22 November 2018

WISDOM ---- उपदेश के साथ सेवा अनिवार्य रूप से जुड़ी हो तभी वह सच्ची लोकसेवा है

    भगवन  बुद्ध  ने   कहा  है ---- " प्रवचन - उपदेश  के  साथ  सेवा  अनिवार्य  रूप  से  जुड़ी  होनी  चाहिए  क्योंकि   सेवा  में  मिलने  वाले  कष्टों  से  ,  अपमानजनक  पीड़ाओं  से  व्यक्ति  का  जीवन  परिशोधित  होता  है  ,  इससे  अहंकार  का  विनाश  होता  है   और  सेवा  से  ही  संवेदना  विकसित  होती  है   l  "
  पं . श्रीराम शर्मा  आचार्य जी  ने  भी   अपने  परिजनों  को  यही  समझाया  कि   ---"  भविष्य  में  कोरे  प्रवचन  काम न  देंगे ,  सच्ची  लोकसेवा  को  ही  प्रतिष्ठा  मिलेगी   l  जो  आज  केवल  धार्मिक  आडम्बरों  में   रत  हैं  ,  कल  का  भविष्य  उन्हें  अस्वीकृत   व  तिरस्कृत  कर  देगा   l  बदलते  हुए  समय  में  युग  की  यही  मांग  है  कि  परिजनों  को  आसपास  के  क्षेत्रों  में  सेवा  कार्यों  में  जुट  जाना  चाहिए  l  सेवा  से  ही  संवेदना  विकसित  होती  है  और  आज  की  सभी  समस्याओं  का  एकमात्र  हल --- संवेदना    है  l 

21 November 2018

WISDOM ----- मनोविकारों से मुक्त होकर ही राम राज्य की स्थापना संभव है

 काम , क्रोध , लोभ , मोह  , ईर्ष्या - द्वेष   --- ये  मनोविकार  ही  परिवार और   समाज  में  अशांति  उत्पन्न  करते  हैं   और  इन  मनोविकारों  से  ग्रस्त  व्यक्ति  स्वयं  कष्ट  उठाता  है  l  युग  चाहे  कोई  भी  हो  ,  जिसमे   भी  ये  मनोविकार     होते  हैं   , प्रकृति  उन्हें  अपने  तरीके  से  दण्डित  करती   है  l 
   रामचरितमानस  में  हम  देखें  तो   राजा  दशरथ  महारानी  कैकेयी  के  सौन्दर्य  पर  मुग्ध  थे  , महारानी  को  अपने  सौन्दर्य  का  बहुत  अभिमान  व  अहंकार  था  l  इससे  भी  अधिक  घातक  था  मंथरा  जैसी  दासी  का  कुसंग   l   इस  कुसंग  ने  महारानी  कैकेयी   के  अहंकार  और  क्रोध  को  इतना  उभार  दिया  कि   राम पर  अपने  पुत्र  से  भी ज्यदा   वात्सल्य  लुटाने  वाली  कैकेयी  ने   राम   के   राजतिलक  को  रुकवाकर   अपने  पुत्र भरत    के  लिए  राज सिंहासन   और  राम  के  लिए   चौदह  वर्ष  का    वनवास  माँगा   l  मंथरा   भी बहुत  ईर्ष्यालु  थी  वह  राम  से ईर्ष्या   करती  थी  और   भरत  को  अधिक   महत्व   देती  थी  l    
  राजा  दशरथ   अपने  पुत्र  राम  से  अतिशय  मोहग्रस्त  थे  l 
  इसी   तरह    द्वापर युग  में  धृतराष्ट्र  पुत्रमोह  में  अंधे  थे ,  दुर्योधन  अति  अहंकारी  था  l   हर  युग  में  मनुष्य  इन  मनोविकारों  से  ग्रस्त  रहा  है   लेकिन  वर्तमान  में   इन  मनोविकारों  का   रूप   अत्यंत  भयावह  और  विकृत  हो   चुका    है   l  कर्मकांड  और   आडम्बर  को  ही  सब  कुछ  मानने  के  कारण  मनुष्य  की  चेतना  सुप्त हो  गई  है  , मनुष्य  संवेदनहीन  हो  गया  है   l  महाकाव्यों  से  शिक्षा  लेने  की  जरुरत  है  l  

