23 April 2013

CAREFUL

'काम अधूरे मत छोड़ो | या तो हाथ मत डालो या पूरे करके रहो | थोड़ा करो पर पूरे मन से करो | जो बहुत समेटता है पर उन्हें संभाल नहीं पाता ,वह पछताता और हँसी कराता है | '
यदिआप जीवितों का जीवन जीना चाहते हैं तो जाग्रत रहिए ,अपने हर काम को सावधानी और सतर्कता के साथ कीजिये | जाग्रत मनुष्यों को ही जीवन फल मिलता है |
प्रकाश के अभाव का नाम अंधकार है ,इसी प्रकार जागरूकता का अभाव ही लापरवाही है |
लापरवाही एक मानसिक लकवा है ,जिससे आधा मस्तिष्क लुंज -पुंज हो जाता है | ऐसे मानसिक अपाहिज जीवन के भार को किसी प्रकार गिरते -मरते ढोते रहते हैं | उन्नत और संपन्न जीवन तो उनके लिये आकाश कुसुम की भांति दुर्लभ है | जीवन को धूलि में मिला देने वाला यह रोग ,जब रोगी चाहे जा सकता है | यह रोग ठहरता तभी तक है जब तक रोगी उसका विरोध नहीं करता और अपने में उसे ठहरने देता है ,पर जब वह विरोध करने और हटा देने हेतु उतारू हो जाता है तो फिर उसका ठहरना नहीं हो सकता | मन की उदासीनता रूपी बाधा को हटा दिया जाये तो हर एक व्यक्ति पूर्ण रूप से क्रिया -कुशल ,कर्तव्य -निष्ठ ,परिश्रमी ,कर्म -परायण और सफल मनोरथी हो सकता है | 

22 April 2013

ABILITY

हजरत उमर ने एक व्यक्तिको किसी प्रदेश का शासकनियुक्त किया | इसके बाद खलीफा एक पड़ोसी के बच्चे को खिलाने लगे | उसे हँसाने के लिये मुंह बनाने और तरह तरह की जानवरों की बोलियाँ बोलने लगे | नव -नियुक्त शासक आश्चर्य में पड़ गया | उसने कहा -"मेरे पांच बच्चे हैं | उनमे से किसी को मैंने इतने प्यार से नहीं खिलाया ,जितना कि आप पड़ोसी के  बच्चे को प्यार कर रहे हैं | "खलीफा ने नियुक्ति पत्र वापस ले लिया और कहा -"जब तुम अपने बच्चों को प्यार नहीं कर सकते तो मेरी प्रजा को प्रसन्न रखने की बात कैसे सोच सकोगे ?"

                       
                  इंग्लैंड के बादशाह हेनरी पंचम जब युवराज थे ,तब एक बार न्यायधीश ने किसी अपराधी को कानून के अनुसार दंड दिया | इस पर हेनरी ने न्यायधीश से कहा -"मैं युवराज की हैसियत से आदेश देता हूँ कि आप इसे छोड़ दें | "न्यायधीश ने आदेश नहीं माना और कहा -कानून युवराज से बड़ा है | इस पर बौखलाये हेनरी ने न्यायधीश को एक थप्पड़ जड़ दिया | जज ने तुरंत पुलिस बुलाकर उसे जेल में बंद करा दिया ,साथ ही एक नोट लिखकर भेजा -'आगे चलकर आपको इस देश का राजा बनना है | यदि आप ही राज्य के कानूनों का सम्मान नहीं करेंगे ,तो प्रजा आपकी आज्ञा क्यों मानेगी |
हेनरी ने अपनी भूल मानी और माफी मांगी | जब वह राजा बने तब भी उस न्यायधीश की घटना को सदा सराहते रहे |
                

