22 April 2024

WISDOM ----

  संसार  में  जिनके  पास  शक्ति , धन -वैभव  सब  कुछ  है  ,  उन्हें  इसका  अहंकार  हो  जाता  है  ,  वे  स्वयं  को  भगवान  समझने  लगते  हैं  l  अपनी  उपलब्धियों  के  लिए  वे  ईश्वर  के  प्रति  कृतज्ञ  नहीं  होते  l  वे  सोचते  है  कि  जो  हम  हैं  सो  कोई  नहीं ,  इसलिए  ईश्वर  को  धन्यवाद  नहीं  देते  l  यही  कारण  है  कि  वे  भयभीत  और  भीतर  से  अशांत  होते  हैं  l  ईश्वर  ने  हमें  जो  कुछ  भी  दिया  , उसके  लिए  यदि  हम  ईश्वर  को  धन्यवाद  देते  हैं ,  उसके  महत्त्व  को  समझते  हैं  तो  उससे  हमारा  अहंकार   मिटने  लगता  है , जीवन  में  सकारात्मक  परिवर्तन  होने  लगते  हैं   और  जीवन  प्रगति  की  दिशा  में  आगे  बढ़ने  लगता   है   l   एक  कथा  है  ------  एक  नगरसेठ  अपनी  गुत्थियों  के  समाधान   में  सहायता  प्राप्त  करने  के  लिए   मंदिर  में  पहुंचे  l  देवता  को  प्रसन्न  करने  के  लिए   वे  थाल  भरकर  मोती   और  नैवेद्य  लाए  थे  l  मंदिर   छोटा  था  ,  उसमें  एक  भक्त  पहले  से  ही  बैठा  था  l  झरोखे  में  से  झांककर  सेठ  ने  देखा   तो  वह  फटे  कपड़े  पहने  , अस्थि -पंजर   जैसा   कोई  दरिद्र  व्यक्ति  था  , वह  बड़ी  प्रसन्नता  के  साथ  ईश्वर   के  प्रति  अपनी  कृतज्ञता  व्यक्त  कर  रहा  था   और  प्रार्थना  कर  कह  रहा  था --हे  प्रभु ,  आपकी  बड़ी  कृपा  है ,  मैं  सुख  की  नींद  सोता  हूँ  , आपकी  कृपा  से  मेरे  परिवार  का  भरण -पोषण  हो  रहा  है   और  कोई  मुझसे  ईर्ष्या  नहीं  करता  है  l '     उस  भक्त  के  बाहर  निकलने  पर  सेठ  ने  पूजा  तो  की   लेकिन  उसके  मन  में  यह  प्रश्न  उफनता  रहा   कि  मैं  इतने  समय  से  पूजा  कर  रहा  हूँ  , भगवान  को  बहुमूल्य  हार -मोती , फल ,  मिठाई   आदि  सब  कुछ  चढ़ाता  हूँ   पर  मेरे  ईर्ष्यालु  बढ़ते  ही  जा  रहे  हैं  और  मेरा  सुख -चैन  घटता  जा  रहा  है  l   देवता  मेरी  इतनी  उपेक्षा  कर  रहे  हैं  और  इस  दरिद्र  पर  इतना  अनुग्रह  ?   इस  संदेह  को  लेकर  सेठ  प्रधान  पुजारी  के  पास  पहुंचे  l  पुजारी  ने  कहा  --हम  देवता  से  पूछकर  तीन  दिन  में  इसका  उत्तर  देंगे  l  जैसे -तैसे  तीन  दिन  बीते   और  सवेरे  ही  सेठजी  प्रधान  पुजारी  के  पास  जा  पहुंचे  l  पुजारी  ने  देवता  का  अभिमत  सुनाया ---- "  आप  देवता  पर  सेवक  की  तरह   काम  करने  को  दबाव  डालते  हैं   और  दरिद्र  ने   ईश्वर  को  अपना  स्वामी  मानकर   बड़ी  श्रद्धा  से  उन्हें  अपने  ह्रदय  में  स्थान  दिया  हुआ  है  l  इसलिए  ईश्वर  ने   सेवक  वाले  की  अपेक्षा   ह्रदय  में  स्थान  देने  वाले  को  अपना  सच्चा  वरदान  देने  का  निश्चय  किया  है  l '  