20 November 2018

WISDOM ---- सुख से जीवन जीना है तो तृष्णा को कम करना होगा

 वस्तुओं के  प्रति  आकर्षण ,  अतृप्त  इच्छाओं  का  नाम  ही  तृष्णा  है   l
  'बढ़त  बढ़त  सम्पति  सलिल   मन  सरोज  बढ़  जाये  l
  घटत -घटत  फिर  न  घटे   बस  समूल  कुम्हलाय   l l
  भाव  यह  है  कि  कमल  का  फूल  पानी  में  डूबता  नहीं  l  पानी  बढ़ने   से  कमलनाल  बढ़ती  जाती  है   पर  पानी घटने  से  घटती  नहीं ,  समूल  कुम्हला  जाती  है   l  सम्पतिवानों  की  इच्छाएं  असीम  बढ़ती  जाती  हैं  , पर  जैसे  ही सम्पति  गई   इच्छाएं  घटती  नहीं  ,  भाव ( आदत )  बनी  रहती  है  l 
  यह  तृष्णा  ही  मनुष्य  की  अशांति  और  तनाव  का कारण  है   l   . ' रामचरितमानस '  में  सुरसा  के  प्रसंग  के  माध्यम  से  इसका  समाधान  सुझाया  है -----   श्री हनुमानजी  जब  सीताजी  का  पता  लगाने  के  लिए  लंका  में  अन्दर  जाने  लगे   तो  सुरसा नामक  राक्षसी  ने  उन्हें  पकड़  लिया   और  मुंह  में  रखकर  चबाने  लगी   l  हनुमानजी  ने  अपना  बदन  बढ़ाना  शुरू  किया   तो  सुरसा  ने  भी  अपना  मुंह  फाड़  दिया ----
   " जस - जस  सुरसा  बदनु  बढ़ावा  l
      तासु  दूंगा  कपि  रूप  देखावा  l l "
 बढ़ते - बढ़ते  जब  उन्होंने  देखा  कि  सुरसा  का  मुंह   सोलह  योजन  का  हो  गया   तो  हनुमानजी बत्तीस  योजन  के   हो  गए  l  अब  हनुमानजी  समझ  गए   कि  यह  सुरसा  कम  होने  वाली  नहीं  है  ,  यह  अपना  मुंह  कई  योजन  और  चौड़ा  कर  लेगी  l   अत:  हनुमानजी  ने        ' अति  लघु  रूप  पवनसुत  लीन्हा   l  '
  बहुत  छोटा  सा  रूप  बना  लिया  l
  ' मसक  समान  रूप  कपि  धरी  l '   --- छोटा  सा  रूप  बनाकर   सुरसा  की  दाढ  से    निकल  गए  l
                     मनोकामनाओं   की  कोई  सीमा  नहीं  है   l  रावण , सिकंदर , हिरण्यकशिपु  किसी  की  कामनाएं  पूरी  नहीं  हुईं   फिर  हमारी  और  आपकी  कैसे  पूरी  हो  सकती  हैं   ?  

19 November 2018

WISDOM ---- अध्यात्म हमारे सोचने के तरीके को ठीक करता है

 विचार   करने  की  दो  श्रेणियां  हैं ----   सोचने  का  एक  तरीका  यह  है  कि  हमारी  इच्छानुकूल  वस्तुएं  मिलें  तभी  हम   दुनिया  में  सुखी  रहेंगे  l  यह  है  भौतिकवादी  द्रष्टिकोण   l   दूसरा  द्रष्टिकोण  है  अध्यात्मवादी  द्रष्टिकोण  --- यह  हमारे  सोचने  के  तरीके  को  ठीक  करता  है  l  यदि हमारा  सोचने  का  तरीका  सही  है   तो  हम  साधारण  सुख - सुविधाओं  में  , अपने  एक  कमरे  में  रहकर  भी  सुख - शांति  से रह  सकते  हैं   लेकिन  चिंतन  सही   न   होने  से  हम  सारा  संसार  भी  घूम  आयेंगे  तब  भी  मन  अशांत  रहेगा ,  समस्याएं  बनी  रहेंगी  l   बाहरी   चीजों  से  आज  तक  किसी  को  भी  सुख - शांति  नहीं  मिली  है  l  शान्ति  हमारी  मन:स्थिति   है  जो  सही  ढंग  से  जीवन  जीने  से  हमें  मिलती  है   और  अध्यात्म  हमें   सही  ढंग  से  जीवन  जीना  सिखाता  है  l     

