इस वैज्ञानिक युग में लोगों के पास सुख - सुविधाएँ तो बहुत हैं लेकिन लोगों के जीवन में आनंद नहीं है l वह आंतरिक ख़ुशी जो चेहरे पर चमक ला देती है , वो कहीं खो गई है l सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी के चेहरे पर ख़ुशी दिख भी जाये , ख़ुशी के कुछ पल आ भी जाएँ तो ईर्ष्या -द्वेष करने वाले इतने हैं कि वे उस ख़ुशी को छीनने का , व्यक्ति को कष्ट देने का हर संभव प्रयास करते हैं l आज व्यक्ति दूसरे की ख़ुशी देखकर दुःखी और परेशान हो जाता है l यह विकृत मानसिकता परिवार से लेकर संसार में है l छोटे -छोटे बच्चों की हँसी तो निर्मल होती है , उनमें कोई ईर्ष्या -द्वेष नहीं होता , निर्मल मन है , हँसते -मुस्कराते हैं लेकिन निष्ठुर व्यक्तियों से उनकी ये निर्मल हँसी भी बर्दाश्त नहीं होती , कभी युद्ध के नाम पर , कभी विकृति के कारण वे बच्चों के ही प्राण ले लेते हैं l यह मनोरोग है l यदि व्यक्ति आध्यात्मिक है , यदि उसे अपने जीवन में कष्ट मिला है तो वह निरंतर यही प्रयास करेगा कि जो कष्ट उसे मिला , वैसा कष्ट किसी को न मिले , वह सबको ख़ुशी देने का हर संभव प्रयास करेगा l उसके कष्ट , उसके अभाव उसे कठोर नहीं बनाते l लेकिन इसके विपरीत अनेक लोग ऐसे होते हैं जिनका मन सब कुछ पाकर भी अतृप्त रहता है , छोटे से कष्ट भी उन्हें शूल की तरह चुभते हैं , ऐसे लोगों की मानसिकता यही होती है कि हमें ख़ुशी नहीं मिली , तो अब हम सब की ख़ुशी छीन लेंगे , किसी को चैन से जीने नहीं देंगे l ऐसे लोग बहुत निष्ठुर , आसुरी प्रवृति के होते हैं l यह आसुरी प्रवृति एक प्रकार का मनोरोग है l पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- ' मनोरोग और कुछ नहीं , मनुष्य की दबी , कुचली , रौंदी गईं भावनाएं ही हैं l भावनात्मक तृप्ति मानव जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है l भावना के बिना मनुष्य सब कुछ पाकर भी अतृप्त ही रहता है l भावना ही जब विकसित हो जाती है तो यह संवेदना है l इसके बिना जीवन वीरान और शुष्क हो जाता है l यही अनेक मनोविकारों का मूल कारण है l " जिनमें संवेदना नहीं है , वही असुर हैं , निर्दयी , निष्ठुर हैं l ऐसा इसलिए है क्योंकि वे स्वयं को भगवान समझते हैं , शक्ति का दुरूपयोग करते हैं l उनकी आत्मा जानती है के वे गलत हैं इसलिए वे लोग शराफत का नकाब पहनकर रहते , ये असुर आपस में बड़े संगठित होते हैं , इस सत्य को वे जानते हैं कि उनसे ऊपर ईश्वर है , इसलिए सब काम छिपकर करते हैं l जिस दिन उन्हें यह समझ आ गया कि ईश्वर उन्हें अपनी हजार आँखों से देख रहे हैं , उनके हर कार्य , प्रत्येक विचार पर उनकी द्रष्टि है , उस दिन उन्हें ईश्वर से प्रेम हो जायेगा , ह्रदय में भक्ति जाग्रत हो जाएगी और तब यह आसुरी प्रवृति आध्यात्मिकता में बदल जाएगी l
31 March 2026
25 March 2026
WISDOM -----
मनुष्य बुद्धिमान प्राणी है लेकिन उसकी सबसे बड़ी भूल यह है कि वह इतिहास से शिक्षा नहीं लेता l अपना अहंकार , लालच , कामना , अतृप्त इच्छाएं , महत्वाकांक्षा के आगे उसे कुछ दिखाई नहीं देता l यह सब दुर्गुण जिसमें भी हैं , वह अपनी शक्ति के अनुरूप उस क्षेत्र को मुसीबत में डाल देता है l व्यक्ति जितना पावरफुल है वह उतने ही बड़े क्षेत्र को , यहाँ तक कि इस दुनिया को , प्रकृति को सबको मुसीबत में डाल देता है l चाहे महाराज ययाति हों , दुर्योधन हों या रावण हों ---सब विभिन्न रूपों में इस धरती पर आफत बनकर बरस रहे हैं l गीता में कहा गया है कि जिनका मन शांत है , वे अपने आसपास सम्पूर्ण वातावरण में शांति फैलाते हैं l इस युग का यह दुर्भाग्य है कि लोगों के मन अशांत हैं l जिनके पास संसार के सारे सुख हैं , वैभव है , शक्ति है , उनके मन सबसे ज्यादा अशांत हैं , मन अशांत होकर भटक रहा है इसलिए बुद्धि बेलगाम हो गई है l यदि हम संसार में शांति चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपने मन को शांत रखना होगा l जब व्यक्ति का मन शांत होगा तो परिवार में शांति होगी , फिर समाज में राष्ट्र में और संसार में शांति होगी l यह शांति अनोखी होगी , एक ऐसी शांति जिसमे हमने अपने मन को मारा नहीं है l हमारे मन की भटकन , पागलपन दूर हो जाता है और हमारे निर्णय विवेकपूर्ण होते हैं l आज संसार में जब इतनी अशांति है तब हम सबका यह कर्तव्य बन जाता है कि हम सब गायत्री मन्त्र का जप करें और ईश्वर से प्रार्थना करें कि वे संसार के विभिन्न राष्ट्रों के जो कर्ता धर्ता हैं , उनके मन को शांति दें , उनके भीतर विवेक जाग्रत हो l सबसे बढ़कर जो हथियार बनाते हैं , उन्हें सद्बुद्धि आए l अपना लाभ कमाने की न सोचें l इस धरती पर अमर कोई नहीं है , इतनी लाशों का बोझ अपने कन्धों पर लेने से कहीं भी शांति नहीं मिलेगी l
