किसी के दुःख , कष्टों का तत्काल संकट निवारण करने के लिए कुछ साधनों की , सहायता की आवश्यकता होती है , पर किसी का स्थायी दुःख मिटाना हो तो उसे अपने पैरों पर खड़ा कर स्वावलंबी बनाना होगा l
10 November 2015
8 November 2015
विचारों में परिवर्तन
कोई भी परिवर्तन चाहे बड़ा हो या छोटा विचारों में परिवर्तन के रूप में ही जन्म लेता है । मनुष्यों और समाज की विचारणा और धारणा में जब तक परिवर्तन नहीं आता तब तक सामाजिक परिवर्तन भी असंभव ही है और विचारों के बीज साहित्य के हल से ही बोये जा सकते हैं ।
जिस प्रकार जासूसी उपन्यास , अपराध फिल्म और अश्लील साहित्य पढ़कर कोई भी व्यक्ति चोर , डाकू और लुटेरा बन सकता है उसी प्रकार सत्साहित्य का अध्ययन मनुष्य के व्यक्तित्व और विचारों में उत्कर्ष करने में सहायक है | अपना समय व्यर्थ की बातों में न गंवाकर उपयोगी एवं उत्कृष्ट - साहित्य का अध्ययन कर उनसे प्राप्त प्रेरणाओ से जीवन के लिए उचित मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है ।
जिस प्रकार जासूसी उपन्यास , अपराध फिल्म और अश्लील साहित्य पढ़कर कोई भी व्यक्ति चोर , डाकू और लुटेरा बन सकता है उसी प्रकार सत्साहित्य का अध्ययन मनुष्य के व्यक्तित्व और विचारों में उत्कर्ष करने में सहायक है | अपना समय व्यर्थ की बातों में न गंवाकर उपयोगी एवं उत्कृष्ट - साहित्य का अध्ययन कर उनसे प्राप्त प्रेरणाओ से जीवन के लिए उचित मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है ।
7 November 2015
WISDOM
एक बार जर्मन दार्शनिक ने स्वामी दयानंद से कहा , " स्वामी जी ! आपका बलिष्ठ शरीर और ओजस्वी मुखमंडल देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हूँ | क्या मुझ जैसे सामान्य व्यक्तियों के लिए यह संभव है कि आप जैसा सशक्त शरीर और तेजयुक्त मुखमंडल प्राप्त हो सके ? "
स्वामी जी ने कहा --- " क्यों नहीं , जो व्यक्ति अपने को जैसा बनाना चाहता है , बना सकता
है । हर व्यक्ति अपनी कल्पना के अनुरूप ही बनता - बिगड़ता रहता है | तुम्हे सर्वप्रथम एक लक्ष्य का निर्धारण करना चाहिए । फिर उसकी पूर्ति के लिए संकल्प करके तदनुकूल प्रयत्न करना चाहिए एकाग्र मन से किये गये कार्य एक दिन सफलता की मंजिल पर अवश्य लाकर खड़ा कर देते हैं ।"
स्वामी जी ने कहा --- " क्यों नहीं , जो व्यक्ति अपने को जैसा बनाना चाहता है , बना सकता
है । हर व्यक्ति अपनी कल्पना के अनुरूप ही बनता - बिगड़ता रहता है | तुम्हे सर्वप्रथम एक लक्ष्य का निर्धारण करना चाहिए । फिर उसकी पूर्ति के लिए संकल्प करके तदनुकूल प्रयत्न करना चाहिए एकाग्र मन से किये गये कार्य एक दिन सफलता की मंजिल पर अवश्य लाकर खड़ा कर देते हैं ।"
27 October 2015
गुरु गरिमा
