20 September 2022

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  लिखते  हैं --- 'इस  समय  का  सबसे  बड़ा  दुर्भाग्य  यह  है  कि  इस  समय  सभी  वर्णों  ने  अपनी -अपनी  गरिमा  को  भुला  दिया  है  l  इस  समय  केवल  एक  ही  वर्ण  रह  गया  है  वह  है ---व्यापारी  l डॉक्टर , इंजीनियर , कलाकार , शिक्षक , पंडित ,क्षत्रिय , वैश्य  आदि  सभी  अपना  कर्तव्य  भूलकर  केवल  धन  के  पीछे  लगे  हैं  l  सारा  व्यवहार  पैसे  के  लिए  ही  चल  रहा  है  l '  वर्तमान  की  स्थिति  इतनी  विकट  है  कि  अमीरी  की  भी  दौड़  है  l  कौन  सबसे  आगे  है  ?  यह  भी  सत्य  है  कि  केवल  ईमानदारी  और  सच्चाई  से  बहुत  अमीर  नहीं  हुआ  जा  सकता  l  मेहनत  तो  करनी  पड़ती  है  लेकिन  वह  अधिकांशत:  दंद -फंद   और  हेरा -फेरी  जैसी  नकारात्मक  दिशा  में  ज्यादा  होती  है  l  ऐसी  दौड़  का  कोई  सकारात्मक  परिणाम  भी  नहीं  होता  ---- एक  कथा  है ---- एक  सेठ जी  थे  , अथाह  धन -सम्पदा  थी  l  दिन -रात  भागा -दौड़ी  करते  , खाने -पीने  का  भी  कोई  होश  नहीं  l  उनके  घर  में  एक  नौकर  सेठ जी  को  देखकर  सदा  यही  सोचा  करता  कि  ये  बेचारे  सेठ  किसके  लिए  इतनी  मेहनत  कर  रहे  हैं  ,  इतना  धन  किसके  लिए  जोड़  रहे  हैं  ?  एक  कन्या  है  उसका  विवाह  हो  ही  गया  l  अब  वो  नौकर  था , उसे  सेठ  को  समझाने  की  हिम्मत  नहीं  थी  l  विधि  का  विधान  देखिए  , एक  दिन  सेठ  को  अचानक  हार्ट अटैक  आया  और  वे  परलोक  सिधार  गए  l  सेठ  की  खूबसूरत   पत्नी  ने  उस  नौकर  से  विवाह  कर  लिया  l  उसे  अपने  प्रश्न  का  उत्तर  मिल  गया  ,कि  वो  बेचारा  सेठ  उसी  के  लिए  दिन -रात  एक  किए  था  l  

एक  और  कथा  है --- व्यक्ति  चाहे  इस  लोक  में  हो  या  उस  लोक  में  ,  धन  का  लालच  ऐसा  है  जो  कभी  जाता  नहीं  l --- एक  सेठ जी  की  मृत्यु  हो  गई  l  जीवन  में  कुछ  दान -पुण्य  भी  किया  था  ,  कुछ  पापकर्म , शोषण  आदि  भी  किया  था  l  जब  धर्मराज  के  यहाँ  हिसाब -किताब  हुआ  तो  धर्मराज  ने  कहा ---" सेठ जी  !  आपके  लिए  कुछ  दिन  का  स्वर्ग  है , कुछ  दिन  का  नरक l  आप  पहले  कहाँ  जाना  पसंद  करेंगे  ?  सेठ जी  ने  कहा --- " महाराज  ! चाहे  स्वर्ग  हो  या  नरक   मुझे  तो  वहां  भेज  दो  ,  जहाँ  चार  पैसे  की  आमदनी  हो  l  "  इस  समय  का  सत्य  यही  है  कि  धन  प्राथमिकता  है  उसके  बदले  चाहे  बीमारी , तनाव , अनिद्रा   कुछ  भी  हो  l  

