दादाभाई नौरोजी को भारतीय स्वाधीनता के जनक , भारत के वयोवृद्ध महापुरुष आदि आदर सूचक संबोधनों से स्मरण किया जाता है l ब्रिटिश संसद के सदस्य हो जाने पर उन्होंने भारत के हित के लिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा दी l उन्हें भारतीयों ने जितना सम्मान दिया उतना ही अंग्रेजों ने भी दिया l इसका प्रमाण इंग्लैंड के श्री वर्डउड के उस पात्र से हो जाता है जो नुन्होने ' टाइम्स आफ इंडिया ' के लन्दन स्थित प्रतिनिधि को लिखा था ------ " दादाभाई नौरोजी उन लोगों में से थे जिनको किसी भी विषय का ज्ञान सम्पूर्ण होता है और जो तब तक जीवित रह सकते हैं जब तक जीवन की आकांक्षा का स्वयं ही त्याग न कर दें l वे हर बात को गंभीर ढंग से रूचि पूर्वक किया करते थे l उनके साथ बात करने पर ऐसा लगता था कि मृत्यु हो जाने पर भी दादाभाई नहीं मरेंगे , केवल उनका पार्थिव शरीर ही मरेगा l वे सदा के लिए अजर - अमर ही रहेंगे l "
18 July 2017
17 July 2017
अंध परम्पराओं का निराकरण ------- स्वामी दयानन्द सरस्वती
स्वामीजी ने कहा था ----" वर्तमान आर्य सन्तान हमें चाहे जो कहे परन्तु भारत की भावी संतति हमारे धर्म सुधार को और हमारे जातीय संस्कार को अवश्यमेव महत्व की द्रष्टि से देखेगी l हम लोगों की आत्मिक और मानसिक निरोगता के लिए जो कुरीतियों का खंडन करते हैं वह सब कुछ हित भावना से किया जाता है l "
स्वामीजी का यह कथन आज एक ' भविष्यवाणी ' की तरह यथार्थ सिद्ध रहा है l उनके प्रचार कार्य के आरंभिक वर्षों में आर्य समाज की स्थापना होते समय उनके विरोध और आक्षेपों जो तूफान उठा था आज उसका चिन्ह भी नहीं है l आज हिन्दू - समाज में केवल थोड़े से पुराने ढर्रे
के पंडा - पुजारियों को छोड़कर कोई स्वामीजी के कार्यों को बुरा कहने वाला न मिलेगा l आज के समय में जब लोगों के जीवन में व्यस्तता अधिक है , अवकाश की समस्या है , परिवहन कठिन और खर्चीला है तो लोग मृत्यु भोज जैसे विशाल खर्चे के स्थान पर ' शुद्धता ' ' तेरहवीं ' श्राद्ध - आर्य - समाजी विधि से कम खर्च व कम समय में संपन्न कर देते हैं l
अन्य देशों के निष्पक्ष विद्वान भी स्वामीजी के लिए ' हिन्दू जाति के रक्षक ' ' हिन्दुओं को जगाने वाले ' आदि प्रशंसनीय विशेषण का प्रयोग करते हैं l वास्तव में स्वामीजी उन महापुरुषों में से थे जो किसी जाति की अवनति होने पर उसके उद्धार के लिए जन्म लिया करते हैं , वे जो कुछ करते हैं मानव मात्र की कल्याण भावना से होता है l
अलीगढ़ में मुसलमानों के सबसे बड़े नेता सर सैयद अहमद खां स्वामीजी से भेंट करने कई बार गए l उन्होंने कहा --- " स्वामीजी आपकी अन्य बातें तो युक्ति युक्त जान पड़ती हैं , लेकिन थोड़े से हवन से वायु में सुधार हो जाता है युक्ति संगत नहीं जान पड़ती l "