सिकन्दर और अरस्तु साथ - साथ जा रहे थे , रास्ते में नदी मिली । अरस्तु पहले पार जाना चाहते थे , पर सिकन्दर न माना और वही पहले उतरा , अरस्तु बाद में उतरे । पार जाने पर अरस्तु ने सिकंदर से कहना न मानने का कारण पूछा । सिकन्दर ने जवाब दिया कि यदि सिकन्दर डूब जाता तो अरस्तु ऐसे दस सिकन्दर बना सकते थे , पर अगर अरस्तु डूब जाते तो दस सिकन्दर मिलकर भी एक अरस्तु नहीं बना सकते थे ।
25 October 2015
ऊँच - नीच की भावनाओं के विरोधी ----- महाकवि कम्बन
' जो विद्वान अपने ज्ञान भण्डार और परिश्रम पूर्वक अर्जित किये अनुभव को जन - साधारण के हितार्थ प्रस्तुत करते हैं वे वास्तव में समाज के बहुत बड़े हितकारी हैं | सद्गुणों और सत्कार्यों की प्रशंसा पढ़कर मनुष्य का चित उनकी तरफ आकर्षित होता है और वह भी उनका अनुकरण करके वैसा ही यश और प्रशंसा प्राप्त करने की अभिलाषा करने लगता है । इस प्रकार सत्कर्मो की श्रंखला आगे बढ़ती है और समाज अधिक सुसंस्कृत बनता जाता है । '
तामिल - भाषा के महाकवि कम्बन ( जन्म 1200 के लगभग ) इसी तथ्य के उदाहरण थे ।
ये बचपन में ही अनाथ हो गये थे । इनके रिश्तेदार इन्हें नल्लूर गाँव में एक किसान के घर के पास छोड़ आये , उसी के घर इनकी परवरिश हुई | ये बचपन से ही प्रतिभाशाली थे और काव्य - रचना करने लगे । इनकी काव्य - प्रतिभा से चोल - राजा बहुत खुश हुए और उन्हें राजकवि बना दिया | कुछ समय बद राज ने उनसे तमिल - भाषा में वाल्मीकि - रामायण की तरह रामचरित्र लिखने का आग्रह किया । उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार किया ।
कुछ वर्ष बाद बारह हजार पदों का सुन्दर ग्रन्थ लिखकर तैयार हो गया । यह ग्रन्थ बहुत लोकप्रिय हुआ | जैसे उत्तर भारत में तुलसीदासजी की रामचरितमानस घर - घर पढ़ी जाती है उसी तरह दक्षिण भारत में ' कम्ब रामायण ' का सर्वत्र सम्मान के साथ पाठ किया जाता है । उनकी महान कृति पर मुग्ध होकर विद्वानों व महाराजाओं ने उन्हें ' कवि - सम्राट ' की पदवी दे दी ।
' कम्ब रामायण ' में उन्होंने राम -वनवास में उनके सर्वप्रथम सहायक निषादराजगुह जो कि नीची जाति के शूद्र थे , का वर्णन बहुत उच्च और उदात्त रूप में किया है । कम्बन ने उसको एक स्वाभिमानी और बहादुर सरदार के रूप में चित्रित किया है |
कम्बन ने निषाद जैसी नीच कहलाने वाली जाति के व्यक्ति को ऊँचा उठाकर , उसे राम का प्रिय मित्र बनाकर ऊँची - नीची जाति के मिथ्या अहंकार की जड़ पर कुठाराघात किया है । उनके इस काव्य - प्रवाह का पाठक के अंतर्मन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है और वह जाति के बजाय चरित्र की उच्चता के सिद्धांत का कायल हो जाता है ।
कम्बन ने अपनी रचना द्वारा हर तरह से सदभावों को अपनाने एवं उनकी वृद्धि की प्रेरणा की है , जो एक सच्चे साहित्यकार का धर्म है |
तामिल - भाषा के महाकवि कम्बन ( जन्म 1200 के लगभग ) इसी तथ्य के उदाहरण थे ।
