20 January 2019

WISDOM ------ गुरु की महानता

 महर्षि  आश्वलायन  अपने  शिष्यों  को   संस्कृति  और  संस्कार    से  परिचित  कराते  थे  ,  जीवन  के  मूलभूत  सिद्धांत  से  लेकर  अध्यात्म  की शिक्षा  देते  थे l  लेकिन  आज  उनके  माथे  पर  चिंता  की  लकीरें  थीं  l  निकट  राज्य  के  सेनापति  ने  बताया   कि  उनका  शिष्य  देवदत्त  दस्यु  बन  गया  l  महर्षि  ने   सेनापति  से  कहा   की  तुरंत  देवदत्त  के  पास  चलो  l  सेनापति  को  भय  और  संकोच  था  क्योंकि  वह  दस्यु  कितने  ही  निरपराध  लोगों  की  हत्या  कर   चुका   था  l 
 महर्षि  ने  सेनापति  से  कहा --- " वत्स !  गुरु  का  दायित्व  ही  अंधकार  से  प्रकाश की  और  ले जाना  होता  है  l  यदि  आज  मैं   अपने  दायित्व से  विमुख  हो  जाऊँगा   तो  आने  वाली  पीढ़ी को  सत्य  और  धर्माचरण  की  शिक्षा  कैसे  दूंगा  l  यदि  मेरी  दी  गई  शिक्षाओं  में  ,  मेरे  आचरण  में   सत्य  और धर्म  का  समावेश  है   तो  मैं  और  तुम  दोनों  सुरक्षित  लौटेंगे   और  यदि  मेरी  दी  गई  शिक्षाएं  दुराचरण  पर  आधारित  हैं   तो  हमारा  नष्ट  हो  जाना  ही  श्रेष्ठ  है  l  "  
  चलते - चलते  महर्षि  व  सेनापति   उस  जंगल  में  पहुंचे  ,  महर्षि  अब   दस्यु  देवदत्त के  सामने  खड़े  थे  ,  उसके  हाथ  में  रक्तरंजित  तलवार  थी  l  विषाक्त  वातावरण  में  रहने  के  कारण  वह  तो महर्षि  को  भूल  ही  गया  था  l  महर्षि  ने  उससे  प्रेम  से  पूछा --- " कैसे  हो  पुत्र  देवदत्त ! क्या  घर  की  याद  नहीं  आती  ? "  इतने  वर्षों  में  किसी  ने  पहली  बार  उससे  प्रेम  से बोला  l  महर्षि  से  आँख  मिलते  ही  उसकी  आँखों  से  अश्रुधारा  बहने  लगी  ,  वह  उनके  चरणों  में  गिर  पड़ा  l   महर्षि  ने  उसके  मस्तक  पर  हाथ  फेरते  हुए  कहा --- "पुत्र  देवदत्त  !  मेरी  शिक्षाओं  में  क्या  कमी  थी   जो  हमारी - तुम्हारी  भेंट  इस  मोड़  पर  हुई ,  तुम्हारे  हाथ  निर्दोषों  के  रक्त  से   रंगे   हैं  l  जीवन  तुम्हे  यहाँ  कैसे  ले  आया ,  पुत्र  ! "
देवदत्त  ने  कहा --- " गुरुदेव  !  कमी  आपकी  शिक्षाओं  में  नहीं  थी   l   मेरे  पिता  राज्य  के  मंत्री  थे  ,  उनकी  प्रवृति  दूषित थी   l  गुरुकुल  से  लौटने  के  उपरांत   मैंने  प्राप्त  शिक्षाओं  के  अनुसरण  का  भरसक  प्रयत्न  किया  l  किन्तु  परिवार  में  व्याप्त  कलुषित  चिंतन  ने  मुझे  इस   पथ   पर  ला  पटका  l   आज  आपके  प्रेम  ने  मुझे  वे  सब  शिक्षाएं  याद  दिला  दीं  l मुझे  क्षमा  करें  गुरुवर  ! "
 महर्षि  बोले --- '  भूल  तो  अनुशय  से  होती  ही  हैं  , परन्तु सच्चा  गौरव  उनका  सही  प्रायश्चित करने  में  है  ,  उन  पर  ग्लानि करने  में  नहीं  l       यदि  तुम  क्षमा  चाहते  हो  तो  उन  निर्दोषों  के  घरों  को  पुन: नवजीवन  दो  ,  जो  तुमने  अज्ञानवश  नष्ट  किये  हैं  l  हर  उस  पीड़ित व्यक्ति  से  निकलते  क्षमा के  स्वर   तुम्हारे  जीवन  को  स्वत:  ही  सुगंध  से  भर  देंगे  l  l "
देवदत्त  को  महर्षि   का  कथन    समझ  में   आ  गया  था  l  यह  अधर्म  पर  धर्म  की विजय  थी  l  

