लोकमान्य तिलक से किसी ने आश्चर्य चकित होते हुए पूछा ---- "कई बार आपकी बहुत निंदापूर्ण आलोचनाएं होती हैं , लेकिन आप तो कभी विचलित नहीं होते l " उत्तर में लोकमान्य तिलक मुस्कराए और बोले ---- " निंदा ही क्यों कई बार लोग प्रशंसा भी करते हैं l " वे कहने लगे ---- " ये है तो मेरी जिंदगी का रहस्य , पर मैं आपको बता देता हूँ l निंदा करने वाले मुझे शैतान समझते हैं और प्रशंसक मुझे भगवान का दरजा देते हैं , लेकिन सच मैं जानता हूँ और वह यह है कि मैं न तो शैतान हूँ और न ही भगवान l मैं तो एक इनसान हूँ , जिसमें थोड़ी कमियां हैं और थोड़ी अच्छाइयाँ हैं l मैं अपनी कमियों को दूर करने में और अच्छाइयों को बढ़ाने में लगा रहता हूँ l एक बात और भी है जब अपनी जिंदगी को मैं ही ठीक से नहीं समझ पाया तो भला दूसरे क्या समझेंगे l इसलिए जितनी झूठ उनकी निंदा है , उतनी ही उनकी प्रशंसा है l इसलिए मैं उन दोनों बातों की परवाह न कर के अपने आपको और अधिक संवारने - सुधारने की कोशिश करता रहता हूँ l " सुनने वाले व्यक्ति को इन बातों को सुनकर लोकमान्य तिलक के स्वस्थ मन का रहस्य समझ में आया l
19 June 2021
18 June 2021
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " जाल में फंसने वाले पक्षियों की ऐसी दुर्गति होती है कि देखते बनती है l दूर कौन उड़कर जाये , कौन परिश्रम पूर्वक दाना चुगे l वे तो दाना ढूंढ़ने की तुलना में जाल पर बिखरे दानों को एक सौभाग्य जैसा मानते हैं और उससे लाभ उठाने में चूकने की बात नहीं सोचते l उन्हें यह सोचने की फुरसत नहीं होती कि लाभ उठाते समय उसके पीछे कोई दूरगामी संकट तो नहीं छिपा है , उसे भी देखने की आवश्यकता है l हर लोभी अधीर - आतुर होता है और तात्कालिक लाभ के कुछ एक दाने चुग लेने के बाद , उस पक्षी की तरह बेमौत मरता है , जिसे सामने बिखरे आकर्षण के अतिरिक्त अन्य कोई बात सूझती ही नहीं l "
WISDOM ------
खलील जिब्रान एक ख्याति प्राप्त विद्वान् थे , उन्होंने अपनी कथाओं के माध्यम से जीवन दर्शन संबंधी सूत्र और नैतिक सीख दी l उनकी एक कथा है ------ वे लिखते हैं ------ ' मैं एक सपना देख रहा था l सपने में एक भयानक भूत ने मुझे पकड़ लिया और मेरा नाम पूछा , मैंने बताया ' अब्दुल्ला ' l भूत बोला --- इसका अर्थ होता है --ईश्वर का दास ' लेकिन तुम अपने कार्य और चेहरे से ऐसे नहीं लगते हो l भूत कहने लगा --- तुम्हारी बिरादरी के लोगों ने मिलकर ईश्वर की नाक में दम कर रखी है l तुम्ही लोगों की अक्ल ठिकाने लगाने के लिए ईश्वर ने मुझे नियुक्त किया है l तुम लोग धर्म की बातें कर के अपनी चमड़ी बचाते हो और उन कामों को करने में लगे रहते हो जिनकी खुदा ने मनाही की है l धर्म प्रवक्ताओं की इस क्रिया पद्धति से खुदा बहुत दुखी व नाराज है l ' सपने में ही उन्होंने भूत से कहा --- मैं ऐसी गलती नहीं करूँगा , मेरे लिए कुछ सेवा हो तो बताएं और मुझे जाने दें l ' भूत ने हँसते हुए उन्हें एक फावड़ा थमा दिया और कहा ---- " फुरसत के समय तुम कब्रें खोदते रहना l इस दुनिया में चलते - फिरते प्रेत बहुत हैं l तुम उन्ही को दमन करना l खुदा ने तुम्हारे लिए यही जिम्मेदारी सौंपी है l " 'जिन्दा प्रेत ? ' भूत ने कहा ----- " जो दूसरों का दर्द नहीं समझ सकते , जिन्हे आपाधापी के अलावा और कुछ नहीं