20 April 2024

WISDOM -----

   इस  संसार  में  आरम्भ  से  ही  देवता  और  असुरों  में  संघर्ष   चला  आ  रहा  है  l  असुर  भी  सामान्य  मनुष्य  की  तरह  ही  होते  हैं  ,  उनके  कहीं  कोई  सींग , विशेष  आकृति  नहीं  होती  l  वास्तव  में  असुरता  एक  प्रवृत्ति  है   l  कैसे  समझें  की  असुरता  कहाँ  है  ?   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " ज्ञान , शक्ति  और  सामर्थ्य  का  जहाँ  दुरूपयोग   हो  रहा  है  ,  वहीं   असुरता  है  l  "  आचार्य श्री  लिखते  हैं --- " ज्ञान  का  अर्जन  दुर्लभ  है  , परन्तु  उसका  समुचित  उपयोग    अति  दुर्लभ  है  l  इस  स्रष्टि  में   प्रतिभा  की  , कला  की  , विद्या -ज्ञान -शक्ति  और  सामर्थ्य  की  कोई  कमी  नहीं  है   l  असुरों  से  श्रेष्ठ  तपस्वी  इस  संसार   अन्यत्र   कहीं  नहीं  है   लेकिन  उनका  सारा  ज्ञान ,  उनकी  समूची  सामर्थ्य    उनके  अहंकार  की  तुष्टि   और  भोग -विलास  के  साधन  जुटाने  में  खप  रही  है  l  "  आज  संसार  में   ज्ञान , शक्ति  और  सामर्थ्य  का  ही  दुरूपयोग  हो  रहा  है , सारे  संसार  में  असुरता  का  बोलबाला  है  ,  देवत्व  तो  कहीं  छिप  गया  है   l  अब  असुर  ही  आपस  में  लड़  रहे  हैं  l  असुरों  के  पास  ज्ञान  है , धन संपदा  अथाह  है  लेकिन  दया , करुणा , संवेदना  आदि  सद्गुणों  की  कमी  है   इसलिए  वे  आपस  में  ही  लड़  रहे  हैं  l  आज  संसार  की  सबसे  बड़ी  जरुरत  ' सद्बुद्धि ' की  है  l  सद्बुद्धि  होगी  तो    लड़ाई -झगड़े , वैर -भाव  सब  समाप्त  हो  जाएंगे  l 

