पं . श्रीराम शर्मा जी के विचार हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं l आचार्य श्री लिखते हैं ---- " हमारे मार्गदर्शन के लिए , दिशाबोध के लिए , परेशानियों व कठिनाइयों को सहने के लिए जीवन में कोई न कोई तो होना चाहिए l यह स्थान यदि भगवान का स्थान हो तो मनुष्य आसानी से कठिन और जटिल परिस्थितियों से लड़ना सीख जाता है l ईश्वर से --- माँ , पिता , भाई , मित्र , बाबा , बालक ---किसी भी रूप में रिश्ता रखा जा सकता है l श्रद्धा और विश्वास से जब हम उन्हें पुकारेंगे तो अपनी अंतरात्मा से , या कहीं न कहीं से हमें अपनी समस्या का समाधान , सकारात्मक नजरिया अवश्य मिल जाता है l " आचार्य श्री लिखते हैं ---- " विपदाएं तो हर किसी के जीवन में आती हैं , यदि इन विपदाओं में हम अकेले होते हैं , तो यही विपदाएं हमारे लिए समस्या बन जाती हैं , हमारा जीवन तहस -नहस कर देती हैं , हम से हमारा बहुत कुछ छीन लेती हैं l परन्तु यदि इन विपदाओं में भगवान के प्रति समर्पण का भाव हमारे साथ है , तो ये विपदाएं हमारे लिए वरदान बन जाती हैं l भगवान का हमारे साथ होना एक ऐसा विश्वास है , जो हमें कठिन पलों में जबरदस्त संबल देता है , सकारात्मकता से जोड़ता है , जीवन को आशा भरी नजरों से देखने और इन जटिल पलों में भी बेहतर करने के लिए प्रेरित करता है l जीवन का बहुत कुछ दांव पर लगे होने पर भी भगवान के साथ होने का भाव का होना , ऐसा मानसिक एहसास देता है कि भले ही जीवन में बहुत कुछ गंवाया जा रहा है , लेकिन फिर भी बहुत कुछ हमारे पास है , जो बेशकीमती है l " आचार्य श्री के इन कथन के एक -एक शब्द की सत्यता केवल वही अनुभव कर सकता है जिसे ईश्वर पर अटूट श्रद्धा और विश्वास हो और जो ईश्वर के दिखाए मार्ग पर चलने के लिए प्रयत्नशील हो l
16 February 2025
15 February 2025
WISDOM -----
संसार में मनुष्य कर्म करने को स्वतंत्र है l प्रत्येक कर्म का परिणाम अवश्य होता है l जब कोई कर्म इस भाव से किया जाता है की उसका किसी को भी पता न चले , वह गुप्त रहे l ऐसे में यदि वह गुप्त रूप से किया गया कोई दान है , सेवा कार्य है तो उसका सुफल उस व्यक्ति को अवश्य मिलता है l उसके इस पुण्य कार्य को ईश्वर ने देखा है l इसी तरह जब कोई व्यक्ति समाज से , सबसे छिपकर कोई अपराध करता है , तो वह निश्चिन्त रहता है कि उसे किसी ने नहीं देखा , कहीं कोई सबूत नहीं है इसलिए दंड से बच जायेगा l लेकिन उसके दुष्कृत्य को ईश्वर ने देखा है l विशेष रूप से जो लोग तंत्र , आदि नेगेटिव एनर्जी की मदद से दूसरों को सताते हैं , अपने अहंकार के पोषण के लिए उनका गलत इस्तेमाल करते हैं तो पीड़ित होने वाला समझ नहीं पाता की उसके जीवन में बार -बार बिना वजह आने वाली ऐसी समस्याओं का कारण क्या है l ऐसे अपराध करने वाले कानून से तो बच जाते हैं लेकिन उन्हें इसका हिसाब कहीं न कहीं अवश्य चुकाना पड़ता है l मनुष्य जागरूक रहकर ही ऐसे अपराधियों को पहचानकर उनसे बचाव के उपाय कर सकता है l ऐसे अपराध कलियुग में व्यापार है क्योंकि इस युग में मनुष्य दूसरों को खुश देखकर दुःखी है , अपनी योग्यता से नहीं , दूसरों को धक्का देकर , गिराकर आगे बढ़ना चाहता है l हर क्षेत्र में शार्टकट से सफलता चाहता है , मेहनत से धन कमाने में बहुत समय लगेगा , नकारात्मक शक्तियों की मदद से दूसरे को मिटाकर व्यक्ति सब कुछ हासिल करना चाहता है l यह सब व्यक्ति करता तो है लेकिन कहीं न कहीं वह स्वयं भी शिव के तृतीय नेत्र खुलने से भयभीत रहता है l
