो  पहुंचोगे  एक  ही   मंजिल  तक  l                 ईश्वर  तक  पहुँचने  के  अनेक  मार्ग  हैं  ,  हम  किसी  भी  पथ  से  चलें  , पहुंचेंगे    भगवान  तक  ही  l  "  

14 May 2026

WISDOM ------

    इस  धरती  पर  अनेक  ऐसी  आत्माओं  ने  जन्म  लिया    जिन्होंने  अपने  आचरण  से संसार  को  शिक्षा  दी   l  अपनी    नीति -कुशलता  से  वे  इतिहास  में  अमर  हो  गए  l ---- दूसरे  देश  से  आया  शिष्टमंडल  महामात्य  चाणक्य  से  मिलने  पहुंचा  l  उसे  आया  देख  चाणक्य  ने  कक्ष  में  रखा  दीपक  बुझा  कर  दूसरा  दीपक  जला  दिया  l  शिष्टमंडल  के  प्रमुख  ने  उनसे  ऐसा  करने  का  कारण  पूछा   तो  चाणक्य  ने  उत्तर  दिया  ---- ' जब  आप  लोगों  ने  प्रवेश  किया  तब  मैं  व्यक्तिगत  कार्यों  में  संलग्न  था   और  जो  दीपक  जल  रहा  था  ,  वह  मेरे  निजी  धन  से  लाए  गए  तेल  से  जल  रहा  था  l  अब  जल  रहा  ये  दीपक   राजकोष  के  धन  से  जल  रहा  है  , क्योंकि  हमारा  वार्तालाप  शासकीय  मुद्दों  पर  है  l  हमें   राष्ट्रीय   संपदा  का   व्यक्तिगत  कार्यों  पर  खर्च  करने  का  अधिकार  नहीं  है   और  न  ही  मैं  ऐसा  करूँगा   l  शिष्टमंडल  चाणक्य  की  ईमानदारी  से  अभिभूत  हो  गया  l    आज  परिवार  में  , समाज  और  राष्ट्र  में  इतनी  समस्या  और  तनाव  है  उसका  कारण  यही  है  की  व्यक्ति  अपने कार्यों  के  प्रति , अपने  कहे  गए  शब्दों  के  प्रति  यहाँ  तक  की  स्वयं  अपने  जीवन  के  प्रति   और  ईश्वर  के  प्रति   भी  ईमानदार  नहीं  है  l  

4 May 2026

WISDOM ------

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ----- " कौन  कितने  दिन  जिया  , इसका  लेखा -जोखा  जन्म दिन  से  लेकर  मरणपर्यंत  के  दिन  गिनकर  नहीं  , वरन  इस  आधार  पर  लगाया  जाना  चाहिए  कि  किसने  अपने  समय  का  उपयोग  महत्वपूर्ण  प्रयोजनों  के  लिए  किया  l  आदि शंकराचार्य   मात्र  बत्तीस  वर्ष  जिए  l  विवेकानंद  ने  छत्तीस  वर्ष  की  अल्प  आयु  पाई  l  स्वामी  रामतीर्थ  तैंतीस  वर्ष  की  आयु  में  ही  चले  गए  l  ऐसे  अनेक  व्यक्ति  इस  संसार  में  हुए  हैं  ,  जिन्हें  लंबी  अवधि  तक  जीने  का  अवसर  नहीं  मिला  , पर  उन्होंने  अपने  समय  का  श्रेष्ठतम  प्रयोजनों  के  लिए   उपयोग  किया   और  इतनी  उपलब्धियां  अर्जित  कर  सके  , जितनी  सौ -दो सौ  वर्ष  जीकर  भी  नहीं  पाई  जातीं  l  कितने  ही  लोग  लंबी  आयु  तक  जीते  हैं  ,  पर  उस  अवधि  का  लेखा -जोखा  लेने  पर  प्रतीत   होता    है  कि  वह  पेट  भरने , प्रजनन  के  जंजाल  में   उलझे  रहने   तथा  दुर्गुणों  के  कारण  जलते -झुलसते   मौत  के  मुँह  में  चले  गए  l  प्राय; आधा  समय  कुचक्रों  की  उलझन  में  और  लगभग  उतना  ही   आलस्य -प्रमाद  में  लगाने  वाले  को  लंबी  आयु  तक  जीने  का  क्या  संतोष  -आनंद  मिला  l  इसे  वे  उनींदी  अवस्था  में  तो  जान  ही  नहीं  पाते  ,  किन्तु  जब  विदाई  के  दिन  आते  हैं   तो  आँखें  खुलती  हैं   और  हाथ  मलते  हुए  , रुधे  कंठ   और  भरी  आँखों  से  इतना  ही  कह  पाते  हैं  कि  उन्होंने  बहुमूल्य  अवसर  निरर्थक  कामों  में  गँवाया  और  जिससे   काल  का  त्रास  देने  वाला  अंधकार  भरा  भविष्य  कमाया  l "  

3 May 2026

WISDOM ------ लघु कथा

   एक  बार  राजा  ने   अपने  मंत्री  से  पूछा  ---- " क्या  गृहस्थ  में  रहकर  भी  ईश्वर  को  प्राप्त  किया  जा  सकता  है  ? '  मंत्री  ने  उत्तर  दिया  ---- " हाँ , श्रीमान  ! ऐसा  हो  सकता  है  l "  राजा  ने  पूछा ---- "यह  किस  प्रकार  संभव  है  ? "  मंत्री  ने  कहा ---' इसका  ठीक -ठीक  उत्तर   एक  महात्मा जी  दे  सकते  हैं  , जो  गोदावरी  नदी  के  पास  एक  घने  वन  में  रहते  हैं  l "  राजा  अपने  प्रश्न  का  उत्तर  पाने  के  लिए  दूसरे  दिन  मंत्री  को  साथ  लेकर   महात्मा  से  मिलने   चल  दिए  l  कुछ  दूर  चलने  पर  मंत्री  ने  राजा  से  कहा  -----" महाराज  !  ऐसा  नियम  है  कि   जो  उन  महात्मा  से  मिलने  जाता  है  , वह  रास्ते  में  चलते  हुए   कीड़े -मकोड़ों  को  बचाता  चलता  है  l  यदि  एक  भी  कीड़ा  कुचल  जाए   तो  महात्मा जी  श्राप  दे  देते  हैं  l "  राजा  ने  मंत्री  की  बात  स्वीकार  कर  ली  और  खूब  ध्यानपूर्वक  आगे  की  जमीन  देख -देखकर  पैर  रखने  लगे  l  इस  प्रकार  चलते  हुए   वे  महात्मा जी  के  पास  पहुंचे  l  महात्मा  ने  दोनों  को  सम्मानपूर्वक  बैठाया   और  राजा  से  पूछा  ---- " आपने  रास्ते  में  क्या -क्या  देखा  , मुझे  बताएं  l ' राजा  ने  कहा ---- "  भगवन  !  मैं  तो  आपके  श्राप  के  डर  से  रास्ते  के  कीड़े -मकोड़ों  को  देखता  आया  हूँ  l  इसलिए  मेरा  ध्यान  दूसरी  ओर  गया  ही  नहीं  , रास्ते  के  द्रश्यों  के  बारे  में  मुझे  कुछ  भी  मालूम  नहीं   है  l "    इस  पर  महात्मा  ने  हँसते  हुए  कहा --- " राजन  !  यही  तुम्हारे  प्रश्न  का  उत्तर  है  l  मेरे  श्राप  से  डरते  हुए  जिस  तरह  तुम  आए  , उसी  प्रकार  ईश्वर  के  दंड  से  डरना  चाहिए  l  कीड़ों को  बचाते  हुए  जैसे  चले  , उसी  प्रकार  दुष्कर्मों  से  बचते  हुए  चलना  चाहिए  l  रास्ते  में  अनेक  द्रश्यों  के  होते  हुए  भी  , वे  दिखाई  न  पड़े  l  जिस  सावधानी  से  तुम  मेरे  पास  आए  हो  ,  उसी  सावधानी  से  जीवन  क्रम  चलाओ  तो  गृहस्थ  में  रहते  हुए  भी  ईश्वर  को  प्राप्त  कर  सकते  हो  l "  राजा  उत्तर  पाकर  संतोषपूर्वक  लौट  आया  l 

