29 November 2017

WISDOM

 एक  संत  के  त्याग  से  प्रभावित  होकर  एक  राजा  ने  भी   उनसे   गुरुदीक्षा   ली  l  पहले  भी   हजारों  लोग  उनसे  दीक्षा  ले  चुके  थे  l  उन्होंने  राजा  को  भी  दीक्षित  देखा  तो  सबने  जाकर  कहा ----- महाराज  !  अब  तो   आप  हमारे  गुरुभाई  हैं  , अब  हमसे  राज्य - कर  नहीं  माँगना  l  राजा  ने  दुविधावश  सबका  कर  माफ  कर  दिया  l परिणाम  यह  निकला  कि   राज्य - व्यवस्था  के  लिए  पैसा  मिलना  बंद  हो  गया ,  सारी  व्यवस्था  नष्ट - भ्रष्ट  हो  गई  l  यह  देखकर   संत  ने  राजा  को  बुलाया  और  कहा ----- " राजन  ! धर्म  की  सार्थकता  कर्म  से  है  l  आलसी  लोग  दीक्षा  भी  ले  लें  तो  क्या  !  इनमे  मेरा  एक  भी  शिष्य  नहीं  है   l "
  राजा  ने  भूल  समझी   और  टैक्स  लगा  दिया  ,  तब  कहीं  बिगड़ती  शासन व्यवस्था  संभली  l  

28 November 2017

WISDOM ----- अन्याय सहना अन्याय करने से कई गुना बड़ा अपराध है l

  कितने  ही  व्यक्ति  अनीति  को  देखकर  उदास  तो  होते  हैं ,  पर  उसके  प्रतिकार  के  लिए  कुछ  नहीं  करते   l  बंगाल  के  राजा राममोहन  राय उनमे  से  न  थे  l   उनकी  भाभी  को  बल पूर्वक  सती  करा  दिया  गया  था  l  वह  करुण  द्रश्य  वे  कभी  नहीं  भूल  पाए  l  उन्होंने  प्रतिज्ञा  कि  कि  वे  इस   कुप्रथा  का  अंत  कर  के  ही  रहेंगे  l  राजा  राममोहन  राय  ने  सरकार  की  सहायता  से   सती  प्रथा  विरोधी  कानून  पास  कराया  l    इसी  तरह   नाना  साहब  पेशवा  को  अंग्रेजों  की  अनीति  अच्छी  नहीं  लगी  l  उस  समय  अंग्रेजों  के  मुकाबले  उनकी  स्थिति  बहुत  साधारण  थी  ,  तब  भी  उन्होंने  संकल्प  लिया  कि  वे  इस  अन्याय  का  प्रतिकार  करेंगे   l    नाना साहब  पेशवा   1857   की   क्रांति  के  सूत्रधार  बने  l  इसके सूत्र  संचालन  के  लिए  उन्होंने  दिन - रात  एक  कर  दिए ,  जनता  और  राजाओं  को  जागरूक  किया  l  उनके  प्रयासों  से  सारे  देश  में  क्रांति  की  आग  भड़क  गई  थी  l 