सूझता , जिनके पास दूसरों को धोखा देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना ही एकमात्र धंधा है , वे जिन्दा भूत नहीं तो और क्या हैं ? ऐसे व्यक्ति धरती पर बोझ हैं , समाज के लिए सिरदर्द हैं , जीवित रहते हुए भी मृतक के समान हैं l उन्हें दफन नहीं करोगे , तो इस दुनिया में जिन्दों को रहने के लिए जगह ही कहाँ बचेगी ? " खलील जिब्रान अपने मित्र को सपना सुनाते और कहते हैं कि यह सपना मुझे बार - बार आता है l मैं कब्र खोदता हूँ और अपने संकीर्ण विचारों को उसमे गहरे गाड़ देता हूँ l सोचता हूँ यह सपना औरों को भी समझ में आ जाये तो खुदा को हैरान न होना पड़े , जिन्दा प्रेत कहीं नजर न आएं , सारा संसार सही अर्थों में मनुष्यों से घिरा सुख - समुन्नति की ओर बढ़ता दिखाई देने लगे l
17 June 2021
WISDOM -------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " वास्तविकता बहुत देर तक छिपाये नहीं रखी जा सकती l व्यक्तित्व में इतने अधिक छिद्र होते हैं कि उनमें होकर गंध दूसरों तक पहुँच ही जाती है l इसलिए कमजोरियों पर गंदगी का आवरण न डालकर उनके निष्कासन के , स्वच्छता के प्रयासों में निरत रहना चाहिए l " एक कहानी है ----- एक दिन एक साहूकार को शक हुआ , उसके खजाने में कहीं खोटे सिक्के तो नहीं आ गए ? यह जाँचने के लिए उसने सब सिक्के एक जगह इकट्ठे किए और जांच - पड़ताल शुरू की l अच्छे सिक्के तिजोरी में और खराब सिक्के एक तरफ पटके जाने लगे , तो खोटे सिक्के घबराये l उन्होंने परस्पर विचार किया ---- " भाई ! अब तो अपने बुरे दिन आ गए , यह साहूकार अवश्य हम लोगों को छाँट - बीनकर तुड़वा डालेगा , कोई युक्ति निकालनी चाहिए , जिससे इसकी नजर से बचकर तिजोरी में चले जाएँ l " एक खोटा सिक्का बड़ा चालाक था l उसने कहा ---- " भाइयों ! हम लोग यदि जोर से चमकने लगे , तो यह साहूकार पहचान नहीं पायेगा और अपना काम बन जायेगा l " बात सबको पसंद आई l सब खोटे सिक्के बनावटी चमकने लगे और सेठ की तिजोरी में पहुँचने लगे l खोते सिक्कों को अपनी चालाकी पर बड़ा अभिमान हुआ l गिनते - गिनते एक सिक्का जमीन पर गिर पड़ा l नीचे पत्थर पड़ा था l सिक्का उसी से टकराया l साहूकार चौंका -- हैं , ये क्या , चमक तो अच्छी है पर आवाज कैसी थोथी है l उसे शंका हो गई l दुबारा उसने सब सिक्के निकाले और पटक - पटक कर उनकी जांच शुरू की l फिर क्या था , असली सिक्के एक तरफ और नकली सिक्के एक तरफ l खोटों की दुर्दशा देखकर एक नन्हा सा असली सिक्का हँसा और बोला ----- " मेरे प्यारे खोटे सिक्कों ! दिखावट और बनावट थोड़े समय चल सकती है , खोटाई अंतत: इसी तरह प्रकट हो जाती है l कोई भी मनुष्य अपनी कमजोरी नहीं छिपा सकता l "
16 June 2021
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फारस का बादशाह नौशेरवाँ स्वयं पारसी धर्म को मानने वाला था किन्तु उसने अपने राज्य में ईसाई , यहूदी , हिन्दू सब मजहब वालों को स्वतंत्रता दे रखी थी l नौशेरवाँ ने बहुत सी संस्कृत की पुस्तकों का अनुवाद ईरान की भाषा में कराया था l एक बार फारस में गीदड़ों की संख्या अधिक हो गई और उससे लोगों को तकलीफ होने लगी l नौशेरवाँ ने प्रधान गुरु को बुलाकर इसका कारण पूछा l तब गुरु ने कहा ----- " जब किसी देश में अन्याय होने लगता है तो गीदड़ बढ़ जाते हैं l तुम पता लगाओ कि तुम्हारे राज्य में कहीं अन्याय तो नहीं हो रहा है l " नौशेरवाँ ने उसी समय इसकी जाँच करने के लिए सुयोग्य न्यायधीशों की एक कमेटी नियुक्त की l उससे मालूम हुआ कि कितने ही प्रांतीय शासक प्रजा पर अन्याय करते हैं l नौशेरवाँ ने उन सबको दंड देकर सर्वत्र न्याय की स्थापना की l
