पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " पतन एक सहज गतिक्रम है , उठना पराक्रम है l पानी नीचे की ओर बड़ी तेजी से बहता है लेकिन यदि ऊपर चढ़ाना हो तो उसके लिए विशेष प्रयास करना पड़ता है l अचेतन की पाशविक प्रवृत्तियां बार -बार मनुष्य को घसीटकर विषयी बनने की ओर प्रवृत्त करती हैं l यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह इन पर किस प्रकार अंकुश लगा पाता है और प्राप्त सामर्थ्य का सदुपयोग कर पाता है l " रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे ,-- दो प्रकार की मक्खियाँ होती हैं l एक तो शहद की मक्खियाँ , जो शहद के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं खातीं और दूसरी साधारण मक्खियाँ , जो शहद पर भी बैठती हैं और यदि सड़ता हुआ घाव दिखलाई पड़े , तो तुरंत शहद को छोड़कर उस पर भी जा बैठती हैं l इसी प्रकार दो तरह के स्वभाव के लोग होते हैं l एक , जो ईश्वर में अनुराग रखते हैं , वे ईश्वर चर्चा के सिवाय कोई दूसरी बात करते ही नहीं , और दूसरे वे लोग होते हैं जो संसार में आसक्त जीव हैं , वे ईश्वर की बात सुनते -सुनते यदि किसी स्थान पर विषय की बातें होती हों , तो तुरंत भगवान की चर्चा छोड़कर उसी में संलग्न हो जाते हैं l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " संस्कारों में परिवर्तन करना आसान नहीं है l ईश्वर , आत्मा , कर्मफल , पुनर्जन्म जैसी मान्यताएं मनुष्य को संयमी , सदाचारी , कर्तव्यपरायण एवं उदार बनने की प्रेरणा देती हैं l व्यक्तिगत , सामाजिक , संस्कृतिक उत्थान इन्ही तत्वों के सहारे संभव होता है l यदि सत्प्रवृत्तियाँ न हों तो बुद्धि कौशल के रहते आदर्शहीन व्यक्ति केवल पिशाच ही बन सकते हैं l "
6 April 2024
5 April 2024
WISDOM -----
इस संसार में गुरु की कृपा से सब कुछ संभव है l कहते हैं यदि भगवान शिव स्वयं रूठ जाएँ तो श्री गुरु की कृपा से रक्षा हो जाती है , लेकिन यदि गुरु रूठ जाएँ तो कोई भी रक्षा करने में समर्थ नहीं होता l सद्गुरु के बताए मार्ग पर चलकर , बिना किसी तर्क के उनके आदेश को स्वीकार कर के ही गुरु कृपा संभव है l जो शिष्य अपने गुरु की कृपा की छाँव में रहता है , उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता l एक सत्य घटना है बंगाल के महान साधक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के बारे में l वे सर्वेयर के पद पर कार्यरत थे l पारिवारिक परिस्थिति कुछ ऐसी हुई कि पहले बेटी की मृत्यु हुई , फिर लंबी बीमारी के बाद पत्नी की मृत्यु हो गई l सुरेन्द्रनाथ बहुत दुःखी थे , ऐसे में उन्होंने बंगाल के महान संत सूर्यानंदगिरी की शरण में रहना चाहा l इस उदेश्य से वे उन महान संत की कुटिया में गए और उनसे दीक्षा देने की प्रार्थना की l इस प्रार्थना को सुनकर संन्यासी महाराज नाराज हो गए और उन्हें डपटते हुए बोले --- " आज तक तुमने सत्कर्म किया है , जो मेरा शिष्य बनना चाहते हो l जाओ पहले सत्कर्म करो l " इस झिड़की को सुनकर सुरेन्द्रनाथ विचलित नहीं हुए और बोले --- " आज्ञा दीजिए महाराज l " संत सूर्यानंदगिरी ने कहा ---- " इस संसार में पीड़ित मनुष्यों की संख्या कम नहीं है l उन पीड़ितों की सेवा करो l " सुरेन्द्रनाथ ने कहा ---- " जो आज्ञा प्रभु l मैंने सम्पूर्ण अंतस से आपको