लघु -कथा --- एक ही रात में इतने सारे रुपयों की थैली देखकर माँ ने कड़ककर बेटे से पूछा ---- " यह धन तू कहाँ से लाया ? " बेटे ने कहा --- " सेंध काटकर ! माँ तू ही तो कहती थी कि मनुष्य को सदैव परिश्रम की कमाई ही खानी चाहिए l माँ , महाजन की सेंध काटने में मुझे कितना परिश्रम करना पड़ा , तू इस बात को समझ भी नहीं सकती l " चपत लगाते हुए माँ ने कहा --- " मूर्ख ! मैंने इतना ही नहीं कहा कि मनुष्य को परिश्रम का खाना चाहिए वरन यह भी कहा था कि वह ईमानदारी से कमाया हुआ भी हो l उठा यह धन , जिसका है उसे लौटकर आ और अपने गाढ़े पसीने की कमाई का भरोसा कर l " माता की इस शिक्षा को शिरोधार्य करने वाला चोर युवक अंततः महा संत श्रमनक के नाम से विख्यात हुआ l न्यायपूर्ण जीविकोपार्जन का अर्थ है परिश्रम और ईमानदारी से कमाया गया धन l
6 March 2025
4 March 2025
WISDOM ------
मनुष्य की मूल प्रवृत्तियां --काम , क्रोध , लोभ , मोह , अहंकार --यह सब अति प्राचीन काल से ही मनुष्य में हैं l सतयुग में इसका प्रतिशत कम था लेकिन कलियुग में यह अपने चरम पर है l कलियुग में इन दुष्प्रवृत्तियों के साथ छल , कपट , धोखा , तिकड़म , दुष्प्रचार जैसे कायरतापूर्ण कार्य भी अत्यधिक होते हैं l रावण स्वयं को राक्षसराज रावण कहता था , लेकिन उसने अपने सगे -सम्बन्धियों के साथ धोखा , छल नहीं किया l रावण चाहता तो विभीषण को लालच दे सकता था कि तुम राम को छोड़कर वापस आ जाओ , तुम्हे आधा राज्य दे देंगे l विभीषण उसकी बातों में आकर वापस लौट जाता तो वह उसे मरवा देता l लेकिन रावण ने ऐसा नहीं किया , वो कायर नहीं था , वीर था l वेद -शास्त्रों का ज्ञाता और महापंडित था l इस कलियुग का सबसे बड़ा दोष यही है कि अब मनुष्य विश्वास के काबिल नहीं है l भाई -भाई के संपत्ति के झगड़े के मुक़दमे से अदालतें भरी हैं l धोखे से किसी को भी मारने की घटनाएँ सामान्य हैं l रिश्तों के नाम पर परस्पर स्नेह नहीं है , शोषण है l यह एक कटु सत्य है कि बड़े -बड़े अपराधियों की शुरुआत परिवार में ही छोटे -छोटे अपराधों को करने से होती है l ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि लालच , कामना , वासना अपने चरम शिखर पर है और ये दुर्गुण मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं l उसे मौके की तलाश होती है और ऐसा मौका उसे परिवार में , मित्रों और निकट सम्बन्धियों में आसानी से मिल जाता है l यहीं से उसके अपराधिक जीवन की शुरुआत हो जाती है l जागरूकता बहुत जरुरी है l मनुष्य या तो स्वयं को सुधारने का प्रयास करे , अन्यथा ये दुर्गुण व्यक्ति को मानसिक रूप से विकृत कर देते हैं l फिर ये सम्पूर्ण समाज के लिए खतरा होते हैं l
3 March 2025
WISDOM -----
कर्मफल के सिद्धांत को माने या न माने , यह व्यक्ति की अपनी इच्छा है l लेकिन यह निश्चित है कि मनुष्य का जीवन प्रकृति के अनुसार ही चलता है l जैसे हर रात के बाद दिन होता है , फिर दिन के बाद रात l यह क्रम निरंतर चलता ही रहता है l इसी तरह मनुष्य के जीवन में कभी दुःख और कष्ट की अँधेरी रात होती है और कभी सुख का सुनहरा सूर्योदय होता है l कभी पतझड़ तो कभी वसंत l प्रकृति के इस नियम को स्वीकार करने पर ही व्यक्ति तनाव रहित जीवन जी सकता है l शांति का जीवन जीने के लिए उस अद्रश्य शक्ति पर गहरी आस्था होनी चाहिए l आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि मनुष्य स्वयं को भगवान समझने लगा है , फिर आस्था और विश्वास किस पर करें ?