2 May 2026

WISDOM ----

  इस  संसार  में  शुरू  से  ही  असुरता  और  देवत्व  दोनों  का  ही  अस्तित्व  अँधेरे  और  उजाले  की  तरह  रहा  है  l  सतयुग , त्रेतायुग  और  द्वापर युग  में  यह  स्पष्ट  था  कि  असुर  कौन  है ,  कौन  अत्याचारी , अनीति  और  अधर्म  की  राह  पर  है   लेकिन  कलियुग  में  सबसे  बड़ी  त्रासदी  यही  है  कि   अब  आसुरी  प्रवृत्ति  के  लोग  समाज  में  घुल-मिलकर , परिवारों  में  , संस्थाओं  में  , उच्च  पदों  पर  -----धरती  के  प्रत्येक  कोने  में  मुखौटा  लगाकर  रहते  हैं  l  अब  उनकी  पहचान  करना  बड़ा  कठिन  है  l  किसी  तरह  पहचान  हो  भी  जाए    तो  लोग  पहचान  करने  वाले  को  ही  मूर्ख  कहेंगे , कोई  उसकी  बात  का  विश्वास  ही  नहीं  करेगा  l  इसका  कारण  यही  है  कि  इस  असुरों  ने  लोगों  की  कमजोर  नस  को  पकड़  लिया  है   l  ये  असुर    शराफत  का  नकाब  पहन  कर  स्वयं  को  समाज  का  , परिवार  का  हितैषी  बताते  हैं  और  लोगों  को  धन  का ,  पद , प्रतिष्ठा , प्रमोशन , कामना , वासना  ----- आदि  अनेक  प्रकार  का  लालच  देकर , उनके  अनेक  बड़े -छोटे  हित  साधकर,  कभी  भय  दिखाकर , ब्लैकमेल  कर  के    उन्हें  अपने  वश  में  कर  लेते  हैं   l  इसलिए  उनका  सच  जानने  पर  भी  कोई  उनके  विरुद्ध  मुँह  नहीं  खोलता  l  यही  कारण  है  कि  संसार  में  असुरता  का  साम्राज्य  बढ़ता  ही  जा  रहा  है  l   लोभ -लालच  के  जाल  में  फँसने  वाले   वे  लोग  ही  होते  हैं  जो  बिना  मेहनत  के ,  योग्यता  न  होने  पर  भी   अति शीघ्र  सफलता  चाहते  हैं  l    इनकी  दुर्गति  जाल  में  फँसने  वाले  पक्षियों  की  तरह  होती  है  --- दूर  कौन  उड़कर  जाए , कौन  परिश्रम पूर्वक  दाना  चुने  l  वे  तो  दाना  ढूँढने  की  तुलना  में  जाल  पर  बिखरे  दानों  को  एक  सौभाग्य  जैसा  मानते  हैं  और  उससे  लाभ  उठाने  में  चूकने  की  बात  नहीं  सोचते  l  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- उन्हें  यह  सोचने  की  फुरसत  नहीं  होती  कि  लाभ  उठाते  समय   उसके  पीछे  कोई  दूरगामी  संकट  तो  नहीं  छिपा  है  ,  उसे  भी  देखने  की  आवश्यकता  है  l  हर  लोभी  अधीर -आतुर  होता  है   और  तात्कालिक  लाभ  के  कुछ  दाने  चुन  लेने  के  बाद  ,  उस  पक्षी  की  तरह  बेमौत  मरता  है  ,  जिसे  सामने  बिखरे  आकर्षण  के  उपरांत  अन्य  कोई  बात  सूझती  ही  नहीं  l  

