24 July 2025

WISDOM -----

 आज  संसार  में  चारों  ओर  भय  का   वातावरण  है  l  इसका  सबसे  बड़ा  कारण  है   कि  कलियुग  के  प्रभाव  से  लोगों  में  कायरता  बढ़ती  जा  रही  है  l  ईर्ष्या , द्वेष , कामना , वासना , महत्वाकांक्षा  , लालच  और  दमित  इच्छाओं  की  पूर्ति  के  लिए  अब  लोग  प्रत्यक्ष  रूप  से  कोई   वाद -विवाद , हाथापाई  और  किसी  तरह  की  लड़ाई  नहीं  करते  l  ऐसा  करने  से  उनका  असली  चेहरा  सामने  आ  जायेगा  l  इसलिए   समाज  में  सबके  सामने  सभ्य  बने  रहकर  लोग  पीठ  पर  वार  करते  हैं  l  धोखा , षड्यंत्र , ब्लैकमेल , माइंडवाश  करना  ,  यह  सब  आम  बात  हो  गई  है  l  यही  कारण  है  कि  आज  सब  भयभीत  है  l  घर , परिवार , आफिस , समाज  में  आप  जिसके  साथ  हैं , जिसका  विश्वास  करते  हैं  ,  वह  अपनी  चालाकी  से , अपनी  दुर्बुद्धि  से  आपको  कब  गिरा  दे , मार  दे  , कोई  नहीं  जानता  l  वातावरण  में  इतनी  नकारात्मकता  है  कि  अब  किसी  का  भी  विश्वास  नहीं  किया  जा  सकता  l  भय  का  एक  दूसरा रूप  भी  है  , जहाँ  व्यक्ति  अपनी  ही  कमजोरियों  से  भयभीत  है  l  और  आश्चर्य  यह  है  कि  वह  अपनी  कमजोरियों  पर  विजय  पाने  का  कोई  प्रयास  नहीं  करता   बल्कि  अपनी  कमजोरियों  के  साथ  जीवन  जीने  के  लिए  किसी  भी  हद  तक  जा  सकता  है  l  वैराग्यशतक  में  भतृहरि  ने  लिखा  है ---- " भोग  में  रोग  का  भय ,  सत्ता  में  शत्रुओं  का भय , सामाजिक  स्थिति  में  गिरने  का  भय  , सौन्दर्य  में  बुढ़ापे  का  भय   और  शरीर  में  मृत्यु  का  भय  है  l  इस  संसार  में  सब  कुछ  भय  से  युक्त  है  l  निर्भयता  से  जीने  के  लिए  उन्होंने  त्याग  का  मार्ग  बताया  है  l  "    लेकिन  युग  का  प्रभाव  ऐसा  है  कि  अब  लोग  'त्याग ' शब्द  को  ही  भूल  गए  हैं  l    जब   मनुष्य  से  ईश्वर  से    डरेगा  , ईश्वर  से  भय  खायेगा  , तभी  उसे  संसार  में  दूसरा  भय  नहीं  सताएगा  l  