7 March 2026
WISDOM ------ आखिरी दांव
लघु कथा ---- प्राचीन काल की बात है एक नगर सेठ था l उसके पास अपार धन संपदा थी l सुख -वैभव की कोई कमी नहीं थी l लेकिन उस सेठ को संतोष नहीं था l जब तक वह दूसरे सेठों का कुछ छीन न ले , उसे चैन की नींद नहीं आती थी l वह दूसरों का केवल धन ही नहीं , सब कुछ छीनना चाहता था , दूसरों का सुख -चैन छीनकर ही उसे आनंद आता था l वह अपने जासूसों को भेजकर यह जानकारी लेता था कि किसके पास क्या सबसे अच्छा है ? किसी के पास खुश होने के लिए और गर्व अनुभव करने के लिए क्या है ? वही उससे छीन लिया जाये l उसके जासूसों ने उसे बताया कि उसके नगर से कुछ दूरी पर एक नगर है , वहां एक बहुत सुन्दर बगीचा है , वहां के सभी लोग उस बगीचे को देवता मानकर पूजते हैं और वहां सैर कर के इतने प्रसन्न होते हैं कि उनकी ख़ुशी का वर्णन नहीं किया जा सकता l यह सुनकर उस लालची सेठ की नींद उड़ गई l वह दिन -रात यही सोचने लगा कि कैसे उस बगीचे पर अपना कब्जा किया जाए l साम , दाम , दंड , भेद हर तरीके से उसने सेठ को अपने वश में कर लिया और उससे कहा कि इस सुन्दर बगीचे पर वह अपना अधिकार चाहता है l बगीचे के मालिक उस सेठ ने कहा ---यदि बगीचे का अधिकार मैं तुम्हे दे दूंगा तो मेरी प्रजा मेरा सम्मान नहीं करेगी और मेरा जीवन जीना मुश्किल हो जाएगा l लालची सेठ ने अगली चाल चली , उसने कहा ---तुम गुपचुप रूप से मुझे इस बगीचे का अधिकार सौंप दो , किसी को पता न चलेगा , मेरे मन को संतोष हो जायेगा और तुम्हारा सम्मान भी बना रहेगा l सेठ आखिर राजी हो गया , उसने बड़े गोपनीय तरीके से उस सुन्दर बगीचे का मालिकाना हक लालची सेठ को सौंप दिया l कुछ ही दिन बाद उस लालची सेठ ने उसको मरवा दिया और उस बगीचे पर अपना अधिकार सबके सामने दिखा दिया l इस कथा से हमें क्या शिक्षा मिलती है ? हमें अपना आखिरी दांव कभी किसी को नहीं बताना चाहिए l जब शेर जंगल का राजा बना तब बिल्ली ने उसे सारे गुर सीखा दिए l शेर ने बिल्ली से कहा --कोई और हुनर हो तो वह भी सिखा दो ताकि मैं एक कुशल प्रशासक बन सकूँ l बिल्ली ने कहा -- मैंने तुम्हे वह सब कलाएं सिखा दीं जो मुझे ज्ञात हैं l शेर के मन में कुटिलता आ गई , उसने सोचा क्यों न मैं पहला शिकार इस बिल्ली का ही करूँ , यह सोचकर वह बिल्ली पर झपटा l बिल्ली सतर्क थी वह और तुरंत पेड़ पर चढ़ गई l शेर को पेड़ पर चढ़ना नहीं आता है l अब उसने बिल्ली से प्रार्थना की कि वह उसे पेड़ पर चढ़ना भी सिखा दे l बिल्ली होशियार थी , उसने कहा , नहीं 1 यह मेरा आखिरी दांव है यदि मैंने इसे तुम्हे सिखा दिया तो तुम मुझे ही खा जाओगे l
24 February 2026
WISDOM ----
प्रसिद्ध कवि अब्दुर्रहीम खानखाना के पास एक व्यक्ति आया और उनसे पूछने लगा कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण कौन सा संयम है ? उन्होंने कविता के माध्यम से उत्तर दिया --- " रहिमन जिह्वा बावरी , कही गई सरग पताल l खुद कह भीतर घुस गई , जूती पड़े कपाल l l अर्थात सारे संयमों में वाणी का संयम अत्यंत महत्वपूर्ण है l जीभ खुद तो बात कहकर मुँह के अन्दर चली जाती है , परन्तु कहने वाले को उसका परिणाम भुगतना पड़ता है l वाणी का संयम न होने से महाभारत का महायुद्ध हुआ l द्रोपदी ने कहा था ---' अंधे का बेटा अँधा होता है l ' दुर्योधन को पांडवों से ईर्ष्या तो पहले से ही थी , अब बदले की आग और इतनी तेज हो गई कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी दुर्योधन को समझा न सके l हर युग में यही सब रहा है l जिसके पास ताकत है , शक्ति है , धृतराष्ट्र का अँधा मोह और पूरा समर्थन है , वह अपनी शक्ति का दुरूपयोग करता है और उसका परिणाम निर्दोष व बेकसूरों को भी भुगतना पड़ता है l पहले तो युद्ध ऐसे होते थे कि महिलाएं व बच्चे सुरक्षित रहते थे जैसे महाभारत का महायुद्ध कुरुक्षेत्र के मैदान में हुआ l खेती और सामान्य जनजीवन सुरक्षित रहा लेकिन अब कोई सीमित क्षेत्र नहीं है l कलियुग में लोगों का नैतिक पतन हो गया है , युद्ध व दंगे आदि के माध्यम से वे अपनी दमित इच्छाओं की पूर्ति करते हैं , किसी से बदला लेने का उन्हें यह सुनहरा मौका लगता है , महिलाओं , छोटे बच्चों , गर्भस्थ शिशु की जो दुर्दशा होती है , जैसे भूत -पिशाच धरती पर नाच रहे हों l सच्चा इन्सान कहाँ छुपा है ?