19 April 2026

WISDOM -----

   गुरु  नानक  देव  उच्च कोटि  के  संत  व  देवपुरुष  थे  l  उनके  उपदेशों  का  लोगों  पर  इतना  गहरा  असर  होता  था  कि  लोगों  का  जीवन  ही  रूपांतरित  हो  जाता  था  l  कहते  हैं  एक  बार   गुरु  नानक देव  जगन्नाथ पुरी  जा  रहे  थे  l  रास्ते  में  उन्हें  डाकुओं  ने  घेर  लिया   और  कहा  ---- 'तुम्हारे  पास  जितनी  भी  वस्तुएं  हैं , हीरे मोती  , सोना -चांदी  जो  कुछ  भी  , वो  सभी  निकाल  कर  हमें  दे  दो  ,  नहीं  तो  हम  अभी  तुम्हारी  हत्या  कर  देंगे  l '  गुरु  नानक  देव  के  चेहरे  पर  परम  शांति  थी  , वे  निर्भय  थे  ,  उन्होंने  डाकुओं  के  सरदार  से  कहा  --- ' ठीक  है  , तुम  जो  कुछ  लेना  चाहते  हो  ले  सकते  हो   लेकिन  मुझे  मारने  के  बाद  मेरे  शव  का  अंतिम  संस्कार   जरुर  कर  देना  ताकि  मानव  देह  का  अपमान  न  हो  l  इसलिए  पहले  आग  जलाने  का  प्रबंध  कर  लो  l  '  गुरु  नानक  देव  के  चेहरे  के  अपूर्व  तेज  से  वे  डाकू  इतने  आश्चर्य चकित  थे  कि   उनकी  बात  मानकर  वह  सरदार  अपने  दो  साथियों  के  साथ   लकड़ियाँ  लाने  चल  दिया  और  अन्य  डाकू  उन्हें  घेरे  रहे  l  सरदार  अपने  दोनों  साथियों  के  साथ  जा  रहा  था  कि  उसने  कुछ  दूर  पर  धुआं  उठता  देखा  l  वहां  पहुंचकर  उसने  देखा  कि   गाँव  के  लोग  एक  शव   का  दाह -संस्कार  कर  रहे  थे   और  आपस  में  बातें  कर  रहे  थे  कि ---' अच्छा  हुआ  कि  यह  दुष्ट , पापी , हत्यारा  , शैतान  मर  गया   l  यदि  यह  जीवित  रहता  तो  न  जाने  कितने  लोगों  को   पीड़ा  देता , अत्याचार  करता  , उन्हें  सताता  l   भीड़  में  से  कुछ  लोग  उस  मृत  व्यक्ति  के  माता -पिता  को  धिक्कार  रहे  थे  कि  ऐसी  दुष्ट , अधर्मी , पापी , दुष्ट  संतान  को  जन्म  देने  से  अच्छा  था  कि  वे  निस्संतान  होते  l  एक  व्यक्ति  कह  रहा  था  --- "  इस  व्यक्ति  का  तो  जीवन  ही  धिक्कारने  लायक  है  , इन्सान  के  रूप  में  जन्म  लेकर  इसने  शैतान  और  हैवान  जैसा  जीवन  जिया  l  ऐसा  जीवन  भी  कोई  जीवन  है  l  इस  पापी  के  शव  के  धुएं  का  हम  सबसे  स्पर्श  हो  गया  , अब  अति  शीघ्र  हम  शुद्ध  जल  से  स्नान  करें  ,  ईश्वर  हमें  सद्बुद्धि  दे  , हमारी  रक्षा  करे  l '    डाकुओं  ने  जब   मृतक  के  विषय  में  लोगों  को  ऐसी  बातें  करते  सुना  तो  उन्हें   अपने  कुकृत्यों  पर  बड़ी   ग्लानि  हुई  , वे  पश्चाताप  करने  लगे  कि  उनकी  मृत्यु  पर  लोग   उन्हें   इसी  तरह  कहेंगे  l  वे   दौड़कर    गए  और  गुरु  नानक देव  के  चरणों   में  गिर  पड़े   और  कहा  कि   आपके  माध्यम  से  हमें  अपने  बुरे  कर्मों  का  एहसास  हुआ   और  वे  सब  बहुत  रोने  लगे  l  गुरु  नानक  देव  ने  कहा  --- '  अब  तक  का  जीवन  जैसा  बीता  , वह  बीत  गया  l  अब  संभल  जाओ  और  अपना  जीवन  परोपकार  में  लगा  दो  l  परोपकार  करने  से , दूसरों  का  भला  करने  से  तुम्हे  आत्मसंतोष  प्राप्त  होगा  , तुम्हारी  जिन्दगी  बदल  सकती  है  और  जीवन  में  सुख शांति  आ  सकती  है  l  '  गुरु  नानक देव  के  उपदेश  का  उन  डाकुओं  पर  ऐसा  असर  हुआ  कि   उन्होंने  बुरे  कर्म , घ्रणित  कर्म  करना  छोड़  दिया  ,  उनकी  जिन्दगी  सदा  के  लिए  बदल  गई  l   

6 April 2026

WISDOM -----

 मनुष्य  के  जीवन  में   जितनी  भी  समस्याएं  हैं  उनके  कारण  कहीं  बाहर  नहीं  हैं  l  भौतिकता  की  अंधी  दौड़  में  मनुष्य  ने  अपने  जीवन  को  एक  समस्या  बना  लिया  है  l  अब  लोग  एक  मशीन  की  तरह  जीवन  जीते  हैं  ,  जिसमें  भावनाओं  का  कोई  स्थान  नहीं  है  l  अनेक  ऐसे  शब्द  जो  रिश्तों  की  नींव  होते  हैं  ,वे  सब  गायब  हो  गए  हैं   l  अब  दया , करुणा ,  सहयोग , सामंजस्य ,  निस्स्वार्थ  प्रेम  --इन  सबका  अर्थ  अब  न  कोई  जानता  है   और  न  ही  जानने  की  इच्छा  रखता  है  l  अब  लालच , स्वार्थ , अहंकार , महत्वाकांक्षा  ,  ईर्ष्या , द्वेष   मनुष्य  पर  हावी  है  l  वह  न  स्वयं  चैन  से  रहता  है   और  न  ही  दूसरों  को  चैन  से  रहने  देता  है  l   इन सब  दुर्भावनाओं  से  मनुष्य  ने  स्वयं  ही   अपने  को  तनावग्रस्त  कर  लिया  है  l  इसका  दुष्परिणाम  संसार  में  विभिन्न  क्षेत्रों  में  देखने  को  मिलता  है  l  मनुष्य  को  इनसान  बनना , मानवीय  मूल्यों को  समझना  सबसे  कठिन  लगता  है   इसलिए  उसने  स्वयं  ही  नकारात्मकता  का  रास्ता  चुन  लिया  , उसे  मनुष्यता  के  स्तर  से  नीचे  गिरने  का  कोई  दुःख  भी  नहीं  है  l  