19 January 2019

WISDOM ------ जो ईश्वर से भय खाता है उसे दूसरा भय नहीं सताता

 वैराग्य   शतक  में  भतृहरि  ने  लिखा  है ----- भोग  में  रोग  का  भय  है ,   सामाजिक  स्थिति ( सत्ता ) में  गिरने  का  भय  है,  धन  में  खोने  का , चोरी  होने  का  भय  है ,  मान - सम्मान  में  अपमान  होने  का  भय  है   सत्ता  में शत्रुओं  का  भय  है ,   सौन्दर्य  में  बुढ़ापे  का  भय  है   और  शरीर  में   मृत्यु  का  भय  है  l  इस  तरह  संसार  में  सब  कुछ  भय  से  युक्त  है   l  
  अध्यात्म्वेताओं  के  अनुसार    भय  के  मूल  में    वासना - कामना ,  तृष्णा  और  अहंता  होती  है   l  इन्ही  के  कारण  व्यक्ति   पापकर्म  करता  है , अनैतिक  जीवन  जीता  है  l  यही  कारण  है  कि  चोर , डाकू ,  व्यभिचारी, अत्याचारी ,   आतंकी,   भ्रष्टाचारी ,  अपराधी   कभी  चैन  से  निश्चिन्त  नहीं  बैठ   पाते  l  उन्हें  हमेशा  भय  रहता  है  कि  उनकी  करतूत  की  पोल  न  खुल   जाये  l 
  ईश्वर  की  शरण  और  सत्कर्मों  की  राह  समस्त    भय  के   समूल  नाश  का   राजमार्ग  है   l  

18 January 2019

WISDOM ----- सौभाग्य और दुर्भाग्य जीवन के दो पहलू हैं

 जब  जीवन  में  कुछ  अच्छा  घटने  वाला  होता  है   तो  उसका  पूर्व  संकेत  मिल  जाता  है   किन्तु  दुर्भाग्य   बिना  पूर्व  संकेत  के  अचानक  आ  जाता  है    क्योंकि  यह  बीते  कल  के  सभी  दुष्कर्मों  की  परिणति   है   जिसे  भोगना  है   l   ऐसा  सबके  साथ  होता  है  --- भगवान  राम  के  राज्याभिषेक  की   तैयारी   थी   किन्तु  दुर्भाग्य  कानोकान  खबर  दिए  बगैर  आया  और  राम  को  राज्याभिषेक  के  स्थान  पर  चौदह  वर्ष  का  वनवास  हो  गया  , l  यहाँ  भी  दुर्भाग्य  ने  पीछा  नहीं  छोड़ा  , रावण  ने  सीताजी  का  हरण  कर  लिया  l 
   इसी  तरह  महाभारत  में  पांडव  लगातार  संघर्ष  कर  रहे  थे  और  धर्म  के  मार्ग  पर  थे  l  युद्ध  में   वीरता  से  लड़  रहे  थे  l  स्वयं  भगवान  कृष्ण  उनके  साथ  थे   लेकिन  दुर्भाग्य  की  ऐसी   काली    छाया   पड़ी  कि  अर्जुन  का  पुत्र ,  भगवान  कृष्ण  का  भानजा  अभिमन्यु  चक्रव्यूह   में  फंसकर  अधर्मियों  के  हाथों  मारा  गया  l  युद्ध   समाप्ति  पर  था  और  द्रोपदी  के  पाँचों  पुत्रों  का  वध  हो  गया  l 
 दुर्भाग्य  का  आक्रमण  ऐसा  होता  है  कि पल  भर  में  सब  कुछ  बदल  जाता  है  l 
  ऋषियों  का  मत  है  कि  जो  प्रारब्ध  भोग  है ,  वह  तो  भोगना  ही  है   लेकिन  यदि  सुख - सौभाग्य  के  समय  सेवा , परोपकार  जैसे  श्रेष्ठ  कार्य  किये  जाएँ  तो  दुःख  की  चुभन  कम  हो  जाती  है   l 
 इसलिए  सुख  के  समय  हमें  जागरूक  रहना  चाहिए   कभी  किसी  का  दिल  न  दुखाए,  किसी  को  शारीरिक  मानसिक  कष्ट  न  दे  ,  ईमानदारी  से  कर्तव्यपालन  करे  ,  यही  तपस्या  है  l  