19 April 2024

WISDOM-----

  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " लोकसेवा  की  सफलता  इस  बात  पर  निर्भर  करती  है  कि   उसके  लोकसेवी  आम  जनता  की  जिन्दगी  से  कितना  जुड़े  हैं  l  गरीब  जनता  से  दूर   ऐशोआराम  में  रहने  पर   उनकी  आँखों  पर  पट्टी  चढ़   जाती    है   और  वे  जनता  की  दुःख -तकलीफों  को  देखना  बंद  कर  देते  हैं  l  फिर  धीरे -धीरे  लोकसेवा   व्यवसाय  बन  जाती  है   और   लोकतंत्र  भ्रष्टतंत्र  बन  जाता  है  l  "                               यदि  कोई  सच्चा  लोकसेवी  होगा   तो  उसका  आत्मबल  इतना  अधिक  होगा  कि  वह  रावण  की  सोने  की  लंका  को  भी  ढहा  दे  l  इस  सत्य  को  बताने  वाली   एक    कथा  है -----  अयोध्या  के  प्राचीन  राजा  और  भगवान  श्रीराम  के  पूर्वज  महाराज  चक्कवेण   की  कथा  है  l   राजा  चक्कवेण  बहुत  प्रतापी  राजा  थे  , उनके  राज्य  में  प्रजा  बहुत  सुखी  - संपन्न  थी  किन्तु  राजा  स्वयं   बहुत  सादगी  से  एक  झोंपड़ी  में  रहते  थे   और  राजकाज  से  जो  समय  मिलता  उसमें   वे  अपने  जीविकोपार्जन   के  लिए  खेती  कर  लेते  l  उनकी  धर्मपत्नी  भी  बहुत  सादगी  से  रहती  थीं  l   जब  कभी  वे  किसी  काम  से  बाहर  जातीं  तो  नगर  के  धनाढ्य  परिवारों  की  महिलाएं  उन्हें  टोकती  कि  आपके  शरीर  पर  कोई  आभूषण  नहीं  है  ,  यदि  महाराज  अपनी  मर्यादा  में   ऐसा  नहीं  करते  तो  आप  कहें  तो   हम  आपके  लिए  आभूषण  बनवा  दें  l  नगर  की  महिलाओं  के  बार -बार  कहने  के  कारण  महारानी  ने   आभूषणों  की  बात  महाराज  चक्कवेण  से  कह  दी  l   राजा  यह  सुनकर  चिंता  में  पड़  गए  , उन्होंने  कहा --- महारानी  आभूषणों  के  लायक  तो  हमारी  आर्थिक  स्थिति  है  नहीं  ,  फिर  भी  तुमने  जीवन  में  पहली  बार  मुझसे  कुछ  माँगा  है  , तो  कुछ  तो  करना  होगा  l  राजा  ने  अपने  प्रमुख  मंत्री  को  बुलाया  और  कहा --- " हम  अपने  सुख  के  लिए   अपने  राज्य  की  जनता  से  अधिक  कर   नहीं  वसूल  सकते  l  तुम  ऐसा  करो  कि  लंका  के  राजा  रावण  से   कर  वसूल  करो  l  उसने  स्वर्ण  की  बहुत  जमाखोरी  की  है  , इसलिए  तुम  उसी  से  स्वर्ण  ले  आओ  l "   मंत्री  राजा  की  बात  मानकर  लंका  गया   और  वहां  जाकर  उसने  रावण  से  कहा ---- " हमारे  महाराज  चक्कवेण  ने   तुमसे  कर  लेने  को  भेजा  है  l "  दम्भी  रावण  यह  सुनकर  बहुत  हँसा  और  बोला --- " तुम्हारे  भिखारी  राजा  की  यह  मजाल  की  रावण  से  कर  वसूल  करने  की  सोचे  l "  रावण  की  बात  सुनकर  मंत्री  ने  कहा --- "  तुम  हमारे  महाराज  के  प्रभाव  को  जानते  नहीं  हो  ,  हम  तुम्हे  कुछ  नमूना  दिखाते  हैं  ,  देखकर  हिल  जाओगे  l  फिर  मंत्री  बोला --- " यदि  हमारे  महाराज  चक्कवेण  सच्चे  लोकसेवी  और  तपस्वी  हैं   तो  लंका  का   उत्तरी  और  दक्षिणी  हिस्सा  ध्वस्त  हो  जाये  l "  मंत्री  के  ऐसा  कहते  ही  सोने  की  लंका  ढहने  लगी  l  न  कोई  सेना , न  मन्त्र  शक्ति  , सिर्फ  सच्ची  लोकसेवा  के  साथ  तप  और  त्याग  का  ऐसा  प्रभाव   !  रावण  यह  देखकर  घबरा  गया  , उसे  आश्चर्य  भी  हुआ  l  उसने  बहुत  सारा  स्वर्ण  देकर  मंत्री  को  विदा  किया  l  मंत्री  ने  वापस  आकर  महाराज  व  महारानी  को    यह  घटना  सुना  दी  l  यह  सुनकर  महाराज   चक्कवेण  ने  महारानी  से  कहा --- "  महारानी  सच  आपके  सामने  है  , अब  आप  चाहें  तो  आभूषण  पहन  लें  ,  लेकिन  आपके  आभूषण  पहनते  ही   मेरी  सच्ची  लोकसेवा  और  तपस्या  का   यह  प्रभाव  समाप्त  हो  जायेगा  l  "  महारानी  को  यथार्थ  समझ  में  आ  गया  ,  उन्होंने  आभूषण  पहनने  से  स्पष्ट  इनकार  कर  दिया  l  इस  पर  महाराज  चक्कवेण   ने  कहा --- "  महारानी  !  तप -त्याग , सादगी  , सदाचार  ही  लोकसेवी  की  सच्ची  संपत्ति  है  l "  

