इस संसार में अच्छाई - बुराई , अंधकार और प्रकाश का अस्तित्व है l इस अस्तित्व का व्यवहारिक रूप हमें संसार में मनुष्यों की आदतें , उनके कार्य करने के तरीके , उनके गुण -अवगुण आदि के द्वारा समझ में आता है l यह संसार एक रंगमंच है और व्यक्ति को इस नाटक में कौन सा पार्ट अदा करना है यह उसके पूर्व में किए गए कर्म और उस दिशा में आगे बढ़ने की संभावनाओं पर निर्भर करता है l महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि कोई व्यक्ति अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ता है , सन्मार्ग पर चलकर , सत्कर्म कर के अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए प्रत्यनशील है तो उसके मार्ग में अनेक बाधाएं आएँगी l वास्तव में ये बाधाएं नहीं हैं , ये ईश्वर द्वारा ली जाने वाली परीक्षाएं हैं l इन परीक्षाओं में मुख्यतः चार पेपर ही होते हैं ---- काम , क्रोध , लोभ और मोह l ये पेपर पहले से ही लीक होते हैं l यदि मनुष्य अपने भीतर की कमियों को जानता है तो वह आसानी से समझ सकता है कि कौन सा पेपर सबसे कठिन होगा जैसे कोई व्यक्ति मंत्र जप , नाम स्मरण , नेक कर्म आदि विभिन्न सात्विक तरीकों से अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ रहा है लेकिन उसमें काम वासना बहुत है , धन का लालच बहुत है तो उसके मन को लुभाने के अनेक प्रस्ताव उसके सामने आएंगे ताकि उनकी टांग खींचकर नीचे धकेला जा सके l अब ईश्वर स्वयं तो परीक्षा लेने आते नहीं हैं , इन परीक्षाओं का कंट्रोल रूम बुरे लोगों के पास होता है जिनके पास लोगों को सताने के अनेक तरीके होते हैं , साम , दाम , दंड , भेद , छल , कपट , षड्यंत्र , तंत्र , मंत्र , ब्लैक मैजिक आदि अनेक तरीकों से वे जी -तोड़ कोशिश करते हैं कि व्यक्ति आगे न बढ़ पाए , नीचे गिरकर उनकी आसुरी प्रवृत्ति में सहयोगी हो जाए l यही परीक्षा है l कर्मों की गति को यदि हम समझें तो यहाँ ' एक पंथ , दो काज ' हैं l बुरे लोगों के माध्यम से अध्यात्म पथ के पथिक की परीक्षाएं भी हो जाती हैं , और अनेक बुरे कर्म करते -करते उनका पाप का घड़ा भी भरता जाता है l जो सन्मार्ग पर हैं वे पुण्य कर्म कर के अपना पुण्य का घड़ा भरते जाते हैं , अध्यात्म -पथ पर आगे बढ़ते जाते हैं l यदि कोई भूल हो गई , नीचे लुढ़क गए तो ईश्वर उन्हें पुन: आगे बढ़ने का - ऊपर उठने का मौका अवश्य देते हैं l अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने का मौका तो भगवान सभी को देते हैं लेकिन जिनकी बुद्धि पापकर्म में लिप्त है वे उसे समझ नहीं पाते , वे स्वयं को ही भगवान समझते हैं l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं --- सत्कर्म करो , सन्मार्ग पर चलो , गायत्री मंत्र का जप करो ताकि हमारे प्रारब्ध के जो भी बुरे कर्म हैं , वे कट जाएँ , समाप्त हो जाएँ और युग - परिवर्तन जैसे श्रेष्ठ कार्यों के लिए , ईश्वरीय योजना में सहयोग देने के लिए हमारा चयन हो सके l
29 September 2026
19 September 2026
WISDOM ------
कहते हैं जो कुछ महाभारत में है वही इस धरती पर भी है और अहंकार एक ऐसा रोग है जो शक्ति और सम्पन्नता के साथ रहने वाला असाध्य रोग है l इस अहंकार को किसी की सलाह पसंद नहीं है , किसी ने भी उनके अहं को चुनौती दी तो खैर नहीं ! यह स्थिति प्रत्येक युग में रही है l महाभारत में विदुर नीति निपुण , महाज्ञानी थे l धृतराष्ट्र को राज-काज संबंधी सही सलाह देते थे , कभी कुछ ऐसी सलाह दी जो युवराज दुर्योधन को सहन न हो सकी और उसने विदुर जी को राजमहल से , सभी राज सुख से बाहर कर दिया और तब विदुर जी महल से बाहर कुटिया बनाकर रहने लगे l उस समय ऐसे अपराध का यही दंड था , जेल या किसी प्रकार का उत्पीड़न नहीं था l ऐसी परिस्थिति में रहने पर विदुर जी का स्वाभिमान से जीवन जीना प्रेरणादायी है l उनके जीवन की श्रेष्ठता ऐसी थी कि उन्हें ईश्वर की कृपा मिल गई थी और जिसे ईश्वर की कृपा मिल जाए , उसके लिए सिंहासन , राजसुख सब मिटटी के समान हैं l विदुर जी के सामने दुर्योधन की सबसे बड़ी हार यही थी कि स्वयं भगवान कृष्ण दुर्योधन के राजमहल के मेवा , पकवान त्याग कर विदुर जी के यहाँ साग -रोटी खाकर तृप्त हुए l सुख कभी स्थायी नहीं होता , जिन्हें राज सुख का लालच था , अत्याचार और अनीति का साथ देने के कारण दुर्योधन के साथ उनका भी अंत हुआ l
17 September 2026
WISDOM ----
प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं है l जैसे कर्म किए हैं वैसा ही फल अवश्य मिलेगा लेकिन यह कब और किस रूप में मिलेगा , इसे काल निश्चित करता है l अब वर्तमान समय में लालच , स्वार्थ , अहंकार , महत्वाकांक्षा ----- आदि बुराइयाँ इतनी बढ़ गईं हैं कि किसी को अपराधी घोषित करने और दंड देने से पहले अपना स्वार्थ आड़े आ जाता है l सामान्य जन भी अपने स्वार्थ और डर की वजह से भी अपने परिवार और समाज के अपराधियों को सहर्ष स्वीकार करते है l यह सब कुछ नया नहीं है , महाभारत में भी धृतराष्ट्र पुत्र मोह में अंधे थे l दुर्योधन बाल्यकाल से ही पांडवों के विरुद्ध षडयंत्र करता रहा लेकिन धृतराष्ट्र ने , भीष्म पितामह ने उस पर कोई नियंत्रण नहीं रखा l उसे उसकी गलतियों की कभी कोई सजा नहीं दी , उसकी उद्दंडता बढ़ती ही गई l लेकिन ईश्वरीय विधान ऐसा नहीं है l ईश्वर को संसार के प्रत्येक व्यक्ति के हर पल की , उसकी उठती -गिरती सांसों की जानकारी है l सबका लेखा -जोखा ईश्वर के पास है l संसार के नियम -कानून अपराधी को दंड दें या न दें , ईश्वर की लाठी से कोई बच नहीं सकता l पुण्य किए हैं तो उनका फल सुख -वैभव के रूप में अवश्य मिलता है l जिस स्तर का पाप व्यक्ति करता है , वैसा ही दंड उसे मिलता है l छल , कपट षड्यंत्र , धोखा , लोगों को योजना बनाकर शारीरिक और मानसिक रूप से उत्पीड़ित करना --ऐसे अपराध हैं जिनकी क्षमा नहीं होती , ईश्वरीय दंड इतना कठोर होता है कि देखने वालों की रूह काँप जाए l ईश्वरीय विधान में एक विशेष बात यह है कि हमारे लिए हमारा यह एक जन्म है लेकिन ईश्वरीय विधान में यह मनुष्य की एक यात्रा है , यात्रा के किस पड़ाव पर पाप और पुण्य के फल मिलेंगे , यह मालूम करना मनुष्य के वश में नहीं है l ऋषि कहते हैं --होश में रह कर जीवन जिओ , किसी का अच्छा नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं , किसी का बुरा मत करो l और इस सत्य को स्वीकार करो कि जब हम किसी का बुरा नहीं कर रहे तो हमारा भी बुरा नहीं होगा l
