मनुष्य के जीवन में जितनी भी समस्याएं हैं उनके कारण कहीं बाहर नहीं हैं l भौतिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य ने अपने जीवन को एक समस्या बना लिया है l अब लोग एक मशीन की तरह जीवन जीते हैं , जिसमें भावनाओं का कोई स्थान नहीं है l अनेक ऐसे शब्द जो रिश्तों की नींव होते हैं ,वे सब गायब हो गए हैं l अब दया , करुणा , सहयोग , सामंजस्य , निस्स्वार्थ प्रेम --इन सबका अर्थ अब न कोई जानता है और न ही जानने की इच्छा रखता है l अब लालच , स्वार्थ , अहंकार , महत्वाकांक्षा , ईर्ष्या , द्वेष मनुष्य पर हावी है l वह न स्वयं चैन से रहता है और न ही दूसरों को चैन से रहने देता है l इन सब दुर्भावनाओं से मनुष्य ने स्वयं ही अपने को तनावग्रस्त कर लिया है l इसका दुष्परिणाम संसार में विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिलता है l मनुष्य को इनसान बनना , मानवीय मूल्यों को समझना सबसे कठिन लगता है इसलिए उसने स्वयं ही नकारात्मकता का रास्ता चुन लिया , उसे मनुष्यता के स्तर से नीचे गिरने का कोई दुःख भी नहीं है l
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