एक महारानी ने अपनी मौत के बाद अपनी कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तियाँ लिखाने का हुक्म दिया था ,"इस कब्र में अपार धन राशि गड़ी हुई है ।जो व्यक्ति निहायत गरीब एवं एकदम असहाय हो ,वह इसे खोदकर ले सकता है ।"उस कब्र के पास से हजारों दरिद्र एवं भिखमंगे निकले ,लेकिन उनमे से कोई भी इतना दरिद्र एवं असहाय नहीं था ,जो धन के लिए मरे हुए व्यक्ति की कब्र खोदे ।एक अत्यंत बूढ़ा भिखमंगा तो वहां सालों -साल से रह रहा था ।वह हमेशा उधर से गुजरनेवाले प्रत्येक दरिद्र व्यक्ति को कब्र की ओर इशारा कर देता था ।आखिर एक दिन ऐसा व्यक्ति आ ही गया और उसने कब्र की खुदाई शुरु करवा दी ,पर उसे उस कब्र में एक पत्थर के सिवाय और कुछ नहीं मिला ।उस पत्थर पर लिखा हुआ था ,"मित्र ,तू अपने से पूछ ,क्या तू मनुष्य है ?क्योंकि धन के लिए कब्र में सोए हुए मुर्दों को परेशान करने वाला मनुष्य हो ही नहीं सकता ।"वह व्यक्ति एक सम्राट था और उसने उस कब्र वाले देश को अभी -अभी जीता था ।वह सम्राट जब निराश होकर उस कब्र के पास से वापस लौट रहा था तो उस कब्र के पास रहने वाले बूढ़े भिखमंगे को लोगों ने खूब जोर से हँसते हुए देखा ।वह हँसते हुए कह रहा था ,मैं कितने सालों से इंतजार कर रहा था ,आख़िरकार आज धरती के दरिद्रतम और सबसे ज्यादा असहाय व्यक्ति का दर्शन हो ही गया !"सच में ह्रदयहीन व्यक्ति से बड़ा दरिद्र और दीन -दुखी और कोई हो ही नहीं सकता है जो प्रेम के अलावा किसी और संपदा की खोज में लगा रहता है ।एक दिन वही संपदा उससे सवाल करती है -क्या तुम मनुष्य हो ?
21 January 2013
20 January 2013
DESIRE
एक राजा ने बकरी पाली और प्रजाजनों की परीक्षा लेने का निर्णय किया कि जो इसे तृप्त कर देगा उसे सहस्त्र स्वर्ण मुद्राएँ पुरस्कार में मिलेंगी ।परीक्षा की अवधि पंद्रह दिन रखी और बकरी घर ले जाने की छूट दे दी ।जो ले जाता ,उसे भर पेट खिलाता और पंद्रह दिन उसका पेट भली प्रकार भर देता ।इतने पर भी जब वह दरबार में पहुँचती तो अपनी आदत के अनुसार ,रखे हुए हरे चारे में मुँह मारती ।प्रयत्न असफल चला जाता ।इस प्रकार कितनों ने ही प्रयत्न किया ,पर वे सभी निराश होकर लौटे ।एक बुद्धिमान उस बकरी को ले गया ।वह पीछे तो पेट भर देता लेकिन जब सामने आता तो छड़ी से बकरी की खबर लेता ।वह उसे देखते ही खाना भूल जाती और मुँह फेर लेती ।यह नया अभ्यास जब पक्का हो गया ,तो वह बकरी को लेकर दरबार में पहुंचा ।छड़ी हाथ में थी ,उसके सामने हरा चारा रखा गया ,तो छड़ी को ऊँची उठाते ही उसने मुँह फेर लिया ।यह समझा गया कि वह पूर्ण तृप्त हो गई ।इनाम उसे मिल गया ।रहस्य का उद्घाटन करते हुए राजपुरोहित ने बताया कि इच्छाएं बकरी के समान हैं वे कभी तृप्त नहीं होतीं ।उन्हें व्रत ,संकल्प और प्रतिरोध की छड़ी से ही काबू में लाया जा सकता है ।
19 January 2013
एक भैंस थी बड़ी उपद्रवी ।रस्सा तुड़ाकर भाग जाती थी और जिस खेत में घुस जाती थी उसी को कुचल कर रख देती थी ।पकड़ने वालों की भी अच्छी खबर लेती थी ।एक दिन तो वह ऐसी हो गई कि किसी की पकड़ में नहीं आ रही थी ।हैरान लोगों के बीच से एक साहसी लड़का निकला ।सिर पर उसने हरी घास का गट्ठर रख लिया और उपद्रवी भैंस की तरफ सहज स्वभाव से आगे चलता चला गया ।ललचायी भैंस घास खाने के लिए आगे बढ़ी ।लड़के ने उसके आगे गट्ठर डाल दिया और मौका मिलते ही उछलकर उसकी पीठ पर जा बैठा ।डंडे से पीटते हुए वह उसे बाड़े में ले आया ।लोगों ने जाना कि आवेश भरे प्रतिरोध से भी बढ़कर उपद्रवी तत्वों को काबू में लाने के लिए कई बार दूरदर्शी नीति अधिक कार्य करती है ।
