महाराणा प्रताप का स्वातंत्र्य प्रेम का उच्च आदर्श भारतीय इतिहास की अनमोल थाती है l कवि बाँकीदास ने उनके लिए लिखा है जिसका भावार्थ है ---- ' अकबर रूपी घोर अंधकार भरी रात्रि में सब भारतीय सो गए हैं किन्तु इस संसार के रचने वाले ईश्वर के महानतम अंश को स्वयं में जगाये हुए राणा प्रताप प्रहरी बने जागकर राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं l ' पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ------ 'आज जब सारा संसार अनैतिकता के अंधकार में डूबा हुआ है , तब इस अनैतिकता को मिटाने की शक्ति भर प्रयास करने वाले थोड़े से नैतिक लोगों के लिए उनका यह साहस एक सम्बल है l ' महाराणा प्रताप के एक - एक कर के सभी किले मुगलों के अधिकार में चले गए l उन्हें वर्षों तक बीहड़ वनों में अपने परिवार और मुट्ठी भर साथियों के साथ घोर अभाव और कष्टों भरा जीवन व्यतीत करना पड़ा l उनकी प्रतिज्ञा थी कि उनका मस्तक केवल ईश्वर के सामने झुक सकता है l इस प्रतिज्ञा में उनका अहम् नहीं था , वरन उनकी ईश्वर निष्ठां , संस्कृति निष्ठा और राष्ट्र निष्ठा बोल रही थी l वे अपने देश की स्वतंत्रता को व्यक्तिगत सुखों के लिए बेचने को तैयार नहीं हुए l महाराणा प्रताप की नैतिक विजय का लोहा उन हिन्दू राजाओं ने भी माना जिन्होंने स्वार्थ और सुख के लिए अपनी स्वतंत्रता व अपने राष्ट्रीय गौरव को बेच दिया था l स्वयं अकबर ने भी माना कि कोई व्यक्ति बिना राज्य और बिना किसी सम्पदा के भी महान हो सकता है l
13 June 2021
12 June 2021
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ------ कोई भी परिवर्तन चाहे बड़ा हो या छोटा विचारों के रूप में ही जन्म लेता है l मनुष्यों और समाज की विचारणा तथा धारणा में जब तक परिवर्तन नहीं आता तब तक सामाजिक परिवर्तन भी असंभव है l और कहना यही होगा कि विचारों के बीज साहित्य के हल से ही बोये जा सकते हैं l ' चीन में लू -शुन महान विचारक और सांस्कृतिक क्रांति के महान सेनापति थे l उन दिनों यद्द्पि चीन में स्वदेशी शासन था परन्तु सामंतों और जागीरदारों का बड़ा प्रभुत्व था और उनके विरुद्ध आवाज उठाने का मतलब था घुट - घुट कर मर जाना l उन परिस्थितियों का चित्रण करते हुए लू - शुन ने एक मार्मिक कहानी लिखी ----- ' भूतकाल का पश्चाताप l ' इस कहानी का नायक शिक्षित भी है और लेखक भी है l बदलती परिस्थितियों में वह मितव्ययता से अपना गुजरा चलाने का प्रयत्न करता है परन्तु परिस्थितियों से तालमेल नहीं बैठता है l इस कहानी में उसे कोई काम नहीं मिलता l वह सोचता है कि जब मेरे पास आजीविका का कोई साधन नहीं है तो मैं अपनी पत्नी से प्रेम भी कैसे कर सकता हूँ और वह अपनी पत्नी को कहीं और भेज देता है -- जहाँ वह मर जाती है l पत्नी के देहांत का समाचार पाकर नायक अवाक रह जाता है l अब नायक के विचार बदलते हैं और उसके साथ उसकी जीवन -दशा भी बदलती है l इन निर्णायक क्षणों में वह कहता है --- निस्संदेह इन परिस्थितियों से समझौता करने के लिए मुझे अपने हृदय को घायल करना पड़ेगा और जीने के लिए घायल हृदय में सत्य को छिपाना ही पड़ेगा l जीने का एक यही रास्ता है कि अपने जीवन दर्शन को भुलाकर असत्य को ही अपना मार्गदर्शक बनाना पड़ेगा l इस कहानी में तीव्र व्यंग्य किया गया था , इससे जो लोग इसका निशाना बने वे तिलमिला गए l