19 September 2022

WISDOM -----

श्रीमद् भगवद्गीता  में  भगवान  कहते  हैं ---ज्ञान , कर्म  और  भक्ति  का  समन्वय  जीवन  के  समग्र  विकास  के  लिए  अनिवार्य  है  l  इन  तीनों  का  समन्वय  होने  पर  ही  सुख , शांतिमय  जीवन  बीत  सकेगा  l    कर्म  और  भक्ति  के  अभाव  में  ज्ञानी  व्यक्ति , अहंकारी  बन  सकते  हैं  l   ज्ञान  के  अभाव  में  मनुष्य  के  कर्म  दुष्कर्म  हो  सकते  हैं    और  ज्ञान  व  कर्म  के  अभाव  में   केवल  भक्ति  व्यक्ति  को  अन्धविश्वासी  तथा  अकर्मण्य  बना  सकती  है  l  भक्ति  भी  ज्ञान  और  कर्म  से  युक्त  होनी  चाहिए  l    एक  कथा  है ----- मरने  के  बाद  एक  व्यक्ति  की  आत्मा  को  यमदूत  धर्मराज  के  सामने  ले  गए  , दूतों  ने  बताया --- " यह  एक  बड़ा  धर्मात्मा  है  l युवावस्था  में  अपने  माता -पिता  और  स्त्री , बच्चों  को  छोड़कर  यह  जंगल  में  चला  गया  और  जीवन  भर  तप  करता  रहा  l  "  धर्मराज  ने  कहा --- " कर्तव्यों  का  त्याग  कर  कोई  व्यक्ति  धर्मात्मा  नहीं  बन  सकता  l  परिवार  के  लोगों  के  साथ  विश्वासघात  कर  के  इसने  अधर्म  ही  कमाया  ,  ऐसा  भजन  किस  काम  का  जो  कर्तव्यों  को  भुलाकर  किया  जाए  l  इसे  पुन:  धरती  पर  भेजो  और  कर्तव्य  पालन  के  साथ  भजन  करने  का  आदेश  करो  ,  तभी  इसे  स्वर्ग  में  स्थान  मिलेगा  l   "   यमदूतों  ने  दूसरे  व्यक्ति  की  आत्मा  उपस्थित  की  और  कहा --- " यह  व्यक्ति  बड़ा  कर्तव्यपरायण  है  l  काम  को  ही  सब  कुछ  समझता  है  l  इसकी  पत्नी  बीमार  पड़ी  और  मर  गई  ,  पर  यह  उसकी  कुछ  भी  परवाह  न  कर  के  अपने  कर्तव्य  में  ही  लगा  रहा  l " धर्मराज  ने  कहा --- " ऐसे  ह्रदयहीन  का  स्वर्ग  में  क्या  काम  ?  भावना पूर्वक  किया  गया  कर्तव्य  ही  प्रशंसनीय  हो  सकता  है  l  जिसे  अपने  नैतिक  कर्तव्यों  का  ज्ञान  नहीं  ,  उसकी  शारीरिक  दौड़ -धूप  क्या  महत्त्व  रखेगी  l  इसे  प्रथ्वी  पर  भेजो  और  कहो  कि  भावना पूर्वक  जीवन  जिए  और  दूसरों  से  प्रेम  करना  सीखे  ,  तभी  उसे  स्वर्ग  में  स्थान  मिलेगा  l  "  एक  तीसरे  व्यक्ति  की  आत्मा  लाई  गई  l  यमदूतों  ने  कहा --- " यह  एक  साधारण  गृहस्थ  है l  सदा  आस्तिक  रहा , प्रेमपूर्वक  परिवार  को  सुविकसित  किया , पवित्र  जीवन  जिया  और  दूसरों  के  उत्थान  के  लिए  निरंतर  प्रयत्न  करता  रहा  l "  धर्मराज  ने  कहा --- " स्वर्ग  ऐसे  ही  लोगों  के  लिए  बनाया  गया  है  ,  इसे  आदरपूर्वक  ले  जाओ  और  आनंद पूर्वक  यहाँ  रहने  की  व्यवस्था  कर  दो  l  "  स्वर्ग  का  अधिकारी  वही  हो  सकता  है  जिसने  ज्ञान , कर्म  और  भक्ति  तीनों  को  जीवन   में  अपनाया  है   l 

