वर्तमान समय में विभिन्न क्षेत्रों में जितना भी ज्ञान है , उसके बीज हमें पूर्व के युगों में भी मिलते हैं l उनमें अंतर केवल अभिव्यक्ति का है l इसे सरल रूप में समझें तो दो कहावतें हैं ---- ' अंधे के आगे रोवे , अपना दीदा खोवे l ' और दूसरी कहावत है --- ' भैंस के आगे बीन बजाए , भैंस खड़ी डकराये l ' त्रेतायुग में जब भगवान श्री राम को समुद्र पार कर लंका जाना था तब उन्होंने तीन दिन तक समुद्र से प्रार्थना की कि वह उन्हें लंका जाने का रास्ता दे , लेकिन समुद्र ने एक न सुनी l लक्ष्मण जी को बहुत क्रोध आया , उनका कहना था -- दैव -दैव आलसी पुकारा l ' आखिर श्री राम ने समुद्र को सुखाने के लिए जैसे ही धनुष बाण उठाया , समुद्र देव प्रकट हो गए और नल -नील के माध्यम से समुद्र पर सेतु बनाने का सुझाव दिया l द्वापर युग में पांडवों पर दुर्योधन , शकुनि आदि ने इतना अत्याचार किया , हर तरह से उन्हें उत्पीड़ित किया लेकिन पांडवों ने कभी भी दुर्योधन से , भीष्म पितामह से , धृतराष्ट्र से कभी भी दया की भीख नहीं मांगी क्योंकि उन्हें यह ज्ञान था कि जिनकी आसुरी प्रवृति होती है उनमें करुणा , संवेदना नहीं होती , उनसे दया की उम्मीद करना , अपनी ऊर्जा को बरबाद करना है l इसलिए पांडवों ने अपने शरीर को मजबूत बनाया , तप से और ज्ञान से शारीरिक और मानसिक बल अर्जित किया , दिव्य अस्त्र -शस्त्र प्राप्त किए l उनके ऐसा करने पर पूरी कायनात ने उनकी मदद की , स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उनके सारथि बने और वीरता से उन्होंने अपना हक प्राप्त किया l भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया कि कर्म करो , परिस्थिति चाहे कैसी भी हो कर्म करना नहीं छोड़ो , कर्म से भागो मत l गीता का ज्ञान हमें जीवन जीने की कला सिखाता है l चारों तरफ कांटे हैं , घोर अंधकार है , ऐसी कठिन परिस्थिति से हम कैसे सकुशल बाहर निकल सकते हैं , यह ज्ञान हमें गीता से मिलता है l इस ज्ञान को सही ढंग से न समझ पाने के कारण अनेक लोग बड़ी मुश्किल से मिले इस मानव तन की उपेक्षा कर देते हैं l संसार के सारे काम इस देह से ही होते हैं , जब यह शरीर ही कमजोर हो गया तो क्या करोगे ? आज संसार को गीता के ज्ञान की जरुरत है l
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