17 July 2025

WISDOM ------

  प्राकृतिक  आपदाएं  तो संसार  में  शुरू  से  ही  आती  रही  हैं    लेकिन  मनुष्य  अपनी  गलतियों  से  इन  आपदाओं  की  तीव्रता  को  बढ़ा  देता  है  l  मनुष्य  कहाँ  गलत  है  इसे  सरल  ढंग  से  समझा  जा  सकता  है  , जैसे  --मनुष्य  अपनी  धन -संपदा ,  गहने , बहुमूल्य  धातुओं  को  बहुत  संभालकर  , छुपाकर  रखता  है  l  चोरी  से  बचने  के  लिए  तो  छुपाकर  रखा  ही  जाता  है   लेकिन  यदि  ये  बहुमूल्य  संपदा  --हीरे , मोती , स्वर्ण  आदि   सड़क  पर   बिखेर  दिए  जाएँ  तो   लूट मच  जाए , बलवा  हो  जाए  l  बेवजह   सामाजिक  जीवन  में  संकट  न  हो  इसलिए  जीवन  के  सभी  क्षेत्रों  में  मर्यादा  जरुरी  है  l  इसी  तरह  धरती  माँ  अपनी  बहुमूल्य  संपदा  को  अपने  गर्भ  में  छुपाकर  रखती  है   और  ऐसी  संपदा  जिससे  मानव  जीवन  के  अस्तित्व  पर  खतरे  के  बादल  आ  जाएँ  , उन्हें  और  भी  गहराई  में  छुपाकर  धरती  माँ  रखती  है  l  लेकिन  अब  इसे  मनुष्य  का  लालच  कहें  या  असुरक्षा  का  भाव ,   मनुष्य     बहुत  गहराई  तक  खोदकर    वह  सब  सामग्री  धरती  के  ऊपर  ले  आया    जिनसे  बम  और  मारक  अस्त्र -शस्त्र  बनते  हैं  l  मनुष्य  ने  मर्यादा  का  उल्लंघन  कर  दिया  ,  इसलिए    अब  विध्वंसक  रूप  में  प्राकृतिक  आपदाएं  आना  स्वाभाविक  है  l  सहन  शक्ति  की  भी  कोई  सीमा  होती  है   l  एक  ओर  तो  धरती  पर  पाप , अपराध , अत्याचार  बढ़ता  जा  रहा  है   और  इसके  साथ  मनुष्य  तंत्र , ब्लैक मैजिक  , भूत , प्रेत  आदि  नकारात्मक  शक्तियों   के  प्रयोग  से   सम्पूर्ण  वातावरण  को  नकारात्मक  बना  रहा  है  l  नकारात्मक  शक्तियों  को  भी  तो  अपनी  खुराक  चाहिए  l  मनुष्य  के  अस्तित्व  पर  दोहरा  आक्रमण  है  --एक  ओर  प्रकृति  नाराज  है   इसलिए  सामूहिक  दंड  देती  है   l  दूसरी  ओर  नकारात्मक  शक्तियां  अपनी  खुराक  के  लिए   ऐसी  ह्रदय विदारक  घटनाओं  को  रचती  हैं  , इससे  उनको  खुराक  भी  मिलती  है  और उनकी  फौज  भी  बढ़ती  है  l  कहते  हैं  जब  जागो , तभी  सवेरा  l  संसार  के  सभी    देश  अपने  विध्वंसक  हथियारों , बम  आदि  को  समुद्र  में  फेंक  दें , इस  तरह  लड़ने  से  कोई  स्वर्ग  का  सिंहासन  तो  मिल  नहीं  रहा  !   प्रत्येक  मनुष्य  जागरूक  हो  , मर्यादा  में  रहे  , अपने  गलत  कर्मों  से  अगले  जन्म  में  भूत -प्रेत  बनने  की  तैयारी  न  करे  l  