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भर्तृहरि ने वैराग्य शतक में लिखा है ----- तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा : l भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता: " अर्थात तृष्णा बूढ़ी नहीं होती , हम ही बूढ़े होते हैं l भोग नहीं भोगे जाते , हम ही भोग लिए जाते हैं l " पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- शरीर ढलने के साथ इन्द्रियाँ भी शिथिल हो जाती हैं लेकिन कामना और वासना समाप्त नहीं होतीं , कल्पनाएं - मनोभाव उसी दिशा में दौड़ लगाते हैं और मनुष्य पतन को प्राप्त होता है l
15 June 2021
WISDOM ----
एंटन चेखव का जन्म रूस में हुआ था , वे उन्नीसवीं शताब्दी के उन महान साहित्यकारों में से हैं जिनकी रचनाएँ समाज पर अपना प्रभाव डाल सकीं और अब वर्तमान में भी वे उतनी ही जीवंत बनी हुई हैं l उनका एक नाटक है --' वार्ड नं. छः ' l बुद्धिजीवी वर्ग की अकर्मण्यता पर तीव्र प्रहार करने वाला यह नाटक जब लेनिन ने देखा तो वे इतने व्यग्र हो उठे कि अपने स्थान पर बैठ न सके l वार्ड नं. छः '----- एक पागलखाने की पृष्ठभूमि पर लिखा गया नाटक है l इस नाटक का नायक डॉ. रैगिन पागलों के अस्पताल का सुपरिंटेंडेंट होता है l डॉ. बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है l उसकी सबसे बड़ी आकांक्षा है ---- अस्पताल में सुधार की l लेकिन अनुकूल वातावरण के अभाव में वह कुछ नहीं कर पाता और निराश होकर बैठ जाता है l सुधार की तीव्र आकांक्षा है ---- परन्तु प्रतिकूलताओं से लड़ने का जरा भी साहस नहीं है l प्रतिकूलताओं से लड़ने में अक्षम होने के कारण वह यह सोचकर मन को समझा लेता है कि ----- मैं तो अपने कर्तव्य का पालन ईमानदारी से कर रहा हूँ l जो कुछ हो रहा है उसके लिए मैं तनिक भी दोषी नहीं हूँ l अस्पताल की व्यवस्था में वह कोई सुधार नहीं कर पाता , इसका परिणाम यह हुआ कि पागलखाने के रसोइये तक उसकी अवज्ञा करने लगे l अव्यवस्था इतनी बढ़ गई कि एक दिन वहां का जमादार अस्पताल का संरक्षक बन बैठा l जमादार रोगियों और कर्मचारियों से दुर्व्यवहार करता और उन्हें मारता - पीटता था l जब रोगी और कर्मचारी शिकायत लेकर डॉ. रैगिन के पास जाते तो वह उन्हें सैद्धांतिक उपदेश देने लगता और कहता --- ' सहन शक्ति बढाकर सुखी रहा जा सकता है l ' पीड़ित और प्रताड़ित कर्मचारी व रोगी इस उपदेश को मानने से इनकार करते थे l कोरे उपदेशों से कोई कैसे सुखी हो सकता है l इस नाटक में डॉ. रैगिन की निष्क्रियता तथा उदासीनता और कर्मचारियों द्वारा हिंसा और अत्याचार के विरुद्ध कठोर संघर्ष तथा स्वाभिमान पूर्ण प्रतिरोध की भावना स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होती है l यह विवाद बढ़ता ही चला जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि डॉ. रैगिन को पागल और विक्षिप्त करार देकर उसी पागलखाने के वार्ड नं. छः में भर्ती करा दिया जाता है