कर्मफल का विधान सबके लिए एक समान है l चाहे हम राजा हों , धर्मात्मा हों या महात्मा , साधु हों या शैतान , कर्म किसी को नहीं छोड़ता l इस विश्व ब्रह्माण्ड में हम जहाँ कहीं भी हों , हमारा कर्म हमारा पीछा करता हुआ हम तक पहुँच ही जाता है l इस जन्म में नहीं तो अगले कई जन्मों तक ये कर्म हमारा पीछा करते ही रहते हैं और तब तक समाप्त नहीं होते , जब तक हम उन्हें भोग नहीं लेते l एक कथा है ----- देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने माँ सीता के पैर में कौवे के रूप में चोंच मार दी l उनके पैर से रक्त निकल आया l प्रभु श्रीराम ने यह देखकर समीप रखे कुषा के एक तिनके को उठाया और उसे अभिमंत्रित कर के जयंत की ओर फेंक दिया l कुषा के उस तिनके ने अभेद्य बाण का रूप धारण कर लिया l जयंत भाग निकला था , उसे लगा था कि वो बच गया l उसने पीछे मुड़कर देखा तो भगवान श्रीराम द्वारा छोड़ा गया बाण उसका पीछा कर रहा है l उस बाण से बचने के लिए जयंत ने सभी लोकों की परिक्रमा की लेकिन स्वयं उसके पिता देवराज और ब्रह्माजी तक ने उसकी सहायता करने से मना कर दिया l अंत में उसे भगवान श्रीराम की शरण में आना ही पड़ा l उन्होंने उसे क्षमा तो किया परन्तु कर्मफल के रूप में उसे अपनी एक आँख गंवानी ही पड़ी l