17 January 2019

WISDOM ---- सत्कर्मों से अपने लिए सुन्दर दुनिया बना सकते हैं

  इस  स्रष्टि  में  सबसे  महत्वपूर्ण  मनुष्य  के  कर्म  हैं  l किये  गए  कर्मों  के  आधार  पर  ही   वह  अपनी  गति  प्राप्त  करता  है  l  यह  मनुष्य  की  अदूरदर्शिता   है  कि  वह  क्षणिक  लाभ के  लिए  वर्तमान  में बुरे  कर्म  करने  के  लिए  तैयार  हो  जाता  है  l  कर्मों  का फल  तुरंत  नहीं  मिलता  है    इसलिए  मनुष्य  को  भी  अपने  किये  गए  कर्मों  का  कोई  एहसास  नहीं  होता  l  उसे लगता  है  कि  इतने  सारे  लोग  गलत  कार्य  कर  रहे  हैं   और  जीवन  में  सुख - भोग  कर  रहे  हैं  ,  सफल  हैं    तो  वह  भी  क्यों  न  करे   ? 
  कर्म  की  गति  बड़ी  गहन  है  l  इसे  समझने   के  लिए  हमें  इतिहास  से  ,   समाज  से   उदाहरण  देखना  चाहिए   l  व्यक्ति  के  सम्पूर्ण  जीवन  को  देखना  चाहिए ,  थोड़े  से  जीवन  को  नहीं  l  समाज  के  अच्छे   और  बुरे    व्यक्तियों  के   सम्पूर्ण  जीवन  का  गहराई  से  अध्ययन  कर  के  ही    प्रकृति  की    कर्मफल   व्यवस्था  समझ  आएगी   l  व्यक्ति  का विवेक  जाग  जायेगा  तब  वह  गलत  कर्म  करने  से  डरेगा   l 
     कर्म  के  दर्शन  को  समझाने वाली  एक  कथा   है  ------   एक  बार  एक  राजा ने  अपने  मंत्री  से  कहा --- " मुझे इन  चार  प्रश्नों  के  जवाब  दो  --- 1. जो  यहाँ  है , वहां  नहीं  l  2.  वहां  हो ,  यहाँ  नहीं
3. जो  यहाँ  भी  नहीं  हो , वहां  भी  न  हो  l  4.  जो  यहाँ  भी  हो  और  वहां  भी  हो  l  "
  मंत्री ने  उत्तर देने  के  लिए  दो  दिन  का  समय  माँगा  l  दो  दिन  बाद  चार  व्यक्तियों  को  लेकर  वह  दरबार  में  उपस्थित  हुआ   और  बोला  --- "  राजन  !  हमारे  धर्मग्रंथों  में   अच्छे  और  बुरे  कर्मों   के  अनुसार  स्वर्ग  और  नरक  की  अवधारणा  प्रस्तुत  की  गई  है  ----
1.  यह  पहला व्यक्ति  भ्रष्टाचारी  है  l  यह  गलत  काम  कर  के  यद्दपि  यहाँ  सुखी  व  संपन्न  है   किन्तु  इसकी  जगह  वहां  स्वर्ग  में  नहीं  है  l
2.  दूसरा  व्यक्ति  सद्गृहस्थ  है  l  यह  यहाँ  ईमानदारी  से  रहते  हुए  कष्ट    में   जरुर  है  ,  पर  इसकी  जगह  वहां  जरुर  होगी  l 
3.  तीसरा  व्यक्ति  भिखारी  है  ,  यह  पराश्रित  है   l यह  न  तो  यहाँ  सुखी  है  , न  वहां  सुखी  रहेगा  l
4.  यह  चौथा  व्यक्ति  एक  दानवीर  सेठ  है   जो  अपने  धन  का  सदुपयोग  करते  हुए  भलाई  भी  कर  रहा  है   और  सुखी - संपन्न  भी  है  l  अपने  उदार  व्यवहार  के  कारण  यहाँ  भी  सुखी  है   और   सत्कर्म  करने  से इसका  स्थान  स्वर्ग  में  भी  सुरक्षित  है   l
  मनुष्य  कर्म  करने  के  लिए  स्वतंत्र  है   लेकिन  उन  कर्मों  का  फल  कब  मिलेगा  , यह  काल  ( समय )  निश्चित  करता  है  l  