31 March 2026

WISDOM -------

   इस  वैज्ञानिक  युग  में  लोगों  के  पास  सुख - सुविधाएँ  तो  बहुत  हैं   लेकिन  लोगों  के  जीवन  में  आनंद  नहीं  है  l  वह  आंतरिक  ख़ुशी  जो  चेहरे पर  चमक  ला  देती  है  ,  वो  कहीं  खो  गई   है  l   सबसे  बड़ी  समस्या  यह  है  कि  किसी  के  चेहरे  पर   ख़ुशी  दिख  भी  जाये  , ख़ुशी  के  कुछ  पल  आ  भी  जाएँ   तो  ईर्ष्या -द्वेष  करने  वाले  इतने  हैं  कि  वे  उस  ख़ुशी  को  छीनने  का  , व्यक्ति  को  कष्ट  देने  का  हर  संभव  प्रयास  करते  हैं  l  आज  व्यक्ति  दूसरे  की  ख़ुशी  देखकर  दुःखी  और  परेशान  हो  जाता  है  l  यह  विकृत  मानसिकता  परिवार  से  लेकर  संसार  में  है  l  छोटे -छोटे  बच्चों  की  हँसी  तो  निर्मल  होती  है  ,  उनमें  कोई  ईर्ष्या -द्वेष  नहीं  होता  ,  निर्मल  मन  है  , हँसते -मुस्कराते  हैं  लेकिन  निष्ठुर  व्यक्तियों  से  उनकी  ये  निर्मल  हँसी  भी  बर्दाश्त  नहीं  होती  ,  कभी   युद्ध  के  नाम  पर  ,  कभी  विकृति  के  कारण  वे  बच्चों   के  ही  प्राण  ले  लेते  हैं  l  यह  मनोरोग  है  l  यदि  व्यक्ति  आध्यात्मिक  है   ,  यदि  उसे  अपने  जीवन  में  कष्ट  मिला  है   तो  वह   निरंतर  यही  प्रयास  करेगा  कि  जो  कष्ट  उसे  मिला  ,  वैसा  कष्ट  किसी  को  न  मिले  ,  वह  सबको  ख़ुशी   देने  का  हर  संभव  प्रयास  करेगा  l  उसके  कष्ट , उसके  अभाव  उसे  कठोर  नहीं  बनाते  l  लेकिन  इसके  विपरीत   अनेक  लोग  ऐसे  होते  हैं   जिनका  मन  सब  कुछ  पाकर  भी  अतृप्त  रहता  है  ,  छोटे  से  कष्ट  भी  उन्हें  शूल  की  तरह  चुभते  हैं  , ऐसे  लोगों  की  मानसिकता  यही  होती  है  कि हमें  ख़ुशी  नहीं  मिली ,  तो  अब  हम  सब  की  ख़ुशी  छीन  लेंगे , किसी  को  चैन  से  जीने  नहीं  देंगे  l  ऐसे  लोग  बहुत  निष्ठुर  , आसुरी  प्रवृति  के  होते  हैं  l  यह  आसुरी  प्रवृति   एक  प्रकार  का  मनोरोग  है  l  पंडित  श्री राम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  --- ' मनोरोग  और  कुछ  नहीं  , मनुष्य  की  दबी , कुचली , रौंदी  गईं  भावनाएं  ही  हैं  l  भावनात्मक  तृप्ति  मानव  जीवन  की  सबसे  बड़ी  आवश्यकता  है  l  भावना  के  बिना  मनुष्य  सब  कुछ  पाकर  भी  अतृप्त  ही  रहता  है  l  भावना  ही  जब  विकसित  हो  जाती  है  तो  यह  संवेदना  है  l  इसके  बिना  जीवन  वीरान  और  शुष्क  हो  जाता  है  l  यही  अनेक  मनोविकारों  का  मूल  कारण  है  l  "     जिनमें  संवेदना  नहीं  है  , वही  असुर  हैं , निर्दयी , निष्ठुर  हैं  l  ऐसा  इसलिए  है  क्योंकि  वे  स्वयं  को  भगवान  समझते  हैं  , शक्ति  का  दुरूपयोग  करते  हैं  l  उनकी  आत्मा  जानती  है  के  वे  गलत  हैं   इसलिए  वे  लोग  शराफत  का  नकाब  पहनकर  रहते  ,  ये  असुर  आपस  में  बड़े   संगठित  होते  हैं  , इस  सत्य  को  वे  जानते  हैं  कि  उनसे  ऊपर  ईश्वर  है , इसलिए  सब  काम  छिपकर  करते  हैं  l  जिस  दिन  उन्हें  यह  समझ  आ  गया  कि  ईश्वर  उन्हें  अपनी  हजार  आँखों  से  देख  रहे  हैं , उनके  हर  कार्य , प्रत्येक  विचार  पर  उनकी  द्रष्टि  है  ,  उस  दिन  उन्हें  ईश्वर  से  प्रेम  हो  जायेगा  , ह्रदय  में  भक्ति  जाग्रत  हो  जाएगी   और  तब  यह  आसुरी  प्रवृति    आध्यात्मिकता  में  बदल  जाएगी  l  

25 March 2026

WISDOM -----

  मनुष्य  बुद्धिमान प्राणी  है  लेकिन  उसकी  सबसे  बड़ी  भूल  यह  है  कि  वह इतिहास  से  शिक्षा  नहीं  लेता  l  अपना  अहंकार , लालच , कामना  , अतृप्त  इच्छाएं  , महत्वाकांक्षा  के  आगे  उसे  कुछ  दिखाई  नहीं  देता  l  यह सब  दुर्गुण   जिसमें  भी  हैं  , वह  अपनी  शक्ति  के  अनुरूप  उस  क्षेत्र  को  मुसीबत  में  डाल  देता  है  l   व्यक्ति  जितना  पावरफुल  है  वह  उतने  ही  बड़े  क्षेत्र  को  , यहाँ  तक  कि  इस  दुनिया  को  , प्रकृति  को  सबको  मुसीबत  में  डाल  देता  है  l  चाहे  महाराज  ययाति  हों , दुर्योधन हों   या  रावण  हों  ---सब  विभिन्न  रूपों  में  इस  धरती  पर  आफत  बनकर  बरस  रहे  हैं  l  गीता  में  कहा  गया  है  कि  जिनका  मन  शांत  है ,  वे  अपने  आसपास  सम्पूर्ण  वातावरण  में  शांति  फैलाते  हैं  l  इस  युग  का  यह  दुर्भाग्य  है  कि  लोगों  के  मन  अशांत  हैं  l  जिनके  पास  संसार  के  सारे  सुख  हैं , वैभव  है , शक्ति  है  , उनके  मन  सबसे  ज्यादा  अशांत  हैं  , मन  अशांत  होकर  भटक  रहा  है  इसलिए  बुद्धि  बेलगाम  हो  गई  है  l  यदि  हम  संसार  में  शांति  चाहते  हैं  तो  हमें  सबसे  पहले  अपने  मन  को  शांत  रखना  होगा  l  जब  व्यक्ति  का  मन  शांत  होगा  तो  परिवार  में  शांति  होगी  ,  फिर  समाज  में  राष्ट्र  में  और  संसार  में  शांति  होगी  l  यह  शांति  अनोखी  होगी  ,  एक ऐसी  शांति  जिसमे  हमने  अपने  मन  को  मारा  नहीं  है   l  हमारे  मन  की  भटकन , पागलपन  दूर  हो  जाता  है  और  हमारे  निर्णय  विवेकपूर्ण  होते  हैं  l  आज  संसार  में  जब  इतनी  अशांति  है   तब  हम  सबका  यह  कर्तव्य  बन  जाता  है  कि  हम  सब  गायत्री  मन्त्र  का  जप  करें  और  ईश्वर  से  प्रार्थना  करें   कि  वे  संसार  के  विभिन्न  राष्ट्रों  के  जो   कर्ता धर्ता   हैं  ,  उनके  मन  को  शांति  दें ,  उनके  भीतर  विवेक  जाग्रत  हो  l  सबसे  बढ़कर  जो  हथियार  बनाते  हैं  , उन्हें  सद्बुद्धि  आए  l   अपना  लाभ  कमाने  की  न  सोचें  l  इस  धरती  पर  अमर  कोई  नहीं  है  ,  इतनी  लाशों  का  बोझ  अपने  कन्धों  पर  लेने  से  कहीं  भी  शांति  नहीं  मिलेगी  l  