18 April 2024

WISDOM ------

  समय  परिवर्तनशील  है , वक्त  के  साथ  सब  कुछ  बदल  जाता  है  l  एक  समय  था  जब   विभिन्न  सत्ताधारियों  के  अहंकार  और  महत्वाकांक्षा  के  कारण  बड़े -बड़े  युद्ध  होते  थे  जैसे  रावण   के  अहंकार  के  कारण  ही  राम -रावण  युद्ध   और  दुर्योधन  के  अहंकार  के  कारण  महाभारत  हुआ  l  इस  युग  में  भी  सिकंदर , हिटलर  आदि  के  अहंकार  ने  ही  संसार  में  तबाही  मचाई  l  लेकिन   वर्तमान  के  युद्धों  में  अहंकार , महत्वाकांक्षा  जैसी  कोई  बात  स्पष्ट  नहीं  है  l  अहंकार   जैसे  दुर्गुण  को  भी  ' धन '  ने  खरीद  लिया  l  यदि  हम  सामान्य  द्रष्टि  से  भी  देखें  तो  इन  युद्धों  में   धन -वैभव  संपन्न  लोगों  का , राजा , बड़े  अधिकारी  , शक्ति   सम्पन्न  , समर्थ  लोगों  का  कोई  नुकसान  नहीं  होता  , वे  सब  सुख -वैभव  और  आराम  की  जिन्दगी  जीते  हैं  l  निर्दोष  प्रजा , कमजोर   लोग  ही  मारे  जाते  हैं  ,  मानों  वे  ही  बड़ी  हुई  जनसँख्या   और  धरती  पर  बोझ  हैं  l  वक्त  के  साथ  युद्ध  के  मायने  ही  बदल  गए  l  मारक  हथियार , बम  आदि  भी  बोलने  लगे  हैं  कि  जल्दी  इस्तेमाल  करो   ताकि  और  नए  , पहले  से  भी  घातक  बने   जिससे  ' फालतू ' जनसँख्या   को  देख  लें  l  इस  तरह  के  युद्ध  एक  छिपी  हुई  चाहत  को  दिखाते  हैं  कि  यह  धरती  केवल  धन  और  शक्ति , वैभव  संपन्न  लोगों  के  लिए  है   यहाँ  प्रकृति , पर्यावरण , छोटे -मोटे  प्राणी   किसी  की  कोई  जरुरत  नहीं  है  , कृत्रिम  से  काम  चलेगा  l  यह  सत्य  है  कि  ' धन  से  व्यक्ति  सब  कुछ  खरीद  सकता  है  l '  लेकिन  धन  से   उस  अज्ञात  शक्ति  , परम  पिता  परमेश्वर  को  भी  कोई  खरीद  सकता  है  क्या  ?   इसका  उत्तर  ' वक्त ' के  हाथ  में  है  l  

17 April 2024

WISDOM -----

    महाबली  रावण  ने  माता  जानकी  को  धोखे  से  बंदी  बना  लिया  l  सीता जी  ने  स्वयं को  अशोक  वाटिका   में  सीमित  कर  लिया  , परन्तु  रावण  उनको  मोहित  करने  के  लिए   भांति -भांति  के  रूप  धारण  कर  के  उनके  पास  जाता  l  रावण  के  सारे  उपाय  विफल  हो  गए   l  सीता जी  ने  भगवान   श्रीराम  के  अतिरिक्त   और  किसी  पर  कोई  ध्यान  नहीं  दिया  l  यह  देख  रावण  के  एक  मंत्री  ने   रावण  को  सुझाव  दिया  ---- " महाराज  ! आप  क्यों  न   राम  का  वेश  धर  कर   सीता  से  मिलें   , तब  तो  उन्हें  आपकी  ओर  देखना  ही  पड़ेगा  l "  रावण  बोला ---- " तुम्हे  क्या  लगता  है  कि  यह  विचार  मेरे  मन  में  नहीं  आया  होगा    लेकिन  जब  राम   का  रूप  धारण  करता  हूँ   तो  मेरा  मन  भी  वैसा  ही  हो  जाता  है  l  उनका  रूप  धरते  ही  ब्रह्म  पद  भी  तुच्छ  नजर  आने  लगता   हैं  ,  फिर  पराई  स्त्री  की  तो  बात  ही  क्या  ? "  जिनका  रूप  धारण  कर  के  मन  के  भाव  शुद्ध  हो  जाते  हैं  ,  उनका  ध्यान  यदि  सही  में  किया  जाए    तो  क्या  होगा  ?  