21 April 2013

GOD HATES THOSE WHO PRAISE THEMSELVES

मान ,बड़ाई ,प्रतिष्ठा ,तथा कार्यों में अभिमान प्राप्त करने की इच्छा खाज की भांति बड़ा सुहावना रोग है | इसके वश में हो जाने पर मनुष्य सत्कर्मो तक को अभिमान की अग्नि से भस्म कर देता है ,प्रमादी बन जाता है और अपने भाग्य पर इतराता है तथा अपनी आत्मा का पतन करता है | अभिमान बड़ी संक्रामक बीमारी है ,जोमनुष्य को अधोगति में पहुँचा सकती है |
       जब मनुष्य अपनी ही महिमा का गुणगान अपने मुख से करने लगे ,तो समझना चाहिये कि वह उस महानता से दूर हटता जा रहा है ,जो उसे सहज में उपलब्ध हो सकती थी | क्षुद्र स्तर के लोग ऐसी ही चर्चा में संलग्न रहते हैं और अपना तथा दूसरों का समय बरबाद करते हैं | महानता यत्र -तत्र उल्लेख कर देने भर से व्यक्तित्व में नहीं आ जाती ,न ही यह विज्ञापन का विषय है | वस्तुत:यह एक ऐसी विभूति है ,जो बिना कहे हुए भी सामने वाले को बहुत कुछ कहती बताती रहती है | फूलों को अपनी सुगंध की चर्चा करने की आवश्यकता नहीं होती ,यह काम तो उनकी अदभुत सुवास ही अनायास करती रहती है और अनेको भौरों को मदमस्त करती हुई खींच बुलाती है | महानता बताने की वस्तु नहीं ,वरन करने योग्य कार्य है | महानता बडप्पन प्रदर्शन में नहीं अपितु अनेको का हित साधन करने में है |
सिकन्दर जैसे सफलताओं के धनी भी मुट्ठी बांधे आये और हाथ पसारे चले गये | अहंकार प्रदर्शित करने के दर्प में ,संसार भर को चुनौती देने और ताल ठोकने वाले किसी समय के दुर्दान्त दैत्यों में से अब कोई कहीं दीख नहीं पड़ता !राजाओं के मणि -मुक्तकों से जड़े राजमुकुट और सिंहासन ,न जाने धराशायी होकर कहां धूल चाट रहे होंगे ?

20 April 2013

THANKFUL

कृतज्ञता मनुष्य जाति का ऐसा गुण है कि यदि लोग दूसरे लोगों के उपकार ,उनकी सेवाओं के प्रति थोड़ी सी भी श्रद्धा और सम्मान का भाव रखें तो संसार से कलह और झगड़ों की 90 प्रतिशत जड़ तुरंत नष्ट हो जाये | कृतज्ञता आत्मा की प्यास और उसकी चिरंतन आवश्यकता है |
एक मार्मिक घटना है -एक डाकिया प्रतिदिन डाक लेकर जंगल से गुजरते हुए दूसरे गांव डाक बांटने जाया करता था | एक दिन उसने देखा पेड़ की एक डाल में छोटे से छेद में से निकलने  के प्रयास से एक बंदर फंस गया | वह बंदर तथा अन्य बंदर चिल्ला रहे हैं | डाकिये ने जब यह देखा तो उसे दया आ गई | पहले तो वह भयभीत हुआ किंतु फिर उसने सोचा जब मैं भलाई करना चाहता हूं तो बंदर क्यों बुराई करेंगे | डाकिये के पास कुल्हाड़ी थी ,वह वृक्ष पर चढ़ गया और सावधानी से छेद बड़ा कर उसने फंसे बंदर को बाहर निकाला | सब बंदर चुपचाप वहां से चले गये | किसी ने डाकिये को डराया नहीं |
लगभग एक सप्ताह बाद एक दिन जब पोस्टमैन डाक लेकर जंगल से गुजर रहा था तो उसने देखा  कई बंदर रास्ते के इधर उधर बैठे हैं ,पोस्टमैन के हाथ में कुल्हाड़ी थी इसलिये वह निडर होकर आगे बढ़ता गया | जैसे -जैसे वह आगे बढ़ा बंदर इकट्ठे होते गये उसके पास आ गये | पोस्टमैन को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उन बंदरों के हाथ में जंगल में पाया जाने वाला दुर्लभ लाल रंग का फल है | सब बंदरों ने अपने अपने फल पोस्टमैन के पास रख दिये और पल भर में इधर उधर चले गये | यह देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गये
         यदि मनुष्य जीव मात्र के प्रति दया का व्यवहार करे ,परस्पर सहयोग की भावना रखें तो संसार की अनेकों समस्याएं स्वत:ही हल हो जायें | 

19 April 2013

'धन संबंधी ईमानदारी और कर्तव्य संबंधी जिम्मेदारी का समन्वय किसी व्यक्ति को प्रमाणिक और प्रतिष्ठित बनाता है | '