WISDOM -----
पारसियों के इतिहास में नौशेरवाँ एक बहुत प्रसिद्ध और न्यायशील बादशाह हुआ l एक बार रोम के बादशाह का राजदूत नौशेरवाँ की राजधानी में आया l वह महल की एक खिड़की के पास खड़ा होकर नीचे सुन्दर उपवन को देख रहा था l उसकी दृष्टि वहां कोने में बनी हुई गन्दी झोंपड़ी पर गई l उसे बड़ा आश्चर्य हुआ l उसने पास खड़े एक पारसी सरदार से इसका कारण पूछा l उस सरदार ने बताया कि जिस समय नौशेरवाँ इस महल को बनवाने लगा तो सब जमीन तो ठीक हो गई पर एक कोने में गरीब बुढ़िया की झोंपड़ी आ गई l जब राज्य कर्मचारियों के कहने से बुढ़िया ने झोंपड़ी खाली नहीं की तो स्वयं नौशेरवाँ ने जाकर उससे कहा कि बगीचे बनने के लिए इस स्थान की आवश्यकता है , तू इसकी जितनी कीमत चाहे लेकर इसे बेच दे l पर जब वह बुढ़िया राजी नहीं हुई तो उससे कहा गया कि इस झोंपड़ी के बजाय यहाँ एक सुन्दर मकान बना दिया जाये l इस पर बुढ़िया ने कहा कि यह झोंपड़ी मेरे परिवार वालों के स्मृति चिन्ह की तरह है , मैं किसी प्रकार इसका नष्ट किया जाना सहन नहीं कर सकती l तब नौशेरवाँ ने कहा कि चाहे मेरा महल अधूरा रह जाये , मैं जबर्दस्ती किसी की चीज पर कब्जा नहीं करूँगा l इसलिए इस झोंपड़ी को ज्यों का त्यों रहने दिया l रोम का राजदूत यह सुनकर बड़ा प्रभावित हुआ और कहने लगा कि तब तो इस झोंपड़ी के रहने से महल की सुंदरता घटने के बजाय बढ़ गई l महल तो कुछ वर्षों में पुराना और खंडहर हो जायेगा , पर यह बुढ़िया की झोंपड़ी की कथा तो सदैव लोगों को सत्य और न्याय पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी l
11 June 2021
WISDOM --------
' अहंकार सारी अच्छाइयों के द्वार बंद कर देता है l ' संसार में जितने भी उत्पात हुए , उन सब के मूल में 'अहंकार ' ही है l इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि अहंकारी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है और जब ऐसे ही विचार के , स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले लोगों का एक बड़ा और मजबूत संगठन तैयार हो जाता है तो उस संगठित अहंकार के पास अनेक दोष स्वयं खिंचे चले आते हैं l संसार में जितने भी बड़े - बड़े नरसंहार हुए , युद्ध हुए , दंगे , उत्पीड़न इन सबके मूल में एक ही बात है कि एक पक्ष ने स्वयं को श्रेष्ठ और धरती का मूल्यवान प्राणी समझा और दूसरे पक्ष को हीन मानकर धरती से मिटा देना चाहा l युग के अनुरूप साधन बदलते गए लेकिन मानसिकता आज भी वही है l संसार में शांति तभी होगी जब मनुष्य इस सत्य को समझेगा कि इस धरती पर जीने का हक सबको है l हम सब एक माला के मोती हैं l ' इस सत्य को भूलकर जब मनुष्य स्वयं को ' विधाता ' समझने लगता है तब हाहाकार मचना स्वाभाविक है l
10 June 2021
WISDOM ---------