16 July 2025

WISDOM -------

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- ' अहंकार  जब  व्यक्ति  के  सिर  पर  चढ़ता  है  तो  उसे  एहसास  कराता  है  कि कोई  उसका  कुछ  भी  नहीं  बिगाड़  सकता  , क्योंकि  वह  सबसे  श्रेष्ठ  है  , वह  शक्तिमान  है  , दुनिया  उसी  के  इशारों  पर  चल  रही  है  , उसके  बिना  कुछ  भी  नहीं  हो  सकता  l  लेकिन  ऐसा  संभव  नहीं  है  , इसलिए  एक  न  एक  दिन  वह  पराजित  होता  है   और  उसकी  पराजय  उसे  यह  एहसास  कराती  है   अहंकार  का  नाश  होना  ही  एकमात्र  सच्चाई  है  l '  आचार्य श्री  कहते  हैं ---" हमारे  व्यक्तित्व  की  सार्थकता   सद्भावनाओं , सद्विचारों   और  सत्कर्मों  से  है  , अहंकार  के  अनुचित  पोषण  में  नहीं  l  पूरे  जीवन  केवल  अहंकार   को  पोषित  करने   के  लिए  जिया  जाए   तब  भी  उसकी  संतुष्टि   संभव  नहीं  है  l '------ एक  सत्य घटना  है ---  दक्षिण  में  मोरोजी  पंत  नामक  एक  बहुत  बड़े  विद्वान  थे  l  उनको  अपनी  विद्या  का  बहुत  अभिमान  था  l  वे  अपने  समान  किसी  को  भी  विद्वान  नहीं  मानते  थे  और  सबको  नीचा  दिखाते  रहते  थे  l  एक  दिन  की  बात  है   वे  दोपहर  के  समय  अपने  घर  से   स्नान  करने  के  लिए   नदी  पर  जा  रहे  थे  l  मार्ग  में  एक  पेड़  पर  दो  ब्रह्मराक्षस   बैठे  हुए  थे  l  वे  आपस  में  बातचीत  कर  रहे  थे  l   एक  ब्रह्मराक्षस  बोला  --- "  हम  दोनों  इस  पेड़  की  दो  डालियों  पर  बैठे  हैं  , पर  यह  तीसरी  डाली  खाली  है  ,  इस  पर  बैठने  के  लिए  कौन  आएगा  ? "   तो  दूसरा  ब्रह्मराक्षस  बोला  ----- "  यह  जो  नीचे  से  जा  रहा  है  न  ,  यहाँ  आकर  बैठेगा  , क्योंकि  इसको  अपनी  विद्वता  का  बहुत  अभिमान  है  l "  उन  दोनों  के  संवाद  को  मोरोजी  पंत  ने  सुना   तो  वे  वहीँ  रुक  गए   और  विचार  करने  लगे  कि  हे  भगवन  !  विद्या  के  अभिमान  के  कारण  मुझे  प्रेतयोनि  में  जाना  पड़ेगा , ब्रह्मराक्षस  बनना  पड़ेगा  l  वे  अपनी  होने  वाली  दुर्गति  से  घबरा  गए   और  मन  ही  मन  संत  ज्ञानेश्वर   के  प्रति  शरणागत  होकर  बोले   --- " मैं  आपकी  शरण  में  हूँ , आपके  सिवाय  मुझे  बचाने  वाला  कोई  नहीं  है  l "  ऐसा  सोचते  हुए  वे   वहीँ  से  आलंदी  चले  गए   और  जीवन पर्यंत  वहीँ  रहे  l  आलंदी  वह  स्थान  है  जहाँ  संत  ज्ञानेश्वर  ने  जीवित  समाधि  ली  थी  l  संत  की  शरण  में  जाने  से  उनका  अभिमान  चला  गया   और  वे  भी  संत  बन  गए  l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       

13 July 2025

WISDOM ------

   दुनिया  में  जितने  भी  महापुरुष  हुए  हैं   , वे  परोपकारी  और  समस्त  मानवता  के  लिए  संवेदनशील  होते  हैं  l   महानता  की  राह  पर  चलने  वाले  व्यक्ति  अन्याय  और  शोषण  के  विरुद्ध  लड़ते  हैं  l उन्हें  दूसरों  का  दुःख -दरद  अपना  प्रतीत  होता  है   और  वे  उसे  दूर  करने  का  यथासंभव  प्रयास  भी  करते  हैं  l  चीन  के  सम्राट  महान दार्शनिक  कन्फ्यूशियस  की  महानता  से  परिचित  थे  l  एक  दिन  वे  कन्फ्यूशियस  से  बोले  ---- "  तुम  मुझे  उस  व्यक्ति  के  पास  ले  चलो  , जो  महान  हो  l "  इस  प्रश्न  को  पूछने  के  पीछे  सम्राट  का  भाव  था  कि   कन्फ्यूशियस  स्वयं  को  या  सम्राट  को   महान  की  श्रेणी  में  रखेंगे   लेकिन  कन्फ्यूशियस  उन्हें  एक  वृद्ध   व्यक्ति  के  पास  ले  गए  जो  बहुत  कमजोर  भी  था   लेकिन  कुआं  खोद  रहा  था  l  कन्फ्यूशियस  बोले  --- "  सम्राट  !   मुझसे  अधिक  महान  यह  वृद्ध  है  l  यह  शरीर  से  दुर्बल  है  लेकिन  परोपकार  के  भाव  से  कुआं  खोद  रहा  है  l  परोपकार  में  ही  इसका  तन  और  मन  आनंदित  होता  है  l  इससे  अधिक  महान  और  कौन  हो  सकता  है  l  "        

