संसार में किसी महान कार्य में सफलता प्राप्त करना सहज नहीं होता । जब तक मनुष्य उसे सिद्ध करने के लिए उसमे अपना सर्वस्व अर्पण करने के लिए तैयार नहीं होता तब तक सिद्धि की आशा निरर्थक है } जो लोग पहले किसी काम को करते हुए भय , आशंका , आदि की ही चिंता किया करते हैं , और थोड़ी कठिनाई आते ही उस मार्ग को त्याग देते हैं , उनसे किसी महत्वपूर्ण कार्य के संपन्न होने की आशा व्यर्थ ही है l
23 February 2017
22 February 2017
सकारात्मक सोच से जीवन में सफलता ------- पं. विष्णु दिगम्बर पुलुस्कर
किशोरावस्था में पुलुस्कर दीवाली के दिन पटाखों से खेल रहे थे कि एक पटाखा हाथ में ही छूट गया जिससे उनकी दोनों आँखें बेकार हो गईं l किसी सहपाठी बच्चे ने पूछा ---- " विष्णु ! तेरी दोनों आँखें बेकार हो गईं, अब तू क्या करेगा ? तेरा जीवन तो बड़ा कठिन हो गया । "
विष्णु ने उत्तर दिया ---- " परमात्मा की छाया हमारे साथ है तो हम क्यों निराश हों ? आँखें ही खराब हुई हैं , हाथ , पाँव , नाक , मुंह और तो सब ठीक है । ऐसा क्यों न सोचूं कि जो कुछ शेष है उसका सदुपयोग करके पथ पर बढ़ सकना अभी भी संभव है l "
बारह वर्षों तक बारह - बारह घंटे का कठोर अभ्यास कर उन्होंने संगीत में निपुणता हासिल की । । उनका उद्देश्य था संगीत विद्दालयों का स्वतंत्र इकाई में विकास जिससे यह महान आध्यात्मिक उपलब्धि ( शास्त्रीय संगीत ) जीवित रहे ।
उन्होंने लाहौर में संगीत विद्दालय की घोषणा कर दी , जो कुछ भी अपने पास था वह उस विद्दालय में लगा दिया । दस दिन तक विद्दालय में एक भी छात्र प्रवेश लेने नहीं आया । वहां के जस्टिस चटर्जी इस से दुखी हुए और पूछा ---- " अब क्या होगा । " विष्णु दिगम्बर हंसकर बोले ---- " जज साहब ! हर बड़े काम की शुरुआत कठिनाइयों से होती है , उन्हें जीतना मनुष्य का काम है । हमारा उद्देश्य बड़ा है तो हम घबराएँ क्यों ? मेरी साधना जब तक मेरे साथ है तब तक असफलता की चिंता क्यों करें ? हम तो प्रयत्न करना जानते हैं । पूरा करना या न करना परमात्मा का काम है । उन्होंने कई विशिष्ट आयोजन किये , लोगों ने शास्त्रीय संगीत का महत्व स्वीकार किया । यह विद्दालय 105 संगीत छात्रों को लेकर विकसित हो चला ।
इसके बाद आपने बम्बई में गांधर्व - महाविद्दालय की स्थापना की जिसकी आज सैकड़ों शाखाएं सारे देश में फैली हुई हैं ।
विष्णु ने उत्तर दिया ---- " परमात्मा की छाया हमारे साथ है तो हम क्यों निराश हों ? आँखें ही खराब हुई हैं , हाथ , पाँव , नाक , मुंह और तो सब ठीक है । ऐसा क्यों न सोचूं कि जो कुछ शेष है उसका सदुपयोग करके पथ पर बढ़ सकना अभी भी संभव है l "
बारह वर्षों तक बारह - बारह घंटे का कठोर अभ्यास कर उन्होंने संगीत में निपुणता हासिल की । । उनका उद्देश्य था संगीत विद्दालयों का स्वतंत्र इकाई में विकास जिससे यह महान आध्यात्मिक उपलब्धि ( शास्त्रीय संगीत ) जीवित रहे ।