9 September 2026
WISDOM -----
मनुष्य के जीवन में सुख -दुःख दिन और रात की तरह आते -जाते रहते हैं l सुख का समय तो बहुत जल्दी बीत जाता है लेकिन दुःख और कष्ट का समय , मन को शांत रखते हुए व्यतीत करना बहुत कठिन होता है l ऐसे में हमारे ऋषियों ने , संतों ने ईश्वर विश्वास और ईश्वर शरणागति की सलाह दी है l गीता में भी भगवान ने अंत में यही कहा है कि ईश्वर की शरण में जाओ l ईश्वर विश्वास और ईश्वर शरणागति कब काम करती है , इसे स्वयं ईश्वर ने ही महाभारत और रामायण और अन्य पुराणों में विभिन्न प्रसंग और कथाओं के माध्यम से स्पष्ट किया है l ---- महाभारत का ही प्रसंग है ---- जब दु:शासन महारानी द्रोपदी को उनके केश खींचते हुए भरी सभा में घसीटता हुआ लाया l उसकी मंशा उनके चीर-हरण की थी l पांचाली ने सभा में बैठे हुए भीष्म पितामह , गुरु द्रोणाचार्य , धृतराष्ट्र और कुलगुरु आदि सभी को पुकारा l अपने पांचों पतियों को पुकारा लेकिन पासे के खेल में हार जाने के कारण वे सभी सिर झुका कर चुप थे , चारों तरफ सन्नाटा था l कोई भी पांचाली की मदद को आगे नहीं आया l सब ओर से निराश होने पर द्रोपदी ने श्रीकृष्ण को पुकारा l कहते हैं नारद जी भगवान श्रीकृष्ण के पास गए और कहा --- हस्तिनापुर की राजसभा में यह कैसा अनर्थ हो रहा है , पांचाली आपको पुकार रही है , आप कृपा कर के उसकी रक्षा के लिए जाएँ ----- l भगवान श्रीकृष्ण नारद जी से कहते हैं --- देखो नारद , मैं स्वयं कर्मों के विधि -विधान से बंधा हुआ हूँ , पांचाली का बहीखाता देखो , उसने ऐसा कोई पुण्य कर्म किया है कि मैं उसकी रक्षा के लिए जाऊं l नारद जी कहते हैं --- मैं भूला नहीं हूँ l भगवान ! जब आपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था , तब आपकी अंगुली से रक्त बहने लगा था l सब रानी -महारानी उस सभा में थीं , उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें तब महारानी द्रोपदी ने अपनी कीमती साड़ी फाड़कर आपकी अंगुली में पट्टी बाँधी थी l ' उसी एक चीर के बदले भगवान ने द्रोपदी का चीर अनंत कर दिया l दु:शासन का दस हजार हाथियों का बल भी द्रोपदी का कुछ नहीं बिगाड़ सका l वह थक -हारकर जमीन पर गिर गया l ----- पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं --- " सत्कर्म का कोई भी मौका हाथ से न जाने दो l सत्कर्मों की पूंजी ही विभिन्न विपदाओं से हमारी रक्षा करती l आचार्य श्री ने बहुत ही सरल ढंग से समझाया है कि यदि हम ऐसी जगह पर या ऐसी परिस्थिति में हैं जहाँ सत्कर्म का कोई भी अवसर हमें नहीं मिलता तो हम मन में ही गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र का जप करें , इससे प्रकृति को पोषण मिलता है , वातावरण में फैली हुई नकारात्मकता दूर होती है l प्रकृति ही ईश्वर है , जब ईश्वर प्रसन्न हों , उनकी कृपा मिले तब तो असंभव भी संभव है l
8 September 2026
WISDOM -------
पुराणों की कथाएं मनुष्य को जीवन जीना सिखाती हैं l मनुष्यों के विवेक को जाग्रत करने के लिए ये कथाएं हैं l एक कथा है ---- समुद्र मंथन में जब हलाहल विष निकला तो देवता और दानव सब के सामने यह बड़ी समस्या थी कि इस विष का क्या करें तब भगवान शिव ने संसार के कल्याण के लिए इस हलाहल विष को अपने गले में धारण किया , न उगला , न पिया l यह विष उनके गले में ही रहा और वे नीलकंठ कहलाए l इस कथा का शिक्षण यही है कि विषाक्तता को न तो आत्मसात करें और न ही उसे विक्षुब्ध होकर उछालें l इसे हम सरल ढंग से इस तरीके से समझा सकते हैं कि जो कुछ भी नकारात्मक है उसकी बार -बार चर्चा न करें क्योंकि बुराई में आकर्षण होता है इसे लोग बहुत जल्दी सीख जाते हैं l आज संसार में इतनी अशांति , अपराध , क्रूरता क्यों है ? क्योंकि हमने प्रति वर्ष रावण को जीवित किया l रावण के गुणों की , उसकी विद्वता की चर्चा नहीं की , उसके नकारात्मक पक्ष की बार -बार चर्चा कर उसे जलाने का नाटक किया l यही कारण है कि आज रावण सारे संसार में लोगों के विचारों में जीवित हो गया l रावण अपने राक्षसों को धरती के कोने -कोने में आतंक मचाने भेजा करता था , ये राक्षस आतंक मचाते , लोगों को सताते , ऋषियों के यज्ञ आदि पवित्र कार्यों को नष्ट कर देते थे l वही स्थिति आज भी है , अंतर केवल इतना है कि पहले एक रावण था , अब बहुत हैं l क्रूरता भरी , संवेदनहीन जितनी भी घटनाएँ संसार में घट रहीं हैं उनके पीछे कोई न कोई रावण अवश्य है l नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों से ही समाप्त किया जा सकता है l जागरूकता की जरुरत है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- ' विचार एक संसाधन है जिसे नियंत्रित , संयमित और उपयोगी बनाकर अनेक चमत्कार और आश्चर्यजनक परिणाम उत्पन्न किए जा सकते हैं l '
3 September 2026
WISDOM ------
लालच और स्वार्थ ये ऐसे दुर्गुण हैं जिनकी प्रत्येक युग में निंदा की गई है l यदि ये दुर्गुण किसी साधारण व्यक्ति में होते हैं तो इससे उसकी स्वयं की और उसके परिवार एवं कुछ निकट के लोगों की ही हानि होती है लेकिन यदि ये दुर्गुण समाज को दिशा देने वाले किसी व्यक्ति हों , ऐसे व्यक्ति जो समाज के एक बहुत बड़े भाग को प्रभावित करते हैं तो ऐसे दुर्गुणों से सम्पूर्ण समाज की इतनी बड़ी हानि होती है जिसका आंकलन करना कठिन है l जैसे गुरु द्रोणाचार्य को शस्त्र और शास्त्र दोनों का ज्ञान था l वे प्रारम्भ में बहुत निर्धन थे लेकिन कौरव और पांडवों को शिक्षा देने के दौरान उन्हें राजसत्ता के निकट रहने का सुख मिला , राजमहल के सब सुख उन्हें मिले l इस सुख -वैभव में वे इतने बंध गए कि कौरवों और पांडवों की शिक्षा के बाद भी वे राजमहल से जा न सके l दुर्योधन युवराज था , सारा जीवन द्रोणाचार्य ने दुर्योधन का नमक खाया इसलिए यह जानते हुए भी कि दुर्योधन अनीति और अधर्म की राह पर है , वे उसका विरोध न कर सके , उसकी प्रत्येक अनीति पर वे मौन रहे अर्थात मौन रहकर दुर्योधन की अनीति , छल -कपट षडयंत्र का समर्थन किया l इतने महान , नीति और धर्म के ज्ञाता , शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता का समर्थन जब उसे मिला तब उसके अहंकार को और अधिक बल मिला , उसने पांडवों को सुई की नोक बराबर भूमि देने से मना कर दिया , इसका परिणाम महाभारत तो होना ही था l गुरु द्रोणाचार्य का सम्पूर्ण जीवन और उनका अंत आज के धर्म गुरुओं के लिए एक चेतावनी है कि जीवन की आवश्यकताओं के लिए धन जरुरी है लेकिन सुख -वैभव से बंध जाना गलत है l इस संसार में एक नहीं अनेक दुर्योधन और दु:शासन हैं जो अपने स्वार्थ के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं l