स्वामीजी ने समझाया ---" जैसे छह - सात सेर दाल को माशा भर हींग से छोंक दिया जाता है तो इतनी सी हींग पचास आदमियों के लिए दाल को सुगन्धित बना देती है l उसी प्रकार थोड़ा सा हवन भी वायु को सुगन्धित बना देता है l स्वामीजी के तर्क से सभी श्रोता प्रभावित हुए और सर सैयद उनकी स्तुति करते हुए अपने घर गए l
इसी तरह उन्होंने बताया कि भारत में दूध , दही , घी को आहार सामग्री का सर्वोत्तम अंग माना जाता है l अत: जो लोग उत्तम और उपयोगी दूध देने वाले पशुओं के विनाश का कारण बनते हैं , वे निस्संदेह समाज के बहुत बड़े अनीति करता माने जाने चाहिए l
" भारत पर स्वामीजी के महान ऋण हैं l अपने छोटे से जीवन में उन्होंने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैले हुए ' पाखण्ड और कुप्रथाओं ' का निराकरण कर के वैदिक धर्म का नाद बजाया l
स्वामीजी का यह कथन आज एक ' भविष्यवाणी ' की तरह यथार्थ सिद्ध रहा है l उनके प्रचार कार्य के आरंभिक वर्षों में आर्य समाज की स्थापना होते समय उनके विरोध और आक्षेपों जो तूफान उठा था आज उसका चिन्ह भी नहीं है l आज हिन्दू - समाज में केवल थोड़े से पुराने ढर्रे
के पंडा - पुजारियों को छोड़कर कोई स्वामीजी के कार्यों को बुरा कहने वाला न मिलेगा l आज के समय में जब लोगों के जीवन में व्यस्तता अधिक है , अवकाश की समस्या है , परिवहन कठिन और खर्चीला है तो लोग मृत्यु भोज जैसे विशाल खर्चे के स्थान पर ' शुद्धता ' ' तेरहवीं ' श्राद्ध - आर्य - समाजी विधि से कम खर्च व कम समय में संपन्न कर देते हैं l
अन्य देशों के निष्पक्ष विद्वान भी स्वामीजी के लिए ' हिन्दू जाति के रक्षक ' ' हिन्दुओं को जगाने वाले ' आदि प्रशंसनीय विशेषण का प्रयोग करते हैं l वास्तव में स्वामीजी उन महापुरुषों में से थे जो किसी जाति की अवनति होने पर उसके उद्धार के लिए जन्म लिया करते हैं , वे जो कुछ करते हैं मानव मात्र की कल्याण भावना से होता है l
अलीगढ़ में मुसलमानों के सबसे बड़े नेता सर सैयद अहमद खां स्वामीजी से भेंट करने कई बार गए l उन्होंने कहा --- " स्वामीजी आपकी अन्य बातें तो युक्ति युक्त जान पड़ती हैं , लेकिन थोड़े से हवन से वायु में सुधार हो जाता है युक्ति संगत नहीं जान पड़ती l "
स्वामीजी ने समझाया ---" जैसे छह - सात सेर दाल को माशा भर हींग से छोंक दिया जाता है तो इतनी सी हींग पचास आदमियों के लिए दाल को सुगन्धित बना देती है l उसी प्रकार थोड़ा सा हवन भी वायु को सुगन्धित बना देता है l स्वामीजी के तर्क से सभी श्रोता प्रभावित हुए और सर सैयद उनकी स्तुति करते हुए अपने घर गए l
इसी तरह उन्होंने बताया कि भारत में दूध , दही , घी को आहार सामग्री का सर्वोत्तम अंग माना जाता है l अत: जो लोग उत्तम और उपयोगी दूध देने वाले पशुओं के विनाश का कारण बनते हैं , वे निस्संदेह समाज के बहुत बड़े अनीति करता माने जाने चाहिए l