18 September 2022

WISDOM -----

 मनुष्य  के  जीवन के  विभिन्न  पक्ष  हैं  ,इनमें  सबसे  महत्वपूर्ण  है  आर्थिक  पक्ष  l  आर्थिक  क्षेत्र  में  विकार  आ  जाने  से  ही  जीवन  का  प्रत्येक  पक्ष  गड़बड़ा  जाता  है  l  संसार  में  जो  बड़ी -बड़ी  क्रांतियाँ  हुई  हैं  उनके  मूल  में  जो  कारण  था  वह --आर्थिक  था  l  एक  समय  था  जब  केवल  व्यापार  -व्यवसाय  में  हानि -लाभ  देखा  जाता  था  l  आज  संसार  में  इतनी  अधिक  समस्याएं  इसलिए  हैं  कि  जीवन  का  प्रत्येक  क्षेत्र  व्यवसाय  बन  गया  है  , इस  कारण  उस  क्षेत्र  की  पवित्रता  समाप्त  हो  गई  है  l  ईमानदारी  ,सच्चाई  से  काम  करने  वाले  बहुत  हैं   लेकिन  उनकी  तुलना  में  दीमक  की  प्रकृति  की  संख्या  बहुत  अधिक  है  l  अमीर  और  गरीब  को  देखने  का  नजरिया  भी  भिन्न  है   l  एक  वृद्ध  व्यक्ति  मजदूरी  करे , ठेला  चलाए ,  बहुत  मेहनत  कर  के  परिवार  का  पालन पोषण  करे  तो  वह  दया  का  पात्र  है  लेकिन  वह    व्यक्ति  जिसने  जीवन  में  नौकरी  कर  के  पर्याप्त  धन  कमा  लिया , उसके  पास  जमा -पूंजी   आदि  सब  कुछ  है  लेकिन  फिर  भी  वह  और  धन  कमाने  के  लिए  , समाज  में  अपनी  पहचान  बनाये  रखने  के  लिए   या  समय  व्यतीत  करने  के  लिए  कहीं  न  कहीं  जुड़ा  है  ,  अब  क्योंकि  वह  समर्थ  है  इसलिए  उसके  प्रति  कोई  भाव  नहीं  है  जबकि  सत्य  ये  है  कि  ऐसे  व्यक्ति  कहीं  काम  कर  के  युवा  पीढ़ी  का  हक  छीन  रहे  हैं  l  धन  को  ही  स्टेटस  सिम्बल  माना  जाने  के  कारण  अब  ऐसे  व्यक्ति  समाज  को  अपने  ज्ञान  का  लाभ  नहीं  देते  बल्कि  सारे  गुर ,  सभी  बारीकियां  समझ  आ  जाने  के  कारण   भ्रष्टाचार  में  बड़ा  योगदान  देते  हैं  l  इन  सबके  पीछे  सबसे  बड़ा  कारण  है  ---दुर्बुद्धि  l  दुर्बुद्धि  के  कारण  ही  संसार  में  सारी  समस्याएं  हैं  l 