1 September 2026
WISDOM
कहते हैं जो कुछ महाभारत में है , वही इस धरती पर है और बहुत कुछ ऐसा भी है जिसके धरती पर होने के संकेत हैं l महाभारत के युद्ध के लिए कहा जाता है --' न भूतो , न भविष्यति ' l स्वयं भीष्म पितामह ने कहा था कि इस युद्ध के कारण यह धरती शूरवीरों से रहित हो जाएगी l-------------------- महाभारत के युद्ध में भीष्म जैसे महा योद्धा को पराजित करना किसी भी योद्धा के लिए संभव नहीं था लेकिन ईश्वर ने सब की मृत्यु का विधान रचा है l पांडवों के प्रार्थना करने पर उन्होंने स्वयं युधिष्ठिर को बताया कि अर्जुन के रथ पर यदि कोई स्त्री बैठी होगी तो वे वीरोचित प्रतिष्ठा के कारण अपना धनुष रख देंगे , और तब उन्हें पराजित करना संभव होगा l अर्जुन ने शिखंडी को अपने रथ में आगे बैठाया , तब भीष्म पितामह ने कोई बाण नहीं चलाया और अर्जुन के बाणों से घायल होकर धरती पर गिर पड़े l यह शिखंडी कौन थी ? इसी प्रश्न के उत्तर में इस युग के लिए कोई संकेत स्पष्ट होता है l शिखंडी , ' शिखंडी ' कैसे बन गई इसकी एक कथा है ---संक्षेप में काशिराज की तीन अति सुन्दर कन्याएं थी l भीष्म पितामह ने अपने भाई विचित्रवीर्य के विवाह के लिए स्वयंवर मंडप से उन तीनो का हरण कर लिया l उनमें से दो का विवाह तो विचित्रवीर्य के साथ हो गया लेकिन तीसरी कन्या जिसका नाम अम्बा था वह राजा शाल्व को अपना पति मान चुकी थी इसलिए पितामह ने उसे राजा शाल्व के पास भेज दिया l लेकिन अब राजा शाल्व ने दूसरे की जीती हुई कन्या से विवाह करने को मना कर दिया l बेचारी अम्बा छ वर्ष तक राजा शाल्व और हस्तिनापुर के बीच ठोकरें खाती रही , रो -रोकर उसके आँसू सूख गए राजा शाल्व और विचित्रवीर्य , किसी ने भी उससे विवाह नहीं किया l अब वह भीष्म पितामह को अपने दुःख का कारण मान कर उनसे बदला लेने के लिए अनेक राजाओं के पास मदद के लिए गई लेकिन भीष्म जैसे वीर और महान योद्धा से टक्कर लेने की हिम्मत किसी में न थी l सब तरफ से निराश होकर उसने भगवान शिव की तपस्या की l प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे वरदान दिया कि इस जन्म में तो नहीं , अगले जन्म में तुम्हारे हाथों भीष्म की मृत्यु होगी l अम्बा में अब इतना धैर्य नहीं था कि वह मृत्यु का इंतजार करे , उसने धधकती हुई आग में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी और अगले जन्म में उसने महाराज द्रुपद के यहाँ कन्या रूप में जन्म लिया , उसे पिछले जन्म की सब बातें याद थीं l उसने वन में पुन : कठोर तपस्या की और अपने तपोबल से वह पुरुष बन गई और उसने अपना नाम शिखंडी रख लिया l भीष्म पितामह इस सत्य को जानते थे इसलिए उन्होंने शिखंडी को देखकर अपने सब अस्त्र -शस्त्र नीचे रख दिए l भीष्म पितामह के गिरते ही यह निश्चित हो गया कि दुर्योधन के अत्याचार और अन्याय का अंत निकट है l ----इस प्रसंग से इस युग के लिए यही संकेत मिलता है कि अत्याचार , अन्याय के अंत के लिए शिखंडी को ही आगे आना पड़ेगा l पुरुष वर्ग अपने विकारों से ग्रस्त है, उनमें सुधार संभव नहीं दीखता l महिलाओं को स्वतंत्रता मिली , लेकिन महिलाओं के एक बड़े भाग ने अपनी स्वतंत्रता का सदुपयोग नहीं किया , अपने कर्तव्यों से विमुख हो गईं l स्वतंत्रता में स्वछंदता का जो थोड़ा भी अंश आ गया तो नवयुग के निर्माण में उसका योगदान कैसे संभव होगा ? महाभारत सत्य है तो एक नए नए युग के निर्माण में शिखंडियों की भूमिका सराही जाएगी l
31 August 2026
WISDOM -------
इस परिवर्तनशील संसार में एक ही अटल सत्य है और वह है -' मृत्यु ' l जो भी इस धरती पर आया है उसे एक दिन जाना ही है और यह कब और कैसे जाना है , यह सब पहले से ही निश्चित है l किसी प्राणी की मृत्यु जहाँ भी होनी है वह स्वयं ही उस स्थान पर पहुँच जाता है ---' तुलसी जसी तस भव्यता तैसी मिले सहाय , आप न आवे ताहि पे , ताहि तहां ले जाए l " आचार्य श्री कहते हैं ---- जीवन को ऐसे जिओ कि मृत्यु भी एक उत्सव बन जाए l मृत्यु के बाद क्या होगा , कोई नहीं जानता लेकिन हमारे महाकाव्यों के अध्ययन से एक बात समझ में आती है कि यदि मृत्यु के समय ईश्वर हमारे सामने हों या ईश्वर का नाम हमारी जुबां पर हो तो मुक्ति मिल जाती है जैसे रावण को राम ने ही मारा , ईश्वर उसके सामने थे , वह सीधा भगवान के धाम ही गया l महाभारत का युद्ध हुआ l दुर्योधन आदि कौरवों ने कितने छल -कपट , षडयंत्र किए लेकिन युद्ध भूमि में उस समय स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उपस्थित थे , सभी को अपने अंतिम समय में उनके दर्शन हुए इसलिए वे सब स्वर्ग के अधिकारी हुए लेकिन इस कलियुग में ईश्वर के दर्शन संभव नहीं हैं इसलिए ऋषियों ने कहा है कि हर पल ईश्वर का नाम -स्मरण करो l अंतिम समय में भी ईश्वर का नाम मन में गूंजेगा तो मृत्यु का कष्ट भी कम होगा और मुक्ति भी मिलेगी l ऋषि कहते हैं ---' भज ले हरि नाम अरे रसना , फिर अंत समय में हिली न हिली l ' अंत समय में तो जीवन में किए गए सारे भले -बुरे कर्म आँखों के सामने एक फिल्म की तरह चलते हैं इसलिए ईश्वर के 'नाम -स्मरण ' की प्रैक्टिस शुरू से ही करनी चाहिए जैसे महात्मा गाँधी ने जीवन भर राम का नाम लिया तो अंत समय में भी उन्होंने ' हे राम ! ' कहा और हाथ जोड़कर मृत्यु को स्वीकार किया l
28 August 2026
WISDOM -----
