हमारे महाकाव्य संसार को जीवन जीने की कला सिखाते हैं l उनके विभिन्न प्रसंग वर्तमान की विभिन्न समस्याओं और उनके समाधान को बताते हैं l रामायण में यदि हम सुग्रीव का प्रसंग देखें तो उस पर सबसे ज्यादा अत्याचार उसके भाई बाली ने ही किया , किसी अन्य जाति या धर्म के व्यक्ति ने नहीं किया l यही इस युग का सच है l धर्म , जाति के नाम पर दंगे , हत्या , उत्पीड़न की घटनाएँ तो बहुत हैं लेकिन इसमें सहभागिता करने वाले और इन्हें देखने - सुनने वाले यदि ईमानदारी से अपने - अपने परिवार की ओर देखें तो एक कटु सत्य समझ में आएगा कि धन -सम्पति के नाम पर भाई - भाई में झगड़े -विवाद , घरेलु हिंसा , पुत्र - पुत्री में भेद , बच्चों का शोषण , नारी उत्पीड़न ये सब परिवार के ही लोग करते हैं और बुद्धि भ्रष्ट हो जाने पर अपनों को सताने के लिए गैरों की मदद लेते हैं l दंगे - फसाद की आड़ में अपनों से ही बदला लेते हैं l धर्म के नाम पर झगड़ने से पहले इस सत्य को समझना चाहिए कि ' हम अपनों के सताए हुए हैं l ' अनीति और अत्याचार कुछ समय तक फलते - फूलते देखे जा सकते हैं लेकिन जीत अंत में सत्य की होती है l बाली ने अपने भाई सुग्रीव पर अत्याचार किया , अनीति की l सुग्रीव को पर्वत पर जाकर रहना पड़ा , अंत में भगवान के हाथों बाली का वध हुआ और सुग्रीव का राज्याभिषेक l रावण ने विभीषण को लात मारी तो रावण का अंत हुआ और विभीषण का राज्याभिषेक l ये सब कथानक हमें शिक्षा देते हैं कि मानव जीवन अनमोल है , कर्मफल से कोई भी नहीं बचा है इसलिए अहंकार के वशीभूत होकर अपनी शक्ति और बुद्धि का दुरूपयोग नहीं करना चाहिए
4 May 2022
3 May 2022
WISDOM -----
कहते हैं जो कुछ महाभारत में है , वही इस धरती पर है l दुर्योधन का चरित्र इस सत्य को उजागर करता है कि जीवन भर धोखा , छल -कपट , और षड्यंत्र करने का दुष्परिणाम क्या होता है l दुर्योधन के हठ और अहंकार के कारण कितने ही राजा - महाराजा , सैनिक आदि मारे गए l इन सब की मृत्यु को देखना उसके लिए बहुत सरल था लेकिन जब उसके सामने मृत्यु आई तो वीर और शक्तिशाली होते हुए भी काँप गया , उसमे जीवन की चाह पैदा हो गई और अपनी मृत्यु से बचने के लिए हस्तिनापुर का युवराज वस्त्रहीन हो गया l अपना जीवन , जीवन है और दूसरे के जीवन की कोई कीमत नहीं ! यह सत्य आज भी देखा जा सकता है l यह कथानक इस सत्य को भी बताता है कि धोखा और षड्यंत्र रचने वाले अपनी योजना को कितना ही गुप्त रख लें , उन पर ईश्वर की कृपा नहीं होती है इसलिए कोई न कोई कमी रह जाती है ताकि सच दुनिया के सामने आ सके l दुर्योधन का भी पूरा शरीर वज्र का नहीं हो सका , उसमे कमी रह गई थी l इस कमी के कारण ही उसके साथ पूरे कौरव वंश का अंत हुआ और ' महाभारत ' महाकाव्य के माध्यम से यह सत्य दुनिया के सामने आया l
2 May 2022
WISDOM ------