7 March 2026

WISDOM ------ आखिरी दांव

 लघु कथा ---- प्राचीन  काल  की  बात  है    एक नगर  सेठ  था  l  उसके  पास  अपार  धन  संपदा  थी  l  सुख -वैभव  की  कोई  कमी  नहीं  थी  l  लेकिन  उस  सेठ  को  संतोष  नहीं  था  l  जब  तक  वह  दूसरे  सेठों  का  कुछ  छीन  न  ले  ,  उसे  चैन  की  नींद  नहीं  आती  थी  l  वह  दूसरों  का  केवल  धन  ही    नहीं  ,  सब  कुछ   छीनना  चाहता  था ,  दूसरों  का  सुख -चैन   छीनकर  ही  उसे   आनंद  आता  था  l  वह  अपने  जासूसों  को  भेजकर  यह  जानकारी  लेता  था  कि  किसके  पास  क्या  सबसे  अच्छा  है  ?   किसी  के  पास  खुश  होने  के  लिए  और  गर्व  अनुभव  करने  के  लिए  क्या  है  ?  वही  उससे  छीन  लिया  जाये  l  उसके  जासूसों  ने  उसे  बताया  कि  उसके  नगर  से  कुछ   दूरी    पर  एक  नगर  है   , वहां  एक  बहुत  सुन्दर  बगीचा  है  ,  वहां के  सभी  लोग  उस  बगीचे  को  देवता  मानकर  पूजते  हैं  और  वहां  सैर  कर  के  इतने  प्रसन्न  होते  हैं  कि  उनकी  ख़ुशी  का  वर्णन  नहीं  किया  जा  सकता  l  यह  सुनकर  उस  लालची  सेठ  की  नींद  उड़  गई  l  वह  दिन -रात  यही  सोचने लगा  कि  कैसे  उस  बगीचे  पर  अपना   कब्जा    किया  जाए  l  साम , दाम , दंड , भेद  हर  तरीके  से  उसने  सेठ  को  अपने  वश  में  कर  लिया   और  उससे  कहा  कि  इस  सुन्दर  बगीचे  पर  वह  अपना  अधिकार  चाहता  है  l  बगीचे  के  मालिक  उस  सेठ  ने  कहा  ---यदि  बगीचे  का  अधिकार  मैं  तुम्हे  दे  दूंगा   तो  मेरी  प्रजा  मेरा  सम्मान  नहीं  करेगी  और  मेरा  जीवन  जीना  मुश्किल  हो  जाएगा  l  लालची  सेठ  ने  अगली  चाल  चली  , उसने  कहा  ---तुम  गुपचुप  रूप  से   मुझे  इस  बगीचे  का   अधिकार  सौंप  दो  ,  किसी  को  पता  न  चलेगा  ,  मेरे  मन  को  संतोष  हो  जायेगा  और  तुम्हारा  सम्मान  भी  बना  रहेगा  l  सेठ  आखिर  राजी  हो  गया  ,  उसने  बड़े  गोपनीय  तरीके  से  उस  सुन्दर  बगीचे  का  मालिकाना  हक  लालची  सेठ  को  सौंप  दिया  l  कुछ  ही  दिन  बाद   उस  लालची  सेठ  ने   उसको  मरवा  दिया  और   उस  बगीचे  पर  अपना  अधिकार   सबके  सामने  दिखा  दिया l   इस  कथा  से  हमें  क्या  शिक्षा  मिलती  है  ?   हमें  अपना  आखिरी  दांव  कभी  किसी  को  नहीं  बताना  चाहिए  l  जब  शेर  जंगल  का  राजा  बना  तब  बिल्ली  ने  उसे   सारे  गुर  सीखा  दिए  l  शेर  ने  बिल्ली  से  कहा  --कोई  और  हुनर  हो  तो  वह  भी   सिखा  दो  ताकि  मैं  एक  कुशल  प्रशासक  बन  सकूँ  l  बिल्ली  ने  कहा  -- मैंने  तुम्हे  वह   सब  कलाएं  सिखा  दीं   जो  मुझे  ज्ञात  हैं  l  शेर  के  मन  में  कुटिलता  आ  गई  ,  उसने  सोचा  क्यों  न  मैं  पहला  शिकार  इस  बिल्ली  का  ही  करूँ  ,  यह  सोचकर  वह  बिल्ली  पर  झपटा  l  बिल्ली  सतर्क  थी  वह और  तुरंत  पेड़  पर  चढ़  गई  l  शेर  को  पेड़  पर  चढ़ना  नहीं  आता  है  l  अब  उसने  बिल्ली  से  प्रार्थना  की  कि  वह  उसे  पेड़ पर  चढ़ना  भी  सिखा  दे  l  बिल्ली  होशियार  थी   , उसने  कहा  ,  नहीं  1  यह  मेरा  आखिरी  दांव  है   यदि  मैंने  इसे  तुम्हे  सिखा  दिया  तो  तुम  मुझे  ही  खा  जाओगे  l   

24 February 2026

WISDOM ----

 प्रसिद्ध  कवि  अब्दुर्रहीम  खानखाना  के  पास  एक  व्यक्ति  आया  और  उनसे  पूछने  लगा  कि  जीवन  में  सबसे  महत्वपूर्ण  कौन  सा  संयम  है  ?  उन्होंने  कविता  के  माध्यम  से  उत्तर  दिया  --- " रहिमन  जिह्वा  बावरी  , कही  गई  सरग  पताल  l  खुद  कह  भीतर  घुस  गई  , जूती  पड़े  कपाल  l l   अर्थात  सारे  संयमों  में  वाणी  का  संयम   अत्यंत  महत्वपूर्ण  है  l  जीभ  खुद  तो  बात  कहकर  मुँह  के  अन्दर  चली  जाती  है  , परन्तु  कहने वाले  को   उसका  परिणाम  भुगतना  पड़ता  है  l                                                                                                           वाणी  का  संयम  न  होने  से  महाभारत   का  महायुद्ध  हुआ  l  द्रोपदी  ने  कहा  था  ---' अंधे  का   बेटा  अँधा  होता  है  l '  दुर्योधन  को  पांडवों  से  ईर्ष्या  तो  पहले  से  ही  थी  ,  अब  बदले  की  आग  और   इतनी  तेज  हो  गई   कि   स्वयं  भगवान  श्रीकृष्ण  भी  दुर्योधन  को  समझा  न  सके  l  हर  युग  में  यही  सब  रहा  है  l  जिसके  पास  ताकत  है , शक्ति  है ,  धृतराष्ट्र  का  अँधा  मोह  और  पूरा  समर्थन  है  ,  वह  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  करता  है   और  उसका  परिणाम   निर्दोष  व  बेकसूरों  को  भी  भुगतना  पड़ता  है   l  पहले  तो  युद्ध  ऐसे  होते  थे  कि  महिलाएं  व  बच्चे  सुरक्षित  रहते  थे  जैसे  महाभारत  का  महायुद्ध  कुरुक्षेत्र  के  मैदान  में  हुआ  l  खेती  और  सामान्य  जनजीवन  सुरक्षित  रहा  लेकिन  अब  कोई  सीमित  क्षेत्र  नहीं  है  l  कलियुग  में  लोगों  का  नैतिक  पतन  हो  गया  है  ,  युद्ध  व  दंगे  आदि  के  माध्यम  से  वे  अपनी  दमित इच्छाओं  की  पूर्ति  करते  हैं , किसी  से  बदला  लेने  का  उन्हें  यह  सुनहरा  मौका  लगता  है ,  महिलाओं  , छोटे  बच्चों , गर्भस्थ  शिशु  की  जो  दुर्दशा  होती  है  , जैसे  भूत -पिशाच  धरती  पर  नाच  रहे  हों  l  सच्चा  इन्सान  कहाँ  छुपा   है  ?  