20 February 2026
WISDOM ------
बंगाल के विख्यात शिक्षाविद् पंडित मुखोपाध्याय से मिलने संस्कृत महाविद्यालय के शिक्षक पहुंचे l उन्होंने पंडित जी से कहा ---- " आप संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं , फिर आप अन्य की तरह दुर्गापूजा महोत्सव धूम -धाम से क्यों नहीं मनाते ? " पंडित जी ने उस समय तो उनके प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया , पर इस वार्तालाप के कुछ दिन बाद उन्होंने शिक्षा तथा संस्कृत के प्रचार -प्रसार के लिए निर्मित विश्वनाथ संस्कृत ट्रस्ट को डेढ़ लाख रूपये दान में दिए l वे शिक्षक इसी ट्रस्ट द्वारा निर्मित महाविद्यालय में कार्यरत थे l पंडित जी उन्हें संबोधित कर के बोले ---- " मैंने दुर्गा पूजा महोत्सव में धूम -धाम न कर के जो पैसे बचाए हैं , ये वही धन है l संस्कृत देववाणी है और माँ दुर्गा के महत्त्व को सामने लाने का श्रेय भी संस्कृत को है l यदि इस धन से संस्कृत की सेवा हो जाये , तो मेरे लिए वही दुर्गा पूजा है l
15 February 2026
WISDOM -----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- 'प्रत्येक व्यक्ति समाज पर अपना भला -बुरा प्रभाव छोड़ता है l किन्तु सुगंध की अपेक्षा दुर्गन्ध का विस्तार अधिक तेजी से होता है l पानी का नीचे गिरना बहुत आसान है किन्तु ऊपर चढ़ाने के लिए बहुत अधिक मेहनत की आवश्यकता है l ' आसुरी प्रवृत्ति के लोग इसी वजह से आसुरी तत्वों को संसार में फैलाने में सफल हो जाते हैं l जो असुर हैं जिन्हें हम राक्षस , दैत्य और नर भक्षी हों तो उन्हें नर पिशाच भी कहते हैं , ये सब मनुष्य शरीर में ही हैं लेकिन इनमे संवेदना , करुणा , दया , ममता , प्रेम , मानवीयता नहीं होती l इनमे अहंकार और उससे जुड़े सभी दुर्गुण होते हैं l आज कलियुग की स्थिति यह है कि असुरता सम्पूर्ण धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहती है , सब उसके गुलाम बने और देवत्व का नामोनिशान मिट जाए l उनका उदेश्य लोगों को मानसिक गुलाम बनाना है , भौगोलिक नहीं l अपने उदेश्य में उसे बहुत सफलता भी मिली लेकिन ऐसे देश जहाँ कि संस्कृति में चरित्र की श्रेष्ठता है जैसा कि हमारा देश भारत , ऐसे किसी भी देश में देवत्व को पूरी तरह मिटाना संभव नहीं है l इसलिए आसुरी तत्वों ने दूसरी चाल चली --- डंडे के जोर पर तो चारित्रिक पतन आसान नहीं होता इसलिए अब उन्होंने लोगों के मन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से आक्रमण शुरू किया l इसके लिए उन्होंने विज्ञान का सहारा लिया और संचार तथा प्रचार-प्रसार के साधनों से लोगों के मन को डांवाडोल करने , उनका नैतिक पतन करने और अश्लीलता को परोसने का सारा व्यापार शुरू कर दिया l बुराई में बड़ा आकर्षण होता है l सद्विचारों को तो दो -चार लोग पढ़ लें यही बहुत बड़ी बात है लेकिन अश्लील साहित्य , ऐसी ही फ़िल्में , गंदे विचार इन्हें पढने , सुनने व देखने के लिए लाखों , करोड़ों लोगों की भीड़ होती है l संसार में जो लोग श्रेष्ठ काम कर रहें हैं , उनके कार्यों को बड़ी मुश्किल से एक -दो लाइन में समाचारों में दिखा दिया जाता है लेकिन जो बहुत ही निम्न श्रेणी के , निकृष्ट कार्य हैं , उन्हें समाचारों में और विभिन्न तरीकों से विस्तार से सचित्र भी दिखाया जाता है ताकि लोगों का मन बहुत कमजोर हो जाए l इसके साथ ही ये आसुरी प्रवृति के लोग अप्रत्यक्ष तरीकों से नकारात्मक शक्तियों की मदद से , साइकिक अटैक आदि विभिन्न तरीकों मानवजाति पर सामूहिक रूप से आक्रमण कर उन्हें विभिन्न तरह की बीमारियाँ देते हैं ताकि व्यक्ति इतना कमजोर हो जाए कि उसमें विरोध करने की सामर्थ्य ही न रहे , फिर वे हमें जैसी शिक्षा दे , चिकित्सा दे , कृषि , साहित्य , कला , खाद्य पदार्थ , बीज , खेती आदि सब कुछ उनकी मरजी का हो , हमारी इच्छा , हमारा स्वास्थ्य , हमारी संस्कृति , हमारी मिटटी , इससे किसी को कोई मतलब नहीं l यही है मानसिक गुलामी l गुलाम का अपना कोई अस्तित्व नही होता , वह तो एक कठपुतली होता है l असुरता की कोई जाति , कोई धर्म , कोई विशेष भौगोलिक क्षेत्र नहीं होता , ये सब एक नाव में सवार होते हैं l इस नाव का आकार अब बढ़ता ही जा रहा है l बुराई में तत्काल लाभ होता है इसलिए सब लोग उसी नाव में बैठने को आतुर हैं l देवत्व को बचाने का , देवत्व की रक्षा का एक ही उपाय है ---- ' गायत्री मन्त्र ' l माँ आदि शक्ति को पुकारो और शक्ति के साथ शिव की उपासना करो l शिव और शक्ति के संतुलन से देवत्व की रक्षा संभव है l प्रत्येक व्यक्ति यह प्रयास करे तब उसका परिवार , समाज , राष्ट्र आसुरी आक्रमण से सुरक्षित रहेंगे l