WISDOM ------
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --- दुराचारी से दुराचारी व्यक्ति भी यह ठान ले कि प्रभु मेरे हैं , मैं उनका हूँ , उनका अंश होने के नाते अब मुझसे कोई गलत कार्य नहीं होगा , तो फिर वे उसे भी तार देते हैं l भगवान कहते हैं --विवेक कभी साथ नहीं देता , संसार का आकर्षण लुभाता है , गलतियाँ हो जाती हैं तो एक ही मार्ग है --हम भगवान का पल्ला पकड़ लें l गन्दा नाला भी गंगा में मिलकर पवित्र हो जाता है लेकिन जो दुराचार किया है उसके लिए कष्टों से तो गुजरना ही होगा l कर्मफल तो भुगतना ही होगा , पीड़ा को तो सहना ही होगा l आचार्य श्री कहते हैं ---ईश्वर के दरबार में झूठ और धोखा नहीं चलता l यदि गलती न करने का संकल्प लिया है तो उस पर अडिग रहो , प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं है l ------ डाकू अंगुलिमाल अनेक नागरिकों की उँगलियाँ काटकर उनकी माला पहनकर घूमता था l राजा प्रसेनजित की सेना भी उससे हार मान गईं थीं l उसके पास चलकर गौतम बुद्ध आए l अंगुलिमाल ने उनसे कहा --- " भिक्षु ! मैं तुम्हे मार दूंगा l " वह उनसे बार -बार रुकने को कह रहा था l तब तथागत बोले ---- " रुकना तो तुझे है पुत्र ! मैं तो कभी का ठहरा हुआ हूँ l भाग तो तू रहा है --अपनी जिन्दगी से , अपने आप से , अपने भगवान से l तू रुक ! " इतना कहते -कहते वे उसके नजदीक आ गए और उसे गले से लगा लिया l अंगुलिमाल को पहली बार सच्चा प्यार मिला l बुद्ध ने उसे संघ में शामिल कर लिया l अब संघ में भगवान बुद्ध की बुराई होने लगी कि उन्होंने एक अपराधी , खतरनाक डाकू को संघ में शामिल कर लिया l भगवान बुद्ध ने अंगुलिमाल से धैर्य रखने और कोई प्रतिक्रिया न देने को कहा l सभी भिक्षुक सामूहिक रूप से भगवान बुद्ध के पास आए और कहा --- अंगुलिमाल के संघ में शामिल होने के कारण संघ की बुराई हो रही है l बुद्ध बोले --- " वह पूर्व में डाकू था , अब भिक्षु है , , पर तुम में से बहुत सारे डाकू बनने की दिशा में चल रहे हो l उसे मार डालने की सोच रहे हो l यह क्या कर रहे हो ? " भगवान बुद्ध ने सोचा कि इन लोगों को जवाब मिल जायेगा और अंगुलिमाल को भी निर्वाण मिल जायेगा , यह सोचकर उन्होंने अंगुलिमाल को उसी क्षेत्र में भिक्षा मांगने भेजा , जहाँ वह अपराधी बना था l लोगों में बहुत क्रोध था , उसे पत्थर खाने पड़े l चोट खाकर वह मूर्छित हो गया l उसके पास कोई नहीं आया , बुद्ध भगवान स्वयं आए , पत्थर हटाए , उसकी सेवा की l जब अंगुलिमाल को होश आया तो उससे कहा --- " तुम एक घुड़की दे देते , सब भाग जाते , क्यों मार खाते रहे ! " अंगुलिमाल बोला ---- " प्रभो ! कल तक मैं बेहोश था , आज ये बेहोश हैं l " गीता में भगवान कहते हैं ---- " यथार्थ निश्चय वाले , संकल्प शक्ति से मजबूत व्यक्ति का अनन्य भाव से समर्पण उसे न केवल शांति , वरन एक सुरक्षा कवच भी प्रदान करता है l ईश्वर सदा उसके साथ रहते हैं l कोई उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता l
12 February 2025