गुरु माना है l आपके द्वारा कहा गया प्रत्येक वाक्य , प्रत्येक अक्षर मेरे लिए मूल मन्त्र है l ऐसा कहकर सुरेंद्र्नाथ कलकत्ता आ गए और अभावग्रस्त , , लाचार व दुःखी मनुष्य की सेवा करने लगे l निराश्रितों के सिरहाने बैठकर उनकी सेवा करते वे गरीबों के मसीहा बन गए l जब अपने पास की सारी रकम समाप्त हो गई तो जिस गली का नाम उनके पिता के नाम पर था , उसी गली में वे कुली का काम करने लगे l इससे जो आमदनी होती उससे वे अपाहिजों की सहायता करते l ऐसा करते कई वर्ष गुजर गए l इस अवधि में उनकी उन संत से कोई मुलाकात नहीं हुई l एक दिन जब वे कुली का काम कर के जूट मिल से बाहर निकले तो देखा सामने गुरुदेव खड़े हैं l आशीर्वाद देते हुए उन्होंने कहा --- " सुरेन्द्र तुम्हारी परीक्षा समाप्त हो गई , अब मेरे साथ चलो l " इस आदेश को शिरोधार्य कर के वे चुपचाप गुरु के पीछे -पीछे चल पड़े गुरुदेव उन्हें बंगाल , आसाम पार कराते बर्मा के जंगलों में ले गए , यहीं उनकी साधना का क्रम शुरू हुआ l गुरु कृपा से वे महान सिद्ध संत महानंद गिरी के नाम से प्रसिद्ध हुए l
4 April 2024
WISDOM ----
1. एक भक्त रोज गंगा स्नान कर के भगवान पर जल चढ़ाता था l एक दिन रास्ते में एक प्यासा मनुष्य रात भर के बुखार का मारा पड़ा था l पानी लाते देखकर उसने भक्त से पानी पिलाने की याचना की l भक्त डपट कर बोला ---- " मूर्ख , यह जल भगवान को चढ़ाना है , तुम्हारे जैसे अनेकों बीमार पड़े होंगे उन्हें कौन पानी पिलाता घूमे l " रात को भक्त ने सपने में देखा कि भगवान बीमार हो गए हैं l भक्त ने बीमारी का कारण पूछा तो भगवान बोले ----- " तूने पीड़ित मनुष्य की सहायता नहीं की , प्यासे मनुष्य की आवश्यकता पूरी न कर मेरे स्नान में जो जल काम आया वह मेरे लिए पाप रूप सिद्ध हुआ और उससे मैं बीमार पड़ गया l " दूसरे दिन से वह मनुष्य सच्चे ह्रदय से दीन दुःखियों की सेवा करने लगा l इसी को उसने ईश्वर भक्ति का सच्चा स्वरुप समझना आरम्भ कर दिया l
2 . एक दुःखी व्यक्ति अपनी व्यथा भगवान से एकांत में कहना चाहता था इसलिए रात के एकांत में वह मंदिर पहुंचा l दरवाजे पर देवदूत खड़े थे , उन्होंने कहा ---- " भाई , भगवान के लिए कोई उपहार लाये बिना तुम अन्दर नहीं जा सकते l " उस व्यक्ति ने रातों रात तीन चोरियां की l पहली बार राजमुकुट लाया तो देवदूतो ने कहा , परमात्मा को मुकुट की जरुरत नहीं है , इसे वापस ले जाओ l दूसरी बार तलवार लाया तो देवदूतों ने कहा --भगवान तो सर्वशक्तिमान हैं उनके लिए तलवार व्यर्थ है l तीसरी बार वह कहीं से वेद उठा लाया l देवदूतों ने यह कहकर कि भगवान तो स्वयं ज्ञान स्वरुप हैं , उनके लिए वेद की क्या आवश्यकता ? उस व्यक्ति को लौटा दिया l वह व्यक्ति बहुत उदास हो गया कि आखिर क्या दे भगवान को ? वह जा रहा था तभी एक गरीब अँधा व्यक्ति ठोकर खाकर गिर पड़ा l उस व्यक्ति ने उसे उसकी रात भर सेवा की l इस बार वह खाली हाथ पहुंचा तो देखा वहां देवदूत नहीं हैं और मंदिर का दरवाजा भी खुला है l वह समझ गया कि दींन -दुःखियों और जरुरतमंदों की निस्स्वार्थ भाव से सेवा करने से ही भगवान प्रसन्न होते हैं l
3 April 2024
WISDOM -----