" भारत पर स्वामीजी के महान ऋण हैं l अपने छोटे से जीवन में उन्होंने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैले हुए ' पाखण्ड और कुप्रथाओं ' का निराकरण कर के वैदिक धर्म का नाद बजाया l
16 July 2017
अत्याचार - पीड़ितों की सहायता में सर्वस्व समर्पण करने वाले योद्धा ------ श्री गणेश शंकर विद्दार्थी
' अन्याय को सहन करना , जो कुछ हो रहा है उसे अनुचित और अस्वाभाविक मानते हुए भी ऐसे चुपचाप बैठना मानव - धर्म नहीं है l '
जब भारत पर ब्रिटिश शासन था तो देशी राज्यों की जनता की दशा बड़ी शोचनीय थी l इन राजाओं ने ब्रिटिश गवर्नमेंट की आधीनता स्वीकार कर ली थी , इसके बदले उसने इनको ' सुरक्षा की गारंटी ' दे रखी थी l इसका नतीजा हुआ वे निर्भय होकर प्रजा का शोषण करने लगे और उस धन को दुर्व्यसनों और अपने शौक की पूर्ति में उड़ाने लगे l जब ' स्वामी ' की यह दशा तो ' सेवक ' लोग क्यों पीछे रहते l रियासती अधिकारी और छोटे - बड़े राज्य कर्मचारी दोनों हाथों से प्रजा को लूटते - मारते थे l
ऐसे समय में श्री गणेश शंकर विद्दार्थी ( 1890 - 1931 ) ने कानपुर से ' प्रताप ' साप्ताहिक प्रकाशित करना आरम्भ किया l उसका उद्देश्य था --- दीन - दुःखी , अत्याचार - पीड़ितों की आवाज को बुलंद करना और उनके कष्टों को मिटाने के लिए आन्दोलन करना l ----
अवध के किसान तालुकेदारों के अत्याचारों से कराह रहे थे l ये ' लुटेरे ' तरह -तरह के लगानों और करों के नाम पर गरीबों के पसीने की कमाई का इस प्रकार अपहरण करते कि दिन - रात मेहनत करने पर भी उनको दो वक्त भरपेट रोटी नसीब नहीं होती l जब कानपुर के निकटवर्ती रायबरेली के किसान बहुत पीड़ित हुए और उन्होंने तालुकेदार वीरपाल सिंह के विरुद्ध सिर उठाया तो उसने गोली चलवाकर कितनो को ही हताहत कर दिया l जब विद्दार्थी जी के पास खबर पहुंची तो उन्होंने एक प्रतिनिधि भेजकर जांच कराई और वीरपाल सिंह की शैतानी का पूरा कच्चा चिटठा ' प्रताप ' में प्रकाशित कर दिया l
तालुकेदार साहब ऐसी बातों को कैसे सहन करते , उन्होंने विद्दार्थी जी को नोटिस भेजा ' या तो माफ़ी मांगो , नहीं तो अदालत में मानहानि का दावा किया जायेगा l विद्दार्थी जी ने उत्तर दिया ---- ' आप खुशी से अदालत की शरण लें l हम वहीँ आपकी करतूतों का भांडाफोड़ करेंगे l माफी मांगने वाले कोई और होते हैं l "
छह महीने तक मुकदमा चला , तीस हजार रुपया उसमे बर्बाद करना पड़ा , तीन माह की सजा भी भोगी , पर किसानों की दुःख गाथा और तालुकेदारों के अन्याय संसार के सम्मुख प्रकट हो गए l और उस समय से जो किसान - आन्दोलन शुरू हुआ तो उसने जमीदारी प्रथा को जड़मूल से उखाड़ कर ही दम लिया l