श्रीमद् भगवद्गीता में अर्जुन ने भगवान से पूछा ---- मैं किस -किस भाव में आपको खोजूं ? कैसे देखूं ? तो भगवान कहते हैं --- उनके लिए कोई निकृष्ट - श्रेष्ठ नहीं , कोई छोटा - बड़ा नहीं l वह तो सभी में हैं , हर स्थान पर हैं l ' लेकिन भगवान को पहचाने कैसे ? भगवान कहते हैं -- जहाँ कोई व्यक्तित्व पूरी खिलावट में है वही ईश्वर है l ' आचार्य श्री लिखते हैं -- मान लो कहीं पर एक बीज पड़ा है , और वहीँ पास में एक फूल पड़ा है तो बीज को देखना कठिन है लेकिन फूल को पहचानना आसान है क्योंकि वहां पर व्यक्तित्व खिला हुआ है , सम्पूर्ण विकसित है l महाभारत की कथा है --- जब युद्ध में सभी योद्धा मारे गए तब अंत में दुर्योधन और भीम में द्वंद युद्ध होना था l दुर्योधन अपनी माँ गांधारी के तपोबल को जानता था l पतिव्रत धर्म से उन्होंने जो बल अर्जित किया था , उसका एक अंश वह चाहता था l गांधारी ने अनीति का कभी साथ नहीं दिया , लेकिन पुत्र प्रेमवश उन्होंने कहा --- " तू निर्वस्त्र होकर आ , मैं आँख की पट्टी थोड़ी देर के लिए खोलूंगी l तू खड़े रहना l " श्रीकृष्ण से कुछ छुपा नहीं है , जब दुर्योधन जा रहा था तो राह में उन्होंने उसे रोक लिया और कहा ---- " दुर्योधन ! तुम इस तरह वस्त्रहीन होकर कहाँ जा रहे हो ? उसने कहा -- माँ के पास l भगवान ने कहा --- थोड़ी तो शर्म करो l माँ के सामने तुम इतने बड़े वस्त्रहीन खड़े होगे , अच्छा लगेगा क्या ? लंगोटी लगा लो , पत्ता लपेट लो l " उसे सलाह समझ में आ गई दुर्योधन लंगोटी पहनकर माँ के सामने खड़ा हुआ , गांधारी ने आँखें खोली , देखा पूरा शरीर वज्र का नहीं हो पाया l वे श्रीकृष्ण की लीला को समझ गईं कि पुत्र का वध होगा और कुल का सर्वनाश l अनीति का ऐसा ही अंत होता है l भीम और दुर्योधन के द्वंद युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने भीम को इशारा किया कि गदा वहीँ मारनी है जो हिस्सा कमजोर है , जहाँ परमात्मा का प्रकाश नहीं है l दुर्योधन अनीति , अधर्म पर था इसलिए गांधारी के तप का तेज उसे पूर्ण रूप से नहीं मिल पाया l यही सत्य है कि नीति और सत्य की राह पर चलने वाले को ही परमात्मा का प्रकाश , उनकी कृपा मिल पाती है l
1 May 2022
WISDOM -----
इस संसार में सब जगह असमानता है , भेद -भाव है l व्यक्ति कितना भी पढ़ -लिख जाये लेकिन धर्म , जाति के आधार पर भेदभाव करना नहीं छोड़ता l अमीर - गरीब , ऊँच -नीच , काले -गोरे , पुत्र - पुत्री हर बिंदु पर असमानता देखने को मिलेगी l शासन भी चाहे प्रजातंत्र हो , या राजतन्त्र , साम्यवाद हो या कोई भी वाद हो , मनुष्यों द्वारा ही संचालित होता है इसलिए इन सब असमानताओं को लेकर उनमे अशांति , तनाव बना ही रहता है l श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान यमराज के शासन को श्रेष्ठतम मानते है l यम मृत्यु के देवता हैं और यम के सामने सभी समान हैं l वहां कोई भेदभाव नहीं , कोई पक्षपात नहीं l बेवजह का छल -कपट , धोखा , अहंकार कुछ नहीं l जब जिसका समय आ गया , फिर चाहे वह राजा हो या रंक , किसी भी जाति या धर्म का हो उसे जाना ही पड़ता है l इसलिए यमदेवता को भगवान अपना स्वरुप कहते हैं l