20 February 2026

WISDOM ------

    बंगाल  के  विख्यात शिक्षाविद्  पंडित  मुखोपाध्याय   से  मिलने  संस्कृत  महाविद्यालय  के शिक्षक  पहुंचे  l  उन्होंने  पंडित जी  से  कहा  ---- "  आप  संस्कृत  के  प्रकांड  विद्वान हैं  ,  फिर  आप  अन्य  की  तरह  दुर्गापूजा  महोत्सव  धूम -धाम  से क्यों  नहीं  मनाते  ?  "  पंडित जी  ने  उस  समय  तो  उनके  प्रश्न  का  कोई  उत्तर  नहीं  दिया  ,  पर  इस  वार्तालाप  के  कुछ  दिन  बाद  उन्होंने  शिक्षा  तथा  संस्कृत  के  प्रचार -प्रसार  के  लिए  निर्मित  विश्वनाथ  संस्कृत  ट्रस्ट  को  डेढ़  लाख  रूपये  दान  में  दिए  l  वे  शिक्षक  इसी  ट्रस्ट  द्वारा  निर्मित  महाविद्यालय  में कार्यरत  थे  l  पंडित जी   उन्हें  संबोधित  कर  के  बोले  ---- " मैंने  दुर्गा  पूजा   महोत्सव  में  धूम -धाम  न   कर  के   जो  पैसे  बचाए  हैं  ,  ये  वही  धन  है  l  संस्कृत  देववाणी  है   और  माँ  दुर्गा के  महत्त्व  को  सामने  लाने  का   श्रेय    भी  संस्कृत  को  है  l  यदि इस  धन  से   संस्कृत  की  सेवा  हो  जाये  ,  तो  मेरे  लिए  वही  दुर्गा  पूजा  है  l  

15 February 2026

WISDOM -----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  ---- 'प्रत्येक  व्यक्ति  समाज  पर  अपना  भला -बुरा  प्रभाव  छोड़ता  है   l  किन्तु  सुगंध  की  अपेक्षा   दुर्गन्ध  का  विस्तार   अधिक  तेजी  से  होता  है  l  पानी  का  नीचे  गिरना  बहुत  आसान  है  किन्तु  ऊपर चढ़ाने  के  लिए  बहुत  अधिक  मेहनत  की  आवश्यकता  है  l '   आसुरी  प्रवृत्ति  के  लोग  इसी  वजह  से   आसुरी  तत्वों  को  संसार  में  फैलाने  में  सफल  हो  जाते  हैं  l  जो  असुर  हैं  जिन्हें  हम  राक्षस  , दैत्य  और  नर भक्षी  हों  तो  उन्हें  नर पिशाच  भी  कहते  हैं  ,  ये  सब  मनुष्य  शरीर  में  ही  हैं   लेकिन  इनमे  संवेदना , करुणा , दया , ममता  , प्रेम  , मानवीयता  नहीं  होती  l  इनमे  अहंकार  और  उससे  जुड़े  सभी  दुर्गुण  होते  हैं  l  आज  कलियुग  की  स्थिति  यह  है  कि  असुरता  सम्पूर्ण  धरती  पर अपना  साम्राज्य  स्थापित  करना  चाहती  है ,  सब  उसके  गुलाम  बने  और  देवत्व  का  नामोनिशान  मिट जाए  l  उनका उदेश्य  लोगों  को  मानसिक  गुलाम  बनाना  है  , भौगोलिक  नहीं  l   अपने उदेश्य  में  उसे  बहुत  सफलता  भी  मिली   लेकिन   ऐसे  देश  जहाँ  कि  संस्कृति  में  चरित्र  की  श्रेष्ठता  है  जैसा  कि  हमारा  देश  भारत  ,  ऐसे  किसी  भी  देश  में  देवत्व  को  पूरी  तरह  मिटाना  संभव  नहीं  है  l  इसलिए  आसुरी  तत्वों  ने  दूसरी  चाल  चली  --- डंडे  के  जोर  पर  तो   चारित्रिक  पतन  आसान  नहीं  होता   इसलिए   अब  उन्होंने  लोगों  के  मन  पर  प्रत्यक्ष  और  अप्रत्यक्ष  तरीके  से  आक्रमण  शुरू  किया  l  इसके  लिए  उन्होंने  विज्ञान  का  सहारा  लिया  और  संचार  तथा  प्रचार-प्रसार    के  साधनों  से    लोगों  के  मन  को  डांवाडोल  करने  , उनका  नैतिक  पतन  करने  और  अश्लीलता  को  परोसने  का  सारा  व्यापार  शुरू  कर  दिया  l  बुराई  में  बड़ा  आकर्षण  होता  है  l  सद्विचारों  को  तो  दो -चार  लोग  पढ़  लें यही  बहुत  बड़ी  बात  है  लेकिन   अश्लील  साहित्य  , ऐसी  ही  फ़िल्में , गंदे  विचार   इन्हें  पढने , सुनने  व  देखने  के  लिए  लाखों , करोड़ों  लोगों  की  भीड़  होती  है  l  संसार  में  जो  लोग  श्रेष्ठ  काम  कर  रहें  हैं  , उनके  कार्यों  को  बड़ी  मुश्किल  से  एक -दो   लाइन  में  समाचारों  में  दिखा  दिया  जाता  है  लेकिन   जो  बहुत  ही  निम्न  श्रेणी  के , निकृष्ट  कार्य  हैं  , उन्हें  समाचारों  में   और  विभिन्न  तरीकों  से    विस्तार   से  सचित्र  भी  दिखाया  जाता  है    ताकि  लोगों  का  मन  बहुत  कमजोर  हो  जाए  l  इसके  साथ  ही   ये  आसुरी  प्रवृति  के  लोग  अप्रत्यक्ष  तरीकों  से   नकारात्मक  शक्तियों  की  मदद  से , साइकिक  अटैक   आदि  विभिन्न  तरीकों  मानवजाति  पर  सामूहिक  रूप  से  आक्रमण  कर  उन्हें  विभिन्न  तरह  की  बीमारियाँ  देते  हैं   ताकि  व्यक्ति  इतना  कमजोर  हो  जाए  कि  उसमें  विरोध  करने  की  सामर्थ्य  ही  न  रहे   ,  फिर  वे  हमें  जैसी  शिक्षा  दे , चिकित्सा  दे ,   कृषि , साहित्य , कला ,  खाद्य पदार्थ , बीज  , खेती  आदि  सब  कुछ  उनकी  मरजी  का  हो  ,  हमारी  इच्छा , हमारा  स्वास्थ्य , हमारी  संस्कृति , हमारी  मिटटी  , इससे  किसी  को  कोई  मतलब  नहीं  l  यही  है  मानसिक  गुलामी  l  गुलाम  का  अपना  कोई  अस्तित्व  नही  होता  , वह  तो  एक  कठपुतली  होता  है  l  असुरता  की  कोई  जाति , कोई  धर्म  , कोई  विशेष  भौगोलिक  क्षेत्र  नहीं  होता  , ये  सब  एक  नाव  में  सवार  होते  हैं  l  इस  नाव  का  आकार  अब  बढ़ता  ही  जा  रहा  है  l  बुराई  में  तत्काल  लाभ  होता  है   इसलिए  सब  लोग  उसी  नाव  में  बैठने  को  आतुर  हैं  l  देवत्व  को  बचाने  का , देवत्व  की  रक्षा  का  एक  ही  उपाय  है  ---- ' गायत्री  मन्त्र  '  l  माँ  आदि शक्ति  को  पुकारो  और  शक्ति  के  साथ  शिव  की उपासना  करो  l  शिव  और  शक्ति  के  संतुलन  से  देवत्व  की  रक्षा  संभव  है l  प्रत्येक  व्यक्ति  यह  प्रयास  करे  तब  उसका  परिवार , समाज , राष्ट्र   आसुरी  आक्रमण  से  सुरक्षित  रहेंगे  l  