जब भारत पर ब्रिटिश शासन था तो देशी राज्यों की जनता की दशा बड़ी शोचनीय थी l इन राजाओं ने ब्रिटिश गवर्नमेंट की आधीनता स्वीकार कर ली थी , इसके बदले उसने इनको ' सुरक्षा की गारंटी ' दे रखी थी l इसका नतीजा हुआ वे निर्भय होकर प्रजा का शोषण करने लगे और उस धन को दुर्व्यसनों और अपने शौक की पूर्ति में उड़ाने लगे l जब ' स्वामी ' की यह दशा तो ' सेवक ' लोग क्यों पीछे रहते l रियासती अधिकारी और छोटे - बड़े राज्य कर्मचारी दोनों हाथों से प्रजा को लूटते - मारते थे l
ऐसे समय में श्री गणेश शंकर विद्दार्थी ( 1890 - 1931 ) ने कानपुर से ' प्रताप ' साप्ताहिक प्रकाशित करना आरम्भ किया l उसका उद्देश्य था --- दीन - दुःखी , अत्याचार - पीड़ितों की आवाज को बुलंद करना और उनके कष्टों को मिटाने के लिए आन्दोलन करना l ----
अवध के किसान तालुकेदारों के अत्याचारों से कराह रहे थे l ये ' लुटेरे ' तरह -तरह के लगानों और करों के नाम पर गरीबों के पसीने की कमाई का इस प्रकार अपहरण करते कि दिन - रात मेहनत करने पर भी उनको दो वक्त भरपेट रोटी नसीब नहीं होती l जब कानपुर के निकटवर्ती रायबरेली के किसान बहुत पीड़ित हुए और उन्होंने तालुकेदार वीरपाल सिंह के विरुद्ध सिर उठाया तो उसने गोली चलवाकर कितनो को ही हताहत कर दिया l जब विद्दार्थी जी के पास खबर पहुंची तो उन्होंने एक प्रतिनिधि भेजकर जांच कराई और वीरपाल सिंह की शैतानी का पूरा कच्चा चिटठा ' प्रताप ' में प्रकाशित कर दिया l
तालुकेदार साहब ऐसी बातों को कैसे सहन करते , उन्होंने विद्दार्थी जी को नोटिस भेजा ' या तो माफ़ी मांगो , नहीं तो अदालत में मानहानि का दावा किया जायेगा l विद्दार्थी जी ने उत्तर दिया ---- ' आप खुशी से अदालत की शरण लें l हम वहीँ आपकी करतूतों का भांडाफोड़ करेंगे l माफी मांगने वाले कोई और होते हैं l "
छह महीने तक मुकदमा चला , तीस हजार रुपया उसमे बर्बाद करना पड़ा , तीन माह की सजा भी भोगी , पर किसानों की दुःख गाथा और तालुकेदारों के अन्याय संसार के सम्मुख प्रकट हो गए l और उस समय से जो किसान - आन्दोलन शुरू हुआ तो उसने जमीदारी प्रथा को जड़मूल से उखाड़ कर ही दम लिया l
15 July 2017
विश्व - मानवता के पुजारी ------ महात्मा फ्रांसिस
सन्त फ्रांसिस का जन्म यद्दपि इटली में हुआ था , पर उनका सादा जीवन ,प्राणीमात्र से प्रेम , स्वयं कष्ट उठाकर दूसरों को सुख पहुँचाना आदि अनेक ऐसे गुण हैं जिनके कारण संत फ्रांसिस जैसे दैवी आत्म संपन्न महामानव के चरित्र का अध्ययन समस्त संसार के लिए कल्याणकारी है l वे कहा करते थे --- मनुष्य के समस्त कर्तव्य -- छोटे हों या बढ़े, वे ईश्वर प्रदत्त हैं उन का निस्वार्थ भाव से पालन करना चाहिए l प्रारंभ में वे भजन गा कर अपनी रोटी पा लेते थे , फिर बाद में वे किसी के घर जाकर वहां काम कर के भोजन पा लेते थे , वे कहते थे मुझे काम करके ही अन्न पाना है , रोटी पाने का सच्चा अधिकारी वही है जो बदले में ठोस कार्य करे l
14 July 2017
टैंक - युद्ध के अनुभवी विजेता ------ जनरल जयन्त नाथ चौधरी
' भारत की स्वतंत्रता के शत्रुओं को अहिंसावादियों की शक्ति से शिक्षा लेनी चाहिए l '
