19 May 2026

WISDOM -----

   कर्मफल  का  विधान  सबके  लिए  एक  समान  है  l  चाहे  हम  राजा  हों , धर्मात्मा  हों  या  महात्मा ,  साधु  हों  या  शैतान  ,  कर्म   किसी  को  नहीं  छोड़ता  l   इस  विश्व  ब्रह्माण्ड  में  हम  जहाँ  कहीं  भी  हों  ,  हमारा  कर्म  हमारा  पीछा  करता  हुआ  हम  तक  पहुँच  ही  जाता  है  l  इस  जन्म  में  नहीं  तो    अगले  कई  जन्मों  तक  ये  कर्म  हमारा  पीछा  करते  ही  रहते  हैं   और  तब  तक  समाप्त  नहीं  होते  ,  जब  तक  हम  उन्हें  भोग  नहीं  लेते   l  एक  कथा  है  -----  देवराज  इंद्र  के  पुत्र  जयंत  ने   माँ  सीता  के  पैर  में   कौवे  के  रूप  में  चोंच  मार  दी  l  उनके  पैर  से  रक्त  निकल  आया  l  प्रभु  श्रीराम  ने  यह  देखकर  समीप  रखे  कुषा  के  एक  तिनके  को  उठाया   और  उसे  अभिमंत्रित  कर  के   जयंत  की  ओर  फेंक  दिया  l  कुषा  के  उस  तिनके  ने  अभेद्य  बाण  का  रूप   धारण  कर  लिया  l  जयंत  भाग  निकला  था  , उसे  लगा  था  कि  वो  बच  गया  l  उसने  पीछे  मुड़कर  देखा  तो  भगवान  श्रीराम   द्वारा  छोड़ा  गया  बाण  उसका  पीछा  कर  रहा  है  l  उस  बाण  से  बचने  के  लिए जयंत  ने  सभी  लोकों  की  परिक्रमा  की    लेकिन  स्वयं  उसके  पिता  देवराज  और  ब्रह्माजी  तक  ने   उसकी सहायता  करने  से  मना  कर  दिया  l  अंत  में  उसे  भगवान  श्रीराम की  शरण  में  आना  ही  पड़ा  l  उन्होंने  उसे  क्षमा  तो  किया  परन्तु  कर्मफल  के  रूप  में  उसे  अपनी  एक  आँख  गंवानी   ही  पड़ी  l  

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