उन्होंने लाहौर में संगीत विद्दालय की घोषणा कर दी , जो कुछ भी अपने पास था वह उस विद्दालय में लगा दिया । दस दिन तक विद्दालय में एक भी छात्र प्रवेश लेने नहीं आया । वहां के जस्टिस चटर्जी इस से दुखी हुए और पूछा ---- " अब क्या होगा । " विष्णु दिगम्बर हंसकर बोले ---- " जज साहब ! हर बड़े काम की शुरुआत कठिनाइयों से होती है , उन्हें जीतना मनुष्य का काम है । हमारा उद्देश्य बड़ा है तो हम घबराएँ क्यों ? मेरी साधना जब तक मेरे साथ है तब तक असफलता की चिंता क्यों करें ? हम तो प्रयत्न करना जानते हैं । पूरा करना या न करना परमात्मा का काम है । उन्होंने कई विशिष्ट आयोजन किये , लोगों ने शास्त्रीय संगीत का महत्व स्वीकार किया । यह विद्दालय 105 संगीत छात्रों को लेकर विकसित हो चला ।
इसके बाद आपने बम्बई में गांधर्व - महाविद्दालय की स्थापना की जिसकी आज सैकड़ों शाखाएं सारे देश में फैली हुई हैं ।
21 February 2017
अलौकिक उदारता ----- स्वामी दयानन्द सरस्वती
' अपने छोटे से जीवन में उन्होंने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैले ' पाखण्ड व कुप्रथाओं ' का निराकरण करके वैदिक धर्म का नाद बजाया । ' गोवध ' बंद कराने का प्रयत्न किया । ' बाल विवाह ' की प्रथा का विरोध करके लोगों को ब्रह्मचर्यं का महत्व समझाया । स्थान - स्थान पर गुरुकुल खुलवाकर ' संस्कृत ' शिक्षा का प्रचार किया । ' विधवा विवाह ' की प्रतिष्ठा की , ' शराब - मांस आदि ' का घोर विरोध किया , राजनीतिक स्वतंत्रता पर बल दिया । उन्होंने हर प्रकार से आर्य जाति को फिर से उसके अतीत गौरव पर स्थापित करने का प्रयत्न किया । '
उनके गुरु स्वामी विरजानंद को किसी ऐसे शिष्य की प्रतीक्षा थी जो सत्पात्र हो , जो उनके सिद्धांतों का प्रचार कर संसार में विशेषकर भारत में एक नयी विचार क्रान्ति करने में सफल हो l । स्वामी दयानन्द के रूप में उनकी यह साध पूरी हुई स्वामी दयानन्द के कार्य और वैदिक संस्कृति के पुनरुत्थान अभियान की उपलब्धियां ऐतिहासिक हैं । ।
उस अन्धकार युग में जबकि देश की जनता तरह - तरह की निरर्थक और हानिकारक रूढ़ियों में ग्रस्त थी , जिससे स्वामीजी को पग - पग पर लोगों के विरोध , विध्न - बाधाओं और संघर्ष का सामना करना पड़ा पर वे अपनी अजेय शारीरिक और मानसिक शक्ति , साहस और द्रढ़ता के साथ अपने निश्चित मार्ग पर निरंतर बढ़ते रहे और अंत में अपने लक्ष्य की प्राप्ति में बहुत कुछ सफल हुए l
स्वामी जी ने अपना अनिष्ट करने वालों के प्रति कभी क्रोध नहीं किया , उनका कभी अनहित चिन्तन नहीं किया । । स्वामी जी को इस बात का अनुमान थोड़ी देर में ही हो गया कि रसोइये जगन्नाथ ने उनको दूध में जहर दे दिया है तो उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और सच्ची बात बताने को कहा । उनके आत्मिक प्रभाव से जगन्नाथ काँप गया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया l पर स्वामी जी ने उसे बुरा - भला नहीं कहा और न ही उसे दण्ड दिलाया बल्कि उसे अपने पास से कुछ रूपये देकर कहा ---- " अब जहाँ तक बन पड़े तुम अति शीघ्र जोधपुर की सरहद से बाहर निकल जाओ , क्योंकि यदि किसी भी प्रकार इसकी खबर महाराज को लग गई तो तुमको फांसी पर चढ़ाये बिना मानेंगे नहीं । जगन्नाथ उसी क्षण वहां से बहुत दूर चला गया और गुप्त रूप से रहकर अपने प्राणों की रक्षा की l स्वामी जी के जीवन की एक यही घटना उन्हें महा मानव सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है ।