16 April 2024

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  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- " बदला  जाए  द्रष्टिकोण   तो  इनसान  बदल  सकता  है  ,                     द्रष्टिकोण   में  परिवर्तन  से  जहान  बदल  सकता  है  l  यदि  हमारा  नजरिया , हमारा  द्रष्टिकोण  सकारात्मक  है   तो  जीवन  की  दिशा  ही  बदल  जाती  है  ,  जीवन  की  रंगत  निखरती  है    और  यदि  नजरिया  नकारात्मक  हो   तो   जीवन  की  दिशा  उस  गर्त  में  जाती  है   जहाँ  से  उबरना , निकलना   आसान  नहीं  होता  है  l  यह  निर्णय  हमें  लेना  है  कि  हमें  किस  नजरिए  को  अपनाना  है  l  महाभारत  में  जब  जुए  में  हारने  पर  पांडवों  को  वनवास  हुआ   तो  उन्होंने  इसका  दुःख  नहीं  मनाया , विलाप  नहीं  किया  ,  अपने  दुःख  के  लिए  किसी  को  दोष  नहीं  दिया  l  उन्होंने  इस  कठिन  समय  को  चुनौती  माना  और  तपस्या  कर  दिव्य  अस्त्र  प्राप्त  किए , अपनी  शक्ति  और  आत्मविश्वास  को   बढ़ाया   l  दूसरी  ओर  दुर्योधन  आदि  कौरव  राजमहल  में  सुख - भोग  में  रहे , उन्होंने  छल , कपट , षड्यंत्र  की  नकारात्मक  राह  का  चयन  कर  स्वयं  अपने  पतन  की  कहानी  लिख  ली  l    मनुष्य  का  जैसा  द्रष्टिकोण  होता  है   वह  उसी  के  अनुसार   जीवन  की  व्याख्या  करता  है  ,  उसी  के  अनुरूप  कार्य  करता  है   और  उसी  के  अनुसार  फल  भोगता  है  l    गुरु  द्रोणाचार्य  कौरव , पांडव  सभी  को  अस्त्र -शस्त्र  की  शिक्षा  देते  थे   l एक  बार  उनका  मन  दुर्योधन  और  युधिष्ठिर  की  परीक्षा  लेने  का  हुआ   , उन्होंने  राजकुमार  दुर्योधन  को   अपने  पास  बुलाकर  कहा --- " वत्स  ! तुम  समाज  में  अच्छे  आदमी  की  परख  करो   और  वैसा  एक  व्यक्ति  खोजकर   मेरे  सामने  उपस्थित  करो  l "   दुर्योधन  ने  कहा --- ' जैसी  आज्ञा '  l  और  वह  अच्छे  आदमी  की  खोज  में  निकल  पड़ा  l  कुछ  दिनों  बाद  दुर्योधन      आचार्य  के  पास  आकर  बोला  --- " गुरुदेव  ! मैंने  कई  नगरों  और  गांवों  का  भ्रमण  किया  , परन्तु  कहीं  भी  कोई   अच्छा  आदमी  नहीं  मिला  l  इस  कारण  मैं  किसी  को   आपके  पास  नहीं  ला  सका  l "    इसके  बाद  द्रोणाचार्य  ने  राजकुमार  युधिष्ठिर   को  अपने  पास  बुलाया   और  कहा --- " बेटा  !   तुम  कहीं  से  भी  कोई   बुरा  आदमी  खोजकर   ला  दो  l "   युधिष्ठिर   गुरु  की  आज्ञा  से  बुरे  आदमी  की  खोज  में  निकल  पड़े  l  काफी  दिनों  बाद  वे  लौटे  और  आचार्य  से  कहा ----" गुरुदेव  ! मैंने   सब  जगह  बुरे  आदमी  की  खोज  की  ,  पर  मुझे  कोई  भी  बुरा  आदमी  नहीं  मिला   l  इस  कारण  मैं  खाली  हाथ  लौट  आया  l "   शिष्यों  ने  पूछा  --- "   गुरुदेव  !  ऐसा  क्यों  हुआ  कि  दुर्योधन  को  कोई  अच्छा   आदमी  नहीं  मिला  और   युधिष्ठिर  कोई  बुरा  आदमी  खोज  नहीं  सके  l "  आचार्य  द्रोणाचार्य   ने  कहा  ---"  जो  व्यक्ति  जैसा  होता  है  ,  उसे  सारे  लोग  वैसे  ही  दिखाई  पड़ते  हैं   इसलिए  दुर्योधन  को  कोई   अच्छा  व्यक्ति  नहीं  दिखा  और  युधिष्ठिर  को   कोई  बुरा  आदमी  नहीं  मिल  सका  l "  वास्तव  में  हमें  संसार  वैसा  ही  दिखाई  देता  है  ,  जैसा  हमारा  देखने  का  नजरिया  होता  है  l  