16 January 2019

WISDOM ------- ईश्वर सत्य है

  मनुष्य  जैसे - जैसे  बड़ा  होता  है  ,  ज्ञान  प्राप्त करता  है  तो  तर्क - कुतर्क  करता  है  l  बच्चों  में  छल - कपट  नहीं  होता   l   जो  सत्य  है  , वही  कहते  हैं  l  एक  कथा  है -----
  एक   बहुत  विद्वान्  व्यक्ति  था  ,  उसने  सभी  धर्म  व  दर्शन  के  ग्रन्थ  पढ़े  थे   l  लेकिन  वह  नास्तिक  था  ,  अपने  तर्कों  से  ईश्वर  के  अस्तित्व  को  नकार  देता  था  l  उससे  कोई  जीत  नहीं  पाता  था  l   उसने  बड़े - बड़े  अक्षरों  में  अपने  घर  की   दीवार  पर लिख  रखा  था --- ' गॉड  इज  नो  व्हेयर ' l    अर्थात  ईश्वर  कहीं  नहीं  है   l     लोगों  को  ऐसा  बताकर  उसे  बड़ी  प्रसन्नता  होती थी  l
 कुछ  समय  बाद  उसका  विवाह  हुआ   l  उसके  एक  पुत्र  हुआ  l  वह  बालक  बहुत  भोला   व  मासूम  था  l  जब  उसने  पढ़ना सीखा    तो  दीवार  पर  लिखे इतने  बड़े वाक्य  ' गॉड  इज  नो  व्हेयर '  को  पढ़ना  उसके  लिए कठिन  था  l  वह  बच्चा  ' गॉड  इज '  तो  आसानी  से  पढ़  लेता  था ,  लेकिन   ' नो  व्हेयर ' पढ़ने  में  अटक  जाता  था  l  उसके  लिए  यह  बड़ा  शब्द  था  ,  एक  साथ  उसका  उच्चारण  कठिन  था   l  इसलिए बच्चे  ने  उस  शब्द  को  दो  भागों  में  तोड़  दिया  --- 'नाउ - हियर '   l  अब  वह  बच्चा  उस वाक्य  को  ऐसे  पढ़ता  था ---- ' गॉड  इज  नाउ  हियर  '  l      वह   बच्चा  दिन - भर ,  जब - तब   बोलता  रहता --- ' गॉड  इज  नाउ  हियर '  ---  गॉड  इज -----  --- ' l   ईश्वर  अब  यहीं  है  '  l 
  बच्चे  के  पास  कोई  तर्क  नहीं  था ,  कोई  बहस  नहीं ,  वह  तो  अपनी   तोतली  भाषा  में   बोलता  था   l
  बच्चे  के  मुँह  से  सुनते - सुनते   कि  ' गॉड  इज  नाउ  हियर '   ,   पिता  का  भी  विवेक  जाग  गया  l  अब  उसके  पास  कोई  तर्क  नहीं  था ,  कोई  विवाद  भी  नहीं   l   उसके  पास अनुभूति  थी  l   ईश्वर  को हम  इन  आँखों  से  देख  नहीं  सकते  ,  केवल  अनुभव कर  सकते  है  ,  उनकी  कृपा  से  आनंदित  हो  सकते  हैं  l  

15 January 2019

WISDOM ---- आशावादी सोच हो , सकारात्मकता अपनाई जाये तो फिर हमें कोई भी निराश नहीं कर सकता