पुत्र ने पिता से पूछा -वृक्षों को शंकर भगवान की उपमा क्यों दी जाती है ?पिता ने कहा -"बेटा ,समुद्र मंथन हुआ तो उसमे से विष भी निकला ,जब उसे किसी ने ग्रहण नहीं किया तो शंकरजी ने पीकर मानवता की रक्षा की ।शंकरजी ने तो ऐसा एक ही बार किया ,पर धरती के जितने भी जीवधारी अपनी गंदी साँस का जहर निकालते हैं ,बेचारे वृक्ष उसे पीकर बदले में स्वच्छ ऑक्सिजन देते हैं ,जिससे उनका जीवन सुरक्षित रहता है ।पुत्र बोला -फिर तो वृक्ष महाशंकर हुए ।
ATMOSPHERE
प्रजापति ब्रह्मा ने वृक्ष बनाये ,वनस्पति बनाई ,छोटे -छोटे जीव -जंतु बनाए ,पशु और पक्षी बनाए और जब देखा कि इनमे से एक भी पर्यावरण को व्यवस्थित रख सकने में समर्थ नहीं है ,हर जीव खुदगर्ज साबित हुआ ,तब विधाता ने सम्पूर्ण प्रतिभा और ज्ञान संपन्न मनुष्य का निर्माण किया ।मनुष्य को अपने समान क्षमतावान देखकर विधाता की चिंता दूर हुई ,संसार की व्यवस्था मनुष्य को सौंपकर वे अपनी थकावट मिटाने के लिए शयन करने लगे ।एक हजार वर्ष की नींद टूटी तो विधाता ने देखा कि द्वार पर जीव -जंतुओं की भारी भीड़ जमा है ।विधाता को जगाने और अपनी शिकायत पेश करने के लिए सब दरवाजा खटखटा रहे हैं ,नारे लगा रहे हैं ।चकित विधाता दरवाजा खोलकर बाहर निकले और जीव -जंतुओं से उनके दुःख का कारण पूछा ।जीवों के प्रमुख प्रतिनिधियों ने बताया -भगवन !आपने मनुष्य को बनाया था स्रष्टि की व्यवस्था के लिए ,पर यह हम सबको ही सताए और नष्ट किये डाल रहा है ।स्रष्टि का सौंदर्य नष्ट होता देखकर विधाता बहुत चिंतित हुए और बोले -बच्चे दुःख न करो ,मनुष्य ने अपनी सद्बुद्धि को दुर्बुद्धि में बदलकर आप लोगों का उतना अहित नहीं किया ,जितना अपना पतन किया है ।जाओ कुछ दिन और प्रतीक्षा करो ,एक दिन उसकी यह दुर्बुद्धि ही उसे पशुवत जीवन में ले जाएगी ,तब वह स्वयं अनुभव करेगा कि यदि -हम भी पशुओं की तरह ही जीवन जीते हैं ,तो मनुष्य शरीर पाने का क्या लाभ ?यह ज्ञान ही उसे पश्चाताप और सुधार की प्रेरणा देगा ,तभी सुख -शांति स्थापित होगी ।वह स्वयं ही गिरा है तथा उठेगा भी स्वयं ही ।
17 January 2013
यदि आप अपना उत्थान चाहते हो तो उसका प्रयत्न स्वयं करो ।दूसरा कोई भी आपकी दशा सुधार नहीं सकता ।यह लोक और परलोक किसी दूसरे की कृपा द्रष्टि से सफल नहीं हो सकता ।अपने पेट के पचाये बिना अन्न हजम नहीं हो सकता ,अपनी आँखों की सहायता के बिना दृश्य दिखाई नहीं पड़ सकते ,अपने मरे बिना स्वर्ग को देखा नहीं जा सकता ,इसी प्रकार अपने प्रयत्न बिना उन्नत अवस्था को भी प्राप्त नहीं किया जा सकता ।समर्थता को ओजस ,मनस्विता को तेजस ,और जीवट को वर्चस कहते हैं ।यही वे दिव्य सम्पदाएँ हैं जिनके बदले संसार के हाट -बाज़ार से कुछ भी ख़रीदा जा सकता है ।
अष्ट भुजा दुर्गा की आठ भुजाएं शक्ति के आठ साधन हैं -1.स्वास्थ्य ,2.विद्दा 3.धन 4.व्यवस्था 5.संगठन 6.यश 7.शौर्य 8.सत्य ।इन शक्तियों में से जिसके पास जितना भाग होगा वह उतना ही शक्तिवान समझा जायेगा ।प्रकृति का ,मनुष्यों का ,रोगों का ,शैतान का आक्रमण अपने ऊपर न हो इसको रोकने का एकमात्र तरीका यह है कि हम अपने शारीरिक ,बौद्धिक ,आत्मिक बल को इतना बढ़ा लें कि उसे देखते ही आक्रमणकारी पश्त हो जाये ।सबलता एक मजबूत किला है जिसे देखकर शत्रुओं के मनसूबे धूल में मिल जाते हैं ।
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