10 February 2026
WISDOM ------
विधाता ने स्रष्टि की रचना की और अनेक प्राणियों , वनस्पति , पशु -पक्षी आदि सभी बनाए l इन सब में विधाता ने मनुष्य को ही बुद्धि दी कि वह सन्मार्ग पर चलकर , नैतिकता के नियमों का पालन कर अपनी चेतना को विकसित करे और बुद्धि का सदुपयोग कर सामान्य मनुष्य से ऊपर उठकर इनसान ., देवता और भगवान बने लेकिन मनुष्य ने ऐसा नहीं किया , मनुष्य में अहंकार है उसने ईश्वर के आदेश को भी नहीं माना l मनुष्य के अहंकार ने उसकी बुद्धि को दुर्बुद्धि में बदल दिया , उसने ईश्वर के बताए क्रम से विपरीत क्रम को चुना l बहुत समय तक उसने पशुओं जैसा जीवन जिया लेकिन यह जीवन भी उसे बहुत कठिन लगा क्योंकि पशु भी प्रकृति के नियमों के अनुसार चलते हैं l समय से उठाना , शाम होते ही अपने घोंसले में चले जाना l संतान उत्पत्ति के उनके नियम हैं , समूह के छोटे बच्चों पर उनकी कुद्रष्टि नहीं होती , जरुरत भर का उनका घोंसला होता है , संपत्ति , वैभव नहीं जोड़ते l मनुष्य को यह पशुओं जैसा जीवन बहुत कठिन लगा l मनुष्य ने अपनी बुद्धि को बेलगाम कर दिया l मनुष्य ने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाए कि अपने समूह में उसे सबका सम्मान मिले और अपने भीतर की कालिख को वह सबसे छुपा ले l जैसी चाहत होती है वैसे रास्ते भी निकल आते हैं l मायावी शक्तियां तो शुरू से ही संसार में हैं l रावण मायावी था , हिरन्यकश्यप , बकासुर , भस्मासुर , अघासुर जैसे असंख्य असुर हैं l वे जीवित नहीं तो क्या , उनकी वाइब्रेशन तो ब्रह्माण्ड में हैं l जैसा जो चाहता है , वैसी ही वाइब्रेशन उसके पास आ जातीं हैं l अब मनुष्य को भी मायावी बनने का रास्ता मिल गया l फिर इन असुरों के अनेक सहयोगी ---भूत , प्रेत , जिन्न ,पिशाच आदि भी होते हैं , उन सबका मनुष्य को भरपूर सहयोग मिला l और मनुष्य को अपनी दुर्बुद्धि से उन्ही का जीवन बहुत पसंद आया , खाओ -पीओ मौज उड़ाओ , मारो -काटो , कोई नैतिकता नहीं , कोई नियम नहीं l मनुष्य युगों से इन्ही के जैसा जीवन जी रहा है , शरीर मनुष्य का है लेकिन अपने भीतर से वह -----है l यह कटु सत्य है , इसका प्रमाण भी है l संसार का इतिहास युद्धों का इतिहास है , बड़े भीषण युद्ध हुए हैं और आज भी हो रहें हैं , खून की नदियाँ बह गईं , अणुबम तो ऐसे गिरे कि सब कुछ राख हो गया l यदि मनुष्य ' इनसान ' होता तो इतने युद्ध नहीं होते , ये सारे शौक तो भूत , पिशाचों के ही हैं l आज स्थिति ये है कि संसार को नहीं सुधार सकते l अब सब व्यक्तिगत है , जो अच्छा व श्रेष्ठ जीवन जीना चाहे , वह इस कीचड़ में कमल की तरह रह सकता है l अपनी कम्युनिटी में खींचने के लिए भूत -पिशाच उस पर बहुत आक्रमण करेंगे , लेकिन यदि एक सच्चा और श्रेष्ठ इन्सान बनने का संकल्प लिया है तो ब्रह्माण्ड की दिव्य शक्तियां उसकी मदद अवश्य करेंगी l
7 February 2026
WISDOM ----
कांची नरेश की राजकुमारी प्रेत बाधा से पीड़ित थी l भूत सामान्य नहीं था , वह ब्रह्म राक्षस था l राजा ने श्री रामानुज को बुलाया l रामानुज ने वहां जाकर जब राजकुमारी को देखा तब सब समझ गए और पूछा ---- " आपको यह योनि क्यों मिली l " ब्रह्मराक्षस रो -रोकर बोला ---- " मैं विद्वान था , किन्तु मैंने अपनी विद्या छिपाकर रखी l किसी को भी मैंने विद्यादान नहीं किया , इससे मैं ब्रह्मराक्षस हुआ l आप समर्थ हैं , मुझे इस प्रेतत्व से मुक्ति दिलाइये l " श्री रामानुज ने राजकुमारी के मस्तक पर हाथ रख कर जैसे ही भगवान का स्मरण किया , वैसे ही ब्रह्मराक्षस ने राजकुमारी को छोड़ दिया , क्योंकि वह स्वयं प्रेत योनि से मुक्त हो गया l उस दिन से श्री रामानुज ने प्रतिज्ञा की कि वह स्वाध्याय का लाभ अपने समाज को भी देते रहेंगे l
4 February 2026
WISDOM