ये बचपन में ही अनाथ हो गये थे । इनके रिश्तेदार इन्हें नल्लूर गाँव में एक किसान के घर के पास छोड़ आये , उसी के घर इनकी परवरिश हुई | ये बचपन से ही प्रतिभाशाली थे और काव्य - रचना करने लगे । इनकी काव्य - प्रतिभा से चोल - राजा बहुत खुश हुए और उन्हें राजकवि बना दिया | कुछ समय बद राज ने उनसे तमिल - भाषा में वाल्मीकि - रामायण की तरह रामचरित्र लिखने का आग्रह किया । उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार किया ।
कुछ वर्ष बाद बारह हजार पदों का सुन्दर ग्रन्थ लिखकर तैयार हो गया । यह ग्रन्थ बहुत लोकप्रिय हुआ | जैसे उत्तर भारत में तुलसीदासजी की रामचरितमानस घर - घर पढ़ी जाती है उसी तरह दक्षिण भारत में ' कम्ब रामायण ' का सर्वत्र सम्मान के साथ पाठ किया जाता है । उनकी महान कृति पर मुग्ध होकर विद्वानों व महाराजाओं ने उन्हें ' कवि - सम्राट ' की पदवी दे दी ।
' कम्ब रामायण ' में उन्होंने राम -वनवास में उनके सर्वप्रथम सहायक निषादराजगुह जो कि नीची जाति के शूद्र थे , का वर्णन बहुत उच्च और उदात्त रूप में किया है । कम्बन ने उसको एक स्वाभिमानी और बहादुर सरदार के रूप में चित्रित किया है |
कम्बन ने निषाद जैसी नीच कहलाने वाली जाति के व्यक्ति को ऊँचा उठाकर , उसे राम का प्रिय मित्र बनाकर ऊँची - नीची जाति के मिथ्या अहंकार की जड़ पर कुठाराघात किया है । उनके इस काव्य - प्रवाह का पाठक के अंतर्मन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है और वह जाति के बजाय चरित्र की उच्चता के सिद्धांत का कायल हो जाता है ।
कम्बन ने अपनी रचना द्वारा हर तरह से सदभावों को अपनाने एवं उनकी वृद्धि की प्रेरणा की है , जो एक सच्चे साहित्यकार का धर्म है |
23 October 2015
मानवता के अमर - गायक ---- एलेक्जेंडर पुश्किन
कवि , मानवता का प्रतिनिधि होता है । जो कला मानवता के श्रंगार में प्रयुक्त हो उसी को सार्थक माना जा सकता है | रूस के महाकवि एलेक्जेंडर पुश्किन ऐसे ही कलाकार थे , उन्होंने अपने युग की पीड़ा को छंद बद्ध करके मानवीय अंत:करण तक पहुँचाने का प्रयत्न किया ।
पुश्किन ,कवि माने जाते हैं और उन्हें किसी क्रांति का ही प्रेरक नहीं वरन अनैतिकता के विरुद्ध छेड़े गये विश्व - युद्ध का अग्रणी नेता समझा जाता है ।
उन्होंने छोटे बड़े दर्जनों महाकाव्य और साधारण कविता की पुस्तकें लिखीं , नाटक और उपन्यास भी कई लिखे , इस सभी रचनाओं में वह ओज , आदर्श और प्रभाव मौजूद है जो अनाचार के विरुद्ध संघर्ष करने और मानवीय पुण्यो की स्थापना में आवश्यक स्फूर्ति व प्रेरणा दे सके | वे कुलीन कहलाने वाले घराने में जन्मे थे किन्तु उनकी रचनाओं में पीड़ित और शोषित जनता का दर्द था , उनकी कवितायेँ गायी जाने लगीं जनता ने उनसे आवश्यक प्रेरणा प्राप्त की । ' रोड टू लिबर्टी , ' दी विलेज ' उनके दो काव्य बहुत लोकप्रिय हुए जिनमे राजनीतिक उत्पीड़न के विरुद्ध जनता को संघर्ष करने की प्रेरणा दी गई थी |
