विधाता ने स्रष्टि की रचना की l पशु -पक्षी , पौधे -वनस्पति और अंत में मनुष्य की रचना की l विधाता ने केवल मनुष्यों में ही ऐसी विशेषता दी , बुद्धि दी कि वे सन्मार्ग पर चलकर , सत्कर्म कर के अपनी चेतना के उच्च से उच्चतम स्तर तक पहुँच सकते हैं l लेकिन विधाता ने इस मार्ग को इतना आसान नहीं बनाया l इस मार्ग में अनेक बाधाएं उपस्थित कर दीं l ये बाधाएं कोई बाहरी नहीं हैं , ये मनुष्य के भीतर छुपे विकार हैं l जब भी कोई व्यक्ति सन्मार्ग पर चलता है , अपने इष्ट को प्रसन्न करने के लिए मंत्र जप करता है , सत्कर्म कर के अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाना चाहता है , या कहें कि श्रेष्ठता के पथ पर चलकर ईश्वर का अनुभव करना चाहता है तो उसके भीतर के विकार --काम , क्रोध , लोभ ,मोह , अहंकार , स्वार्थ उसके सामने मजबूती से खड़े हो जाते हैं l व्यक्ति में जो कमजोरी सबसे ज्यादा है , उसी का आक्रमण तीव्र गति से होता है जैसे किसी में लोभ लालच है और वह मन्त्र जप आदि श्रेष्ठ कार्यों से अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहता है , तब उसके सामने ऐसे अधिकाधिक धन कमाने के प्रस्ताव आ जाएंगे , जिसका परिणाम वह जानता होगा कि गलत होगा लेकिन लालच ऐसा सिर पर चढ़ जायेगा कि वह भटक जायेगा l इसी तरह जिसमें काम वासना अधिक है , उसे लुभाने के , भटकाने के अनेकों वार उस पर होंगे l पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं --- यह आग का दरिया है , गुरु कृपा से ही इस दरिया से पार पाना संभव है और जो इस दरिया को पार कर लेता है वह कुंदन की भांति चमकने लगता है l ' विकारों के यह आक्रमण एक बार नहीं होते , बार -बार ईश्वर परीक्षा लेते है l अध्यात्म -पथ की राह बहुत कठिन है l मनुष्य अपने ही मन का गुलाम है , अपने ही विकार , मानसिक विकृतियों की वजह से वह इस शरीर रूपी मंदिर से अनेक पापकर्म करता है l जन्म -जन्मांतर के पापकर्म इकट्ठे होते जाते हैं l अनेक पाप कर्म सामूहिक होते हैं , सोच -समझ कर योजना बना कर पाप , अपराध युगों से इस धरती पर हो रहे हैं l मनुष्य पशु और पिशाच तुल्य पापकर्म करता है l जब धरती पर इन पापों का बोझ बहुत बढ़ जाता है , तब प्रकृति का दंड विधान शुरू हो जाता है , ईश्वर का न्याय होता है l व्यक्तिगत स्तर पर भी लोगों को उनके पाप का दंड मिलता है और सामूहिक दंड विधान के अंतर्गत बाढ़ , भूकंप , सुनामी , युद्ध आदि तबाही के अनेक रूपों में प्रकृति का क्रोध , उसका विकराल रूप हमें देखने को मिलता है l मनुष्य ने ईश्वरीय विधान के अनुरूप अपनी चेतना को उच्च स्तर पर ले जाने का कोई प्रयास नहीं किया l पशु और पशु स्तर से भी नीचे गिरकर पिशाचों की भांति कुकृत्य किए हैं , इन्ही सब का परिणाम हुआ कि अनेक सभ्यताओं का अंत हो गया , उनका नामोनिशान मिट गया , राजे -महाराजे , महान कुल -वंश न जाने कहाँ काल के गर्त में समा गए l प्रकृति हमें बार -बार चेतावनी देती है l स्वयं को बनाना और मिटाना मनुष्य के ही हाथ में है l ' जिओ और जीने दो ' l विकारों का अंत तो संभव नहीं है लेकिन उनको मर्यादित कर के मानव जाति और इस सभ्यता की रक्षा संभव है l