मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख , धूप -छाँव की तरह आते जाते रहते हैं l जब दुःख जीवन में आता है तब मनुष्य उसे अपना दुर्भाग्य समझता है l यही व्यक्ति की सबसे बड़ी भूल है l प्रत्येक दुःख का कारण दुर्भाग्य या प्रारब्ध नहीं होता l अनेकों बार जागरूकता की कमी की वजह से हमें दुःख के बोझ को उठाना पड़ता है l यह संसार ऐसा ही है , लोग हमारी सरलता और अज्ञानता के कारण ही फायदा उठाते हैं l युग के साथ लोगों की सोच भी बदल जाती है l त्रेतायुग में यह सबके सामने था कि मंत्र ने महारानी कैकेयी के कान भरे और भगवान श्रीराम को राजतिलक के स्थान पर वनवास हुआ l द्वापर युग में भी कौरवों का पांडवों के प्रति ईर्ष्या -द्वेष संसार के सामने स्पष्ट था , महाभारत हुआ l लेकिन कलियुग की स्थिति बहुत विकट है l अब मनोविकार तो अपने चरम पर हैं , लेकिन अब व्यक्ति दोगला है l वह समाज के सामने स्वयं को बहुत सभ्य , संस्कारी और परिवार के प्रति बहुत जिम्मेदार स्वयं को दिखाना चाहता है , लेकिन वह अपनी मानसिक विकृतियों से विवश है l धन -संपत्ति का लालच , कामना , वासना के वशीभूत वह अपने ही रिश्ते -नातों पर पीठ पीछे प्रहार करता है l धन संपत्ति के विवाद तो प्रत्यक्ष भी है जिनसे सारी अदालतें भरी हैं लेकिन जिनकी मानसिकता निकृष्ट है वे तंत्र -मन्त्र , ब्लैक मैजिक , भूत , पिशाच आदि अनेक नकारात्मक शक्तियों की मदद लेकर अपनों पर ही प्रहार करते हैं l ये सब नकारात्मक कार्य अपने ही करते हैं , गैरों की मदद लेकर l और जो इन सबको भुगतता है , वह जागरूक न होने के कारण इसे अपना दुर्भाग्य कहता है और ऐसे ' अपनों ' के साथ बातचीत , स्वागत , सत्कार , रिश्ता निभाने में उलझा रहता है और फायदा उठाने वाले अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं l लोग कहते हैं ईश्वर ऐसे दोगले लोगों को सजा क्यों नहीं दे रहे ? तो ईश्वर क्या करे ? जब व्यक्ति जागरूक नहीं है , अपने को सताने वालों के साथ चाय -नाश्ता कर रहा है , हँस -बोल रहा है , उनके स्वागत -सम्मान में अपनी ऊर्जा कर रहा खर्च कर रहा है l ईश्वर के पास सन्देश तो यही गया कि आप उसके द्वारा स्वयं को सताए जाने पर भी खुश हैं l जब व्यक्ति अपनी आँखें खुली रखेगा , जागरूक रहेगा तभी वह नाजायज शोषण व अत्याचार से बच सकेगा l
No comments:
Post a Comment