विधाता ने स्रष्टि की रचना की l पशु -पक्षी , पौधे -वनस्पति और अंत में मनुष्य की रचना की l विधाता ने केवल मनुष्यों में ही ऐसी विशेषता दी , बुद्धि दी कि वे सन्मार्ग पर चलकर , सत्कर्म कर के अपनी चेतना के उच्च से उच्चतम स्तर तक पहुँच सकते हैं l लेकिन विधाता ने इस मार्ग को इतना आसान नहीं बनाया l इस मार्ग में अनेक बाधाएं उपस्थित कर दीं l ये बाधाएं कोई बाहरी नहीं हैं , ये मनुष्य के भीतर छुपे विकार हैं l जब भी कोई व्यक्ति सन्मार्ग पर चलता है , अपने इष्ट को प्रसन्न करने के लिए मंत्र जप करता है , सत्कर्म कर के अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाना चाहता है , या कहें कि श्रेष्ठता के पथ पर चलकर ईश्वर का अनुभव करना चाहता है तो उसके भीतर के विकार --काम , क्रोध , लोभ ,मोह , अहंकार , स्वार्थ उसके सामने मजबूती से खड़े हो जाते हैं l व्यक्ति में जो कमजोरी सबसे ज्यादा है , उसी का आक्रमण तीव्र गति से होता है जैसे किसी में लोभ लालच है और वह मन्त्र जप आदि श्रेष्ठ कार्यों से अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहता है , तब उसके सामने ऐसे अधिकाधिक धन कमाने के प्रस्ताव आ जाएंगे , जिसका परिणाम वह जानता होगा कि गलत होगा लेकिन लालच ऐसा सिर पर चढ़ जायेगा कि वह भटक जायेगा l इसी तरह जिसमें काम वासना अधिक है , उसे लुभाने के , भटकाने के अनेकों वार उस पर होंगे l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं --- यह आग का दरिया है , गुरु कृपा से ही इस दरिया से पार पाना संभव है और जो इस दरिया को पार कर लेता है वह कुंदन की भांति चमकने लगता है l ' विकारों के यह आक्रमण एक बार नहीं होते , बार -बार ईश्वर परीक्षा लेते है l अध्यात्म -पथ की राह बहुत कठिन है l मनुष्य अपने ही मन का गुलाम है , अपने ही विकार , मानसिक विकृतियों की वजह से वह इस शरीर रूपी मंदिर से अनेक पापकर्म करता है l जन्म -जन्मांतर के पापकर्म इकट्ठे होते जाते हैं l अनेक पाप कर्म सामूहिक होते हैं , सोच -समझ कर योजना बना कर पाप , अपराध युगों से इस धरती पर हो रहे हैं l मनुष्य पशु और पिशाच तुल्य पापकर्म करता है l जब धरती पर इन पापों का बोझ बहुत बढ़ जाता है , तब प्रकृति का दंड विधान शुरू हो जाता है , ईश्वर का न्याय होता है l व्यक्तिगत स्तर पर भी लोगों को उनके पाप का दंड मिलता है और सामूहिक दंड विधान के अंतर्गत बाढ़ , भूकंप , सुनामी , युद्ध आदि तबाही के अनेक रूपों में प्रकृति का क्रोध , उसका विकराल रूप हमें देखने को मिलता है l मनुष्य ने ईश्वरीय विधान के अनुरूप अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने का कोई प्रयास नहीं किया l पशु और पशु स्तर से भी नीचे गिरकर पिशाचों की भांति कुकृत्य किए हैं , इन्ही सब का परिणाम हुआ कि अनेक सभ्यताओं का अंत हो गया , उनका नामोनिशान मिट गया , राजे -महाराजे , महान कुल -वंश न जाने कहाँ काल के गर्त में समा गए l प्रकृति हमें बार -बार चेतावनी देती है l स्वयं को बनाना और मिटाना मनुष्य के ही हाथ में है l ' जिओ और जीने दो ' l विकारों का अंत तो संभव नहीं है लेकिन उनको मर्यादित कर के मानव जाति और इस सभ्यता की रक्षा संभव है l
22 August 2026
WISDOM -----
हमारे महाकाव्य हमें बहुत कुछ सिखाते हैं l महाभारत की कथा महर्षि व्यास की ओजपूर्ण वाणी से प्रवाहित हुई और गणेश जी की अथक लेखनी ने उसे लिपिबद्ध किया l महाभारत के विभिन्न प्रसंग इस युग में , इस धरती पर वैसे ही हैं जैसे उस युग में थे l छल , कपट , षड्यंत्र , धोखा , अहंकार ---सब कुछ वैसा ही है , केवल पात्र बदल गए l कुछ घटनाएँ ऐसी हैं , उनमे छिपे हुए संकेतों को समझा जा सकता है जैसे ----गुरु द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की l उस काल के सब गणमान्य , विचारवान , नीति , अनीति को समझने वाले , महानुभाव सब इस में सम्मिलित थे l कुटिलता से उन्होंने अर्जुन को संशप्तकों के साथ युद्ध में उलझा दिया l अब इस पक्ष में केवल अभिमन्यु ही था , जिसे चक्रव्यूह का ज्ञान था , यह उसने अपनी माँ के गर्भ में था तभी सीख लिया था l यह कैसा युद्ध था , एक ओर 17 -18 वर्ष का युवा अभिमन्यु अकेला था और दूसरी ओर उससे आयु में दुगुने -तिगुने , शक्तिशाली सब एक समूह में थे l द्रोणाचार्य , अश्वत्थामा , कर्ण , जयद्रथ , शकुनि आदि सात महारथी अपने -अपने स्वार्थवश दुर्योधन के साथ थे और सब ने मिलकर अभिमन्यु का वध कर दिया l यह स्थिति आज भी है , चाहे परिवार हो , कोई संस्था हो राष्ट्र हो या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति हो , चक्रव्यूह आज भी रचे जा रहे हैं l उम्र के बढ़ने के साथ कामनाएं , वासनाएं बढ़ती ही जा रही हैं , त्याग का तो नाम ही नहीं है l अभिमन्यु का जब वध हुआ तब वह समय भी युग परिवर्तन का था और कलियुग के इस धरती पर आने की आहट थी , इसलिए ऐसा अनर्थ हुआ l आज का समय भी युग परिवर्तन का है लेकिन अब कलियुग का अंत और सतयुग के आरम्भ होने का समय है इसलिए अब कोई अभिमन्यु नहीं मारा जायेगा , अब आसुरी शक्तियों का अंत होगा l बड़े -बड़े चक्रव्यूह रचने वालों के राज बाहर आयेंगे , अब अभिमन्यु विजयी होगा और चक्रव्यूह में सम्मिलित जयद्रथ , द्रोणाचार्य -----आदि सभी का एक -एक कर के अंत होगा l ईश्वरीय विधान कुछ ऐसा है कि वे बड़े से बड़े महापपियों को भी सुधरने का पूरा मौका देते हैं , विभिन्न संकेतों से उन्हें समझाते भी हैं कि अनीति , अत्याचार का साथ मत दो वरना अंत बहुत बुरा होगा l जो इन संकेतों को समझ जाये तो ठीक है अन्यथा यम के दूत तो तैयार हैं l कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है चाहे हँसकर भोगो या रो -रोकर भोगो l
19 August 2026
WISDOM -----
संसार में बहुत लम्बे समय से धर्म पर चर्चाएँ होती रही हैं l कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है , किसका वर्चस्व रहेगा यह सब विवाद बहुत सामान्य हो गया है लेकिन सर्वश्रेष्ठता का पैमाना क्या होगा ? संख्यात्मक वृद्धि या गुणात्मक वृद्धि ? किसे आधार माना जाए l पं . श्रीराम शर्मा जी ने अपने प्रवचनों में बहुत सरल ढंग से समझाया है l आचार्य श्री कहते हैं ---"भगवान को समीप बुलाने का एक ही मार्ग है कि हम ' धर्म पथ ' पर अग्रसर रहें और पात्रता विकसित करें l सत्पात्र की दो ही निशानियाँ हैं ---1 .