उनके गुरु स्वामी विरजानंद को किसी ऐसे शिष्य की प्रतीक्षा थी जो सत्पात्र हो , जो उनके सिद्धांतों का प्रचार कर संसार में विशेषकर भारत में एक नयी विचार क्रान्ति करने में सफल हो l । स्वामी दयानन्द के रूप में उनकी यह साध पूरी हुई स्वामी दयानन्द के कार्य और वैदिक संस्कृति के पुनरुत्थान अभियान की उपलब्धियां ऐतिहासिक हैं । ।
उस अन्धकार युग में जबकि देश की जनता तरह - तरह की निरर्थक और हानिकारक रूढ़ियों में ग्रस्त थी , जिससे स्वामीजी को पग - पग पर लोगों के विरोध , विध्न - बाधाओं और संघर्ष का सामना करना पड़ा पर वे अपनी अजेय शारीरिक और मानसिक शक्ति , साहस और द्रढ़ता के साथ अपने निश्चित मार्ग पर निरंतर बढ़ते रहे और अंत में अपने लक्ष्य की प्राप्ति में बहुत कुछ सफल हुए l
स्वामी जी ने अपना अनिष्ट करने वालों के प्रति कभी क्रोध नहीं किया , उनका कभी अनहित चिन्तन नहीं किया । । स्वामी जी को इस बात का अनुमान थोड़ी देर में ही हो गया कि रसोइये जगन्नाथ ने उनको दूध में जहर दे दिया है तो उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और सच्ची बात बताने को कहा । उनके आत्मिक प्रभाव से जगन्नाथ काँप गया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया l पर स्वामी जी ने उसे बुरा - भला नहीं कहा और न ही उसे दण्ड दिलाया बल्कि उसे अपने पास से कुछ रूपये देकर कहा ---- " अब जहाँ तक बन पड़े तुम अति शीघ्र जोधपुर की सरहद से बाहर निकल जाओ , क्योंकि यदि किसी भी प्रकार इसकी खबर महाराज को लग गई तो तुमको फांसी पर चढ़ाये बिना मानेंगे नहीं । जगन्नाथ उसी क्षण वहां से बहुत दूर चला गया और गुप्त रूप से रहकर अपने प्राणों की रक्षा की l स्वामी जी के जीवन की एक यही घटना उन्हें महा मानव सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है ।
20 February 2017
कर्मयोग की शक्ति
' ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास व्यक्ति को कठिनाइयों तथा विपत्ति की घड़ियों में भी वह धैर्य प्रदान करता है , जिसके बल पर वह प्रतिकूल परिस्थितियों को भी आसानी से सह लेता है । '
लोकमान्य तिलक को देश निकाले का दंड देकर छह वर्ष के लिए बर्मा की मांडले जेल में रहने के लिए ले जाया जा रहा था । दूसरी श्रेणी में एक बर्थ पर तिलक और उनके सामने साथ वाले दोनों सैनिक अधिकारी बैठे थे ।
रात के नौ बजे , तिलक के सोने का समय हो गया । पगड़ी , अंगरखा और दुपट्टा उतार कर सोने की तैयारी करने लगे । और पांच मिनट में ही उन्हें गहरी नींद आ गई ।
सुबह पांच बजे वे सोकर उठे । उतनी गहरी नींद लेते देखकर अधिकारियों को आश्चर्य हुआ । पूछा ---- " आप जानते हैं आपको कहाँ ले जाया जा रहा है और वहां क्या सजा दी जाएगी । फिर भी इतनी निश्चिन्तता पूर्वक कैसे सो सके ? "