27 November 2017

शान - ए - अवध ------- बेगम हजरत महल

 वर्ष  1857  देश  में  स्वाधीनता  का बिगुल  बज  चुका   था  l  अवध  के  बहादुर  सिपाहियों  का   नेतृत्व  स्वयं  बेगम  हजरत महल  कर  रही  थीं  ,  जबकि  अंग्रेज  फौज  की  कमान  लार्ड  कैनिंग  ने  सम्हाल  रखी  थी  l
  उनके  कई   वफादारों  ने  सलाह  दी  कि  आप   जंग  से  दूर  रहें ,  किसी  सुरक्षित  स्थान  पर  छुप  जाएँ  किन्तु  बेगम  हजरत महल  ने  कहा --- " झाँसी  की  रानी  लक्ष्मीबाई, कानपुर  में  तात्यां  टोपे  और  पेशवा  नाना   साहब  इस  आजादी  की  लड़ाई  में  कूद  पड़े  हैं  l  ऐसे  में  हमारा  लखनऊ  पीछे  रहे ,  यह  उचित  न  होगा  l  "   अहमदुल्ला  ने  कहा --- " आपकी  बातें  वाजिब  हैं  बेगम  साहिबा  !  पर  यह  न  भूलें  कि  आप  औरत  हैं  ? "  इस  बात  को  सुनकर  बेगम  हजरत महल  हंस  दीं  और  बोलीं ---- " क्या  झाँसी  की  रानी  औरत  नहीं है  ?  अहमदुल्ला  ने  टोकना  चाहा --- " लेकिन  वह  तो  हिन्दू  हैं  l "  इस  पर  बेगम  के  माथे  पर  बल  पड़  गए  ,  उनकी  आवाज  तेज  हो  गई ,  वह  कहने  लगीं ---- " यह  किसी  को  नहीं  भूलना  चाहिए   कि  यह  देश  हिंदू - मुसलमानों  का  नहीं , मर्दों  या औरतों  का  नहीं  ,  सभी  देशवासियों  का  है  l  इसकी  आन - बान  और  शान  के  लिए  मर - मिटने  का  सबको  बराबर  का  हक  है   और  मुझसे मेरे  इस  हक  को  कोई  नहीं  छीन  सकता  l  सबसे  पहले  मैं  हिन्दुस्तान  की  बेटी  हूँ  ,  बाद  में  अवध  की  बेगम  l " 
     उनकी  भावनाओं   को  देखकर  सभी  एक  साथ  बोल  पड़े --- " बेगम  साहिबा  !  हम  सभी  आपकी  कमान  में  आजादी  की  यह  जंग  लड़ेंगे   और  जीतेंगे  भी  l  "  हिन्दुस्तान   आखिरी  शहंशाह  बहादुरशाह  जफर  को  यह  खबर  मिली  तो  फूले  न  समाये ,  उन्होंने  बेगम  साहिबा  के  पास  पैगाम  भेजा --- '  हमें  फक्र  है  तुम  पर  l  जब  तक  बेगम  हजरत  महल   और  रानी  लक्ष्मीबाई  जैसी  बेटियां  हमारे  मुल्क  में  हैं  ,  कोई  भी  विदेशी  ताकत  इसका  कुछ  नहीं  बिगाड़  सकती  l  इंशाअल्लाह ! हम  रहें  या  न  रहें  हिन्दुस्तान  को  आजादी  जरुर  मिलेगी  l  हम  तुम्हे  शुक्रिया  अदा  करते  हैं   और  तुम्हारे  बेटे  को  अवध  का  नवाब  घोषित  करते  हैं  l "    बूढ़े  बादशाह   के  इस  पैगाम  को  बेगम  हजरत महल  ने  अपने  सिर  से  लगाया  और  अपनी  फौज  के  साथ   पहुँच  गईं---- चिनहट  के  मैदान  में  l  जितने  दिन  यह  जंग अली  , उतने  दिन  बेगम  हजरत महल  खुद  हाथी  पर  बैठकर  अपनी  फौज  का  हौसला  बढ़ाती  रहीं   l  उनके  साहस , शौर्य , शस्त्र - संचालन,   व्यूह  रचना   ने  अंगरेजी  फौज  को  मैदान  छोड़कर  भागने  पर  मजबूर  कर  दिया  l  जनरल  आउटरम  एवं    कॉलिन   कैम्पबेल  को  भी  मानना  पड़ा  कि  बेगम  हजरत  महल  ने  अंग्रेजी  फौज  में  खौफ  पैदा  कर  दिया  था  l   इतिहासकार  ताराचंद  ने   लिखा  है  कि --- "  30  जून  1857  से   21 मार्च  1858     तक  बेगम  हजरत महल  ने  लखनऊ  में  नए  सिरे  से  शासन  सम्हाला  और  आजादी  की  लड़ाई  का  नेतृत्व  किया  l  "  हिन्दुस्तान  की  बेटी  बेगम  हजरत महल  की  ये   जंग   इतिहास  के  पन्नों  में   सदा  अमर  रहेगी   l 

24 November 2017

WISDOM ----

  खलील  जिब्रान  की  एक  कथा  है ----- उनका  एक  मित्र  अचानक  एक  दिन  पागलखाने  में  रहने  चला  गया  l  जब  वह  उससे  मिलने  गया  तो  उसने  देखा   उसका  वह  मित्र  पागलखाने  में  बाग़  में  एक  पेड़  के  नीचे  बैठा  मुस्करा  रहा  है  l  पूछने  पर  उसने  कहा --- " मैं  यहाँ  बड़े  मजे  से  हूँ  l  मैं  बाहर  के  उस  बड़े  पागलखाने  को  छोड़कर  इस  छोटे  पागलखाने  में  शांति  से  हूँ   l  यहाँ  पर  कोई  किसी  को  परेशान  नहीं  करता  l  किसी  के  व्यक्तित्व  पर  कोऊ  मुखौटा  नहीं  है  l  जो  जैसा  है  वह  वैसा  है  l  न  कोई  आडम्बर ,  न  कोई  ढोंग   l "  उसने  कहा --- " मैं  यहाँ  पर  ध्यान  सीख  रहा  हूँ   क्योंकि  ध्यान  ही  सभी  तरह  के  पागलपन  का  स्थायी  इलाज  है   l "  