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कहते हैं संस्कार बहुत प्रबल होते हैं , संस्कारों का परिवर्तन बहुत कठिन है l माता -पिता के और उनसे पूर्व की पीढ़ियों के गुण -दोष ही संस्कारों के रूप में संतानों में आते हैं l यहाँ तक कि निकटतम रिश्तों के गुण -अवगुण भी खानदान की आने वाली पीढ़ियों में संस्कार रूप में आते हैं l कई लोग ऐसे भी होते हैं जो सारी जिन्दगी एक मुखौटा पहने रहते हैं , उनके भीतर की असलियत कोई जान ही नहीं पाता , उनका पूरा जीवन इसी मुखौटे में गुजर जाता है लेकिन उनके भीतर , मन से भी अधिक गहराई में जो अवगुण , जो बुराई उनमें होती है , वह उनकी संतान के माध्यम से प्रकट होती है , बच्चे अपने माता -पिता का ही प्रतिरूप होते हैं l अर्जुन के अभिमन्यु जैसा पुत्र तो संभव है लेकिन हिरन्यकश्यप के प्रह्लाद जैसा श्रेष्ठ पुत्र रत्न हो , यह अपवाद है l प्रह्लाद की माता कयाधू ईश्वर भक्त थी और गर्भावस्था की सम्पूर्ण अवधि में वे ईश्वर के परम भक्त नारद जी के संरक्षण में रही थीं l दुनिया -दिखावे के लिए तो सभी चाहते हैं कि समाज मर्यादित हो , नैतिक मूल्य हों , सबका यथा -योग्य सम्मान हो , लेकिन स्वयं को सुधारना कोई नहीं चाहता l यदि समाज में नैतिक मूल्यों को स्थापित करना है और एक स्वस्थ समाज का निर्माण करना है तो युवाओं के जीवन को तो सही दिशा में चलना ही चाहिए क्योंकि देश का भविष्य उन्ही के हाथों में है लेकिन उन्हें दिशा देने वाले प्रौढ़ , बुजुर्ग और जीवन के आखिरी मोड़ पर बैठे व्यक्तियों को भी अपने बीते हुए जीवन का एक बार अवलोकन अवश्य करना चाहिए कि अपनी संतानों के लिए वे धन -वैभव के अतिरिक्त नैतिक और मानवीय मूल्यों की , उनके जीवन को सही राह देने वाली कौन सी विरासत छोड़कर जा रहे हैं l अश्लील फ़िल्में , निम्न स्तर का साहित्य और धन की चकाचौंध ने विचारों को प्रदूषित कर दिया है l आचार्य श्री कहते हैं ---- 'चिन्तन क्षेत्र बंजर हो जाने के कारण कार्य भी नागफनी और बबूल जैसे हो रहे हैं l
WISDOM ------
दो मित्र राम और श्याम जंगल में सैर कर रहे थे l अचानक ही उन्होंने देखा कि एक भालू बड़ी तेजी से उनकी ओर आ रहा है l राम पेड़ पर चढ़ना जानता था इसलिए वह शीघ्रता से पेड़ पर चढ़ गया l श्याम पेड़ पर चढ़ना नहीं जानता था इसलिए उसने राम से कहा कि तुम मुझे थोडा सहारा दो जिससे मैं भी पेड़ की डाल पकड़ कर ऊपर चढ़ जाऊं l राम ने सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि श्याम को ऊपर चढ़ाने में देर हो जाए और जब तक भालू आकर उसका काम -तमाम कर दे l राम ने श्याम की बात को अनसुना कर दिया और पेड़ पर पत्तों की आड़ में छुपकर बैठा रहा l श्याम ने बुद्धिमत्ता से काम लिया और पेड़ के नीचे सांस रोककर सीधा लेट गया l भालू आया , उसने श्याम को सूंघा l श्याम ने सांस रोक रखी थी , भालू ने समझा कि वह मरा पड़ा है इसलिए वह चुपचाप लौट गया l भालू के चले जाने पर राम नीचे उतरा और हँसते हुए श्याम से बोला --- " भालू तुम्हारे कान में क्या कह रहा था ? " श्याम ने कहा --- " भालू मेरे कान में कह रहा था ---ऐसे मित्र का कभी विश्वास न करो , जो संकट के समय तुम्हारा साथ न दे , तुम्हे मुसीबत में छोड़ कर चला जाये l " कलियुग में कृष्ण और सुदामा जैसी और दुर्योधन व कर्ण जैसी मित्रता असंभव है l यहाँ तो सब स्वार्थ से जुड़े हैं l इसलिए कहते हैं मित्रता और रिश्ता बराबर वालों में होना चाहिए l यदि मित्र बहुत अमीर और शक्तिशाली है तो वह आपको अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करेगा और जब स्वार्थ पूरा हो जायेगा या स्वार्थ पूरा होने की कोई संभावना नहीं होगी तो वह दूध की मक्खी की तरह बाहर निकाल देगा l इस युग में संवेदनाएं कहीं भी नहीं है , सब जगह व्यापार है ' यूज़ एंड थ्रो ' केवल वस्तुओं में ही नहीं है , मानवीय संबंधों में भी है l किसी विद्वान ने सत्य कहा है ---- ' प्रेम सबसे करो , लेकिन विश्वास किसी पर भी न करो l '