आज संसार में सबसे बड़ी समस्या है ------ ' प्राथमिकता के चुनाव की l ' संसार में भिन्न - भिन्न विचारधारा के , विभिन्न व्यवसाय के --------- प्राणी हैं l प्रत्येक व्यक्ति की प्राथमिकता उसके विचार , उसकी मानसिक प्रवृत्ति के अनुसार होती है l एक सामान्य व्यक्ति की प्राथमिकता क्या है उसका परिणाम केवल उस पर और उसके परिवार पर होता है जैसे --यदि एक व्यक्ति अपनी सीमित आय का अधिकांश भाग नशा , सिगरेट , गुटका आदि पर खर्च कर देता है तो उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाएगी , कलह होगी , बच्चों का भविष्य भी बिगड़ेगा l लेकिन ऐसे व्यक्ति जिनके कार्य और उनकी प्राथमिकताओं के चयन सम्पूर्ण समाज , राष्ट्र और संसार को प्रभावित करते हैं , उन पर यदि स्वार्थ और महत्वाकांक्षा हावी है तो उसका नकारात्मक परिणाम होगा l --- महाभारत में एक कथा है --- महाराज ययाति वृद्ध हो गए लेकिन उनकी भोग - विलास की इच्छाएं तृप्त नहीं हुईं , यमराज उन्हें लेने आए तो वे बहुत रोए , गिड़गिड़ाए l यमराज ने कहा --- यदि तुम्हारा कोई पुत्र तुम्हे अपनी जवानी दे दे तो तुम पुन: सुख - भोग पा सकोगे l उनके चार पुत्रों ने मना कर दिया लेकिन पांचवें पुत्र को दया आ गई उसने अपनी जवानी उन्हें दे दी l ऐसा दस बार हुआ और उन्होंने हजार वर्षों तक भोग -विलास का जीवन जिया l ययाति की प्राथमिकता थी कि वे स्वयं भोग - विलास का जीवन जिएं , अपने पुत्रों के जीवन की कीमत पर l यह द्वापर युग की बात थी लेकिन जब संसार में कलियुग में प्रवेश किया तो राजा परीक्षित ने कलियुग को रहने के जो स्थान बताए उनमे एक स्थान ' स्वर्ण ' अर्थात धन- दौलत , वैभव l यही कारण है कि जिसके पास जितना अधिक है , उसे उतना ही अधिक लालच है और उसके इस लोभ - लालच का परिणाम समाज को भुगतना पड़ता है l एक कथा है ---- एक राजा था , वह प्रजा के हित का बहुत ध्यान रखता था l उसने अपने विशाल राज्य में अनेक पाठशाला , धर्मशाला , चिकित्सालय , पशुओं के लिए चरागाह आदि व्यवस्थाएं की l इन सबकी जानकारी के लिए वह वेश बदलकर भ्रमण करता था l एक बार वह अपने कुछ अधिकारियों और राज्य के प्रमुख श्रेष्ठियों के साथ अपने राज्य के दूरस्थ क्षेत्र में गया l वहां देखा कि सब जगह रौनक थी , जहाँ अस्पताल था वहां हरियाली थी , शांति थी , पक्षी चहक रहे थे , पानी का सुन्दर दृश्य था l माली से पूछा -- यहाँ के सब मरीज कहाँ गए l ' माली ने कहा --- इस क्षेत्र में तो सब स्वस्थ हैं , व्यर्थ में यहाँ क्यों आएंगे ? वेश बदले हुए राजा ने पूछा ---- इतने स्वस्थ सब कैसे हैं ? ' माली वृद्ध था उसने समझाया ----- यहाँ सब लोग प्राकृतिक जीवन जीते हैं , नशे से दूर रहकर नियम , संयम से रहते हैं और सबसे बढ़कर नैतिकता के नियमों का पालन करते हैं इस कारण हर तरह की तकलीफों से मुक्त रहते हैं l यह सब सुन राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई कि उसके विशाल राज्य में एक क्षेत्र इतना आदर्श है l उसने अपने साथ के अधिकारियों व श्रेष्ठियों से कहा ---इस गांव का उदाहरण देकर अन्य गांवों को भी प्रेरित करेंगे l लेकिन यह सुनकर उन श्रेष्ठियों का माथा ठनक गया कि जब कोई बीमार नहीं पड़ेगा तो उनका व्यापार कैसे बढ़ेगा , दवाई कैसे बिकेगी , धन के बल पर शासन पर और राज्य में दूर -दूर तक जो