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'किसी को भी असफलता मिलने पर निराश होकर नहीं बैठना चाहिए l प्रयासरत रहना चाहिए , किसी न किसी क्षेत्र में सफलता अवश्य मिलेगी l जिस तरह सीढ़ियाँ चढ़ने में सावधानी बरती जाती है , अतिशीघ्रता में कभी-कभी पाँव फिसलने व गिरने का भी डर रहता है , उसी तरह मंजिल तक पहुँचने के लिए बढ़ाये जाने वाले क़दमों में भी सावधानी का ध्यान रखना जरुरी है l मंजिल तक ले जाने वाला हमारा हर प्रयास महत्वपूर्ण होता है l " पंचतंत्र की एक कहानी है ---------------- एक जंगल में दो पक्षी रहते थे l उस जंगल में एक छोर पर एक वृक्ष था , जिसमें वर्ष में एक बार स्वादिष्ट फल लगते थे l जब फलों का मौसम आया , तो जंगल के दोनों पक्षियों ने वहां जाने की योजना बनाई l पहले पक्षी ने दूसरे पक्षी से कहा --- " वह वृक्ष यहाँ से बहुत दूर है , इसलिए मैं तो आराम से वहां पहुँच जाऊँगा l अभी फलों का मौसम दो माह रहेगा l " इस बात पर दूसरे पक्षी ने कहा ---- " नहीं मित्र ! मुझसे तो रहा नहीं जा रहा है l उन स्वादिष्ट फलों के बारे में सोचकर ही मेरे मुँह से पानी आ रहा है l इसलिए मैं तो एक ही उड़ान में वहां पहुंचकर मीठे फल खा लेना चाहता हूँ l " दूसरे दिन दोनों पक्षी अपने घोंसले से निकलकर उस वृक्ष की ओर उड़ चले l कुछ दूर जाने पर पहले पक्षी को थकान होने लगी , तो वह विश्राम करने के लिए एक वृक्ष की टहनी पर ठहर गया l वहीँ दूसरा पक्षी उसे ठहरा हुआ देखकर मुस्कराया और तेजी से फलों की ओर उड़ने लगा l थकान तो उसे भी थी लेकिन उसे फल खाने की जल्दी थी l अब उसे दूर से ही फलों वाला वृक्ष दिखाई देने लगा l फलों की सुगंध भी उसे आने लगी , लेकिन तभी उसके पंख लड़खड़ाए क्योंकि वह बुरी तरह थक चुका था l वह आसमान से जमीन पर जा गिरा l उसके पंख बिखर गए और वह उन फलों तक कभी नहीं पहुँच सका l दूसरी ओर पहला पक्षी जो रुक -रूककर आ रहा था , वह फलों तक आराम से पहुँच गया l और उसने जी भरकर स्वादिष्ट फल खाए l इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि एक -एक कदम चलकर ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं l साथ ही लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जितना महत्त्व श्रम व प्रयास का है , उतना ही महत्त्व विश्राम का भी है l विश्राम करने से ही हमें आगे बढ़ने के लिए ऊर्जा मिलती है l
31 January 2026
WISDOM ------
वर्तमान समय में प्राकृतिक आपदाएं , आकस्मिक मृत्यु , दुर्घटनाएं ---प्रकृति की नाराजगी और चेतावनी का संकेत है l प्रत्यक्ष रूप में इसके अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन कुछ कारण ऐसे भी होते हैं जो दिखाई नहीं देते l अनेक लोग गुप्त रूप से अपने स्वार्थ की पूर्ति और ईर्ष्या द्वेष के कारण दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए नकारात्मक शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं l ऐसी नकारात्मक शक्तियां वायुमंडल में ही विचरण करती हैं l जिस किसी की ओर लक्ष्य कर के इन्हें भेजा जाता है , उसका तो ये नुकसान करती ही हैं , इसके साथ ही वे पूरे वायुमंडल को भी प्रदूषित करती हैं जैसे कोई बड़ी बदबूदार चीज एक स्थान से दूसरे स्थान जाएगी तो वह पूरा रास्ता बदबू से भर जायेगा और उसका असर सभी पर किसी न किसी रूप में अवश्य होगा l इस समय में धन और महत्वाकांक्षा की अंधी दौड़ है l लोगों का कितना अहित होता है , इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता l अनेक प्रकार की बीमारियाँ लोग झेल रहे हैं l जिनका जीवन स्तर अच्छा है , पौष्टिक भोजन है फिर भी बीमारी है , पीठ में दर्द , घुटने में दर्द , पैरों में दर्द यह तो आम बात है इसके लिए बुढ़ापा या कमजोरी ही कारण नहीं है l बड़ी मात्रा में तंत्र -मन्त्र , नकारात्मक शक्तियों के प्रयोग , साइकिक अटैक , विभिन्न तरीके के तांत्रिक प्रयोग ---ऐसी सभी बीमारियों के कारण हैं जो महँगी दवाई खाने और आपरेशन के बाद भी ठीक नहीं होतीं l जो लोग भी गुप्त रूप से इन कार्यों में लगे हैं , उनका परिवार भी सुरक्षित नहीं होता , बड़ी बीमारियों को झेलता है और अपने ही हाथों अपनी पीढ़ियों की बर्बादी लिख लेता है l जो लोग किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए ऐसी नकारात्मक शक्तियों का इस्तेमाल स्वयं करते हैं या किसी को प्रचुर धन देकर ऐसा कराते हैं वे मानसिक रूप से विकृत होते हैं , जिन्हें लोगों को कष्ट में देखने से आनंद मिलता है l पागल तो क़ानूनी दंड से भी बच जाता है , फिर ये तो छिपे हुए अपराधी हैं , इन्हें तो केवल भगवान ही देख सकते हैं , प्रत्यक्ष में तो कोई सबूत नहीं है l
29 January 2026
WISDOM -----
मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख , धूप -छाँव की तरह आते जाते रहते हैं l जब दुःख जीवन में आता है तब मनुष्य उसे अपना दुर्भाग्य समझता है l यही व्यक्ति की सबसे बड़ी भूल है l प्रत्येक दुःख का कारण दुर्भाग्य या प्रारब्ध नहीं होता l अनेकों बार जागरूकता की कमी की वजह से हमें दुःख के बोझ को उठाना पड़ता है l यह संसार ऐसा ही है , लोग हमारी सरलता और अज्ञानता के कारण ही फायदा उठाते हैं l युग के साथ लोगों की सोच भी बदल जाती है l त्रेतायुग में यह सबके सामने था कि मंत्र ने महारानी कैकेयी के कान भरे और भगवान श्रीराम को राजतिलक के स्थान पर वनवास हुआ l द्वापर युग में भी कौरवों का पांडवों के प्रति ईर्ष्या -द्वेष संसार के सामने स्पष्ट था , महाभारत हुआ l लेकिन कलियुग की स्थिति बहुत विकट है l अब मनोविकार तो अपने चरम पर हैं , लेकिन अब व्यक्ति दोगला है l वह समाज के सामने स्वयं को बहुत सभ्य , संस्कारी और परिवार के प्रति बहुत जिम्मेदार स्वयं को दिखाना चाहता है , लेकिन वह अपनी मानसिक विकृतियों से विवश है l धन -संपत्ति का लालच , कामना , वासना के वशीभूत वह अपने ही रिश्ते -नातों पर पीठ पीछे प्रहार करता है l धन संपत्ति के विवाद तो प्रत्यक्ष भी है जिनसे सारी अदालतें भरी हैं लेकिन जिनकी मानसिकता निकृष्ट है वे तंत्र -मन्त्र , ब्लैक मैजिक , भूत , पिशाच आदि अनेक नकारात्मक शक्तियों की मदद लेकर अपनों पर ही प्रहार करते हैं l ये सब नकारात्मक कार्य अपने ही करते हैं , गैरों की मदद लेकर l और जो इन सबको भुगतता है , वह जागरूक न होने के कारण इसे अपना दुर्भाग्य कहता है और ऐसे ' अपनों ' के साथ बातचीत , स्वागत , सत्कार , रिश्ता निभाने में उलझा रहता है और फायदा उठाने वाले अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं l लोग कहते हैं ईश्वर ऐसे दोगले लोगों को सजा क्यों नहीं दे रहे ? तो ईश्वर क्या करे ? जब व्यक्ति जागरूक नहीं है , अपने को सताने वालों के साथ चाय -नाश्ता कर रहा है , हँस -बोल रहा है , उनके स्वागत -सम्मान में अपनी ऊर्जा कर रहा खर्च कर रहा है l ईश्वर के पास सन्देश तो यही गया कि आप उसके द्वारा स्वयं को सताए जाने पर भी खुश हैं l जब व्यक्ति अपनी आँखें खुली रखेगा , जागरूक रहेगा तभी वह नाजायज शोषण व अत्याचार से बच सकेगा l
WISDOM ------
लघु कथा ------ एक महात्मा के पास तीन मित्र गुरु -दीक्षा लेने गए l तीनों ने बड़े भक्तिभाव से प्रणाम कर के अपनी जिज्ञासा प्रकट की l महात्मा ने उनको शिष्य बनाने से पूर्व पात्रता की परीक्षा कर लेने के उदेश्य से पूछा ---- " बताओ कान और आँख में कितना अंतर है ? ' एक ने उत्तर दिया ---- ' केवल पांच अंगुल का भगवन l ' महात्मा ने उसे एक ओर खड़ा कर के दूसरे से उत्तर के लिए कहा l दूसरे ने उत्तर दिया --- " महाराज ! आँख देखती है और कान सुनते हैं , इसलिए किसी बात की प्रमाणिकता के विषय में आँख का महत्त्व अधिक है l " महात्मा ने उसको भी एक ओर खड़ा कर के तीसरे से उत्तर देने के लिए कहा l तीसरे ने कहा --- ' भगवान् ! कान का महत्त्व आँख से अधिक है l आँख केवल लौकिक एवं द्रश्यमान जगत को ही देख पाती है , किन्तु कान को परलौकिक एवं पारमार्थिक विषय का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है l " महात्मा ने तीसरे को अपने पास रोक लिया l पहले दोनों को कर्म एवं उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिए , विदा कर दिया l
27 January 2026
WISDOM -----
मानव जीवन अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है l अमीर हों या गरीब कठिनाइयाँ सभी के जीवन में है , उनके रूप भिन्न -भिन्न हैं l समस्याओं से छुटकारा नहीं मिलता और अनेक लोगों के जीवन में ऐसा भी होता है कि एक ही तरह की समस्या निश्चित समय बाद बार -बार आती है l हम समझ नहीं पाते कि हमारे भाग्य में ऐसा क्या है कि एक ही तरह की समस्या बार -बार आ रही है , किसी तरह पीछा ही नहीं छूट रहा l सब उपाय कर लिए लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं मिला l ये समस्याएं हमारे व्यापार , व्यवसाय , स्वास्थ्य , वैवाहिक जीवन , विभिन्न रिश्तों से संबंधित होती हैं l हमारा जीवन इन सब में उलझा हुआ है l जब मन बहुत परेशान होता है तब हम सोचते हैं कि हमारे जीवन में ऐसा क्यों हुआ ? आखिर क्यों ? ऐसे सभी अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर यूनिवर्स में हैं l हमारे जीवन की प्रत्येक क्रिया , प्रत्येक श्वास का उत्तर यूनिवर्स में है जिन्हें हम ' TAROT CARDS ' की मदद से मालूम कर सकते हैं l आप भी अपने जीवन के ऐसे अनसुलझे प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए ' TAROT CARDS READER ' ANJALI से संपर्क कर सकते हैं l यह एक ईश्वरीय विद्या है , हम ईश्वर की कृपा से ही समस्या के पीछे छुपे सत्य को समझ सकते हैं l मेरा WHATS APP NO . है --- 9425142092 समय 2 PM - 4 PM
