10 July 2013

NOBLE

'जो मनीषी हैं वे स्तुति से न तो प्रसन्न होते हैं ,और न ही निंदा से अप्रसन्न होते हैं | '
          समर्थ गुरु रामदास के साथ एक  उद्दंड व्यक्ति चल पड़ा और रास्ते भर खरी -खोटी सुनाता रहा | समर्थ उन अपशब्दों को चुपचाप सुनते रहे |
       सुनसान समाप्त हुआ और बड़ा गाँव नजदीक आया तो समर्थ रुक गये और उस उद्दंड व्यक्ति से कहने लगे -"अभी और जो बुरा -भला कहना हो ,उसे कहकर समाप्त कर लो अन्यथा अगले गाँव में मेरे परिचित हैं ,सुनेगें तो तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करेंगे | तब इससे कहीं अधिक कष्ट मुझे होगा |
        वह व्यक्ति पैरों में गिरकर समर्थ गुरु रामदास से क्षमा मांगने लगा | समर्थ ने उसे अपना आचरण सुधारने एवं परिवार में भी सद प्रवृतियों को फैलाने का आशीर्वाद दिया |
   संत के इस व्यवहार ने उसके जीवन को तो बदला ही ,उसे बदले में जहां तिरस्कार और गालियां मिला करती थीं ,वहां अब सम्मान मिलने लगा |  

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