तिलक ने कहा ---- " यह जानने की मुझे क्या आवश्यकता है । परिणाम को जानकर ही मैं इस क्षेत्र में आया हूँ । चिंता होती तो इस क्षेत्र में प्रविष्ट ही क्यों होता ? "
मांडले जेल में न कोई उनकी भाषा समझने वाला था , न ही कोई परिचित । उन्होंने सब तरफ से ध्यान हटाकर ' गीता ' का अध्ययन आरंभ किया और छह वर्ष में उसका एक प्रेरणाप्रद भाष्य तैयार कर दिया । लोकमान्य का ' गीता रहस्य ' उनके जेल से छुटकारे के बाद प्रकाशित हुआ तो उसका प्रचार आंधी - तूफान की तरह बढ़ा । भारतीय जनता को कर्तव्य पालन की प्रेरणा देने वाला महत्वपूर्ण ग्रन्थ है ।
लोकमान्य तिलक को देश निकाले का दंड देकर छह वर्ष के लिए बर्मा की मांडले जेल में रहने के लिए ले जाया जा रहा था । दूसरी श्रेणी में एक बर्थ पर तिलक और उनके सामने साथ वाले दोनों सैनिक अधिकारी बैठे थे ।
रात के नौ बजे , तिलक के सोने का समय हो गया । पगड़ी , अंगरखा और दुपट्टा उतार कर सोने की तैयारी करने लगे । और पांच मिनट में ही उन्हें गहरी नींद आ गई ।
सुबह पांच बजे वे सोकर उठे । उतनी गहरी नींद लेते देखकर अधिकारियों को आश्चर्य हुआ । पूछा ---- " आप जानते हैं आपको कहाँ ले जाया जा रहा है और वहां क्या सजा दी जाएगी । फिर भी इतनी निश्चिन्तता पूर्वक कैसे सो सके ? "
तिलक ने कहा ---- " यह जानने की मुझे क्या आवश्यकता है । परिणाम को जानकर ही मैं इस क्षेत्र में आया हूँ । चिंता होती तो इस क्षेत्र में प्रविष्ट ही क्यों होता ? "
मांडले जेल में न कोई उनकी भाषा समझने वाला था , न ही कोई परिचित । उन्होंने सब तरफ से ध्यान हटाकर ' गीता ' का अध्ययन आरंभ किया और छह वर्ष में उसका एक प्रेरणाप्रद भाष्य तैयार कर दिया । लोकमान्य का ' गीता रहस्य ' उनके जेल से छुटकारे के बाद प्रकाशित हुआ तो उसका प्रचार आंधी - तूफान की तरह बढ़ा । भारतीय जनता को कर्तव्य पालन की प्रेरणा देने वाला महत्वपूर्ण ग्रन्थ है ।
19 February 2017
गुरु दक्षिणा ------
महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी ---- इन महापुरुषों के व्यक्तित्व और कर्तव्य को काल की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता , ये चिरंतन हैं । अमर हैं । आज भी और हर काल में भी ये नाम उतने ही प्रभामय और प्रेरक रहेंगे ।
समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को समझाया ---- " शिवाजी ! तू बल की उपासना कर , बुद्धि को पूज , संकल्पवान बन और चरित्र की द्रढ़ता को अपने जीवन में उतार , यही तेरी ईश्वर भक्ति है । भारतवर्ष में बढ़ रहे पाप , हिंसा , अनैतिकता और अनाचार के यवनी कुचक्र से लोहा लेने और भगवान् की स्रष्टि को सुन्दर बनाने के लिए इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है । "
शिवाजी ने दृढ किन्तु विनीत भाव से कहा ----- " आज्ञा शिरोधार्य देव ! किन्तु यह तो गुरु दीक्षा हुई , अब गुरु - दक्षिणा का का आदेश दीजिये । "
गुरु की आँखें चमक उठीं । शिवाजी के शीश पर हाथ फेरते हुए बोले ----- " गुरु - दक्षिणा में मुझे एक लाख शिवाजी चाहिए , बोल देगा ? "