भारतीय सेनाध्यक्ष -' जनरल जयन्त नाथ चौधरी ' एक वीर अनुभवी और तपे हुए सेनानी थे l विश्व के माने हुए छह टैंक युद्ध महारथियों में उनका विशेष स्थान है l
द्वितीय महायुद्ध में जर्मन सेनापति रोमेल को हराने का जो श्रेय मित्र राष्ट्र -सेनाध्यक्ष अकिनलेक को मिला था , वह वास्तव में हमारे जनरल चौधरी और चौथी भारतीय डिवीजन के जवानो की उपलब्धि थी l जनरल चौधरी ने लीबिया के मरुस्थल की हड्डी गला देने वाली सर्दी और आत्मा हिला देने वाली रेगिस्तानी आँधियों के बीच जान हथेली पर रखकर टैंक युद्ध की बारीकियों का अध्ययन किया था l उनकी प्रत्युत्पन्न बुद्धि ने उन्हें टैंक युद्ध में इतना दक्ष बना दिया था कि संसार में उनकी विशेषता का नक्कारा बज रहा है l
लीबिया का युद्ध एक निर्णायक युद्ध था , यदि मित्र - राष्ट्रों की सेना इसमें हार जाती तो हिटलरशाही के नीचे दबे यूरोप का कुछ और ही रूप होता l
जर्मन सेनापति जनरल रोमेल ने लीबिया पर पूर्ण अधिकार कर के उसे मिश्र से अलग करने के लिए दस गज चौड़ी कांटेदार तारों की एक बाड़ लगवा दी थी और इस विश्वास के साथ निश्चिंतता की चादर तान ली कि लीबिया की प्राण -लेवा ठण्ड में इन लौह कंटकों को पार कर कोई नहीं आएगा l 10 नवम्बर 1941 की प्रलयंकारी रात को जब लीबिया का रेगिस्तानी तापमान गौरीशंकर के तापमान को मात दे रहा था , हिम -हवाएं तीर की भांति शरीर में चुभ रहीं थीं , तब मित्र -सेना के सैनिक , इंजीनियर असह्य ठण्ड में अपनी आत्मा की शक्ति लगाकर उस लोहे की कंटीली बाड़ को काट रहे थे कठिन प्रयत्नों के बाद वह कटीली बाड़ बीस जगह से काट गिराई l मित्र राष्ट्र की सेनाओं के टैंक -दस्ते , बख्तर बंद गाड़ियों , मोटार्र का दल तोपों के साथ लीबिया में घुस गया l
इस अभियान में चौथी भारतीय डिवीजन के जवान और उनके नायक --जनरल चौधरी सबसे आगे थे l कई दिन लगातार रेतीली यात्रा पार कर के मित्र सेनाओं ने लीबिया में सिदी उमर के मैदान पर मोर्चा जमा लिया और जर्मन सेनापति रोमेल के आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगी l दूर समुद्र तट पर अपने शिविर में पड़े रोमेल को जब आक्रमण की सूचना मिली तो वह अपनी सेना के साथ तोपें दागता , गोले बरसाता, आग उगलता चला l उसकी तोपों के वार से टैंक टूटने लगे , जवान मर -मर कर गिरने लगे , अमरीकी लड़ाकों की हिम्मत पस्त कर दी गई l दूसरे दिन के युद्ध में भी रोमेल विजयी हुआ l ऐसा लगने लगा था कि मित्र सेना लीबिया के रेगिस्तान में दफ़न हो जाएगी किन्तु भारत के वीर जवानो और जनरल चौधरी ने हिम्मत नहीं हारी l वे एक संगठित अनुशासन में होकर बढ़े और तीसरे दिन के घमासान युद्ध में रोमेल के छक्के छुड़ा दिए l रोमेल भाग गया और मैदान मित्र - सेनाओं के हाथ रहा l