15 April 2024

WISDOM ------

  बादशाह  अब्बास  अपने  एक  पदाधिकारी  के  यहाँ  दावत  में  गए   l  वहां  उन्होंने  और  सब  साथियों  ने  इतनी  मदिरा  पी  ली    कि  किसी  के  होश -हवाश   दुरुस्त  नहीं  रहे  l  नशे  की  झोंक  में  बादशाह  खड़े  हो  गए   और  उस  पदाधिकारी  के  अंत:पुर   की  ओर  जाने  लगे  ,  लेकिन  दरवाजे  पर  उस  पदाधिकारी  का  नौकर  इस  प्रकार  खड़ा  था  कि   उसे  हटाये  बिना   बादशाह  भीतर  नहीं  घुस  सकते  थे  l  उन्होंने  नौकर  से  कहा --- " अभी  यहाँ  से  हट  जा    वरना    मैं  तलवार  से   तेरा  सिर  उड़ा  दूंगा   l "   नौकर  ने  सिर  झुककर  कहा ---- " हुजूर   , आप  मेरे  देश  के  स्वामी  हैं  , इसलिए  मैं  आप  पर  हाथ  तो  नहीं  उठा  सकता  ,  पर  यह  निश्चय  है  कि   आप  मेरी  लाश  पर  पैर  रखकर  ही   भीतर  जा  सकेंगे  l  याद  रखिए  कि  भीतर  जाने  पर   बेगमें  तलवार  लेकर   आपका  मुकाबला  करेंगी  ,  क्योंकि  जब  उनकी  इज्जत  पर  हमला  किया  जायेगा   तो  वे  अपना  बचाव  जरुर  करेंगी  l  "  बादशाह  का  नशा  सेवक  की  खरी   बातों  को  सुनकर  ठंडा  पड़  गया   और  वे  वापस  चले  गए  l   दूसरे  दिन  उस  पदाधिकारी  ने  बादशाह  से  कहा ---- " मेरे  जिस  नौकर  ने   कल   आपके  साथ  बेअदबी  की   थी  उसे  मैंने  नौकरी  से  निकाल  दिया  है  l "  बादशाह  ने  कहा ----- " यह  तो  बहुत  अच्छा  हुआ  l  मैं  उसे  आपसे  मांगकर   अपने  अंगरक्षकों  का   सरदार   बनाना  चाहता  था  l  आप  उसे  बुलाकर  मेरे  पास  भेज   दीजिए  l  सच्चे  व्यक्ति  की  कद्र  सब  जगह   होती  है  l