संत का एक शिष्य उनके दर्शन को पहुंचा और बोला ----' आज मैं गरीबों को खाना खिलाकर आया हूँ l जब तक मैं किसी की सहायता न कर दूँ , मुझे चैन नहीं मिलता l बिना प्रार्थना किए मुझे नींद भी नहीं आती l " संत उसे समझाते हुए बोले --- " वत्स ! तुम्हारा आज का पुण्य समाप्त हो गया l जो दिखावे के लिए किसी की सहायता करता है , समझ लो वह नाटक कर रहा है , किसी की सहायता गुप्त रूप से करनी चाहिए l सेवा इतनी गुप्त रूप से होनी चाहिए कि दांया हाथ दान दे तो बांये हाथ को भी पता न चले l इस निष्काम भाव से किया गया कर्म ही पुण्य का माध्यम बनता है l " युग का प्रभाव प्रत्येक वर्ग पर पड़ता है l वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में प्रजातंत्र है l बड़ी विषम स्थिति है l एक ओर सांसारिक आकर्षण है , त्याग और वैराग्य बहुत कठिन है दूसरी ओर वोट के लिए लालच , महत्वाकांक्षा , सुख -भोग का जाल बिछाया जाता है l संत चाहे किसी भी जाति -धर्म का हो , किसी भी देश का हो , उसके लिए इस जाल में फँसने से बचना लगभग असंभव है , शरीर से पहाड़ पर चले भी जाओ , तो क्या यह चंचल मन तो संसार में ही भटकता है l भगवान ने गीता में कहा भी है --कोई विरला ही , लाखों , करोड़ों में कोई एक ही उन तक पहुँच पाता है l यही सत्य है क्योंकि जो भी ईश्वर की ओर कदम बढ़ाता है , आसुरी शक्तियां उसकी टांग खींचती है , उसका जीना मुश्किल कर देती है , वे सबको अपनी तरह राक्षस बनाना चाहते हैं l इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं , महात्मा ईसा को सूली पर चढ़ा दिया , मीरा को जहर दे दिया ---- ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है l कलियुग में चाहे लाख बुराइयाँ हों , लेकिन अब ऐसा नहीं होगा l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने भी कहा है ---युग परिवर्तन होगा , आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को हारना ही होगा , उन्हें सिर उठाने की जगह ही नहीं मिलेगी l