उसका चरित्र पवित्र और पारदर्शी हो l 2 . उसके ह्रदय में करुणा हो , संवेदना हो l जिस व्यक्ति का व्यक्तित्व ऐसा शानदार और मजबूत होगा भगवान उसके पास खिंचे चले आते हैं l " उनके इन वचनों से यही स्पष्ट होता है कि सद्गुणों से युक्त व्यक्ति जिस भी धर्म में अधिक होंगे वही धर्म सर्वश्रेष्ठ कहलाएगा और वही चिरकाल तक कायम रहेगा l अब समस्या यही है कि कलियुग में पाप , अनीति , अपराध , अत्याचार आदि दुर्गुणों की बाढ़ आ गई है , तो सद्गुण कैसे स्थापित हों ? समाज को दिशा देने वाले ही दिशाभ्रमित हैं , उनके कोरे उपदेशों का कोई असर नहीं होता l आचरण से ही शिक्षा दी जा सकती है लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं जिनके आचरण और व्यवहार में एकरूपता हो l आज की युवा पीढ़ी तो इतनी बुद्धिमान है कि समाज के बड़े -बड़े और जिम्मेदार लोगों का भूत , वर्तमान सब खोज लेती है l बुराई का मार्ग बहुत सरल होता है , पानी नीचे की ओर बड़ी तेजी से गिरता है इसलिए युवा पीढ़ी का भटकना स्वाभाविक है l आज संसार पतन और पराभव की ओर जा रहा है , इस स्थिति को पलटने का और अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने का एक ही मार्ग आचार्य श्री ने संसार को बताया और वह है ---- ' गायत्री मंत्र ' l यदि संसार में सभी लोग इस मन्त्र को अपनी पूजा का अभिन्न अंग बना लें तो नकारात्मकता दूर होगी l व्यक्ति के जीवन में , वातावरण में सकारात्मकता आएगी l आचार्य श्री कहते हैं --- हम मंत्र का अर्थ जाने या न जाने , यदि हम श्रद्धा और विश्वास से मंत्र जप करते हैं तो मंत्र के देवता अवश्य आते हैं और आशीर्वाद देते हैं l '
17 August 2026
WISDOM -----
3 August 2026
WISDOM -------
हमारे पुराणों में जो कथाएं हैं , वे मात्र मनोरंजन के लिए नहीं हैं l उनमें प्रत्येक युग की परिस्थितियों के अनुरूप गूढ़ रहस्य छिपे हुए हैं l ऐसी ही एक कथा है ---- एक असुर जिसका नाम भस्मासुर था , उसने शिवजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और वरदान माँगा कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रख दे , वही भस्म हो जाए l यह वरदान प्राप्त कर उसने धरती पर उत्पात मचाना शुरू कर दिया l गलत सलाह देने वाले प्रत्येक युग में होते हैं , उन्होंने भस्मासुर को सलाह दी कि तुम शिवजी के ही सिर पर हाथ रख दो , उसके बाद उनका सब कुछ तुम्हारा ही होगा l शिवजी ने जब देखा कि भस्मासुर उन्हें ही भस्म करने आ रहा है तो उन्होंने भागकर विष्णुजी के पास शरण ली l तब विष्णुजी ने मोहिनी रूप धारण किया , उसको सम्मोहित कर कहा कि जैसे वे नृत्य करें वैसी ही भाव -भंगिमा वह भी करे l नृत्य की लय के साथ मोहिनी रूप धारी विष्णुजी ने अपने सिर पर हाथ रखा , वैसे ही भस्मासुर ने अपने सिर पर हाथ रखा और वह वहीँ जल कर भस्म हो गया l यह कथा सांकेतिक रूप में बहुत बड़ा शिक्षण देती है ------- ------- आज एक नहीं अनेक भस्मासुर हैं , जो अपने जीवन में अनेक पापकर्म करते हैं और फिर किसी सिद्ध संत -साधक के पाँव पकड़ कर उनकी करुणा को जगा देते हैं , अनेक लोग तरह -तरह के प्रलोभन देकर , कभी भय दिखाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लेते हैं l इन संत -साधकों के पास ज्ञान का तो भंडार है लेकिन ये भी शिवजी की तरह बहुत भोले व सरल होते हैं , आज के युग के लोगों की चालाकी को नहीं समझ पाते l वास्तव में ये भस्मासुर , इन संत -साधकों की समीपता प्राप्त कर उनके पुण्य , उनकी सकारात्मक ऊर्जा को खींच लेते हैं और अपने पापों का बोझ , अपनी नकारात्मक ऊर्जा उन पर उड़ेल देते हैं l ये एनर्जी वैम्पायर हैं , समाज में छुट्टा घूमते हैं और पुण्यात्मा लोगों की एनर्जी चूसकर ऐशोआराम का जीवन जीते हैं l एनर्जी ट्रान्सफर के इनके पास अनेक तरीके हैं l भगवान शिव तो स्वयं महाकाल हैं , यह कथा तो समाज को सचेत करने के लिए है कि अपने ज्ञान से अच्छे-बुरे लोगों की परख करो l अब विष्णु भगवान नहीं आयेंगे , अपनी एनर्जी की स्वयं सुरक्षा करो l हम देखते हैं कि अनेक संत -साधक बहुत नियम संयम से , तपस्वी का जीवन जीने के उपरांत भी बड़े शारीरिक कष्ट में हैं , ईश्वर उन्हें सहन शक्ति देते हैं लेकिन ये बीमारी उनके भाग्य की नहीं है , ये तो पापियों को आशीर्वाद देकर , अपने पुण्य देकर उनके पापों का बोझा ढो रहे हैं l हमारी गंगा मैया भी पापियों का बोझा ढोने से इतनी प्रदूषित हो गईं l विधाता भी न्याय करने से पहले पाप -पुण्य के घड़े को देखते हैं l इस युग के असुर एनर्जी ट्रान्सफर से अपने पाप का घड़ा जब -तब खाली कर लेते हैं और पुण्यात्मा लोगों की एनर्जी पर ठाठ से रहते हैं l यही कारण है कि संसार में असुरता कम नहीं हो रही है l
1 August 2026
WISDOM ------
इस संसार में धरती का कोई ऐसा कोना नहीं जहाँ जाति , धर्म , अमीर -गरीब , ऊँच -नीच , रंग -रूप आदि को लेकर भेदभाव न हो l केवल मृत्यु ही ऐसी है जो किसी से कोई भेदभाव नहीं करती , यमराज के सामने सब एक समान हैं l ईश्वर ने सब को गिनती की साँसे दी हैं , जिस पल वह पूरी हो गईं , फिर उसका धरती पर खेल खतम l l कहते हैं जब मनुष्य का जन्म होता है तब विधाता आते हैं , उसका भाग्य लिख देते हैं जिसमें यह भी लिखा होता है कि उसकी मृत्यु कब और कैसे होगी l एक कथा है ----- राजा विक्रमादित्य रात्रि को वेश बदल कर राज्य का भ्रमण करते थे l भ्रमण करते हुए वे बहुत दूर निकल गए l वहां उन्हें एक झोपड़ी से कुछ आवाज आ रही थी , उन्होंने वहीँ रुकने का निश्चय किया और उसका दरवाजा खटखटाया l किसान बाहर निकला , राजा ने कहा --मैं आज रात यहाँ विश्राम करना चाहता हूँ , सुबह चला जाऊँगा l किसान ने कहा ---मेरी झोपड़ी बहुत छोटी है और पत्नी को प्रसव पीड़ा हो रही है अत: आप बाहर विश्राम करे l राजा तो वेश बदले हुए थे बाहर विश्राम करने लगे l कुछ समय बाद शिशु के रोने की आवाज आई , किसान ने बताया कि पुत्र हुआ है l उस समय राजा विक्रमादित्य ने किसी को झोपड़ी में प्रवेश करते देखा , उन्होंने तुरंत उसे रोक लिया और कहा --कौन हो तुम ? इतनी रात्रि में यहाँ क्यों जा रहे है ? उसने कहा ---मैं विधाता हूँ , इस शिशु का भाग्य लिखने जा रहा हूँ l थोड़ी देर बाद जब विधाता लौटे तो राजा विक्रमादित्य ने तलवार निकलकर उनका रास्ता रोक लिया और कहा कि बताओ , तुमने उस बच्चे के भाग्य में क्या लिखा ? विधाता ने कहा --यह बताया नहीं जाता , तुम मुझे जाने दो l विक्रमादित्य बहुत वीर थे , वे टस से मस न हुए , उन्होंने विधाता से कहा --केवल इतना बता दो कि इसकी मृत्यु कैसे होगी l तब विधाता को बताना पड़ा कि अमुक तिथि को इसको