4 January 2026

WISDOM -----

 '  कहते  हैं  ----- ' जब -जब  होता  नाश  धर्म  का  और  पाप  बढ़  जाता  है  , तब  लेते  अवतार  प्रभु  और  विश्व  शांति  पाता  है  l '     लेकिन  कलियुग  में  इतना  पाप , अधर्म , अत्याचार  बढ़  गया  है   फिर  ईश्वर  ने  अवतार  क्यों  नहीं  लिया  ?   कारण   स्पष्ट  है --- त्रेतायुग  में  रावण  बहुत  अत्याचारी , अन्यायी  , अधर्मी  था  , परनारी  का  अपहरण  किया  था  l  इन  दुर्गुणों  के  साथ  वह  परम  शिवभक्त  था  , वेद  , पुराण  का  ज्ञाता  था  l  वीर , साहसी , कूटनीतिज्ञ  आदि  अनेक  गुणों  से  संपन्न  था  l  ऐसे  अनेक  श्रेष्ठ  गुणों  के  कारण   उसे    निम्न  योनि  में  नहीं  ले  जाया  जा  सकता  था  l  रावण  के  कल्याण  के  लिए  ईश्वर  ने अवतार  लिया  क्योंकि  भगवान  के  हाथों  जिसका  वध  होगा  उसकी   मुक्ति  हो जाती  है  l  इसी  तरह  द्वापर  युग  में   दुर्योधन  ने  पांडवों  के  साथ  अन्याय  किया  लेकिन  वह  प्रजापालक  था  , प्रजा  उससे  खुश  थी  , वह  बहुत  वीर  और  बलराम जी  का  शिष्य  था  भगवान  श्रीकृष्ण  के  सामने  ही  उसकी  मृत्यु  हुई  l  ईश्वर  के  दर्शन  से  उसकी  मुक्ति  निश्चित  थी  l  कहने  का  तात्पर्य  यह  है  कि  त्रेतायुग  और  द्वापर  युग  में   पाप  की   तुलना    में  पुण्य  का  , सद्गुणों  का  प्रतिशत  लोगों  में  अधिक  था  लेकिन  कलियुग  में  पाप  और  मानसिक  विकृतियां  अपने  चरम  पर  हैं  l  ऐसे  पापियों  को   ईश्वर  कभी  मुक्ति  नहीं   देना  चाहते  , इसलिए  अवतार  नहीं  लेते  l  कलियुग  में  पापियों  को  उन्ही  के कर्मों  की  लौटकर  मार  पड़ती  है  l  अपने ही  किए  गए  कुकृत्यों  का  बोझा  वे  ढोते  हैं  l  

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