11 July 2025

WISDOM -----

समाज  में  अशांति  का  एक  बहुत  बड़ा  कारण  समाज  में    व्याप्त  कुरीतियाँ  और  अन्धविश्वास  हैं  l  लोग  कितना  भी  पढ़ -लिख  जाएँ  , स्वयं  को  आधुनिक   होने  का  दावा  करें   लेकिन  यह  दावा  सिर्फ   उनके  स्वयं  उनके  लिए  ही  होता  है  , वे  चाहे  जो  करें   लेकिन  जहाँ  परिवार  के   अन्य    सदस्यों  और  समाज  की  बात  आती  है   , ऐसे  लोग  परम्पराओं , कुरीतियों  और  अंधविश्वासों  से  अलग  नहीं  हो  पाते  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  -- हमारी  वृत्ति  हंस  जैसी  हो ,   जो  श्रेष्ठ  है  उसे  स्वीकार  करो  l  यह  भी  दुर्बुद्धि  का  ही  प्रकोप  है  कि  मनुष्य  अपनी  अधिकांश  ऊर्जा  जाति -पांति , छुआछूत , ऊँच -नीच ,  धार्मिक  भेदभाव    जैसे  मुद्दों  पर  अपने  अहंकार  को  पोषित  करने  में  व्यर्थ  गँवा  देता  है  l   यदि  मनुष्य  को  सद्बुद्धि  आ  जाए   और  वह  अपनी  ऊर्जा  का  सही  उपयोग  करना  सीख  जाए   तो  वह  स्वयं  का  जीवन  भी  सफल  कर  सकता  है   और  धरती  माँ  को  भी  अपने  सिर  पर  होने  वाले  खून -खराबे  से  राहत  मिल  जाएगी  l    आज  संसार   को   महर्षि  दयानंद  सरस्वती  के  विचारों  और  उनके  जैसे  व्यक्तित्व  की  जरुरत  है  l  वे  हर  प्रकार  के  आडम्बर  और  कुरीतियों  के  विरुद्ध  थे  l  महर्षि  दयानंद  मानते  थे  कि  हमारा  नाम  आर्य  है  l  आर्य  का  अर्थ  है  श्रेष्ठ  पुरुष  l  विदेशियों  ने  हमें  हिंदू  नाम  दिया  l  आर्यों  का  संस्कृत  भाषा  में  साहित्य   ही  संसार  का  सबसे  पुराना  साहित्य  है  l  महाभारत  के   उद्योग  पर्व  में  महात्मा  विदुर  धृतराष्ट्र  से  कहते  हैं ---- " हे  राजन  !  इस  संसार  में   दूसरों  को  निरंतर  प्रसन्न  करने  के  लिए  प्रिय  बोलने  वाले  प्रशंसक  लोग  बहुत  हैं  ,  परन्तु    सुनने  में  अप्रिय  लगे   और  वह  कल्याण  करने  वाला  वचन  हो  ,  उसका  कहने  और  सुनने  वाला   पुरुष  दुर्लभ  है  l "   महर्षि  दयानंद  ऐसे  ही  हितकारक  वचन  कहने  वाले  विरले  मनुष्य  थे  l  वे  राजाओं -महाराजाओं  और  बड़े -से -बड़े  अंगरेज  अफसरों  की  उपस्थिति  में  भी  निर्भीक  होकर  सबके  हित  की  सत्य  बात  कहा  करते  थे  l   महर्षि  दयानंद  कहते  थे  ---- " मेरा  काम  लोगों  के  मन -मंदिर   से  मूर्तियाँ  निकलवाना  है  ,  ईंट -पत्थर  के  मंदिरों  को  तोड़ना -फोड़ना  नहीं  है  l "   फर्रुखाबाद  में  एक  दिन  एक   ' साध ' ( निम्न  जाति  का  व्यक्ति )   स्वामी जी  के  लिए  कढ़ी  और  चावल  बनाकर  लाया   और  उन्होंने  उसे  खा  लिया  l  इस  पर  ब्राह्मणों  ने  कहा ---- " आप  भ्रष्ट  हो  गए  ,  जो  ' साध '  के  घर  का  भोजन  कर  लिया  l "    स्वामीजी  ने  उत्तर  दिया  ---- " भोजन  दो  प्रकार  से  भ्रष्ट  होता  है  --एक  तो  यदि  किसी  को  दुःख  देकर  धन  प्राप्त  किया  जाए  और  उससे  अन्न  आदि  खरीदकर   भोजन  बनाया  जाए  ,  दूसरा   भोजन  मलिन  हो  या  उसमें  कोई  मलिन  वास्तु  गिर  जाए  l  ,साध '  लोगों  का  मेहनत  का  पैसा  है  ,  उससे  प्राप्त   किया  हुआ  भोजन  उत्तम  है  l  "  ' सत्यार्थ प्रकाश  ' उनकी  प्रसिद्ध  कृति  है  l  