10 February 2026

WISDOM ------

 विधाता ने  स्रष्टि  की  रचना  की   और  अनेक  प्राणियों , वनस्पति , पशु -पक्षी  आदि  सभी  बनाए  l  इन  सब  में  विधाता  ने  मनुष्य  को  ही  बुद्धि  दी  कि  वह  सन्मार्ग  पर  चलकर  ,  नैतिकता  के  नियमों  का  पालन  कर  अपनी  चेतना  को  विकसित  करे   और  बुद्धि  का  सदुपयोग  कर   सामान्य  मनुष्य  से  ऊपर  उठकर  इनसान .,  देवता  और  भगवान  बने   लेकिन  मनुष्य  ने  ऐसा  नहीं  किया  , मनुष्य  में अहंकार  है   उसने  ईश्वर  के  आदेश  को  भी  नहीं  माना  l  मनुष्य  के  अहंकार  ने  उसकी  बुद्धि  को  दुर्बुद्धि  में  बदल  दिया   ,  उसने  ईश्वर  के  बताए  क्रम  से  विपरीत  क्रम  को  चुना  l  बहुत  समय  तक  उसने  पशुओं  जैसा  जीवन  जिया   लेकिन  यह  जीवन  भी  उसे  बहुत  कठिन  लगा   क्योंकि  पशु  भी  प्रकृति के  नियमों  के  अनुसार  चलते  हैं  l  समय  से  उठाना , शाम  होते  ही  अपने  घोंसले  में  चले  जाना  l  संतान  उत्पत्ति  के  उनके  नियम  हैं  ,  समूह  के  छोटे  बच्चों  पर  उनकी  कुद्रष्टि  नहीं  होती  , जरुरत  भर  का  उनका  घोंसला  होता  है  ,  संपत्ति  , वैभव  नहीं  जोड़ते  l   मनुष्य  को  यह  पशुओं  जैसा  जीवन  बहुत  कठिन  लगा  l  मनुष्य  ने  अपनी  बुद्धि  को  बेलगाम  कर  दिया  l  मनुष्य  ने  सोचा  कि  ऐसा  कुछ  किया  जाए  कि  अपने  समूह  में   उसे  सबका  सम्मान  मिले   और  अपने  भीतर  की  कालिख  को  वह   सबसे  छुपा  ले  l  जैसी  चाहत  होती  है  वैसे  रास्ते  भी  निकल  आते  हैं  l  मायावी  शक्तियां  तो  शुरू  से  ही  संसार  में  हैं  l  रावण  मायावी  था  , हिरन्यकश्यप , बकासुर , भस्मासुर , अघासुर   जैसे  असंख्य  असुर  हैं   l  वे  जीवित  नहीं  तो  क्या ,  उनकी  वाइब्रेशन  तो  ब्रह्माण्ड  में  हैं  l जैसा  जो  चाहता  है ,  वैसी  ही  वाइब्रेशन  उसके  पास  आ   जातीं  हैं  l  अब  मनुष्य  को  भी  मायावी    बनने  का  रास्ता  मिल  गया  l  फिर  इन  असुरों  के  अनेक  सहयोगी  ---भूत , प्रेत , जिन्न ,पिशाच  आदि भी  होते  हैं  ,  उन  सबका  मनुष्य  को  भरपूर  सहयोग मिला  l  और  मनुष्य  को  अपनी  दुर्बुद्धि  से  उन्ही  का  जीवन  बहुत  पसंद  आया  , खाओ -पीओ  मौज  उड़ाओ , मारो -काटो  ,  कोई  नैतिकता  नहीं  , कोई  नियम  नहीं  l  मनुष्य  युगों  से  इन्ही  के  जैसा  जीवन  जी  रहा  है  , शरीर  मनुष्य  का  है  लेकिन  अपने  भीतर  से  वह  -----है  l    यह  कटु  सत्य  है  , इसका  प्रमाण  भी  है   l  संसार  का  इतिहास  युद्धों  का  इतिहास  है , बड़े  भीषण  युद्ध  हुए हैं  और  आज  भी  हो  रहें  हैं , खून  की  नदियाँ  बह  गईं , अणुबम  तो  ऐसे  गिरे  कि  सब  कुछ  राख  हो   गया  l  यदि  मनुष्य ' इनसान '  होता  तो  इतने  युद्ध  नहीं  होते  ,  ये  सारे  शौक  तो  भूत ,  पिशाचों  के  ही  हैं  l  आज  स्थिति  ये  है  कि  संसार  को  नहीं  सुधार  सकते  l  अब सब  व्यक्तिगत  है  , जो  अच्छा  व  श्रेष्ठ  जीवन  जीना  चाहे  ,  वह  इस  कीचड़  में  कमल  की  तरह  रह  सकता  है  l  अपनी  कम्युनिटी  में खींचने  के  लिए  भूत -पिशाच  उस  पर  बहुत आक्रमण  करेंगे  ,  लेकिन  यदि   एक सच्चा  और  श्रेष्ठ  इन्सान  बनने  का  संकल्प  लिया  है   तो  ब्रह्माण्ड  की  दिव्य  शक्तियां  उसकी  मदद  अवश्य  करेंगी  l  

