पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ----- " कौन कितने दिन जिया , इसका लेखा -जोखा जन्म दिन से लेकर मरणपर्यंत के दिन गिनकर नहीं , वरन इस आधार पर लगाया जाना चाहिए कि किसने अपने समय का उपयोग महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए किया l आदि शंकराचार्य मात्र बत्तीस वर्ष जिए l विवेकानंद ने छत्तीस वर्ष की अल्प आयु पाई l स्वामी रामतीर्थ तैंतीस वर्ष की आयु में ही चले गए l ऐसे अनेक व्यक्ति इस संसार में हुए हैं , जिन्हें लंबी अवधि तक जीने का अवसर नहीं मिला , पर उन्होंने अपने समय का श्रेष्ठतम प्रयोजनों के लिए उपयोग किया और इतनी उपलब्धियां अर्जित कर सके , जितनी सौ -दो सौ वर्ष जीकर भी नहीं पाई जातीं l कितने ही लोग लंबी आयु तक जीते हैं , पर उस अवधि का लेखा -जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि वह पेट भरने , प्रजनन के जंजाल में उलझे रहने तथा दुर्गुणों के कारण जलते -झुलसते मौत के मुँह में चले गए l प्राय; आधा समय कुचक्रों की उलझन में और लगभग उतना ही आलस्य -प्रमाद में लगाने वाले को लंबी आयु तक जीने का क्या संतोष -आनंद मिला l इसे वे उनींदी अवस्था में तो जान ही नहीं पाते , किन्तु जब विदाई के दिन आते हैं तो आँखें खुलती हैं और हाथ मलते हुए , रुधे कंठ और भरी आँखों से इतना ही कह पाते हैं कि उन्होंने बहुमूल्य अवसर निरर्थक कामों में गँवाया और जिससे काल का त्रास देने वाला अंधकार भरा भविष्य कमाया l "