WISDOM ----

 तुलसीदास जी  ने  कहा  है ----  'कर्मप्रधान  विश्व  करि  राखा  l जो  जस  करहि  सो  तस  फल  चाखा  l   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---' यह  कर्मफल  कभी -कभी  तुरंत  ही  इसी  जन्म  में  मिल  जाता  है  , परन्तु  कभी -कभी  ऐसा  भी  होता  है  कि  दुष्ट  कर्म  करने  वाले  तो  सुखी  और  संपन्न  दिखाई  देते  हैं  तथा  त्यागी , तपस्वी  दुखी  होते  हैं  तो  विश्वास  डगमगा  जाता  है  l  मनुष्य  सोचता  है  कि  जब  दुष्ट  व्यक्ति  आराम  का  जीवन  जीते  हैं  और  सज्जन  कष्ट  पा  रहे  हैं  तो  फिर  त्याग -तपस्या  का  जीवन  क्यों  जिएं  ? यह  भावना  मनुष्य  को  उद्दंड  और  नास्तिक  बना  देती  है  l  विधाता  ने  मनुष्य  को  कर्म  करने  की  छुट  दी  है  , परन्तु  फल  को  अपने  हाथ  में  रखा  है  l  यदि  झूठ  बोलते  ही  मनुष्य  की  जीभ  काटकर  गिर  जाती  , चोरी  करते  ही  हाथ  कट  जाते  तो  व्यक्ति  दुष्कर्म  करने  से  डरता  , किन्तु  कर्म  का  फल  विधि  के  विधान  के  अनुसार  मिलता  है   तो  पापी  व्यक्ति  को  फलता -फूलता  देखकर  मनुष्य  आस्थाहीन  हो  जाता  है  l  आचार्य श्री  लिखते  हैं --यह  बात  निश्चित  है  कि  ईश्वर  के  यहाँ  देर  है , अंधेर  नहीं  l ''    कर्म  का  फल  कब  और  कैसे  मिलेगा  , यह  काल  निश्चित  करता  है  l एक  कथा  है ------  एक  स्त्री  नि:संतान  थी  l  किसी  तांत्रिक  ने  उसे  बताया  कि  किसी  बच्चे  को  मरवाकर  गड़वा  दे  तो  उसके  संतान  होगी  l  उसने  दूर  गाँव  के  किसी  गरीब  बच्चे  के  साथं  ऐसी  ही  निर्दयता  की  l   ईश्वर  की  लीला  देखिए  उसके  दो  पुत्र  हुए  l  दोनों  ही  बहुत  सुन्दर  और  होनहार   l  उस  स्त्री  के  कर्म  का  जिन्हें  पता  था  , वे  सब  यहो  कहते  थे  कि  देखो  इस  औरत  ने  कितना  नीच  कर्म  किया  और  भगवान  ने  इसको  सजा  देने  के  बदले  दो -दो  बेटे  दे  दिए  l  ईश्वर  के  यहाँ  कितना  अंधेर  है  ?  बच्चे  बड़े  हुए , पढ़ने -लिखने  में  बहुत  होशियार , देखने  में  सुंदर  लेकिन  एक  दिन  दोनों  नदी  में  नहा  रहे  थे  , अचानक  एक  का  पैर  फिसला  l  दूसरा  उसे  बचाने  के  लिए  आगे  बढ़ा  तो  वह  भी  संभल  नहीं  सका  और  दोनों  नदी  में  डूब  गए  l  तब  वह  रो -रोकर  सब  से  यही  कह  रही  थी थी  कि  भगवान  में  मेरे  पाप  की  सजा  मुझे  दे  दी  l  ईश्वर  के  घर  देर  है , अंधेर  नहीं  l '  कर्मफल  का  नियम  स्वयं  ईश्वर  पर  भी  लागू  होता  है  l  भगवान  राम  ने  बालि  को  छिपकर  बाण  मारा  था  ,  अगले  जन्म  में  वे  कृष्ण  बने  और  बालि  बहेलिया  और  उसने  उसी  प्रकार  उसी  बाण   को  उन्हें  मारा  और  उनकी  जीवन  लीला  समाप्त  हुई  l  राजा  दशरथ  ने  श्रवण कुमार  को  तीर  मारा  था  ,  उसके  माता -पिता  की  मृत्यु  पुत्र -शोक  में  हो  गई  l  उनके  शाप  के  कारण  राजा  दशरथ  की  मृत्यु  भी  पुत्र -शोक  में  हुई  l  गीता  में  भगवान  ने  कहा  है --- 'गहना  कर्मणोगति  l '

