28 August 2026

WISDOM -----

  विधाता  ने  स्रष्टि  की  रचना  की  l  पशु -पक्षी , पौधे -वनस्पति  और  अंत  में  मनुष्य  की  रचना  की  l  विधाता  ने  केवल  मनुष्यों   में  ही  ऐसी  विशेषता  दी  , बुद्धि  दी   कि  वे  सन्मार्ग  पर  चलकर , सत्कर्म  कर  के  अपनी  चेतना  के  उच्च  से  उच्चतम  स्तर  तक  पहुँच  सकते  हैं  l  लेकिन  विधाता  ने  इस  मार्ग  को  इतना  आसान  नहीं  बनाया  l  इस  मार्ग  में  अनेक  बाधाएं  उपस्थित  कर   दीं  l  ये  बाधाएं  कोई  बाहरी  नहीं  हैं  ,  ये  मनुष्य  के  भीतर  छुपे  विकार  हैं  l  जब  भी  कोई  व्यक्ति   सन्मार्ग  पर  चलता  है , अपने  इष्ट  को  प्रसन्न  करने  के  लिए  मंत्र  जप  करता  है  , सत्कर्म  कर  के  अपनी  चेतना  को  उच्च  स्तर  पर  ले  जाना  चाहता  है  , या  कहें  कि  श्रेष्ठता  के  पथ  पर  चलकर  ईश्वर  का  अनुभव  करना  चाहता  है   तो  उसके  भीतर  के  विकार  --काम , क्रोध , लोभ ,मोह , अहंकार , स्वार्थ   उसके  सामने  मजबूती  से  खड़े  हो  जाते  हैं  l  व्यक्ति  में  जो  कमजोरी  सबसे  ज्यादा  है  , उसी  का  आक्रमण  तीव्र  गति  से  होता  है  जैसे  किसी  में  लोभ  लालच  है   और  वह  मन्त्र जप  आदि  श्रेष्ठ  कार्यों  से  अध्यात्म  पथ  पर  आगे  बढ़ना  चाहता  है   , तब  उसके  सामने    ऐसे    अधिकाधिक  धन  कमाने  के प्रस्ताव  आ  जाएंगे  , जिसका  परिणाम  वह  जानता  होगा  कि  गलत  होगा  लेकिन  लालच  ऐसा  सिर  पर  चढ़  जायेगा  कि  वह  भटक  जायेगा  l  इसी  तरह  जिसमें  काम वासना  अधिक  है  ,  उसे  लुभाने  के  , भटकाने  के  अनेकों   वार  उस  पर  होंगे  l  पं . श्रीराम  शर्मा   आचार्य  जी  कहते  हैं  --- यह  आग  का  दरिया  है  ,  गुरु  कृपा  से  ही  इस  दरिया  से  पार  पाना  संभव  है   और  जो  इस  दरिया  को  पार  कर  लेता  है  वह  कुंदन  की  भांति  चमकने  लगता  है  l '  विकारों  के  यह  आक्रमण  एक  बार  नहीं  होते  ,  बार -बार  ईश्वर  परीक्षा  लेते  है  l  अध्यात्म -पथ  की  राह  बहुत  कठिन  है  l  मनुष्य  अपने  ही  मन  का  गुलाम  है  , अपने  ही  विकार , मानसिक  विकृतियों  की  वजह  से  वह  इस  शरीर  रूपी  मंदिर  से  अनेक  पापकर्म  करता  है  l  जन्म -जन्मांतर  के  पापकर्म  इकट्ठे  होते  जाते  हैं  l  अनेक  पाप  कर्म  सामूहिक  होते  हैं , सोच -समझ  कर  योजना  बना  कर  पाप  , अपराध   युगों  से  इस  धरती  पर  हो  रहे  हैं  l  मनुष्य  पशु  और  पिशाच   तुल्य   पापकर्म  करता  है  l  जब  धरती  पर  इन  पापों  का  बोझ  बहुत  बढ़  जाता  है  ,   तब  प्रकृति  का  दंड  विधान  शुरू  हो  जाता  है  ,  ईश्वर  का  न्याय  होता  है   l  व्यक्तिगत  स्तर  पर  भी  लोगों  को  उनके  पाप  का  दंड  मिलता  है  और  सामूहिक  दंड   विधान   के  अंतर्गत  बाढ़ ,  भूकंप   , सुनामी , युद्ध   आदि  तबाही  के  अनेक  रूपों  में  प्रकृति  का  क्रोध   , उसका  विकराल  रूप  हमें  देखने  को  मिलता  है  l  मनुष्य  ने  ईश्वरीय  विधान  के  अनुरूप  अपनी  चेतना  को  उच्च  स्तर  पर  ले  जाने  का  कोई  प्रयास  नहीं  किया  l  पशु  और  पशु स्तर  से  भी  नीचे  गिरकर  पिशाचों  की  भांति   कुकृत्य  किए  हैं  , इन्ही  सब  का  परिणाम  हुआ  कि  अनेक  सभ्यताओं  का  अंत  हो  गया  , उनका  नामोनिशान  मिट  गया  , राजे -महाराजे , महान  कुल -वंश  न  जाने  कहाँ  काल  के  गर्त  में  समा  गए  l  प्रकृति  हमें  बार -बार  चेतावनी  देती  है  l  स्वयं  को  बनाना  और  मिटाना  मनुष्य  के  ही  हाथ  में  है  l  ' जिओ  और  जीने  दो '  l  विकारों  का  अंत  तो  संभव  नहीं  है  लेकिन  उनको  मर्यादित  कर  के   मानव  जाति  और  इस  सभ्यता  की  रक्षा  संभव  है  l