" दूँगा गुरुदेव ! एक वर्ष एक दिन में ही यह गुरु - दक्षिणा चुका दूँगा । "
इतना कहकर शिवाजी ने गुरुदेव की चरण धूलि ली और महाराष्ट्र के निर्माण में जुट गए ।
जीवन विकास में सहायक गुणों ----- स्फूर्ति , उत्साह , तत्परता , श्रमशीलता , नियम , संयम , उपासना -- आदि गुणों को शिवाजी ने अलंकारों की तरह धारण किया हुआ था । इसके साथ ही व्यवहार कुशलता , अनुशासन , वाक्पटुता जैसे गुणों और योग्यता के बल पर जागीर के सारे तरुण नवयुवक तथा किशोर अपने अनुयायी बना लिए । उन्होंने स्थान - स्थान पर इनके संगठन तथा स्वयं सेवक दल बना दिए । समय - समय पर वे उनको शस्त्रों तथा देश प्रेम की शिक्षा देते । उन्होंने स्थान - स्थान पर देश की रक्षा के लिए सामग्री एकत्रित करने के लिए भण्डार - भवनों की स्थापना की और उनकी देखरेख व प्रबंध व्यवस्था के लिए कार्यकारिणी बनाई ।
शिवाजी ने बहुत से चुने हुए साथियों की एक स्वयं सैनिक सेना बनाकर युद्ध , व्यूह तथा उन्हें सञ्चालन का व्यवहारिक अभ्यास कर लिया । वे लोगों को स्वयं शस्त्र तथा युद्ध की शिक्षा देते थे और सेना के लिए आवश्यक अनुशासन का अभ्यास कराते थे ।
लगातार 36 वर्ष तक वन - पर्वत एक करके अनेकानेक युद्ध करके सशक्त महाराष्ट्र की स्थापना का स्वप्न साकार किया । उन्होंने अपने समय के एक युगपुरुष की भूमिका निभायी ।
समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को समझाया ---- " शिवाजी ! तू बल की उपासना कर , बुद्धि को पूज , संकल्पवान बन और चरित्र की द्रढ़ता को अपने जीवन में उतार , यही तेरी ईश्वर भक्ति है । भारतवर्ष में बढ़ रहे पाप , हिंसा , अनैतिकता और अनाचार के यवनी कुचक्र से लोहा लेने और भगवान् की स्रष्टि को सुन्दर बनाने के लिए इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है । "
शिवाजी ने दृढ किन्तु विनीत भाव से कहा ----- " आज्ञा शिरोधार्य देव ! किन्तु यह तो गुरु दीक्षा हुई , अब गुरु - दक्षिणा का का आदेश दीजिये । "
गुरु की आँखें चमक उठीं । शिवाजी के शीश पर हाथ फेरते हुए बोले ----- " गुरु - दक्षिणा में मुझे एक लाख शिवाजी चाहिए , बोल देगा ? "
" दूँगा गुरुदेव ! एक वर्ष एक दिन में ही यह गुरु - दक्षिणा चुका दूँगा । "
इतना कहकर शिवाजी ने गुरुदेव की चरण धूलि ली और महाराष्ट्र के निर्माण में जुट गए ।
जीवन विकास में सहायक गुणों ----- स्फूर्ति , उत्साह , तत्परता , श्रमशीलता , नियम , संयम , उपासना -- आदि गुणों को शिवाजी ने अलंकारों की तरह धारण किया हुआ था । इसके साथ ही व्यवहार कुशलता , अनुशासन , वाक्पटुता जैसे गुणों और योग्यता के बल पर जागीर के सारे तरुण नवयुवक तथा किशोर अपने अनुयायी बना लिए । उन्होंने स्थान - स्थान पर इनके संगठन तथा स्वयं सेवक दल बना दिए । समय - समय पर वे उनको शस्त्रों तथा देश प्रेम की शिक्षा देते । उन्होंने स्थान - स्थान पर देश की रक्षा के लिए सामग्री एकत्रित करने के लिए भण्डार - भवनों की स्थापना की और उनकी देखरेख व प्रबंध व्यवस्था के लिए कार्यकारिणी बनाई ।