  विश्वकवि  रवीन्द्रनाथ  टैगोर  की  बढ़ती  हुई  प्रतिभा  व  लोकप्रियता  से  लोग  ईर्ष्या  करने  लगे  l उन्होंने  गुरुदेव  की  छवि  को  धूमिल  करने  के  लिए   विभिन्न  पत्र - पत्रिकाओं  के  माध्यम  से   अपने  कलुषित  प्रयास  आरम्भ  कर  दिए   l  परन्तु   वे  समभाव    से  सब  सहन  करते  रहे  तथा  तनिक  भी  विचलित  नही  हुए   l  श्री  शरतचंद्र  को  जब  यह  आलोचना  सहन  नहीं  हुईं  तो  उन्होंने  गुरुदेव  से  कहा  कि  वे  इन  आलोचकों  को  रोकने  का  कुछ  प्रयास  करें  l  गुरुदेव  रवीन्द्रनाथ  टैगोर  ने  उन्हें  शांत  भाव  से  समझाया  ,  प्रयास  क्या  करूँ  ?  मैं उन  जैसा  नहीं  बन  सकता  व  उन्होंने   जो  मार्ग  अपनाया  है  ,  वह  भी मैं  नहीं  अपना  सकता   l 
  महाकवि  रवीन्द्रनाथ  ने  अपनी  रचनाओं   द्वारा   संसार  में  भारतीय  संस्कृति  का  मान  बढ़ाया  l  उन्होंने  विश्व  भ्रमण  किया  l  वे  जहाँ   भी   गए  उन्हें  बहुत  सम्मान  मिला  l   नोबेल  पुरस्कार  और  विश्व भ्रमण   आदि  से  उन्हें  जितना  भी  धन  मिला  उसे    शान्ति  निकेतन  की  स्थापना  में  लगाया  l

14 January 2019

WISDOM ---- ----- विभूति योग ---- श्रीमद्भगवद्गीता

ईश्वर  ने  मनुष्यों  को   अनेक  विभूति  सौंपी  है ,  आवश्यकता  है  उनको  विकसित  करने  की   l
  स्त्रियों  में  भगवान  की  सर्वाधिक  विभूतियाँ  हैं  ,  इन  विभूतियों  के  विकसित  होने  पर  ही  दुनिया  में  संतुलन  व  सौन्दर्य  प्रकट  होगा  l ----
  भगवान  कहते  हैं ----- स्त्रियों  में  मैं  कीर्ति  हूँ   l  कीर्ति  का  मतलब  ऐसी   नारी ,  जिसके  व्यक्तित्व  से  वासना  की  झंकार  नहीं  निकलती  l  ऐसा  होने  पर  उसे  एक  अनूठा  सौन्दर्य  उपलब्ध  होता  है   और  वही   सौन्दर्य  उसका  यश  है , उसकी    कीर्ति  है   l
  इसके  बाद   भगवान  कहते  हैं ---- स्त्रियों  की  श्री  मैं  ही  हूँ   l   श्री   स्त्री  का  आत्मिक  सौन्दर्य  है  ,  उसकी  दिव्यता  की  अभिव्यक्ति   l    श्री  का  सौन्दर्य  अलौकिक  है ,  अपार्थिव  है   l 
   इसके  बाद  स्त्रियों  के  एक   अन्य   गुण   ' वाक् '  को  भगवन  अपना  स्वरुप  बताते   हैं  l   जब  स्त्री  अपने  अस्तित्व  में परम  मौन  को  उपलब्ध  होती  है  तब  उसकी वाणी  ' वाक् ' बनती  है  , जिससे  मन्त्र  प्रकट  होते  हैं   l  यह  मौन  की   गरिमा  है   l
  वाक्  के  बाद   स्त्री  के  एक  अन्य  गुण  को  भगवन  अपना  स्वरुप  कहते  हैं   ,  वह  गुण  है ---- स्मृति   l
 स्त्री  के  लिए  स्मृति  उसकी  बुद्धि  का  हिस्सा  नहीं  है  ,  बल्कि  अस्तित्व  की सम्पूर्णता  है   l 
  इसके बाद  ' मेधा  '  को  भगवन   अपनी  विभूति  बताते   हैं   l  मेधा  के  बल  पर  ही   संवेदना  और  सृजन  को  स्त्री  धारण  करती  है   l 
  इसके  पश्चात्   धृति  को  भगवन  अपना  स्वरुप  बताते  हैं  l  धृति  का  अर्थ  है --- धीरज , धैर्य , स्थिरता  l  स्त्री  का  धैर्य ,  उसकी  सहने  की  क्षमता  अनंत  है  ,  इसलिए  प्रकृति  ने  उसे  माँ  का  गौरव  दिया  है  l 
  इसके  पश्चात्  स्त्री  का  अगला  गुण  है -- क्षमा ,  जिसे  भगवन  अपनी  विभूति  कहते  हैं   l  स्त्री  में  जितना  प्रेम  है ,  उतनी  ही  क्षमा  है   l 
  ये  सब  विभूतियाँ  जब  तक  विकसित  नहीं  होती  ,  तब  तक  दुनिया  असंतुलित  रहेगी   l