24 January 2026
WISDOM ----
संत का एक शिष्य उनके दर्शन को पहुंचा और बोला ----' आज मैं गरीबों को खाना खिलाकर आया हूँ l जब तक मैं किसी की सहायता न कर दूँ , मुझे चैन नहीं मिलता l बिना प्रार्थना किए मुझे नींद भी नहीं आती l " संत उसे समझाते हुए बोले --- " वत्स ! तुम्हारा आज का पुण्य समाप्त हो गया l जो दिखावे के लिए किसी की सहायता करता है , समझ लो वह नाटक कर रहा है , किसी की सहायता गुप्त रूप से करनी चाहिए l सेवा इतनी गुप्त रूप से होनी चाहिए कि दांया हाथ दान दे तो बांये हाथ को भी पता न चले l इस निष्काम भाव से किया गया कर्म ही पुण्य का माध्यम बनता है l " युग का प्रभाव प्रत्येक वर्ग पर पड़ता है l वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में प्रजातंत्र है l बड़ी विषम स्थिति है l एक ओर सांसारिक आकर्षण है , त्याग और वैराग्य बहुत कठिन है दूसरी ओर वोट के लिए लालच , महत्वाकांक्षा , सुख -भोग का जाल बिछाया जाता है l संत चाहे किसी भी जाति -धर्म का हो , किसी भी देश का हो , उसके लिए इस जाल में फँसने से बचना लगभग असंभव है , शरीर से पहाड़ पर चले भी जाओ , तो क्या यह चंचल मन तो संसार में ही भटकता है l भगवान ने गीता में कहा भी है --कोई विरला ही , लाखों , करोड़ों में कोई एक ही उन तक पहुँच पाता है l यही सत्य है क्योंकि जो भी ईश्वर की ओर कदम बढ़ाता है , आसुरी शक्तियां उसकी टांग खींचती है , उसका जीना मुश्किल कर देती है , वे सबको अपनी तरह राक्षस बनाना चाहते हैं l इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं , महात्मा ईसा को सूली पर चढ़ा दिया , मीरा को जहर दे दिया ---- ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है l कलियुग में चाहे लाख बुराइयाँ हों , लेकिन अब ऐसा नहीं होगा l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने भी कहा है ---युग परिवर्तन होगा , आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को हारना ही होगा , उन्हें सिर उठाने की जगह ही नहीं मिलेगी l
19 January 2026
WISDOM -------
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की यात्रा उसके परिवार से ही आरम्भ होती है l संस्कार तो उसके होते ही हैं और परिवार जीवन की प्रथम पाठशाला है इसलिए गुण -दुर्गुण के बीज परिवार में ही बोये जाते हैं जो उसकी उम्र के साथ बढ़कर विशाल वृक्ष बन जाते हैं l बाहरी परिस्थितियां और संगत उसमें अपना प्रभाव डालती हैं l ये परिवार ही हैं जो मनुष्य को देवता या असुर बना देते हैं l यह कलियुग का दुर्भाग्य है कि इस समय असुरता परिवार , समाज , संस्थाएं और सम्पूर्ण संसार में अपना आधिपत्य स्थापित करने में अपनी पूरी शक्ति लगा रही है l असुरों का अहंकार और महत्वाकांक्षा रावण से भी ज्यादा है इसलिए संसार में तनाव और युद्ध है l अब यदि निष्पक्ष रूप से इसकी जिम्मेदारी की बात कहें तो मानव जाति में बच्चे हैं , युवा हैं , प्रौढ़ और उम्र की ढलान पर पहुँचने वाले वृद्ध हैं l बच्चे मन के सच्चे हैं , वे अहंकर और महत्वाकांक्षा से दूर हैं , वे निश्छल और मासूम हैं , युद्ध , पारिवारिक कलह से उन्हें कोई मतलब नहीं है l जो युवा पीढ़ी है उनके सपने हैं , वे सुख से जीना चाहते हैं , उन्हें सही दिशा देने वाला कोई नहीं है इसलिए चालाक लोग उनकी ऊर्जा का अपने स्वार्थ के लिए उपयोग कर लेते हैं l अब शेष बचे प्रौढ़ और उम्र की ढलान वाले लोग , इनकी कामना , वासना , महत्वाकांक्षा , अहंकार कम नहीं हो रहा l इन लोगों को लगता है क्या -क्या , भोग लें , कोई सुख छूट न जाए , अहंकार की पताका नीची न हो जाये l इसके लिए ये लोग धन , वैभव यानि भौतिक शक्तियों के साथ हर तरह की नकारात्मक शक्तियों का भी भरपूर उपयोग करते हैं l संसार में , परिवार में , हर क्षेत्र में अशांति , तनाव , शारीरिक , मानसिक उत्पीड़न के लिए यही लोग उत्तरदायी हैं l इन्हें कौन समझा सकता है , न्याय करने अब ईश्वर को ही आना पड़ेगा l संसार में यदि कहीं कुछ अच्छा है , तो उसके लिए भी इसी उम्र के त्यागी , महात्मा हैं लेकिन उनकी संख्या सागर में एक बूंद के समान है l आचार्य श्री कहते हैं -- अंधकार को मिटाने के लिए एक किरण ही पर्याप्त है l इसलिए हमें निराश नहीं होना है , हर रात के बाद सुबह होती है , वो सुबह अवश्य होगी l