महाकाश्यप भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में से एक थे l वह जब पहली बार भगवान बुद्ध से मिलने पहुंचे तो भगवान के उनके मस्तक पर हाथ रख देने से ही उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हो गई l यह देखकर आनंद को बड़ा आश्चर्य हुआ l उन्होंने भगवान बुद्ध से प्रश्न किया ---- " भगवन ! यह व्यक्ति आज आया और आपके क्षणिक स्पर्श से मुक्त हो गया और मैं सदा आपके साथ रहता हूँ तब भी उस अवस्था को प्राप्त न कर सका , ऐसा क्यों ? " बुद्ध ने उत्तर दिया ---- " आनंद ! तुम जब पहली बार मुझसे मिले तो तुमने तीन शर्तें रखीं कि हमेशा साथ रहोगे , सदा मेरे निकट सोओगे और जिसको भी मुझसे मिलाना चाहोगे , उससे मुझे मिलना पड़ेगा l तुम्हारा समर्पण सशर्त समर्पण था और महाकाश्यप का समर्पण बिना किन्ही अपेक्षाओं के था l समर्पण शर्तों के आधार पर नहीं होता l जिस दिन तुम्हारी अपेक्षाएं छूट जाएँगी , उस दिन तुम भी उसी शून्यता को उपलब्ध हो जाओगे l " आनंद को अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया l
WISDOM ------
एक व्यक्ति जिनका नाम था अभय कुमार उन्हें जंगल में एक नवजात शिशु मिला l वह शिशु को अपने साथ घर ले आए और उसका नाम रखा ' जीवक ' l जब जीवक बड़ा हुआ तो उसे पता चला कि अभय कुमार उसके असली पिता नहीं हैं किसी ने लोकाचार के भय से उसे जंगल में छोड़ दिया था l यह जानकर कि वह कुलहीन है , जीवक का ह्रदय ग्लानि से भर गया l अभय कुमार ने उसे समझाया कि व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है , इसके लिए ज्ञान बहुत जरुरी है l अत: उन्होंने जीवक को श्रेष्ठतम विद्या अर्जित करने के लिए तक्षशिला जाने के लिए प्रेरित किया l जीवक के तक्षशिला पहुँचने पर उससे प्रवेश के समय कुल , गोत्र संबंधित प्रश्न पूछे तो उन्होंने स्पष्ट रूप से सब सत्य बता दिया l जीवक की सत्यवादिता से प्रसन्न होकर उसे प्रवेश दे दिया गया l जीवक ने कठोर परिश्रम से तक्षशिला विश्वविद्यालय से आयुर्वेदाचार्य की उपाधि हासिल की l उनके आचार्य ने उन्हें मगध जाकर लोगों की सेवा करने का निर्देश दिया l जीवक ने कहा ---- " आचार्य ! मगध राज्य की राजधानी है l सभी कुलीन लोग वहां निवास करते हैं l क्या वे मुझ जैसे कुलहीन से अपनी चिकित्सा करवाना स्वीकार करेंगे ? मुझे आशंका है कि कहीं मुझे अपमान का सामना न करना पड़े l " जीवक के गुरु ने उत्तर दिया --- " वत्स ! आज से तुम्हारी योग्यता , क्षमता , प्रतिभा और ज्ञान ही तुम्हारे कुल और गोत्र हैं l तुम जहाँ भी जाओगे , अपने इन्हों गुणों के कारण सम्मान के अधिकारी बनोगे l कर्म से मनुष्य की पहचान होती है , कुल और गोत्र से नहीं l सेवा ही तुम्हारा धर्म है l " जीवक की आत्महीनता दूर हो गई और अपने सेवाभाव से वे महान चिकित्सक बने l
1 April 2024
WISDOM -----
संत अहमद से कुछ शिष्य बोले --- " महाराज ! हमें ईश्वर के किसी सच्चे भक्त के बारे में बताइए l " संत ने कहा ---- " तो सुनो , बहराम मेरा पड़ोसी था l मुझसे उसकी मित्रता हो गई l वह मालदार व्यापारी था l एक दिन राह में डाकुओं ने उसके कारवां को लूट लिया l यह सुनकर मैं उसे ढाढस बंधाने गया l जब मैं उसके घर पहुंचा , तो बहराम ने सोचा --- शायद मैं भी दूसरों की तरह भोजन के लिए आया हूँ l मैंने उससे कहा --- " भाई कष्ट मत करो l मैं भोजन की आशा से नहीं , बल्कि तुम्हारे इस भारी नुकसान में तुम्हे ढाढस बंधाने आया हूँ l " इस पर बहराम बोला --- " हाँ , यह सच है कि मुझे लाखों का नुकसान हुआ है l लेकिन ईश्वर की कृपा है कि उन्होंने मेरी शाश्वत संपत्ति को हाथ तक नहीं लगाया l वह संपत्ति है ---- ईश्वर में मेरी आस्था l वही तो जीवन की सच्ची संपत्ति है l " संत बोले ----- "सत्पुरुषों की श्रेष्ठता उनकी आस्था के स्तर के आधार पर ही पनपती है l जिन्हें ईश्वर में आस्था नहीं है वे न तो भक्त हो सकते हैं , और न ही सज्जन l "