शिवाजी ने बहुत से चुने हुए साथियों की एक स्वयं सैनिक सेना बनाकर युद्ध , व्यूह तथा उन्हें सञ्चालन का व्यवहारिक अभ्यास कर लिया । वे लोगों को स्वयं शस्त्र तथा युद्ध की शिक्षा देते थे और सेना के लिए आवश्यक अनुशासन का अभ्यास कराते थे ।
लगातार 36 वर्ष तक वन - पर्वत एक करके अनेकानेक युद्ध करके सशक्त महाराष्ट्र की स्थापना का स्वप्न साकार किया । उन्होंने अपने समय के एक युगपुरुष की भूमिका निभायी ।
17 February 2017
आश्चर्य जनक स्मरण शक्ति
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे | वे सरलता की प्रतिमूर्ति थे लेकिन उनकी स्मरण शक्ति इतनी आश्चर्य जनक थी कि एक दिन पं . नेहरु उनसे पूछ बैठे --- " ऐसा आला दिमाग कहाँ से पाया राजेन्द्र बाबू ? "
बात यह थी कि एक बार कांग्रेस कार्य कारिणी के प्रधान सदस्य परेशान थे कि वह रिपोर्ट नहीं मिल रही है जिसके लिए कार्य कारिणी की बैठक बुलाई गई थी | वह रिपोर्ट डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पढ़ चुके थे | उनसे पूछा गया तो बोले ____ " हाँ मैं पढ़ चूका हूँ और आवश्यक हो तो उसे बोलकर पुन: नोट करा सकता हूँ | "
लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि इतनी लम्बी रिपोर्ट एक बार पढ़ने के बाद ज्यों की त्यों लिखाई जा सकती है । रिपोर्ट खोजने के साथ पुनर्लेखन भी आरम्भ कर दिया गया । राजेन्द्र बाबू सौ से भी अधिक पृष्ठ लिखा चुके तब वह रिपोर्ट भी मिल गई कौतूहलवश लोगों ने मिलान किया तो कहीं भी अंतर नहीं मिला । ऐसी थी उनकी गजब की स्मरण शक्ति !
बात यह थी कि एक बार कांग्रेस कार्य कारिणी के प्रधान सदस्य परेशान थे कि वह रिपोर्ट नहीं मिल रही है जिसके लिए कार्य कारिणी की बैठक बुलाई गई थी | वह रिपोर्ट डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पढ़ चुके थे | उनसे पूछा गया तो बोले ____ " हाँ मैं पढ़ चूका हूँ और आवश्यक हो तो उसे बोलकर पुन: नोट करा सकता हूँ | "
लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि इतनी लम्बी रिपोर्ट एक बार पढ़ने के बाद ज्यों की त्यों लिखाई जा सकती है । रिपोर्ट खोजने के साथ पुनर्लेखन भी आरम्भ कर दिया गया । राजेन्द्र बाबू सौ से भी अधिक पृष्ठ लिखा चुके तब वह रिपोर्ट भी मिल गई कौतूहलवश लोगों ने मिलान किया तो कहीं भी अंतर नहीं मिला । ऐसी थी उनकी गजब की स्मरण शक्ति !
16 February 2017
शस्त्रबल और सैन्यबल के साथ नैतिक बल भी जरुरी है ------ प्राणवान कवि ---- निराला
महाकवि निराला ने काव्य - साधना के माध्यम से लोक मानस का मार्गदर्शन करने का निश्चय किया | उनके ग्रन्थ ' राम की शक्ति - पूजा ' में आत्म बल की , नैतिक बल की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया गया है | ' आसुरी तत्वों के साथ दैवीय पद्धति से मोर्चा लेने की प्रेरणा उनके काव्य दर्शन से मिलती है |श्री राम लंका विजय अभियान को आरम्भ करने से पूर्व शक्ति की आराधना करते हैं उनका अभीष्ट नैतिक बल था |
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