18 November 2018

WISDOM ----- अकेलेपन का सार्थक उपयोग करें

  दुनिया में  जो  भी  उपलब्धियाँ हैं ,  सिद्धियाँ  हैं , वे  भले  ही  संसार  के  सम्मुख  हों  , लोगों  से  घिरी  हों  , लोग  उनका  उपभोग  करते  हों  , लेकिन  उनकी  उत्पति  एकांत  के  माहौल  में  ही  होती  है  l 
 हमारे  अन्दर  की  प्रतिभा , क्षमता , रचनात्मकता  का  विकास   हमारे  स्वयं  के  पुरुषार्थ  से  होता  है   और  इसके  लिए  हमें  एकांत  की  आवश्यकता  होती  है  l  शोर - गुल  में  हम  पूरी  तरह  एकाग्र  नही  हो  पाते,  एकांत  में  ही  मन  शांत  और  स्थिर  होता  है   जिससे  साधना  के  मार्ग  पर  आगे  बढ़ने में  मदद  मिलती  है  l      एक    चीनी  साहित्यकार   हैं ---- मो  यान  l  वे  चीन  के  पहले  ऐसे  लेखक  हैं  जिन्हें  साहित्य  के  लिए  नोबेल  पुरस्कार   प्राप्त  हुआ  है  l   वे  कहा  करते  थे  एकांत  मेरे लेखन  का  अभिन्न  एंग  है   l   आर्थिक  तंगी  के   कारण  उन्हें   वीद्दालय  छोड़कर  मवेशी  चराना पड़ा   l  मवेशियों  के  बीच  वे  अकेले  होते  थे  l  यह  एकांत  उन्हें  इतना   पसंद  आया   कि  उन्होंने  अपना  नाम   ' ग्वान  मोए '  से  बदलकर   ' मो  यान  रख  लिया  , चीनी  भाषा  में  इसका  अर्थ  होता  है  मत  बोलो   l 
  एकांत   में  हम  अपनी  उर्जा  का  सकारात्मक  उपयोग कर  उसे  सार्थक  करें   l  

16 November 2018

WISDOM ------ प्रत्येक श्रेष्ठ और महान कार्य की सफलता में गंभीर मौन सहायक रहा है l

  सार्थक  मौन  उसे  कहते  हैं  जब   मन  में  श्रेष्ठ  चिंतन  और  ईश्वर  स्मरण  चलता  रहे   l
 जब  व्यक्ति  बोलता  है   तो  जिह्वा  हावी  रहती  है   लेकिन  मौन    की    अवस्था में  अंतर  बोलता  है  ,  हमें  अपने  अंतर  को  बोलने  का  मौका  देना  चाहिए  क्योंकि  इसी  में  जीवन  का  सारा  मर्म    छुपा   है   l 
   गांधीजी  के  मौन  का   प्रभाव   ऐसा  विलक्षण  और  अद्भुत  था   जिसने  कभी  न  अस्त  होने  साम्राज्य  को  पराजय  का कडुआ  घूंट  पिला  ही  दिया   l 
 अरुणाचलम  के  महर्षि  रमण  सदैव  मौन  रहते  थे  l  परन्तु  उनका  मौन  उपदेश  आत्मा  की  गहराई   में  उतर   जाता  था  l  हर  कोई उनसे  अपनी  गंभीर  समस्या  का  समाधान   अनायास  ही  पा  जाता  था  l   अंग्रेजी  साहित्य  के  महान  कवि   वर्ड्सवर्थ    अपने  काव्य  को   मौन  और  नीरवता  का  वरदान   कहा  करते  थे  l 
  जीवन  में  श्रेष्ठ  एवं  सार्थक  कार्य   के  लिए   मौन  को  एक  व्रत  मानकर  अपनाना  चाहिए   l  

15 November 2018

WISDOM ------

 एक  मिटटी के  ढेले  से  सुगंध  आ  रही  थी  तथा  दूसरे  से  दुर्गन्ध   l  दोनों  जब  मिले  तो  आपस  में  विचार  करने  लगे   कि  हम   दोनों  एक  ही  मिटटी  के  बने  हैं  ,  फिर  इतना  अंतर  क्यों   ?  सुगन्धित  ढेले  ने  कहा ---- ' यह  संगति  का प्रतिफल  है   l  मुझे  गुलाब  के  नीचे  पड़े  रहने  का  अवसर  मिला   और  तुम  गोबर  के  नीचे  दबे  रहे  l  '  यह  संगत  का  असर  है   l