17 September 2022

WISDOM -----

    पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- ' प्रयत्न  और  कर्म साधना  से  सब  कुछ  संभव  है  l  संसार  में  आत्म उन्नति  के  लिए   जो  भी   थोड़ा    कुछ  करने  का  साहस  दर्शाते  हैं  -- उनके  लिए  सहायक  परिस्थितियां  अपने  आप  निर्मित  होती  चलती  हैं  l  कभी  एक  मुजरिम  रहे  जाइगेर  ने  आगे  चलकर  समूचे  विश्व  को  अपने  साहित्य  द्वारा  नया  प्रकाश  और  नयी  जीवन  दिशा  दी  l  ----- जाइगेर  जर्मनी  के  एक  विख्यात  लेखक  हो  गए  हैं  l  जब  वे  केवल  बारह  वर्ष  के  थे  , तब  उन्हें  रोजगार  के  लिए  भटकना  पड़ा  l  सुस्त  और  दुबले -पतले  होने  के  कारण  किसी  ने  भी  उनको  अपने  यहाँ  नौकर  नहीं  रखा  l  फिर  वे  एक  मोटर कंपनी  के  मालिक  से  मिले  l  वह  कंपनी  अवैध  धंधों  के  कारण  बदनाम  थी  l मालिक  ने  कहा --बदनामी  के  कारण  कोई  यहाँ  पर  झाड़ू  लगाने  को  तैयार  नहीं  है  l  जाइगेर  ने  उससे  विनती  की  और  कहा  कि  मैं  अपना  काम  ईमानदारी  से  करूँगा  l  मालिक  की  हाँ  सुनते  ही  उसने  झाड़ू  उठाई  और  कंपनी  की  पूरी  इमारत  सफाई  कर  के  चमका  दी  l  मालिक  उससे  बहुत  खुश  था  l  उस  कंपनी  में  पहले  से  कुछ  अपराधी  किस्म  के  लोग  काम  करते  थे  , वे  जाइगेर  के   मालिक  पर  बढ़ते  प्रभाव  से  चिढ़ते  थे  इसलिए  उन्होंने   जाइगेर  पर  चोरी  का  इल्जाम  लगा  दिया  जिससे  उसको  जेल  हो  गई  l  कैद  से  छूटने  के  बाद  अब  उसे  रोजगार  मिलना  बहुत  कठिन  हो  गया  l  भूखा  क्या  न  करता  ?  उसने  अपना  एक  गिरोह  बना  लिया   और  पचास  से  अधिक  डकैतियां  और  चोरियां  की  l  एक  दिन  पुलिस  की  गिरफ्त  में  आ  गया  और  जेल  में  कष्ट  सहना  पड़ा  l  यहाँ  उसे  अपने  अपराधी  जीवन  के  बारे  में  सोचकर    बहुत  दुःख  होने  लगा  और  उसने  अपनी  व्यथा  साबुन  के  एक  रैपर  पर  कविता  रूप  में  लिख  डाली  l  जेल  के  पादरी  को  उसने  अपने  मन  की  व्यथा  सुनाई  तो  उसे  इसकी  साहित्यिक  प्रतिभा  पर  बहुत  आश्चर्य  हुआ  , उसने  सोचा  कि  यदि  इसकी  सहायता  की  जाये  तो  यह  अपना  जीवन  भी  सुधार  सकेगा  और  दूसरे  सैकड़ों  लोगों  को  सन्मार्ग  पर  चलने  की  प्रेरणा  दे  सकेगा  l  पादरी  ने  सरकार  की  ओर  से  उसकी  इस  रूचि  को  विकसित  करने  के  लिए  साधन  जुटा  दिए  l  जाइगेर  ने  कविता  और  गद्य  के  सैकड़ों  पृष्ठ जेल  में  ही  लिखे  l  जेल  से  छूटने  के  बाद  वह  दिन  भर  मजदूरी  करता  और  शाम  को  नियम  से  लिखता  l  उसने  एक  अच्छा  उपन्यास  ' दी  फोट्रेस '  लिख  डाला  l  पादरी  की  मदद  से  वह  उपन्यास  प्रकाशित  हुआ  l  इस  कृति  ने  उसे  पूरे  जर्मनी  में  प्रसिद्ध  ओर  लोकप्रिय  बना  दिया  l बाद  में  उसकी  अन्य  रचनाएँ  भी  सर्वाधिक  संख्या  में  बिकीं  l   निरंतर  प्रयास  और  संघर्ष  करने  से  जीवन  में  सफलता  अवश्य  मिलती  है  l  