शेर खा जायेगा l प्रात:काल होने पर राजा ने किसान को अपना परिचय दिया और कहा कि इस बच्चे को अब राजसी सुरक्षा में रखा जायेगा l राजा ने उसकी सुरक्षा के लिए बहुत मजबूत एक हॉल बनवा दिया , इतना मजबूत कि एक परिंदा तो क्या एक चींटी भी उसमे प्रवेश नहीं कर सकती थी l हजारों नौकर , सिपाही उसकी सुरक्षा में लगे थे l राजा को विधाता के लेख को मिटाना था l सुरक्षा के साथ उस बच्चे की शिक्षा व मनोरंजन के लिए सब व्यवस्था थी , दीवार पर विभिन्न जानवरों की तस्वीरें भी थीं l आखिर उसकी मृत्यु की घड़ी आ गई , अन्दर बाहर सब जगह उसकी सुरक्षा के लिए सैनिक तैयार थे , सब अपने हथियार लेकर देखते ही रह गए , दीवार पर शेर की भी तस्वीर थी , उसमें से शेर प्रगट हो गया और बच्चे को खा गया l तब राजा को समझ में आया कि कोई कितना भी वीर क्यों न हो , सुरक्षा के कितने ही साधन हों , मृत्यु को , विधाता के लेख को टाला नहीं जा सकता l
30 July 2026
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ' महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग ' में लिखते हैं ----- " वास्तव में अधिकार पद बड़ा विडम्बनापूर्ण होता है l जब तक वह सक्षम और समर्थ है , लोग उसकी झूठी चाटुकारी किया करते हैं और जब वह असहाय और विवश होता है तो तुरंत आँखे ही नहीं फेर लेते बल्कि न उठने देने के लिए दो धक्के और दे देते हैं l " --- विश्व विजय की कामना लिए हुए जब सिकंदर फारस देश पर आक्रमण करने जा रहा था l सहसा एक स्थान पर उसकी तबियत ख़राब होने लगी , तुरंत तम्बू लगा दिया गया l सिकंदर पेट और ह्रदय-स्थल की पीड़ा से छटपटाने लगा l सिकंदर के साथ यूनान के कई सुयोग्य हकीम आए हुए थे , उन्होंने सिकंदर के शरीर और नाड़ी की परीक्षा की और वे हताश हो गए l उन्हें विश्वास हो गया कि सिकंदर चन्द मिनटों का मेहमान है l सिकंदर असहाय सा हकीमों और सरदारों की ओर सहायता के लिए देख रहा था l इधर सरदार सहायता से यह सोचकर मुँह छिपा रहे थे कि शायद इसकी मृत्यु के बाद यह अधिकार हमें मिल जाए और हकीम सोच रहे थे कि यदि मेरी दवा लेने के बाद मर गया तो लोग यह संदेह करेंगे कि इसे मैंने जानबूझ कर मार डाला , तब बेकार में जान आफत में फंसेगी l उन सब का स्वामी सिकंदर मर रहा था और उसकी मृत्यु की घड़ी देखकर सब अपने -अपने हित की सोच रहे थे l l आचार्य श्री आगे लिखते हैं ---- " जब तक शक्तिमंतों की भुजा में बल , वाणी में प्रभाव और विस्तार पर नियंत्रण रहता है , सभी उसे नमन करते हैं , उसके अत्याचार को वीरता , अनीति को चातुर्य और शोषण को आवश्यकता मानते हैं किन्तु ज्यों ही उसकी ये विशेषताएं समय पाकर क्षीण हो जाती हैं त्यों ही लोगों के मन और द्रष्टिकोण बदल जाते हैं l लोग निर्णायक की तरह उसके जीवन तथा कृत्यों का लेखा -जोखा करने लगते हैं , उसके गुण नीचे पड़ जाते हैं और सारे दोष उभर आते हैं l " आचार्य श्री लिखते हैं ---"सिकंदर का जीवन इस सत्य को सिद्ध करता है , सिखाता है कि बड़े आदमी बनने की अपेक्षा महान कार्य करने की कामना हजार गुनी श्रेष्ठ है l "
29 July 2026
WISDOM -----
कहते हैं जो भी महाभारत में है , वही इस धरती पर है l सब कुछ वैसा ही है , यह हमारा विवेक है कि हम क्या सीखते हैं l कौरवों के कुलगुरु थे --- कृपाचार्य l दुर्योधन ने जीवन भर जितने षडयंत्र किए , छल -कपट किया , कुलगुरु होने के नाते वे दुर्योधन को ऐसा करने से रोक सकते थे , धृतराष्ट्र को भी समझा सकते थे कि ऐसा अन्याय न करें , इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि उन्हें राजसी सुख भोग की आदत हो गई थी और दुर्योधन के विरोध का मतलब था उन राजसी सुखों से वंचित हो जाना l ऐसे ही संत -महात्मा आज के समय में भी हैं , उन्हें अपनी दुकान की चिंता है , वे सब शक्ति और धन -वैभव संपन्न लोगों को खुश करने में लगे रहते हैं l इस युग में जिनके पास पद -प्रतिष्ठा है , धन संपन्न हैं वे भी सोचते हैं की जितनी चाहे मनमानी कर लो , पापकर्म कर लो फिर बड़े -बड़े संत -साधकों से पूजा - पाठ करा लेंगे जिससे सारे पाप धुल जाएंगे l मन्त्र की और विधि -विधान से पूजा -पाठ की ऐसी शक्ति भी है कि ऐसा होता भी है और ऐसे लोगों के सुख - वैभव में कहीं कोई कमी नहीं आती l लेकिन जो साधक - संत उनके लिए इतनी तपस्या करते हैं , इसके लिए उन्हें पर्याप्त धन -राशि , मान -सम्मान तो मिल जाता है लेकिन कहते हैं इसमें उनके पुण्यों का एक बड़ा हिस्सा भी चला जाता है l अब वे विभिन्न नेक कर्मों से इसकी क्षतिपूर्ति कर लें तो ठीक है अन्यथा उन संत -साधकों का पतन शुरू हो जाता है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- अत्याचारी , अन्यायी और मर्यादाहीन आचरण करने वालों का कभी भी साथ न दें , ऐसे लोग स्वयं तो डूबेंगे और जो भी उनके साथ है , उन सब को ले डूबेंगे l महात्मा विदुर ने दुर्योधन के गलत कार्यों का कभी समर्थन नहीं किया राजमहल के सुख छोड़कर बहुत साधारण जीवन जिया l विदुर जी की सत्य -निष्ठा और सादगी की ऐसी ताकत थी कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के स्वादिष्ट पकवान त्याग दिए और विदुर जी के घर जाकर साग -रोटी खा कर ही तृप्त हो गए l
27 July 2026
WISDOM ------
यदि जीवन में कुछ भी खोने का भय न हो और मृत्यु का भी भय न हो तो व्यक्ति निर्भय हो जाता है l वर्तमान युग का जो युवा वर्ग है , वह ऐसा ही निर्भय है l सामान्य वर्ग में हम देखें तो पुत्र के युवा होने पर , उसकी शिक्षा पर पर्याप्त धन खर्च करने के बाद माता -पिता उसकी ओर बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से देखने लगते हैं कि बेटा ! अब कुछ कमाने लगो , अपनी जिम्मेदारी समझो l इस उम्मीद में कई वर्ष बीत जाते हैं फिर भी नौकरी नहीं , कोई निश्चित आय का साधन नहीं तब उस युवक की स्थिति बहुत दयनीय हो जाती है , अड़ोसी -पडोसी , रिश्तेदार और माता -पिता भी ताने देने लगते हैं कि कुछ कमाता नहीं है , बैठा रहता है l अब वह युवक क्या करे ? बहुत मेहनत कर रहा है लेकिन सब व्यर्थ है l बिना कमाई के विवाह भी संभव नहीं है और यदि विवाह हो गया है तो बिना कमाई के परिवार में कोई इज्जत नहीं है l परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत साधारण है तब रोजगार के बिना युवा