7 February 2026

WISDOM ----

   कांची नरेश  की  राजकुमारी  प्रेत  बाधा  से  पीड़ित  थी  l  भूत  सामान्य  नहीं  था , वह  ब्रह्म राक्षस  था  l  राजा  ने  श्री  रामानुज  को  बुलाया  l   रामानुज  ने  वहां  जाकर   जब  राजकुमारी  को  देखा  तब  सब  समझ  गए  और   पूछा  ---- "  आपको  यह  योनि  क्यों  मिली  l "  ब्रह्मराक्षस  रो -रोकर  बोला  ---- "  मैं  विद्वान  था  ,  किन्तु  मैंने  अपनी  विद्या  छिपाकर   रखी  l  किसी  को  भी  मैंने  विद्यादान नहीं  किया  ,  इससे  मैं  ब्रह्मराक्षस  हुआ  l  आप  समर्थ  हैं  ,  मुझे  इस  प्रेतत्व  से  मुक्ति    दिलाइये  l "  श्री  रामानुज  ने  राजकुमारी के  मस्तक  पर  हाथ  रख  कर  जैसे  ही  भगवान  का  स्मरण  किया  ,  वैसे  ही  ब्रह्मराक्षस   ने  राजकुमारी  को  छोड़  दिया  ,  क्योंकि  वह  स्वयं  प्रेत योनि  से  मुक्त  हो  गया  l  उस  दिन  से  श्री  रामानुज  ने  प्रतिज्ञा  की   कि  वह  स्वाध्याय  का  लाभ   अपने  समाज   को  भी  देते  रहेंगे  l  

4 February 2026

WISDOM

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते हैं  ---- 'किसी  को  भी  असफलता  मिलने पर  निराश  होकर  नहीं  बैठना  चाहिए  l  प्रयासरत  रहना  चाहिए  , किसी  न  किसी  क्षेत्र  में  सफलता  अवश्य  मिलेगी  l   जिस  तरह सीढ़ियाँ  चढ़ने  में सावधानी   बरती  जाती  है  ,  अतिशीघ्रता में  कभी-कभी  पाँव  फिसलने  व  गिरने  का  भी  डर   रहता  है  ,  उसी  तरह  मंजिल  तक  पहुँचने  के लिए   बढ़ाये  जाने  वाले  क़दमों  में  भी   सावधानी  का  ध्यान  रखना  जरुरी  है  l  मंजिल  तक  ले  जाने  वाला   हमारा हर  प्रयास  महत्वपूर्ण  होता  है  l  "  पंचतंत्र  की  एक  कहानी  है  ---------------- एक  जंगल  में  दो  पक्षी  रहते  थे  l  उस  जंगल  में   एक    छोर  पर  एक  वृक्ष  था  ,  जिसमें  वर्ष  में  एक  बार  स्वादिष्ट  फल  लगते  थे  l  जब  फलों  का  मौसम  आया  ,  तो  जंगल  के  दोनों  पक्षियों  ने  वहां  जाने  की  योजना  बनाई  l  पहले  पक्षी  ने  दूसरे  पक्षी  से  कहा  --- "  वह  वृक्ष  यहाँ  से  बहुत  दूर  है  ,  इसलिए  मैं  तो  आराम  से  वहां  पहुँच  जाऊँगा  l  अभी  फलों  का  मौसम  दो  माह  रहेगा  l "  इस  बात  पर  दूसरे  पक्षी  ने  कहा  ---- " नहीं  मित्र  !  मुझसे  तो  रहा  नहीं  जा  रहा  है  l  उन  स्वादिष्ट  फलों  के  बारे  में  सोचकर  ही  मेरे  मुँह  से  पानी  आ  रहा  है   l  इसलिए  मैं  तो  एक  ही  उड़ान  में  वहां  पहुंचकर   मीठे  फल  खा  लेना  चाहता  हूँ  l "  दूसरे  दिन  दोनों  पक्षी  अपने  घोंसले  से  निकलकर  उस  वृक्ष  की  ओर  उड़  चले  l  कुछ  दूर  जाने  पर  पहले पक्षी  को  थकान  होने  लगी  ,  तो  वह  विश्राम  करने  के  लिए  एक  वृक्ष  की  टहनी  पर  ठहर  गया  l  वहीँ  दूसरा  पक्षी  उसे  ठहरा  हुआ  देखकर  मुस्कराया  और  तेजी  से  फलों  की  ओर  उड़ने  लगा  l  थकान  तो  उसे  भी  थी   लेकिन  उसे  फल  खाने  की  जल्दी  थी  l  अब  उसे  दूर  से  ही  फलों  वाला  वृक्ष  दिखाई  देने  लगा  l  फलों  की  सुगंध  भी  उसे  आने  लगी  ,  लेकिन  तभी  उसके  पंख  लड़खड़ाए  क्योंकि  वह  बुरी  तरह  थक  चुका  था  l  वह  आसमान  से  जमीन  पर  जा  गिरा  l  उसके  पंख  बिखर  गए   और  वह  उन  फलों  तक  कभी  नहीं  पहुँच  सका  l  दूसरी  ओर  पहला  पक्षी  जो  रुक -रूककर  आ  रहा  था  ,  वह  फलों  तक  आराम  से  पहुँच  गया  l  और  उसने  जी  भरकर  स्वादिष्ट  फल  खाए  l  इस  कहानी  से  हमें  यही  शिक्षा  मिलती  है   कि  एक -एक  कदम  चलकर  ही  हम  अपने  लक्ष्य  को  प्राप्त  कर  सकते  हैं  l  साथ  ही  लक्ष्य  तक  पहुँचने  के  लिए   जितना  महत्त्व  श्रम  व  प्रयास  का  है  ,  उतना  ही महत्त्व  विश्राम  का  भी  है  l  विश्राम  करने  से  ही  हमें  आगे  बढ़ने  के  लिए  ऊर्जा  मिलती  है  l