16 September 2022

WISDOM------

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " ईर्ष्या  एक  घातक  विष  है , मनोविकार  है  l यह  बहुत  ही  जहरीली  और  नकारात्मक  भावना  है l  यह  अंगीठी  की  उस  आग  की  तरह  है  , जो  ईर्ष्यालु  व्यक्ति  के  मन -मस्तिष्क  में  सदैव  जल  रही  होती  है  l  ईर्ष्या  मनुष्य  की  एक  हीन  भावना  है  , वह  दूसरों  की  अच्छाई  से , सफलता  से  प्रेरणा  लेने  के  बजाय  हमेशा  दूसरों  के  सुख -शांति ,सफलता  और  समृद्धि  को  देख-देखकर  जलता -भुनता  रहता  है  l  वह  हमेशा  यही  सोचता  है  कि  आगे  बढ़ते  लोगों  की  राह  में  रोड़ा  कैसे  बना  जाए ? उनको  कैसे  नीचा  दिखाया  जाये , जिससे  समाज  में  उनका  मजाक  बने  और  कैसे  उनकी  खुशियाँ  छीनी  जाएँ  l "   ईर्ष्या  के  घातक  परिणाम  को  लेकर  एक  रोचक  कथा  है ---- ' एक  बार  एक  महात्मा  ने  अपने  प्रवचन  में  शिष्यों  से  अनुरोध  किया  कि  वे  अगले  दिन  अपने  साथ  एक  थैली  में  बड़े  आलू  साथ  लेकर  आएं  और  उन  आलुओं  पर  उन  व्यक्तियों  के  नाम  लिखकर  लाएं  जिनसे  वे  ईर्ष्या  करते  हैं  , नफरत  करते  हैं  l  सभी  शिष्यों  ने  उनकी  आज्ञा  मानकर  ऐसा  ही  किया  l  अब  महात्मा जी  ने  कहा  कि  थैले  में  ये  आलू  वे  सात  दिनों  तक  हर  पल  अपने  साथ  रखें  l  वे  सभी  शिष्य  सोते -जागते , उठते -बैठते  हर  समय  उन  आलुओं  का  बोझा  ढो  रहे  थे  l  जिसके  पास  जितने  अधिक  आलू  थे  वह  उतना  ही  अधिक  परेशान  था  l  जैसे -तैसे  सात  दिन  बीते , आठवें  दिन  वे  महात्मा  के  पास  पहुंचे  और  कहा  कि  हम  तो  इन  आलुओं  से  परेशान  हो  गए  l  महात्मा जी  के  कहने  पर  उन्होंने  अपने -अपने  थैले  नीचे  रख  दिए  और  चैन  की  साँस  ली   क्योंकि  उन  आलुओं  से  बहुत  बदबू  आने  लगी  थी  l  महात्मा जी  ने  कहा ---मैंने  आपको  यही  महसूस  करने  के  लिए  ऐसा  करने  को  कहा  था  l  जब  मात्र  सात  दिनों  में  ये  आलू  बदबू  देने  लगे , बोझ  लगने  लगे  , तब  जरा  सोचिए  जी  लोगों  से  आप  ईर्ष्या  करते  हैं  , नफरत  करते  हैं , उनका  आपके  मन  व  दिमाग  पर  कितना  बोझ  होगा  l  उन  आलुओं  की  तरह  आपका  मन व  दिमाग  भी  बदबू  से  भर  जाता  है  ,  यह  बोझ  आप  केवल  सात  दिन  नहीं , सारी  जिन्दगी  ढोते  हैं  l  इसलिए  ईर्ष्या  जैसी  नकारात्मक  भावनाओं  के  बोझ  को  अपने  मन  से  निकाल  फेंकिये  l   आचार्य श्री  लिखते  हैं  ---ईर्ष्या  के  रोग  से  बचने  के  लिए   आप  ईश्वर  पर  विश्वास  रखें , उनकी  शरण  में  जाएँ l  ईश्वर  ने  जो  आपको  दिया  है  ,उसे  देखें , उसका  महत्त्व  समझें  l  अपनी  शक्ति  और  सामर्थ्य  को  पहचाने  और  सही  दिशा  में  लगायें  l  सबसे  बढ़कर  निष्काम  कर्म  करें ,   सेवा  के  कार्यों  से  मन  के  विकार  दूर  होने  लगते  हैं  और  मन  निर्मल  हो  जाता  है  l 