10 July 2025

WISDOM ------

   सिकंदरिया का  राजा  टालेमी  , यूक्लिड  से   ज्यामिति  सीख  रहा  था  ,  किन्तु  यह  कठिन  विद्या  उसके  पल्ले  ही  नहीं  पड़  रही  थी  l  एक  दिन  टालेमी  अपना  धैर्य  खो  बैठा  l  उसने  अपने  गुरु  से  पूछा  ---- "  क्या  ज्यामिति  सीखने  का  कोई  सरल  मार्ग  नहीं  है  ? "    यूक्लिड  ने  गंभीरता  से  कहा  --- "  राजन  !  आपके  राज्य  में   जनसाधारण  और  अभिजात  वर्ग  के  लिए   पृथक    मार्ग  हो  सकते  हैं  ,  किन्तु  ज्ञान  का  मार्ग  सबके  लिए   एक  सा  ही  है  l  इसमें  अभिजात  वर्ग  के  लिए   कोई  राजमार्ग  नहीं  है  l "   यह  बात  टालेमी  को  समझ  में  आ  गई  l  फिर  इसके  बाद  टालेमी   ज्यामिति  सीखने  के  लिए  कठोर  परिश्रम  करने  लगा  l  

9 July 2025

WISDOM ---

 कहते  हैं  यदि  भगवान  नाराज  हो  जाएँ  तो  गुरु  बचाने  वाले  हैं  ,  लेकिन  यदि  गुरु  नाराज  हो  जाएँ   तो  उसे   कोई  नहीं  बचा  सकता  l  गुरु  पूर्णिमा  को  ' व्यास  पूर्णिमा '  भी  कहा  जाता  है  l  महर्षि  वसिष्ठ  के  पौत्र  ,  महर्षि  पराशर  के  पुत्र   ' वेदव्यास '  जन्म  के  कुछ  समय  बाद  ही   अपनी  माँ  से  आज्ञा  लेकर  तपस्या  करने  चले  गए  थे  l  वेदों  को  विस्तार  प्रदान  करने  के  कारण   ही  इनका  नाम  'वेदव्यास ' पड़ा  l  ' गुरु पूर्णिमा  '  का  पर्व  गुरु  के  प्रति  समर्पित  है  l  '  सच्चे  गुरु  के  लिए  सैकड़ों  जन्म  समर्पित  किए  जा  सकते  हैं  l  सच्चा  गुरु  वहां  पहुंचा  देता  है  ,  जहाँ  शिष्य  अपने  पुरुषार्थ  से   कभी  नहीं  पहुँच  सकता  l "    गुरु  के  द्वारा  कहे  गए  वाक्य  मूलमंत्र  हैं   , वे  हमें  जीवन  जीना  सिखाते  हैं  l  l    बाहरी  शत्रुओं  से  तो  एक  बार  हम  अपनी  शक्ति  और  सामर्थ्य  से  लड़कर  विजयी  हो  भी  सकते  हैं   लेकिन  अपने  भीतरी  शत्रुओं  ---काम , क्रोध , लोभ  और  अहंकार  पर    विजय   तो  केवल  और  केवलमात्र  गुरु  कृपा  से  ही  संभव  है l  अपनी  पूजा -साधना  से   हम  अपने  मानसिक  विकारों  को  पराजित  नहीं  कर  सकते   l  अहंकार  और  कामवासना  जैसे   दुष्ट   शत्रुओं  पर  विजय  प्राप्त  करना   तो  असंभव  है   लेकिन  सच्चे  गुरु  असंभव  को  संभव  कर  देते  हैं  l  वे  एक   बार  नहीं  अनेकों  बार  अपने  शिष्य  को  गहरी  खाई  में  गिरने  से  बचाते  हैं  ,  उसे  जीवन  जीना  सिखाते  हैं  ,  उसकी  चेतना  का  विस्तार  करते  हैं  l  गुरु  की  कृपा  प्राप्त  करने  के  लिए  शिष्य  को  भी  सच्चा  शिष्य  बनना  होगा  l  गुरु  ने  अपने  प्रवचनों  और  साहित्य  के  द्वारा  जो  विचार  हमें  दिए  ,  जो  मार्ग  दिखाया  ,  उसका   अनुसरण   करें  l