इस संसार में शुरू से ही असुरता और देवत्व दोनों का ही अस्तित्व अँधेरे और उजाले की तरह रहा है l सतयुग , त्रेतायुग और द्वापर युग में यह स्पष्ट था कि असुर कौन है , कौन अत्याचारी , अनीति और अधर्म की राह पर है लेकिन कलियुग में सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि अब आसुरी प्रवृत्ति के लोग समाज में घुल-मिलकर , परिवारों में , संस्थाओं में , उच्च पदों पर -----धरती के प्रत्येक कोने में मुखौटा लगाकर रहते हैं l अब उनकी पहचान करना बड़ा कठिन है l किसी तरह पहचान हो भी जाए तो लोग पहचान करने वाले को ही मूर्ख कहेंगे , कोई उसकी बात का विश्वास ही नहीं करेगा l इसका कारण यही है कि इस असुरों ने लोगों की कमजोर नस को पकड़ लिया है l ये असुर शराफत का नकाब पहन कर स्वयं को समाज का , परिवार का हितैषी बताते हैं और लोगों को धन का , पद , प्रतिष्ठा , प्रमोशन , कामना , वासना ----- आदि अनेक प्रकार का लालच देकर , उनके अनेक बड़े -छोटे हित साधकर, कभी भय दिखाकर , ब्लैकमेल कर के उन्हें अपने वश में कर लेते हैं l इसलिए उनका सच जानने पर भी कोई उनके विरुद्ध मुँह नहीं खोलता l यही कारण है कि संसार में असुरता का साम्राज्य बढ़ता ही जा रहा है l लोभ -लालच के जाल में फँसने वाले वे लोग ही होते हैं जो बिना मेहनत के , योग्यता न होने पर भी अति शीघ्र सफलता चाहते हैं l इनकी दुर्गति जाल में फँसने वाले पक्षियों की तरह होती है --- दूर कौन उड़कर जाए , कौन परिश्रम पूर्वक दाना चुने l वे तो दाना ढूँढने की तुलना में जाल पर बिखरे दानों को एक सौभाग्य जैसा मानते हैं और उससे लाभ उठाने में चूकने की बात नहीं सोचते l l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- उन्हें यह सोचने की फुरसत नहीं होती कि लाभ उठाते समय उसके पीछे कोई दूरगामी संकट तो नहीं छिपा है , उसे भी देखने की आवश्यकता है l हर लोभी अधीर -आतुर होता है और तात्कालिक लाभ के कुछ दाने चुन लेने के बाद , उस पक्षी की तरह बेमौत मरता है , जिसे सामने बिखरे आकर्षण के उपरांत अन्य कोई बात सूझती ही नहीं l