का जीवन बहुत कठिन है l ऐसे में कुछ निराश होकर आत्महत्या कर लेते हैं , कुछ पलायन कर साधु बन जाते हैं l कोई बहकाने वाला मिल जाये तो उनके कदम अपराध की ओर बढ़ जाते हैं लेकिन जो जागरूक हैं और आशावादी हैं , उन्हें यदि तिनके का भी सहारा मिल जाए तो वे अपने नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूक होकर ' करो या मरो ' पर उतारू हो हो जाते हैं l उनके जोश को देखकर जो युवा निराश हो चुके हैं , उनमे भी ऊर्जा का संचार हो जाता है l संसार के कई देशों में युवाओं के जोश को देखकर ऐसा लगता है जैसे कार्ल मार्क्स की आत्मा ऊर्जा बनकर इन सबके भीतर समां गई है , उन्होंने कहा था --- संसार के मजदूरों एक हो जाओ , तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है ------------' आज का युवा बहुत बुद्धिमान है और संचार के आधुनिक साधनों ने उनकी ऊर्जा को और अधिक शक्तिशाली बना दिया है l अब यह ऊर्जा क्या गजब करेगी यह तो आने वाला समय बताएगा l
26 July 2026
WISDOM ------
महाभारत के विभिन्न प्रसंग हमें शिक्षा देते हैं , सिखाते हैं कि कैसे हमें होश में रहकर जीवन जीना चाहिए l छोटी सी चूक से बहुत बड़ा नुकसान हो जाता है l --महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था l दुर्योधन ने 18 दिन चले इस युद्ध में अश्वत्थामा को सेनापति नहीं बनाया था , संभवतः यह ईश्वर का ही कोई विधान होगा l अब दुर्योधन युद्ध भूमि में घायल पड़ा था l दुर्योधन के मरणासन्न होते ही युद्ध तो समाप्त हो गया था लेकिन उसकी सेना के अश्वत्थामा और कृपाचार्य तो जीवित थे l इधर पांडव विजय का जश्न मनाकर शिविर में निश्चिन्त होकर सो रहे थे l वे भगवान श्रीकृष्ण की शरण में थे इसलिए निश्चिन्त थे l उस समय श्रीकृष्ण ने शिविर में प्रवेश किया और पांचों पांडवों को अपने साथ शिविर से बाहर नदी किनारे चलने को कहा l पांडव आज्ञाकारी थे इसलिए बिना किसी तर्क के वे श्रीकृष्ण के साथ बाहर निकल गए l पांडवों के पाँचों पुत्र वहीँ सो रहे थे , उन्होंने चलने से मना कर दिया l युद्ध भूमि में दुर्योधन की पराजय देखकर अश्वत्थामा क्रोध के कारण अपना विवेक खो बैठा और अर्धरात्रि में उसने पांडवों के शिविर में प्रवेश कर बहुत उत्पात मचाया , कुछ का क़त्ल किया और पांडवों के पांच पुत्र सो रहे थे , उन्हें अँधेरे में पांच पांडव समझ कर उसने उनके सिर काट दिए l अपना विवेक खो देने के कारण उसके भीतर की आसुरी प्रवृत्ति जाग गई थी , उसने पांडवों के वंश का अंत करने के लिए उसने अभिमन्यु की पत्नी उत्तर के गर्भ को लक्ष्य कर ब्रह्मास्त्र चला दिया था ताकि गर्भ में स्थित पुत्र का अंत हो जाये l अश्वत्थामा के इन सब कृत्यों का क्या परिणाम हुआ , इसकी एक पूरी कथा है लेकिन यह प्रसंग हमें शिक्षा देता है कि --- शत्रु को कभी भी कमजोर मत समझो , घायल शत्रु और भी खतरनाक होता है और वह कैसी भी रणनीति बनाकर फिर से आक्रमण कर सकता है l युद्ध में कौरव वंश , उनकी विशाल सेना सभी का अंत हो गया था लेकिन पांडव यह भूल गए कि अभी अश्वत्थामा और कृपाचार्य जीवित हैं l पांडवों की इस भूल ने उन्हें ऐसा दुःख दिया जिसकी भरपाई अब संभव नहीं थी l इसलिए शत्रु से हमेशा सतर्क और सावधान रहना चाहिए l
24 July 2026
WISDOM -----
इस धरती पर जब भी अत्याचार , अन्याय की अति हुई है , ईश्वर ने किसी न किसी रूप में यहाँ अवतार लिया है l संसार के सभी धर्मों में अनेक महान आत्माओं ने जन्म लिया और पूरा प्रयास किया कि असुरता का अंत हो और धरती पर सुख-शांति हो , मनुष्य देवत्व की ओर आगे बढ़ने का प्रयास करे , मनुष्यता से नीचे न गिरे l इन विभिन्न प्रयासों के बावजूद असुरता का अंत नहीं हुआ l अब कहते हैं भगवान कलिक का अवतार होगा l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा है --- अब भगवान का अंशावतार होगा , ईश्वर लोगों की चेतना में प्रवेश करेंगे l उनका कहना है कि असुरों को मारने से असुरता समाप्त नहीं होगी , उनके विचारों में परिवर्तन जरुरी है l ' असुर कहीं आकाश से यहाँ नहीं आए , वे सब परिवार से ही हैं , धन -सम्पन्नता , शक्ति प्राप्त कर वे अहंकारी हो गए , अत्याचारी हो गए और अपनों को ही सताने लगे l अब साम्राज्यवाद नहीं है , कोई बाहर से आकर हम पर अत्याचार नहीं कर रहा l आज अपने ही अपनों को सता रहे हैं l यह अलग बात है कि मनुष्य अपने स्वार्थ के कारण चाहे परिवार हो या राष्ट्र हो , अपनों को सताने के लिए गैरों से भी सांठ -गाँठ कर लेता है , मनुष्यता के स्तर से नीचे गिर जाता है l ईश्वर विभिन्न घटनाओं के माध्यम से मनुष्य के अहंकार को मिटाने का और उसकी सोई हुई चेतना को जगाने का प्रयास करते हैं l
21 July 2026
WISDOM ----
देवता और असुर तो प्रत्येक युग में रहे हैं लेकिन कलियुग में एक विशेष बात यह है कि असुर समाज में घुल-मिलकर रहते हैं , उन्हें अलग से पहचानना कठिन है l व्यक्ति के काम करने के तरीके , बोलचाल और उसके स्वभाव से ही समझा जा सकता है कि वे किस श्रेणी के असुर हैं l ऐसे व्यक्तियों में करुणा , संवेदना , दया , प्रेम जैसी कोई भावना नहीं होती , ये बहुत निर्दयी होते हैं l उनका यह निर्दयता का व्यवहार उन सभी के साथ होता है जिसने उनके अहंकार को चोट पहुंचाई है , उनकी निरंकुशता में रहने से इनकार कर दिया l रिश्ते -नातों से भी वे ऐसा कठोरता का व्यवहार करने से नहीं चूकते l हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को सताने में कोई कोर -कसर नहीं छोड़ी असुरों के पास धन -वैभव और इसके बल पर प्राप्त शक्ति की कोई कमी नहीं होती है l कलियुग में यह असुरता इतनी दुखदायी इसलिए हो जाती है क्योंकि सामान्य जन अपने हितों को पूरा करने के लिए इस असुरो के अहंकार को पोषित करते हैं , उनकी चापलूसी कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और उनकी कमजोरियों का पता लगाकर उन की कमजोर नस भी दबाकर रखते हैं इसलिए असुरता एक श्रंखलाबद्ध तरीके से बढ़ती जाती है l इसका अंत कौन करे ? यह बहुत बड़ी समस्या है l
17 July 2026
WISDOM -----