प्रभुत्व है उसका क्या होगा ? कलियुग ने उनकी बुद्धि को दुर्बुद्धि में बदल दिया , अपने अनेक अपराधी मनोवृत्ति के लोगों को भेजकर वहां के लोगों में नशे आदि की आदत डलवा दी l नैतिकता के नियम नहीं रहे l हमारे आचार्य और ऋषियों ने लिखा है -- मनुष्य का पतन ऐसे होता है जैसे गेंद टप्पे खा , खाकर गिरती है l यही हाल उस क्षेत्र का हुआ , बहती दरिया में हर कोई हाथ धोता है l जब प्राथमिकता में लालच हो , संवेदनहीनता हो तो परिणाम दुखदायी होते हैं l
9 June 2021
WISDOM -----
स्वार्थ , लालच और अति महत्वाकांक्षा व्यक्ति को देशद्रोही बना देती है l ----- ऐतिहासिक घटना है ---- घटना उस समय की है जब भारतवर्ष अनेकों छोटे - छोटे राज्यों में विभक्त था l हिन्दू राजाओं की परस्पर फूट से लाभ उठाकर समय - समय पर विदेशियों ने भारत पर आक्रमण किए और यहाँ की अपार धनराशि को लूटकर अपने खजाने को भरा , यहाँ की संस्कृति , सभ्यता को कुचलकर नष्ट किया l चौदहवीं शताब्दी की बात है l देवगिरि नामक एक छोटे से राज्य में क्षत्रिय वंश का राजा रामदेव राज्य करता था l उसके समय में अलाउद्दीन ने देवगिरि के राजा रामदेव को सन्देश भेजा कि वह उसकी आधीनता को स्वीकार कर ले l राजा ने संदेशवाहक से कहलवा भेजा कि भारत के क्षत्रिय पराधीन होने के बदले युद्ध में ख़ुशी - खुशी मर जाना पसंद करते हैं l ऐसा उत्तर पाकर अलाउद्दीन ने अपनी विशाल सेना के साथ देवगिरि पर आक्रमण कर दिया किन्तु मुट्ठी भर राजपूतों के शौर्य और प्रचंड पराक्रम के सम्मुख अलाउद्दीन अधिक देर तक टिक नहीं सका और उसे हार कर वापस लौटना पड़ा l अलाउद्दीन को इस बात का बहुत दुःख था , उसने कूटनीति से काम लिया , उसने सोचा ये हिन्दू परस्पर ईर्ष्या -द्वेष रखते हैं और अपने स्वार्थ के लिए एक दूसरे का अहित करने से नहीं चूकते l हिन्दुओं की इसी फूट का फायदा उठाने के लिए उसने राजा रामदेव की सेना के एक बड़े अधिकारी कृष्णराव को लालच दिया कि यदि वह उसे देवगिरि के किले के सारे भेद बता देगा तो जीते जाने पर अलाउद्दीन उसे वहां का राजा बना देगा l कृष्णराव बहुत लोभी और स्वार्थी था , उसका विवाह वीरवती से तय हुआ था जो राजा रामदेव की सेना में एक सिपाही के रूप में काम करती थी l इसके पिता एक मराठा सरदार थे l युद्ध में मृत्यु हो जाने पर अनाथ बालिका वीरवती का पालन राजा ने ही अपनी पुत्री के समान किया था l वीरवती को इस बात का ज्ञान हो गया था था कि कृष्णराव देशद्रोही है l देवगिरि में जब विजय उत्सव चल रहा था उसी समय अलाउद्दीन के आक्रमण का समाचार मिला l राजा समझ गया कि उसकी तरफ के किसी व्यक्ति ने ही गुप्त भेद बताकर अलाउद्दीन को आक्रमण करने की प्रेरणा दी है l तभी राजा और सैनिकों ने देखा कि सेना का प्रमुख अफसर युद्ध नहीं कर रहा है वरन सैनिकों को गलत निर्देशन कर रहा है l वे कुछ पूछते जब तक वीरवती शत्रु पक्ष को काटती हुई वहां आ पहुंची , उसकी आँखों में खून उतर आया , उसने अपनी कृपाण कृष्णराव की छाती में भोंक दी और गरजकर बोली --यह देशद्रोही है इसकी यही गति होनी चाहिए l कृष्णराव घायल अवस्था में था बोला ---- मैं देशद्रोही हूँ लेकिन तुम्हारा -------- वीरवती ने कहा ----- एक देशद्रोही को मारकर मैंने अपने देश के प्रति अपना कर्तव्यपालन किया है l