10 February 2025
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पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " संसार में वैभव रखना , धनवान होना कोई बुरी बात नहीं , बुराई तो धन के अभिमान में है l वैभव असीम मात्रा में कमाया तो जा सकता है , पर उसे एकाकी पचाया नहीं जा सकता l धन -संपत्ति और ज्ञान में वृद्धि के साथ -साथ यदि मनुष्य का ह्रदय विकसित हो , चिन्तन परिष्कृत हो , उसमें ईमानदारी , उदारता ` सेवा आदि सद्गुण हो तभी वह धन और ज्ञान सार्थक होगा l अन्यथा पैनी अक्ल और अमीरी विनाश के साधन होंगे l " आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग की यह स्पष्ट मान्यता थी कि मनुष्य की धर्म , न्याय , नीति में अभिरुचि होनी चाहिए l यदि इस दिशा में प्रगति न हो पाई तो अंतत: मनुष्य टूट जाता है और उसका जीवन निस्सार हो जाता है l "
9 February 2025
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सौराष्ट्र के राजकवि हेमचन्द्र सूरि का प्रजा बहुत सम्मान करती थी l स्वयं नरेश भी उनकी इच्छा पूर्ति करने में अपने जीवन की सार्थकता अनुभव करते थे l ऐश्वर्य से घिरे रहने पर भी वे उससे अछूते थे l एक बार वे एक गाँव में प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेने निकले l गाँव वासियों को जैसे ही यह ज्ञात हुआ कि कविराज आ रहे हैं , वे सभी कुछ न कुछ लेकर कविराज के दर्शन हेतु उमड़ पड़े l इसी क्रम में एक ग्रामीण जो स्वयं फटेहाल वस्त्रों में था , उसने एक हस्तनिर्मित परिधान राजकवि के चरणों में समर्पित किया l राजकवि की नजर उसके फटेहाल वस्त्रों पर गई तो उनकी आँखे भर आईं l वे सोचने लगे " कितनी विषमता है , कहाँ तो उनके इतने कीमती , बहुमूल्य परिधानों से सुसज्जित वस्त्र और कहाँ इसके टाट जैसे मोटे वस्त्र l यह परिश्रमी किसान तन ढंकने के वस्त्रों से वंचित है l सत्य तो यह है कि हमारा अस्तित्व इनकी श्रमशीलता के कारण ही है , किन्तु हम इन्हें ही सुरक्षित जीवन प्रदान करने में असमर्थ हैं l " ऐसा विचार करते हुए राजकवि ने वह परिधान माथे से लगाया और धारण कर लिया l अगले दिन वह उसी परिधान को धारण कर जब राजदरबार में गए तो महाराज बोले ----- " कविवर ! ऐसे दरिद्र वस्त्र आपको शोभा नहीं देते l आपने ऐसे वस्त्र क्यों पहने हैं ? कविराज बोले --- " महाराज ! हमारे हमारे राज्य की अधिकांश प्रजा ऐसे ही साधारण वस्त्र पहनती है , तो फिर मुझे बहुमूल्य वस्त्र पहनने का अधिकार किसने दिया ? मैंने निश्चय किया कि अब मैं ऐसे ही वस्त्र पहनूंगा l " कविराज की करुणापूर्ण बातें महाराज के ह्रदय को छू गईं और उन्होंने निश्चय किया कि अब वे राज्य के प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक जीवनस्तर उपलब्ध कराने का हर संभव प्रयास करेंगे और स्वयं भी अनावश्यक खर्चों में कटौती कर सामान्य जीवन जिएंगे l