पुश्किन ,कवि माने जाते हैं और उन्हें किसी क्रांति का ही प्रेरक नहीं वरन अनैतिकता के विरुद्ध छेड़े गये विश्व - युद्ध का अग्रणी नेता समझा जाता है ।
उन्होंने छोटे बड़े दर्जनों महाकाव्य और साधारण कविता की पुस्तकें लिखीं , नाटक और उपन्यास भी कई लिखे , इस सभी रचनाओं में वह ओज , आदर्श और प्रभाव मौजूद है जो अनाचार के विरुद्ध संघर्ष करने और मानवीय पुण्यो की स्थापना में आवश्यक स्फूर्ति व प्रेरणा दे सके | वे कुलीन कहलाने वाले घराने में जन्मे थे किन्तु उनकी रचनाओं में पीड़ित और शोषित जनता का दर्द था , उनकी कवितायेँ गायी जाने लगीं जनता ने उनसे आवश्यक प्रेरणा प्राप्त की । ' रोड टू लिबर्टी , ' दी विलेज ' उनके दो काव्य बहुत लोकप्रिय हुए जिनमे राजनीतिक उत्पीड़न के विरुद्ध जनता को संघर्ष करने की प्रेरणा दी गई थी |
22 October 2015
हिंसा और अहिंसा का अदभुत समन्वय करने वाले ------- भगवान् परशुराम
'अन्याय और अधर्म को यदि सहन करते रहा जायेगा तो इससे अनीति बढ़ेगी और इस सुन्दर संसार में अशांति उत्पन्न होगी । अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापन एक ही रथ के दो पहिये होते हैं | '
परशुराम जी ने कहा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए जब अहिंसा समर्थ न हो तो हिंसा भी अपनायी जा सकती है । अनाचार को समाप्त करने की उदात्त भावना से प्रेरित होकर यदि हिंसात्मक नीति अपनानी पड़े तो उसे परशुराम जी ने अनुचित नहीं समझा ।
शान्ति की स्थापना के लिए प्रयुक्त हुई अशान्ति सराहनीय है और अहिंसा की परिस्थितियां उत्पन्न करने के लिए की गई हिंसा में पाप नहीं माना जाता ।
परशुराम जी शास्त्र और धर्म के गूढ़ तत्वों को भली - भांति समझते थे इसलिए आवश्यकता पड़ने पर काँटे से काँटा निकालने , विष से विष मारने की नीति के अनुसार ऋषि होते हुए भी उन्होंने धर्म रक्षा के लिए सशस्त्र अभियान आरम्भ करने में तनिक भी संकोच न किया ।
नम्रता और ज्ञान से सज्जनों को और दण्ड से दुष्टों को जीता जा सकता है ।
परशुराम जी ने कहा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए जब अहिंसा समर्थ न हो तो हिंसा भी अपनायी जा सकती है । अनाचार को समाप्त करने की उदात्त भावना से प्रेरित होकर यदि हिंसात्मक नीति अपनानी पड़े तो उसे परशुराम जी ने अनुचित नहीं समझा ।
शान्ति की स्थापना के लिए प्रयुक्त हुई अशान्ति सराहनीय है और अहिंसा की परिस्थितियां उत्पन्न करने के लिए की गई हिंसा में पाप नहीं माना जाता ।
परशुराम जी शास्त्र और धर्म के गूढ़ तत्वों को भली - भांति समझते थे इसलिए आवश्यकता पड़ने पर काँटे से काँटा निकालने , विष से विष मारने की नीति के अनुसार ऋषि होते हुए भी उन्होंने धर्म रक्षा के लिए सशस्त्र अभियान आरम्भ करने में तनिक भी संकोच न किया ।
नम्रता और ज्ञान से सज्जनों को और दण्ड से दुष्टों को जीता जा सकता है ।
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