हमारे पुराणों की कथाएं केवल मनोरंजन के लिए नहीं हैं , उनके भीतर प्रत्येक युग के अनुरूप ज्ञान है , महत्वपूर्ण संकेत हैं l एक कथा है ---महाराज ययाति की ----ययाति की मृत्यु का समय आया तो यमराज उन्हें लेने गए l अब तो ययाति बहुत रोए , गिडगिडाए कि अभी तो मेरी कामनाएं , वासनाएं ही पूरी नहीं हुईं , मुझे कुछ समय और दो l यमराज को दया आ गई , उन्होंने कहा ---यदि तुम्हारा कोई पुत्र तुम्हे अपना यौवन दे दे तो तुम्हे उतने वर्ष का जीवन मिल जायेगा l महाराज ययाति अपने सभी पुत्रों के पास गए , उनसे याचना की l सभी ने उन्हें अपना यौवन देने से इनकार कर दिया लेकिन ' छोटे पुत्र ' को दया आ गई , उसने अपना यौवन उन्हें दे दिया l ययाति को पुत्र की परवाह नहीं थी वे तो भोग -विलास में मगन हो गए l कहते हैं ऐसा दस बार हुआ , ययाति ने हजारों वर्षों तक सुख भोगा लेकिन इच्छाएं शांत नहीं हुईं l मृत्यु तो आखिर होनी ही थी , उन्हें गिरगिट की योनि मिली l इस कथा का संकेत यही है की यह 'छोटा पुत्र ' जागरूक नहीं था , पिता के प्रति कर्तव्यपालन तो उचित है लेकिन उसकी अंध भक्ति से पिता का ही पतन हो गया , वे गिरगिट की योनि में न जाने कितने वर्षों तक रहे l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' वासना कभी समाप्त नहीं होती , देह पर देह बदलती है लेकिन वासना समाप्त नहीं होती l आचार्य जी कहते हैं ---- वासना का रूपांतरण संभव है और भक्ति वासना का दिव्य रूपांतरण है l ' इस ज्ञान की कलियुग में सबसे ज्यादा जरुरत है , संसार में हजारों , लाखों की संख्या में यायाति भर गए हैं जिनकी इच्छाएं किसी तरह पूरी ही नहीं हो रही हैं l कलियुग की मार ऐसी है कि लोग विवेकशून्य हैं , उनमें जागरूकता नहीं है , वे स्वयं ही यायातियों का पोषण करते हैं l सतयुग इतनी आसानी से नहीं आता , या तो ययातियों में विवेक जागे या पुत्रों में विवेक जागे तभी संसार में सुख -शांति होगी l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने ' गायत्री मन्त्र ' को संसार के लिए ही सरल ढंग से समझा दिया l केवल यही एक रास्ता है l गायत्री मन्त्र सद्बुद्धि का ही मन्त्र है , इससे विवेक जाग्रत होगा तभी संसार में सुख-शांति होगी l