         
          'जिसने ईमानदारी खो दी ,उसके पास खोने के लिये और कुछ नहीं बचता '| 

SELF - RESPECT

'आत्म -सम्मान का मर्म आत्म -निष्ठ ,ईश्वर परायण एवं सेवामय जीवन शैली में निहित है | 'जीवन में सफलता एवं प्रसन्नता की अनुभूति का आधार आत्म -सम्मान ,आत्म -गौरव की स्वस्थ भावदशा है |
                                  व्यक्ति आत्म -सम्मान के अभाव में सफल तो हो भी सकता है ,बाह्य उपलब्धियों भरा जीवन भी जी सकता है ,किंतु वह अंदर से भी सुखी ,संतुष्ट एवं संतृप्त होगा ,यह संभव नहीं है | आत्म -सम्मान के अभाव में जीवन एक गंभीर अपूर्णता से भरा रहता है ,जो पग -पग पर जीवन में बहुत कुछ होते हुए भी एक गहरी कमी का एहसास देता रहता है और जीवन एक अज्ञात सी पीड़ा ,असुरक्षा एवं अशांति से बेचैन रहता है | आत्म -सम्मान के अभाव में जीवन की बड़ी से बड़ी ,महान से महान सफलता भी मनुष्य जीवन को सार्थकता की अनुभूति नहीं दे पाती | इस युग की यह त्रासदी उन सभी नेताओं ,शिक्षकों ,कलाकारों एवं व्यक्तियों के साथ घटित होते हुए देखी जा सकती है जिन्होंने मनुष्य जाति को बड़े -बड़े अनुदानों से उपकृत किया ,किंतु अपने जीवन में निम्न आत्म -सम्मान से पीड़ित रहे | कुछ लोग इसी कमी के कारण शराबी ,नशा के आदि या दुर्व्यसनों के शिकार हुए हैं ,कोई आत्म हत्या जैसा वीभत्स कदम भी उठा बैठे | इस तरह आत्म सम्मान की कमी जीवन को नीरस ,दुखमय बनाने वाली गंभीर मनोदशा है |
                                            आत्म -सम्मान का बाहरी उपलब्धियों एवं सफलताओं से बहुत अधिक लेना -देना नहीं है ,यह तो स्व -प्रेम एवं स्व -सम्मान की व्यक्तिगत अनुभूति है | यह व्यक्ति का अपनी नजरों में अपना मूल्य है |
                        अपने जीवन को अंतरात्मा द्वारा निर्धारित उच्चतम मानदंडों पर जीने का प्रयास करें | अपनी अंतरात्मा की आवाज का अनुसरण करें ,अपने सत्य के साथ किसी तरह का समझौता न करें | देह की वासना ,मन की तृष्णा और अहं की क्षुद्रता को पैरों तले रौंदते हुए जब हम अंतरात्मा के पक्ष में निर्णय लेते हैं तो हमारा आत्म -सम्मान उछलकर हमारे व्यक्तित्व को आत्म -गौरव की एक नई चमक देता है ,परंतु जब हम जीवन के भय -प्रलोभन ,वासना -स्वार्थ एवं अहं की क्षुद्रता के सामने घुटने टेक देते हैं तो तत्क्षण हमारे चेहरे पर आत्म ग्लानि की राख पुत जाती है और व्यक्तित्व की चमक क्षीण हो जाती है |
व्यक्ति की विश्वसनीयता एवं प्रमाणिकता उच्च आत्म सम्मान की द्दोतक है 

18 April 2013

DUTIFUL

'पवित्र जीवन ,प्रेमी स्वभाव ,परमार्थपरायणता ही कर्तव्य निष्ठा की सही परिभाषा है ,जो स्वर्गीय आनंद दिलाती हैं '|
मरने के बाद तीन व्यक्तियों की आत्माएँ मृत्यु देवता धर्मराज के पास पहुंची | दूतों ने पहले के बारे में बताया कि ये बड़े महात्मा हैं ,युवावस्था में माता -पिता ,पत्नी -बच्चों को छोड़कर ये जंगल में चले गये और जीवन -भर तप करते रहे | धर्मराज ने कहा -"इसने कर्तव्यों की उपेक्षा की है | ऐसा व्यक्ति धार्मिक कैसे बन सकता है ?परिवार के लोगों के साथ इसने विश्वासघात किया है | इसे कर्तव्य पालन हेतु पुन:धरती पर भेजें ,तभी यह स्वर्ग पा सकेगा | "दूसरे व्यक्ति के बारे में दूतों ने कहा -"यह बड़ा कर्तव्यपरायण है | पत्नी बीमार पड़ी ,तब भी यह बेपरवाह काम करता रहा | मर गई पर चिंता नहीं की | जीवन भर अपने काम में लगा रहा | "धर्मराज बोले -" ऐसे ह्रदयहीन का स्वर्ग में क्या स्थान इसे  फिर से पृथ्वी पर भेजो ,संवेदना पूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा दो | "!तीसरे  व्यक्ति के बारे में दूतों ने बताया कि यह एक साधारण गृहस्थ है | ईश्वर विश्वास और पवित्रता का जीवन जिया ,परिवार को प्रेमपूर्वक विकसित कर संस्कारवान बनाया | हमेशा दूसरों के सुख और उत्थान हेतु कार्य करता रहा | "धर्मराज ने कहा -"स्वर्ग ऐसे ही पवित्र और परमार्थी लोगों के लिये बनाया गया है | इन्हें आदर पूर्वक स्वर्ग में स्थान दें | "