31 March 2026

WISDOM -------

   इस  वैज्ञानिक  युग  में  लोगों  के  पास  सुख - सुविधाएँ  तो  बहुत  हैं   लेकिन  लोगों  के  जीवन  में  आनंद  नहीं  है  l  वह  आंतरिक  ख़ुशी  जो  चेहरे पर  चमक  ला  देती  है  ,  वो  कहीं  खो  गई   है  l   सबसे  बड़ी  समस्या  यह  है  कि  किसी  के  चेहरे  पर   ख़ुशी  दिख  भी  जाये  , ख़ुशी  के  कुछ  पल  आ  भी  जाएँ   तो  ईर्ष्या -द्वेष  करने  वाले  इतने  हैं  कि  वे  उस  ख़ुशी  को  छीनने  का  , व्यक्ति  को  कष्ट  देने  का  हर  संभव  प्रयास  करते  हैं  l  आज  व्यक्ति  दूसरे  की  ख़ुशी  देखकर  दुःखी  और  परेशान  हो  जाता  है  l  यह  विकृत  मानसिकता  परिवार  से  लेकर  संसार  में  है  l  छोटे -छोटे  बच्चों  की  हँसी  तो  निर्मल  होती  है  ,  उनमें  कोई  ईर्ष्या -द्वेष  नहीं  होता  ,  निर्मल  मन  है  , हँसते -मुस्कराते  हैं  लेकिन  निष्ठुर  व्यक्तियों  से  उनकी  ये  निर्मल  हँसी  भी  बर्दाश्त  नहीं  होती  ,  कभी   युद्ध  के  नाम  पर  ,  कभी  विकृति  के  कारण  वे  बच्चों   के  ही  प्राण  ले  लेते  हैं  l  यह  मनोरोग  है  l  यदि  व्यक्ति  आध्यात्मिक  है   ,  यदि  उसे  अपने  जीवन  में  कष्ट  मिला  है   तो  वह   निरंतर  यही  प्रयास  करेगा  कि  जो  कष्ट  उसे  मिला  ,  वैसा  कष्ट  किसी  को  न  मिले  ,  वह  सबको  ख़ुशी   देने  का  हर  संभव  प्रयास  करेगा  l  उसके  कष्ट , उसके  अभाव  उसे  कठोर  नहीं  बनाते  l  लेकिन  इसके  विपरीत   अनेक  लोग  ऐसे  होते  हैं   जिनका  मन  सब  कुछ  पाकर  भी  अतृप्त  रहता  है  ,  छोटे  से  कष्ट  भी  उन्हें  शूल  की  तरह  चुभते  हैं  , ऐसे  लोगों  की  मानसिकता  यही  होती  है  कि हमें  ख़ुशी  नहीं  मिली ,  तो  अब  हम  सब  की  ख़ुशी  छीन  लेंगे , किसी  को  चैन  से  जीने  नहीं  देंगे  l  ऐसे  लोग  बहुत  निष्ठुर  , आसुरी  प्रवृति  के  होते  हैं  l  यह  आसुरी  प्रवृति   एक  प्रकार  का  मनोरोग  है  l  पंडित  श्री राम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  --- ' मनोरोग  और  कुछ  नहीं  , मनुष्य  की  दबी , कुचली , रौंदी  गईं  भावनाएं  ही  हैं  l  भावनात्मक  तृप्ति  मानव  जीवन  की  सबसे  बड़ी  आवश्यकता  है  l  भावना  के  बिना  मनुष्य  सब  कुछ  पाकर  भी  अतृप्त  ही  रहता  है  l  भावना  ही  जब  विकसित  हो  जाती  है  तो  यह  संवेदना  है  l  इसके  बिना  जीवन  वीरान  और  शुष्क  हो  जाता  है  l  यही  अनेक  मनोविकारों  का  मूल  कारण  है  l  "     जिनमें  संवेदना  नहीं  है  , वही  असुर  हैं , निर्दयी , निष्ठुर  हैं  l  ऐसा  इसलिए  है  क्योंकि  वे  स्वयं  को  भगवान  समझते  हैं  , शक्ति  का  दुरूपयोग  करते  हैं  l  उनकी  आत्मा  जानती  है  के  वे  गलत  हैं   इसलिए  वे  लोग  शराफत  का  नकाब  पहनकर  रहते  ,  ये  असुर  आपस  में  बड़े   संगठित  होते  हैं  , इस  सत्य  को  वे  जानते  हैं  कि  उनसे  ऊपर  ईश्वर  है , इसलिए  सब  काम  छिपकर  करते  हैं  l  जिस  दिन  उन्हें  यह  समझ  आ  गया  कि  ईश्वर  उन्हें  अपनी  हजार  आँखों  से  देख  रहे  हैं , उनके  हर  कार्य , प्रत्येक  विचार  पर  उनकी  द्रष्टि  है  ,  उस  दिन  उन्हें  ईश्वर  से  प्रेम  हो  जायेगा  , ह्रदय  में  भक्ति  जाग्रत  हो  जाएगी   और  तब  यह  आसुरी  प्रवृति    आध्यात्मिकता  में  बदल  जाएगी  l