' कहते हैं ----- ' जब -जब होता नाश धर्म का और पाप बढ़ जाता है , तब लेते अवतार प्रभु और विश्व शांति पाता है l ' लेकिन कलियुग में इतना पाप , अधर्म , अत्याचार बढ़ गया है फिर ईश्वर ने अवतार क्यों नहीं लिया ? कारण स्पष्ट है --- त्रेतायुग में रावण बहुत अत्याचारी , अन्यायी , अधर्मी था , परनारी का अपहरण किया था l इन दुर्गुणों के साथ वह परम शिवभक्त था , वेद , पुराण का ज्ञाता था l वीर , साहसी , कूटनीतिज्ञ आदि अनेक गुणों से संपन्न था l ऐसे अनेक श्रेष्ठ गुणों के कारण उसे निम्न योनि में नहीं ले जाया जा सकता था l रावण के कल्याण के लिए ईश्वर ने अवतार लिया क्योंकि भगवान के हाथों जिसका वध होगा उसकी मुक्ति हो जाती है l इसी तरह द्वापर युग में दुर्योधन ने पांडवों के साथ अन्याय किया लेकिन वह प्रजापालक था , प्रजा उससे खुश थी , वह बहुत वीर और बलराम जी का शिष्य था भगवान श्रीकृष्ण के सामने ही उसकी मृत्यु हुई l ईश्वर के दर्शन से उसकी मुक्ति निश्चित थी l कहने का तात्पर्य यह है कि त्रेतायुग और द्वापर युग में पाप की तुलना में पुण्य का , सद्गुणों का प्रतिशत लोगों में अधिक था लेकिन कलियुग में पाप और मानसिक विकृतियां अपने चरम पर हैं l ऐसे पापियों को ईश्वर कभी मुक्ति नहीं देना चाहते , इसलिए अवतार नहीं लेते l कलियुग में पापियों को उन्ही के कर्मों की लौटकर मार पड़ती है l अपने ही किए गए कुकृत्यों का बोझा वे ढोते हैं l
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