कभी -कभी ऐसा वक्त आता है कि दो पक्षों में युद्ध जैसी स्थिति होती है l एक पक्ष आक्रमण पर आक्रमण करता जाता है लेकिन दूसरा पक्ष वार नहीं करता , केवल अपनी सुरक्षा का ही प्रयास करता है l जैसे मथुरा का राजा कंस कितना शक्तिशाली था , उसके पास सब कुछ था लेकिन वह भयभीत था और भयभीत भी था तो छोटे से दूध पीते बच्चे कृष्ण से l मृत्यु का भय , सत्ता को खोने का भय ऐसा ही होता है l कंस आयु में कृष्ण से कितना बड़ा था , उसके पास विशाल सेना थी , अनेक मायावी राक्षस थे , अनेक शक्तिशाली राजा उसके मित्र , संबंधी थे l क्या आश्चर्य है कि फिर भी वह डरता था l उसने पूतना को और अनेक राक्षसों को भेजा कि वे किसी तरह कृष्ण का अंत कर दें l श्रीकृष्ण तो स्वयं ईश्वर थे , वे बाल रूप में थे तो क्या , उन्हें पता था कि ये सब राक्षस कंस के भेजे हुए हैं , उन्होंने केवल अपनी सुरक्षा के लिए उन राक्षसों को मारा , उन्होंने कंस को मारने का कोई प्रयास नहीं किया l कंस के सिर पर जब मृत्यु का साया मंडराने लगा तब उसने स्वयं ही कृष्ण और बलराम को मथुरा बुला लिया , अपनी मृत्यु की व्यवस्था स्वयं ही कर ली l इस प्रसंग का अर्थ यही है कि इस संसार में सभी के जन्म , मृत्यु , सत्ता , प्रतिष्ठा , धन-वैभव , सुख --- आदि प्रत्येक घटना का समय निश्चित है , इन सब को खोने के भय से किसी को सताना , उसको मारने का प्रयास करना व्यर्थ है l लोग इसी भय से न तो स्वयं चैन से रहते हैं और न ही दूसरे को चैन से रहने देते हैं l कंस ने काल को समझा नहीं , स्वयं को ही भगवान समझा , समय रहते चेता नहीं इसलिए काल ने उसे पटक -पटक कर मारा l
WISDOM -----
श्रीमद भगवद्गीता संन्यास की पाठ्य -पुस्तक नहीं , यह हमें जीवन जीने की कला सिखाती है l जीवन समर में सभी प्रकार की उथल -पुथल का सामना करते हुए जीना , सक्रिय हो उद्यमी बने रहना ही मनुष्य को शोभा देता है l कर्म करो , सक्रिय होकर जियो एवं निर्भय होकर रहो , परिश्रम से मत डरो l निराशाओं का सामना करने से हिचकिचाओ मत l जब तक जीवित हो , वास्तव में जीवन का एक -एक पल जिओ l कर्मों द्वारा ऊँचे उठो , कर्मों द्वारा ही उन्नति करो , कर्मों से ही अपना विस्तार करो l जीवन को कलाकार की तरह जीने का , हँसती -हँसाती , खिलती -खिलखिलाती , मस्ती भरी जिन्दगी जीने का संदेश गीता हमें देती है l गीता का संदेश बड़ा स्पष्ट है ---- कभी भी कर्म किए बिना न रहो l जीते हुए धरना देना , धीमे काम करना , हड़ताल करना , भाग खड़े होना , कर्तव्य त्याग देना , अनुपस्थित रहना , यह सब उपाय जीवन को धीमी मृत्यु की ओर ले जाते हैं , सौन्दर्य छीन लेते हैं और जीवन का क्षरण कर डालते हैं l जो कर्म किए बिना जीता है , वह अपने अस्तित्व को खो बैठता है l
15 July 2026
WISDOM ------
वर्तमान समय में विभिन्न क्षेत्रों में जितना भी ज्ञान है , उसके बीज हमें पूर्व के युगों में भी मिलते हैं l उनमें अंतर केवल अभिव्यक्ति का है l इसे सरल रूप में समझें तो दो कहावतें हैं ---- ' अंधे के आगे रोवे , अपना दीदा खोवे l ' और दूसरी कहावत है --- ' भैंस के आगे बीन बजाए , भैंस खड़ी डकराये l ' त्रेतायुग में जब भगवान श्री राम को समुद्र पार कर लंका जाना था तब उन्होंने तीन दिन तक समुद्र से प्रार्थना की कि वह उन्हें लंका जाने का रास्ता दे , लेकिन समुद्र ने एक न सुनी l लक्ष्मण जी को बहुत क्रोध आया , उनका कहना था -- दैव -दैव आलसी पुकारा l ' आखिर श्री राम ने समुद्र को सुखाने के लिए जैसे ही धनुष बाण उठाया , समुद्र देव प्रकट हो गए और नल -नील के माध्यम से समुद्र पर सेतु बनाने का सुझाव दिया l द्वापर युग में पांडवों पर दुर्योधन , शकुनि आदि ने इतना अत्याचार किया , हर तरह से उन्हें उत्पीड़ित किया लेकिन पांडवों ने कभी भी दुर्योधन से , भीष्म पितामह से , धृतराष्ट्र से कभी भी दया की भीख नहीं मांगी क्योंकि उन्हें यह ज्ञान था कि जिनकी आसुरी प्रवृति होती है उनमें करुणा , संवेदना नहीं होती , उनसे दया की उम्मीद करना , अपनी ऊर्जा को बरबाद करना है l इसलिए पांडवों ने अपने शरीर को मजबूत बनाया , तप से और ज्ञान से शारीरिक और मानसिक बल अर्जित किया , दिव्य अस्त्र -शस्त्र प्राप्त किए l उनके ऐसा करने पर पूरी कायनात ने उनकी मदद की , स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके सारथि बने और वीरता से उन्होंने अपना हक प्राप्त किया l भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया कि कर्म करो , परिस्थिति चाहे कैसी भी हो कर्म करना नहीं छोड़ो , कर्म से भागो मत l गीता का ज्ञान हमें जीवन जीने की कला सिखाता है l चारों तरफ कांटे हैं , घोर अंधकार है , ऐसी कठिन परिस्थिति से हम कैसे सकुशल बाहर निकल सकते हैं , यह ज्ञान हमें गीता से मिलता है l इस ज्ञान को सही ढंग से न समझ पाने के कारण अनेक लोग बड़ी मुश्किल से मिले इस मानव तन की उपेक्षा कर देते हैं l संसार के सारे काम इस देह से ही होते हैं , जब यह शरीर ही कमजोर हो गया तो क्या करोगे ? आज संसार को गीता के ज्ञान की जरुरत है l
13 July 2026
WISDOM
युग परिवर्तन के साथ लोगों के विचार और सोचने -समझने का तरीका भी बदल जाता है l यहाँ तक कि समाज में जो संघर्ष होते हैं , उनके कारण भी बदल जाते हैं l त्रेतायुग में धर्म और अधर्म के बीच युद्ध था l रावण के आतंक और अत्याचार का अंत करने के लिए यह युद्ध हुआ था l इसी तरह द्वापरयुग में पांडव सत्य और धर्म के मार्ग पर थे लेकिन दुर्योधन आदि कौरवों ने षड्यंत्र और अन्याय की अति कर दी थी , इसलिए महाभारत हुआ l लेकिन कलियुग में लोग सत्य , धर्म , नैतिकता , न्याय को भूल गए हैं l लोगों पर कामना , अहंकार और महत्वाकांक्षा हावी है l सभी अनीति की राह पर हैं तो कौन किस को मिटाए , किसे सजा दें l सभी को अपनी -अपनी कमियां उजागर होने का भय है l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----' समाज में फैले संघर्षों का मूल मुख्यतः ईर्ष्या होती है l आज की परिस्थिति पर द्रष्टिपात करें तो चारों ओर ईर्ष्या का ही साम्राज्य फैला दिखाई देगा l भाई -भाई से ईर्ष्या करता है , पड़ोसी -पड़ोसी से l जातियों , संगठनों , दलों , सम्प्रदाय और राष्ट्रों के बीच ईर्ष्या की आग फैली हुई है l ' आचार्य श्री कहते हैं --- ' उच्च स्थिति में पहुँचने के बाद भी यदि किसी में ईर्ष्यालु वृत्ति आ गई है , तो वह उसके पतन का कारण ही बनेगी l l इसलिए ईर्ष्या की अग्नि को शांत करना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है l "