15 September 2022

WISDOM ------

 ऋषियों  का  कहना  है  कि  हम  इस  संसार  में  आए  हैं  तो  इसका  कोई  कारण  है  --हमें  किसी  का  कर्ज  चुकाना  है  या  कोई  अपना  कर्ज  चुकता  करेगा  l  यह  कर्ज  किसी  भी  रूप  में  हो  सकता  है  l  हम  अपने  जीवन  में  जिसके  भी  संपर्क  में  आते  हैं  चाहे  वह  भूमि  हो , संस्था  हो , पशु -पक्षी  हों , संतान , रिश्ते -नाते  --जो  भी  हों  उन  सबसे  हमारा  जन्म -जन्मान्तर  का  लेन  -देन  होता  है  जिसे  निपटाने  के  लिए  हम  जन्म  लेते  हैं  जैसे  --किसी  की  संतान  बहुत  बीमार  है , लाखों  रूपये  उसकी  बीमारी  पर  खर्च  हो  रहे  हैं  तो  इसका  अर्थ  है  कि  उस  व्यक्ति  पर  अपनी  संतान  का , उस  चिकित्सक  का  पिछले  जन्मों  का  कर्ज  है  जिसे  वह  चुका    रहा  है  l  हम  इस  संसार  में  सुख -दुःख , हानि -लाभ , मान -अपमान  , प्रेम , तिरस्कार  जो  भी  महसूस  करते  हैं  , वह  सब  कर्ज  है  जो  हम  चुका  रहे  हैं  या  कोई  हमसे  वसूल  कर  रहा  है  l  कर्ज  चुकने  के  बाद  ही  मुक्ति  है  l  एक  कथा  है --- एक  राजा  के  संतान  तो  होती  थी  परन्तु  एक -दो  साल  की  होकर  मर  जाती  थी  l  जब  उसके  पांचवें  पुत्र  का  जन्म  हुआ  तो  उसने  ज्योतिषियों  को  बुलाकर  उसकी  जन्म पत्री   दिखाई  l  ज्योतिषी  ने  कहा --- " महाराज  1  अब  तक  आपके  जो  पुत्र  हुए  हैं  , वे  सब  आपने  कर्ज  चुकाने  आए  थे  ,  साल -दो  साल  में  अपना  कर्ज  लेकर  चले  गए  l  ,  किन्तु  आपका  यह  पुत्र  अपना  कर्ज  चुकाने  आया  है  ,  इसलिए  आप  इसे  कोई  कार्य  न  करने  दें  ,  जिससे  यह  आपका  कर्ज  न  चुका  सके  l  यह  आपके  साथ  तब  तक  बना  रहेगा  ,जब  तक  कर्ज  न  चुका  दे  l "  राजा  यह  सुनकर  बहुत  प्रसन्न  हुआ  ,  वे  उस  पर  दिल  खोलकर  पैसा  लुटाते  थे , जिससे  वह  और  अधिक  कर्जदार  हो  जाये  l  जब  वह  पंद्रह  वर्ष  का  हुआ  तो  एक  दिन  राज कर्मचारियों  के  साथ  रथ  पर  बैठकर  घूमने  जा  रहा  था  तो  उसने  देखा  कि  रास्ते  में  एक  आदमी  बेहोश  पड़ा  है  l  उसने  रथ  रोककर  उसे  उठाया l  उसकी  जेब  से  उसका  पता  मिल  गया  l  राजकुमार  ने  उसे  रथ  पर  बिठाकर  उसे  उसके  घर  पहुँचाया  l  वह  एक  सेठ  का  बेटा  था , सेठ  बहुत  खुश  हुआ  l  उसने  अपने  गले  से  मोतियों  की  माला  उतारकर  राजकुमार  के  गले  में  पहना  दी  l  राजकुमार  ने  बहुत  मना  किया  , पर  सेठ  ने  कहा  --- " तुमने  मुझ  पर  जो  उपकार  किया  उसका  बदला  तो  मैं  नहीं  चुका  सकता  ,  पर  तुम  इसे  स्वीकार  कर  लो  l "  राजकुमार  घर  आया  ,  वह  माला  अपनी  माता  को  दे  दी  और  खाना  खाकर  सोया  तो  सोता  ही  रह  गया  l  घर  में  हाहाकार  मच  गया  l  ज्योतिषी  को  बुलाया  गया  l  राजा  ने  कहा --- " पंडित जी ,  आपकी  ज्योतिषी  विद्या  भी  झूठी  हो  गई  ,  क्योंकि  मैंने  तो  इससे  कोई  धन  नहीं  लिया  l "  तब  तक  रानी  ने  वह  मोतियों  की  माला  लाकर  दी  और  बताया  कि  यह  माला  उसे  किसी  सेठ  ने  दी  थी  l  ज्योतिषी  ने  कहा ---" देखिए  महाराज  ! ज्योतिषी  विद्या  झूठी  नहीं  हुई   बल्कि  आप  यह  भी  देखिए  कि  इसे  आपका  कर्ज  तो  चुकाना  ही  था  ,  उस  सेठ  से  कर्ज  लेना  भी  था  l  उस  सेठ  से  अपना  कर्ज  लेकर  तथा  आपसे  कर्ज  मुक्त  होकर  वह  चला  गया  l "   इस  संसार  में  यही  लेन -देन  चलता  रहता  है  l  केवल  मनुष्य  रूप  में  ही  नहीं  कभी -कभी  गाय , बैल , कुत्ता , बिल्ली  , पक्षी  बनकर  भी  कर्ज  चुकाना  पड़ता  है  l  प्रकृति  में  हिसाब  बराबर  होता  है  , लेन -देन  में  एक  पैसा , एक  पाई  भी  इधर  से  उधर  नहीं  होता  l