18 January 2026
WISDOM -----
लघु कथा ---- बिना नाव की सहायता के योगी ने जल पर चलकर नदी को पर किया l उसे अपनी सिद्धि पर बहुत गर्व हुआ और संतोष भी l अहंकार से तने हुए उस योगी को एक बूढ़े मछियारे ने देखा l उसने समीप जाकर प्रणाम करते हुए उनसे पूछा ---- " भगवन ! जल पर चलने की यह सिद्धि आपने कितने समय में प्राप्त की ? " योगी ने गर्व से अपना मस्तक ऊँचा उठाते हुए कहा ---- " पूरे बीस वर्ष कठोर तपस्या कर के मैंने यह सिद्धि प्राप्त की है l " बूढ़े ने खिन्न होकर कहा ---- " आपका इतना लम्बा समय व्यर्थ ही चला गया l जो काम नाव वाले को दो पैसा देकर पूरा हो सकता था , उसके लिए इतना कष्ट उठाने की क्या जरुरत थी ? आचार्य श्री कहते हैं --- ' मनुष्य को तपस्या , साधना विचारों के परिष्कार और सद्बुद्धि के लिए करनी चाहिए l क्योंकि सद्बुद्धि ही प्रत्येक कार्य में प्रकाशित है l
14 January 2026
WISDOM -----
1. लघु कथा ----- भिखारी दिन भर भीख मांगता -मांगता शाम को एक सराय में पहुंचा और भीतर की कोठारी में भीख की झोली रखकर सो गया l थोड़ी देर में एक किसान आया , उसके पास रुपयों की एक थैली थी , वह बैल खरीदने गया था l वह किसान भी रात को उसी सराय में रुका , जहाँ भिखारी था और वह पोटली सिराहने रखकर सो गया l भीख की झोली रुपयों की झोली से बोली --- " बहन ! हम तुम एक ही बिरादरी के हैं , इतनी दूर क्यों हो , आओ , हम तुम एक हो जाएँ l रुपयों की थैली ने हँसकर कहा -----" बहिन ! क्षमा करो , यदि मैं तुमसे मिल गई तो संसार में परिश्रम और पुरुषार्थ का मूल्य ही क्या रह जायेगा ? "
2 . लघु कथा --- एक दिन छाया ने मनुष्य से कहा --- " लो देखो , तुम जितने थे उतने ही रहे और मैं तुमसे कई गुना बढ़ गई l मनुष्य मुस्कराया और बोला ----- " सत्य और असत्य में यही तो अंतर है l सत्य जितना है उतना ही रहता है और असत्य पल -पल में घटता -बढ़ता रहता है l "
4 January 2026
WISDOM -----
' कहते हैं ----- ' जब -जब होता नाश धर्म का और पाप बढ़ जाता है , तब लेते अवतार प्रभु और विश्व शांति पाता है l ' लेकिन कलियुग में इतना पाप , अधर्म , अत्याचार बढ़ गया है फिर ईश्वर ने अवतार क्यों नहीं लिया ? कारण स्पष्ट है --- त्रेतायुग में रावण बहुत अत्याचारी , अन्यायी , अधर्मी था , परनारी का अपहरण किया था l इन दुर्गुणों के साथ वह परम शिवभक्त था , वेद , पुराण का ज्ञाता था l वीर , साहसी , कूटनीतिज्ञ आदि अनेक गुणों से संपन्न था l ऐसे अनेक श्रेष्ठ गुणों के कारण उसे निम्न योनि में नहीं ले जाया जा सकता था l रावण के कल्याण के लिए ईश्वर ने अवतार लिया क्योंकि भगवान के हाथों जिसका वध होगा उसकी मुक्ति हो जाती है l इसी तरह द्वापर युग में दुर्योधन ने पांडवों के साथ अन्याय किया लेकिन वह प्रजापालक था , प्रजा उससे खुश थी , वह बहुत वीर और बलराम जी का शिष्य था भगवान श्रीकृष्ण के सामने ही उसकी मृत्यु हुई l ईश्वर के दर्शन से उसकी मुक्ति निश्चित थी l कहने का तात्पर्य यह है कि त्रेतायुग और द्वापर युग में पाप की तुलना में पुण्य का , सद्गुणों का प्रतिशत लोगों में अधिक था लेकिन कलियुग में पाप और मानसिक विकृतियां अपने चरम पर हैं l ऐसे पापियों को ईश्वर कभी मुक्ति नहीं देना चाहते , इसलिए अवतार नहीं लेते l कलियुग में पापियों को उन्ही के कर्मों की लौटकर मार पड़ती है l अपने ही किए गए कुकृत्यों का बोझा वे ढोते हैं l
2 January 2026
WISDOM -----
इंग्लॅण्ड के एक प्रसिद्ध पहलवान थे l एक दिन वह अभ्यास कर के लौट रहे थे कि एक व्यक्ति ने उन पर थूक दिया l पहलवान बिलकुल शांत रहे , उन्होंने शांत भाव से अपना चेहरा साफ कर लिया l उनके प्रशंसकों को बहुत क्रोध आया , वे बदला लेने के पक्ष में थे l एक प्रशंसक ने उनसे कहा ---- " एक आदमी आप पर थूक जाए और हम चुप रहें ? " पहलवान बोले ---- " मित्र ! आपने देखा नहीं कि वह व्यक्ति जिसने थूका था , कितना दुबला -पतला था l मैं चाहता तो उसे एक घूंसा मार सकता था l क्या वह उसे सह पाता ? बलवान होने का यह अर्थ नहीं कि दुर्बलों को सताया जाए l " प्रशंसक ने कहा --- " आप सच में सच्चे वीर व बहादुर हैं l मैं आपके सद्गुणों को नमन करता हूँ l "