WISDOM ----- ईश्वर पर अटूट विश्वास व्यक्ति को निडर व निश्चिन्त बना देता है l

 आत्मविश्वास  और  ईश्वर विश्वास  एक  ही  सिक्के  के  दो  पहलू  हैं  l  ईश्वर  पर  विश्वास  कर  के  व्यक्ति  संसार  के  किसी  भी  भय  एवं  प्रलोभन  से  विचलित  नहीं  होता  l  सुद्रढ़  विश्वास  किसी  भी  चुनौती  से  घबराता  नहीं  है  ,  बल्कि  उससे  पार  पाने  के  लिए   अपनी  राह  निकाल  कर  आगे  अग्रसर  हो  जाता  है  l 
               इस  संबंध  में  एक  घटना   मुगलकालीन  भारत  के  महान  कवि  श्रीपति  के  जीवन  की  है  l  श्रीपति  माँ  भगवती  के  परम  उपासक  थे  l  अपनी  बुद्धिमता  और  माँ  की  कृपा   वे  मुगल  बादशाह  अकबर  के  अति  प्रिय  थे  ,  उन्होंने  श्रीपति  को  दरबार  में  अपना  सलाहकार  बना  रखा  था   l  इस  कारन  अनेक  दरबारी  उनसे  ईर्ष्या  करते  थे  l  एक  दिन  दरबारियों  ने  भक्त   श्रीपति   नीचा   दिखाने  के   लिए   एक   तरकीब  निकली  l  एक  दिन  दरबार  में  श्रीपति  को  छोड़कर   अन्य   कवियों  व  दरबारियों  ने  एक  प्रस्ताव  रखा  कि   अगले  दिन  सभी  कवि  स्वरचित  कविता  सुनायेंगे  जिसकी  अंतिम  पंक्ति  में   यहय  रहे ---- " करौं  मिलि  आस   अकबर  की  l "  दरबारियों को  अनुमान  था  कि  श्रीपति  तो  माँ    भवानी  के  भक्त  हैं ,  वे   बादशाह  की  प्रशंसा  नहीं   करेंगे     बादशाह  उनसे  नाराज  हो  जाये ,  संभव  है  कोई  दंड  दे  l 
   अगले  दिन  दरबार  में  भारी  भीड़  थी   l  सभी  अपनी  स्वरचित  कवितायेँ    सुनाकर  अकबर  की  प्रशंसा  कर  रहे  थे   और  श्रीपति  जी  मन  ही  मन   ईश्वर  का  स्मरण  करते  हुए  निडर  व  निश्चिन्त  थे  ,  उन्हें  भरोसा  था  कि  संकट  की  इस  घड़ी  में   माँ   भगवती  उनकी  चेतना  में  प्रकट  होकर  अवश्य  मार्ग  दिखाएंगी  l  अंत  में  उनकी  बारी  भी  आ  गई ,  वे  आसन  से  उठे   और  माता  का  स्मरण  करते  हुए    अपनी  स्वरचित  कविता  पढ़ी ------  अबके  सुलतान  फरियांन  समान  है  .
                                                         बांधत  पाग  अटब्बर   की ,
                                                         तजि  एक  को  दूसरे  को  जो  भजे ,
                                                       कटी  जीभ  गिरै  वा  लब्बर  की
                                                      सरनागत  ' श्रीपति ' माँ  दुर्गा  कि
                                                       नहीं  त्रास  है  काहुहि  जब्बर  की
                                                     जिनको  माता  सो  कछु  आस  नहीं ,
                                                      करौं  मिलि  आस  अक्ब्बर  की  ll 
  इस  कविता  को  सुनकर  सभी  षड्यंत्र कारियों  के  मुख  पर  कालिमा  छा  गई  l  बादशाह  अकबर  बहुत  प्रसन्न  हुआ   l  उसने  भक्त  श्रीपति  को  यह  कहते  हुए   गले  लगा  लिया  कि  तुम्हारी  भक्ति  सच्ची  है ,  सचमुच  जगन्माता   तुम्हारी  चिंतन , चेतना  में  विराजती  हैं   l 

22 November 2017

WISDOM ----- यदि अंत:करण मलिन और अपवित्र है तो ईश्वर की उपासना भी फलवती नहीं होती

अधिकतर  व्यक्ति  ईश्वर  को  याद करते  हैं  ,  पूजा -पाठ ,  उपासना  ,   -  आदि  कर्मकांड करते  हैं   परन्तु   फिर    भी  गई - गुजरी     स्थिति  में   रहते    हैं   l  कारण  है --- अन्दर  के  पाप कर्म     और  दुष्प्रवृत्तियों  में  लिप्त  रहना   l  फिर  यह  ढोंग  हुआ  ,  इसके  बदले  ईश्वर  की  कृपा  कैसे  मिले   ?   प्रभु  कृपा  की  एक  ही   शर्त  है ------ पवित्रता   l  

21 November 2017

WISDOM ------ जागरूकता जरुरी है

  प्रजातंत्र  जब  असफल  होता  है  तो  उसका  स्थान  तानाशाही  लेती  है  l  इस  दुर्भाग्य  का  कारण  है --- दुर्बल  सरकारें  l  प्रजातंत्र  में  सफल  सरकार  वह  है   जो  भय  और  गरीबी  से  जनता  को  बचा  सके   अन्यथा  लोग  सब्र  खो  बैठेंगे   और  गृह युद्ध  जैसी  स्थिति  में  तानाशाही  उठ  खड़ी  होती  है  l
  प्रजातंत्र  की  सफलता  ऐसी  सशक्त  सरकार   पर  निर्भर  है   जो  जनता  के  हितों  की  रक्षा  कर  सके   l  ऐसी  सरकार  बना  सकने  के  लिए  सशक्त  और  सजग  जनता  का  होना  आवश्यक  है   l   वस्तुतः  जाग्रत  जनता  ही   प्रजातंत्र  सफल  बनती  है   और  वही  उसका  लाभ  लेती  है   l