WISDOM -------
लघु - कथा ------ एक व्यापारी रेगिस्तान के रास्ते से व्यापार कर के लौट रहा था l उसने अपनी झोली में कई कीमती हीरे - जवाहरात आदि भर रखे थे l कुछ शुभ चिंतकों ने उसे समझाया कि वो अपना कुछ भार हल्का कर दे और मोतियों के बदले पानी की चिश्तियां बाँध ले l उसने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और अपनी यात्रा जारी रखी l दुर्योग से वो रास्ता भटक गया l साथ में लाई गई रसद व भोजन सामग्री धीरे - धीरे चुक गई l वह भूखा - प्यासा निढाल पड़ा था तब रत्नों और माणिकों के वजन को देखकर उसे अनुभव हुआ कि जीवन में जीवन से ज्यादा बहुमूल्य और कुछ भी नहीं है l हीरे - मोतियों की चमक थोड़ी देर का आकर्षण जरुर प्रस्तुत करती है , पर कठिन समय में पानी की एक बूंद के सामने कोहिनूर की कीमत भी एक पत्थर है से ज्यादा नहीं है l
30 April 2022
WISDOM -----
आज संसार में इतनी अशांति है , तनाव है , इसका एक ही कारण है --- व्यक्ति जैसा अपने को दिखाता है वैसा वो है नहीं l अपनी असलियत छुपाने के लिए उसे तरह - तरह के स्वांग रचने पड़ते हैं l इसी चिता में वे तनावग्रस्त हो जाते हैं l इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि आज व्यक्ति स्वयं को धार्मिक होने का दावा करता है लेकिन यह केवल उसका बाहरी रूप है l यदि इतना ही अच्छा वह अपने ह्रदय से होता तो संसार में शांति होती l
29 April 2022
WISDOM ----
काल का पहिया ----- समय का चक्र चलता रहता है l भगवान ने गीता में कहा है --- कर्म करने के लिए तुम स्वतंत्र हो लेकिन उसके परिणाम से बच नहीं सकते l ' मनुष्य अहंकार के वशीभूत होकर स्वयं को भगवान समझने लगता है l अहंकार मनुष्य का दुर्गुण है इसलिए इस दुर्गुण से ग्रस्त मनुष्य छल - कपट , धोखा , षड्यंत्र , पीठ में छुरा भोंकना जैसे नीच कर्म करता है l ईश्वर तो श्रेष्ठता का समुच्च्य हैं और पाप कर्म करने वाले स्वयं को भगवान समझें , यह मनुष्य की दुर्बुद्धि है l रावण और दुर्योधन केवल उस युग में ही नहीं हुए , वे हर युग में हुए हैं और उनका अंत सबका एक जैसा ही होता है l वे स्वयं तो डूबते ही हैं , अपना साथ देने वालों को भी ले डूबते हैं l यही उनका प्रारब्ध है l ईश्वर तो सदा से यही चाहते हैं कि मनुष्य की चेतना का स्तर ऊँचा उठे , वह कम से कम इनसान तो बने l जब तक मनुष्य स्वयं नहीं सुधरना चाहे , उसे कोई नहीं सुधार सकता l रावण को समझाने तो श्री हनुमान जी गए l अंगद , विभीषण और रावण की पत्नी मंदोदरी ने उसे बहुत समझाया लेकिन वह नहीं सुधरा l दुर्योधन को समझाने तो साक्षात् भगवान कृष्ण गए l समझना तो दूर , वह तो उन्हें ही बंदी बनाने चला l ' जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है l '