2 March 2025
WISDOM ------
भौतिकता की अंधी दौड़ के साथ मनुष्य की मानसिकता बहुत बदल गई l कलियुग का भी असर है कि अधिकांश व्यक्ति अच्छाई में भी बुराई ढूंढ लेते हैं l किसी के साथ अच्छा व्यवहार करो तो लोग उसे उसकी कमजोरी और दिखावा समझते हैं कि जरुर कोई स्वार्थ होगा इसीलिए सद् व्यवहार है l लेकिन मनुष्य के अतिरक्त सभी प्राणी --पशु -पक्षी आदि इस भौतिकता की दौड़ में नहीं हैं इसलिए वे नि:स्वार्थ प्रेम को समझते हैं l इनसान से अधिक विश्वसनीय अब पशु -पक्षी हैं l एक कथा है ----- एक राजा ने एक दिन स्वप्न देखा कि कोई साधु उससे कह रहा है कि बेटा ! कल रात को तुझे एक विषैला सर्प काटेगा और उसके काटने से तेरी मृत्यु हो जाएगी l वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है , पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेने के लिए वह तुझे काटेगा l राजा धर्मात्मा था , उसे स्वप्न की सत्यता पर विश्वास था l राजा ने सोचा कि मधुर व्यवहार से सर्प के मन में जो शत्रुता है , उसे दूर किया जा सकता है l यह निर्णय कर राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शैया तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया , सुगन्धित जल का छिड़काव कराया , मीठे दूध के कटोरे जगह -जगह रखवा दिए और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई भी उसे किसी प्रकार का कष्ट पहुँचाने का प्रयत्न न करे रात के ठीक बारह बजे सर्प अपनी बाबी में से फुफकारता हुआ निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया l रास्ते में मीठा दूध , सुगन्धित जल , फूलों का बिछौना -- इन सबके आनंद से उसके मन का क्रोध शांत होने लगा l द्वार पर खड़े सशस्त्र प्रहरी ने भी उसे कोई कष्ट नहीं दिया l वह सोचने लगा कि जो राजा इतना धर्मात्मा है , शत्रु के साथ इतना मधुर व्यवहार करता है उसे काटूं कैसे ? राजा के पलंग तक पहुँचने तक उसका निश्चय बदल गया था l वहां पहुंचकर उसने राजा से कहा --- " हे राजन ! मैं तुम्हे काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था परन्तु तुम्हारे सद व्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया l अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूँ l उसने मित्रता के उपहार स्वरुप अपनी बहुमूल्य मणि राजा को दी और वापस अपने घर चला गया l
1 March 2025
WISDOM -----
28 February 2025
WISDOM -----
लघु कथा ----- ' मन का अभ्यास '---- भिखारी ने हाथ आगे बढ़ाया लेकिन अश्वपति की जेब में कुछ न निकला l वे दुःखी होकर घर गए और एक बरतन उठाकर ले आए और उसे भिखारी को दे दिया l थोड़ी देर में अश्वपति की पत्नी आई और वह बरतन न पाकर चिल्लाई ---अरे , अरे चांदी का बरतन भिखारी को दे दिया l दौड़कर उसे वापस ले आओ l अश्वपति ने आगे बढ़कर भिखारी को रोककर कहा --- " भाई ! मेरी पत्नी ने बताया कि यह गिलास चांदी का है , इसे सस्ता मत बेच देना l " एक पड़ोसी ने पूछा ---- " अश्वपति ! जब तुम्हे पता हो गया था कि गिलास चांदी का है , तो भी उसे क्यों ले जाने दिया ? " अश्वपति ने हँसकर कहा ---- " मन को इस बात का अभ्यस्त बनाने के लिए कि यह बड़ी से बड़ी हानि में भी दुःखी और निराश न हो l "