8 June 2021
WISDOM ----- शिवजी कहाँ से देते हैं
एक प्रेरणाप्रद दृष्टांत है ----- एक ब्राह्मण थे , शिवजी के अनन्य भक्त , साथ ही निर्धनता की साक्षात् मूर्ति l सुबह चार बजे से शिवजी की पूजा आदि सब करते , उनकी पत्नी कूटना - पीसना कर घर का प्रबंध करती l सावन का महीना था l पंडित जी एक सहस्त्र एक बेलपत्र पर राम नाम लिखकर प्रतिदिन अत्यंत भक्ति पूर्वक शिवजी पर चढ़ाते थे l इस प्रकार उन्तीस दिन बीत गए l तीसवें दिन पंडित जी पूजा -पाठ में तल्लीन थे , संयोगवश उधर से शिव - पार्वती निकले l पार्वती जी को उस ब्राह्मण पर बहुत दया आई , उन्होंने शिवजी से कहा ---- " भगवान ! यह ब्राह्मण बहुत दिनों से आपकी भक्ति - पूजा कर रहा है और यह बहुत निर्धन है , इस पर कृपा करें l शिवजी ने कहा --- 'तुम ठीक कहती हो देवी ! इसने इस प्रकार जो मेरी सेवा की है , उसका पारिश्रमिक इसे आज सांयकाल तक मिल जायेगा l ठीक उसी समय एक सेठ लोभीमल वहां से निकला , उसने यह वार्तालाप सुना तो उसे बहुत लालच आ गया l वह सोचने लगा कि भगवान सहस्त्रों में देंगे तो क्यों न अवसर का लाभ उठाया जाये l लोभिमाल उस ब्राह्मण के घर पहुंचा और कहा ---- " आप अत्यंत निर्धन हैं l आपने सावन के महीने भर जो शिवजी की पूजा की है उसका पुण्य मुझे दे दो और बदले में ये सौ रूपये ले लो l निर्धनता के कारण ब्राह्मण व उसकी पत्नी राजी हो गए कि सौ रूपये से कुछ दिन तो काम चलेगा l श्रावण की पूर्णिमा थी लोभीमल बहुत प्रसन्न था , वह मंदिर में बैठ गया , उसे उम्मीद थी कि शिवजी असंख्य धन देंगे l आखिर रात के ग्यारह बज गए , उसके धैर्य ने जवाब दे दिया उसने क्रोध में अपने दोनों हाथ शिवजी की मूर्ति पर पटक दिए और बोला ---- " अरे ! अब तू भी झूठ बोलने लगा ! " उसके दोनों हाथ मूर्ति से चिपक गए l उसने छुड़ाने का बहुत परिश्रम किया किन्तु वह और मजबूती से चिपक गए , वह थक गया तो उसे नींद आ गई l स्वप्न में उसने देखा शंकर जी त्रिशूल लिए खड़े हैं , उसने भगवान से कहा --- भगवान , कृपा कर मेरे हाथ छुड़वाये l ' शिवजी ने कहा ---- ' सुबह तू मेरे ब्राह्मण भक्त को पचास हजार दे तो ये हाथ छूट जायेंगे अन्यथा ऐसे ही चिपके रहेंगे l " सुबह हुई वह ब्राह्मण पूजा के लिए मंदिर आया तो देखा कि लोभिमाल मूर्ति से चिपका है l उसने अपनी सारी व्यथा - कथा सुनाई और कहा --- 'मेरे पुत्र को कहलवाओ कि पचास हजार यहाँ ले आए l वह रुपया शंकर जी ने आपको दिलवाया है l ' इस प्रकार उस शिव भक्त को पचास हजार रूपये मिले तब लोभीमल का हाथ छूटा l ब्राह्मण की निर्धनता दूर हुई और शेष धन उसने और गरीबों व अपाहिजों में बाँट दिया l एक दिन पारवती जी ने शिवजी से पूछा --- ' भगवन ! आपने उस ब्राह्मण को कुछ दिया नहीं ? ' शंकर जी बोले ---- ' क्यों ? दिए तो पचास हजार रूपये l ' पारवती जी ने कहा --- ' वह तो लोभीमल ने दिए , आपने क्या दिया ? ' शिवजी बोले ---- " इसी प्रकार से तो मैं देता हूँ , अन्यथा मेरे पास भांग , धतूरा और नंदी बैल के सिवा और है ही क्या l "