31 March 2024
WISDOM -----
महाभारत का महायुद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही भगवान श्रीकृष्ण के पास मदद की इच्छा से गए l भगवान ने कहा --- एक तरफ मेरी विशाल सेना है और दूसरी तरफ मैं नि:शस्त्र , युद्ध में शस्त्र नहीं उठाऊंगा l दुर्योधन ने विशाल सेना को चुना और अर्जुन ने भगवान से भगवान को ही मांग लिया l श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने l अर्जुन ने अपने जीवन की बागडोर भगवान के हाथों में सौंप दी , स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर दिया l यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि यह समर्पण कर्तव्यपालन के साथ था l आखिरी साँस तक कर्तव्यपालन करना है तभी ईश्वर की कृपा मिलेगी , आलस या पलायन नहीं चलेगा l जब अर्जुन ने युद्ध के मैदान में अपने ही भाई -बंधुओं , गुरु , पितामह को देखा तो अपने अस्त्र -शस्त्र नीचे रख दिए , तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया , कर्तव्यपालन के लिए प्रेरित किया l जब भीष्म पितामह के साथ युद्ध में अर्जुन उस वीरता से नहीं वार कर रहा था , उसके मन में यही था कि ' पितामह हैं , मुझे बचपन में गोदी में खिलाया है ' l कृष्ण जी बार -बार समझा रहे थे कि पितामह अधर्म और अन्याय के साथ है , और इस अन्याय का अंत करने के लिए ही यह महायुद्ध है , पितामह के वार से निर्दोष सैनिक मरते जा रहे हैं , तुम वीरता से वार करो l लेकिन ऐसा करने के लिए अर्जुन स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहा था तब अर्जुन को कर्तव्यपालन से विमुख होते देख भगवान श्रीकृष्ण को बहुत क्रोध आया , वे रथ से कूद पड़े और एक टूटे हुए रथ का पहिया लेकर भीष्म पितामह को मारने दौड़े l सारी सेना में खलबली मच गई , पितामह तो भगवान की स्तुति करने लगे कि ऐसा सौभाग्य फिर कहाँ मिलेगा l अर्जुन ने दौड़कर भगवान के पैर पकड़ लिए और क्षमा मांगी कि मेरी वजह से आप अपनी नि:शस्त्र रहने की प्रतिज्ञा न तोड़ें l फिर अर्जुन ने जिस वीरता से युद्ध लड़ा कि पांडव विजयी हुए l आज के युग में ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन तो संभव नहीं हैं लेकिन यह प्रसंग इस बात को स्पष्ट करता है कि ईमानदारी से कर्तव्यपालन कर के ईश्वर को , उनकी कृपा को अनुभव किया जा सकता है l कलियुग की सबसे बड़ी व्यथा यही है कि बेईमानी , भ्रष्टाचार , लालच , तृष्णा , कामना ---- लोगों को नस -नस में समा गया है इसलिए कर्तव्यपालन को भी लोग अपने -अपने ढंग से , अपने संस्कार और मन: स्थिति के अनुसार ही समझते हैं l इसलिए ईश्वर अब केवल कर्मकांड तक कोरी कल्पना हैं , अब मनुष्य स्वयं को ही भगवान समझने लगा है l मनुष्य के इस भ्रम को प्रकृति अपने ढंग से तोड़ देती है और मनुष्य समझ भी जाता है कि भगवान का तीसरा नेत्र खुल गया लेकिन फिर भी वो सुधरता नहीं है l