27 February 2025
WISDOM -----
जाति प्रथा केवल हमारे देश में ही नहीं है , संसार के विभिन्न देशों में , विभिन्न धर्मों में भेदभाव अवश्य है l इसे कुछ भी नाम दे दिया जाये , इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इनमें एक वर्ग पीड़ित है और दूसरा उसे भिन्न -भिन्न तरीकों से सताने वाला l जाति के नाम पर लोग इतना लाभ कमाते हैं कि धर्म भी उसके आगे फीका पड़ जाता है l एक लोक कथा है ---- एक सेठ था l अपार संपदा थी उसके पास l जितनी संपदा थी , उससे कई गुना उसे लालच था l बहुमूल्य संपदा को वह मटकों में भरकर जमीन में गाड़ कर रखता था l इतनी संपत्ति एकत्रित करने के लिए वह स्वांग रचता था l उसकी हुकूमत आसपास के आठ -दस गांवों तक थी l उसने गुप्त रूप से अपनी एक सेना बना रखी थी जिसमें कुछ युवक , कुछ वृद्ध पुरुष और कुछ वृद्ध महिलाएं भी थी l ये लोग क्या करते हैं , उस सेठ की ऐसी कोई सेना है , इस बात को कोई नहीं जानता था l वह सेठ इन गाँवों में अक्सर कोई न कोई उत्सव , प्रवचन , गाँव के लोगों की कलाकारी से संबंधित तमाशा कराता रहता था l जब ये कार्यक्रम निश्चित होते तब सेठ के ये सैनिक जो गाँव के ही विभिन्न परिवारों के थे , उनके और अधिक हमदर्द बनकर लोगों के पास जाते और कभी प्यार से कभी धमकी देकर लोगों को समझाते कि सेठ जो भी करा रहा है , उसमे तुम्हे जाना है , गाँव के कल्याण के लिए निश्चित राशि जमा करनी है अन्यथा तुम्हे जाति से बहिष्कृत कर दिया जायेगा , तुम्हारा हुक्का -पानी बंद कर दिया जायेगा l गाँव के सीधे -सरल लोग , मरता क्या न करता अपना पेट तन काटकर इस 'आदेश ' को मानते l उन्हें भय था कि जाति से बहिष्कृत हो गए तो अकेले कैसे रहेंगे , बच्चों का विवाह कैसे होगा ? गरीबी और भुखमरी के कारण वहां महामारी फ़ैल गई , वे गाँव वीरान हो गए , जो बच गए वे रातों -रात गाँव छोड़कर चले गए l अब उस वीराने में सेठ अकेला , अपनी संपदा के ढेर पर बैठा था , और छाती पीट -पीट कर रो रहा था कि उसके वैभव पर उसके क़दमों में सिर झुकाने वाला अब कोई नहीं है l वह चीख -चीख कर अपनी करतूत बता रहा था लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था l उसका परिवार भी महामारी की चपेट में आ चुका था l उस गाँव से जब बहुत दिनों तक कोई आवाजाही नहीं हुई तो तो लोगों ने वहां जाकर पता लगाना चाहा की क्या बात हो गई ? जब लोग वहां पहुंचे तो देखा पूरा गाँव वीरान था और सेठ अपने कमरे में अपनी छाती पर बहुमूल्य संपदा को दोनों हाथों से दबाए मृत पड़ा था l