लीबिया की पराजय को विजय में बदलने वाले इन्ही जनरल जयन्त नाथ चौधरी ने पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध की कमान संभाली और तब जिस कौशल से जर्मन के अभेद्द टैंकों की मिटटी बनाई थी , उसी कौशल से भारत भूमि पर चढ़ कर आये अमेरिका के पैटर्न - टैंकों के टुकड़े - टुकड़े कर के फेंक दिया l
भारतीय सेनाध्यक्ष -' जनरल जयन्त नाथ चौधरी ' एक वीर अनुभवी और तपे हुए सेनानी थे l विश्व के माने हुए छह टैंक युद्ध महारथियों में उनका विशेष स्थान है l
द्वितीय महायुद्ध में जर्मन सेनापति रोमेल को हराने का जो श्रेय मित्र राष्ट्र -सेनाध्यक्ष अकिनलेक को मिला था , वह वास्तव में हमारे जनरल चौधरी और चौथी भारतीय डिवीजन के जवानो की उपलब्धि थी l जनरल चौधरी ने लीबिया के मरुस्थल की हड्डी गला देने वाली सर्दी और आत्मा हिला देने वाली रेगिस्तानी आँधियों के बीच जान हथेली पर रखकर टैंक युद्ध की बारीकियों का अध्ययन किया था l उनकी प्रत्युत्पन्न बुद्धि ने उन्हें टैंक युद्ध में इतना दक्ष बना दिया था कि संसार में उनकी विशेषता का नक्कारा बज रहा है l
लीबिया का युद्ध एक निर्णायक युद्ध था , यदि मित्र - राष्ट्रों की सेना इसमें हार जाती तो हिटलरशाही के नीचे दबे यूरोप का कुछ और ही रूप होता l
जर्मन सेनापति जनरल रोमेल ने लीबिया पर पूर्ण अधिकार कर के उसे मिश्र से अलग करने के लिए दस गज चौड़ी कांटेदार तारों की एक बाड़ लगवा दी थी और इस विश्वास के साथ निश्चिंतता की चादर तान ली कि लीबिया की प्राण -लेवा ठण्ड में इन लौह कंटकों को पार कर कोई नहीं आएगा l 10 नवम्बर 1941 की प्रलयंकारी रात को जब लीबिया का रेगिस्तानी तापमान गौरीशंकर के तापमान को मात दे रहा था , हिम -हवाएं तीर की भांति शरीर में चुभ रहीं थीं , तब मित्र -सेना के सैनिक , इंजीनियर असह्य ठण्ड में अपनी आत्मा की शक्ति लगाकर उस लोहे की कंटीली बाड़ को काट रहे थे कठिन प्रयत्नों के बाद वह कटीली बाड़ बीस जगह से काट गिराई l मित्र राष्ट्र की सेनाओं के टैंक -दस्ते , बख्तर बंद गाड़ियों , मोटार्र का दल तोपों के साथ लीबिया में घुस गया l
इस अभियान में चौथी भारतीय डिवीजन के जवान और उनके नायक --जनरल चौधरी सबसे आगे थे l कई दिन लगातार रेतीली यात्रा पार कर के मित्र सेनाओं ने लीबिया में सिदी उमर के मैदान पर मोर्चा जमा लिया और जर्मन सेनापति रोमेल के आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगी l दूर समुद्र तट पर अपने शिविर में पड़े रोमेल को जब आक्रमण की सूचना मिली तो वह अपनी सेना के साथ तोपें दागता , गोले बरसाता, आग उगलता चला l उसकी तोपों के वार से टैंक टूटने लगे , जवान मर -मर कर गिरने लगे , अमरीकी लड़ाकों की हिम्मत पस्त कर दी गई l दूसरे दिन के युद्ध में भी रोमेल विजयी हुआ l ऐसा लगने लगा था कि मित्र सेना लीबिया के रेगिस्तान में दफ़न हो जाएगी किन्तु भारत के वीर जवानो और जनरल चौधरी ने हिम्मत नहीं हारी l वे एक संगठित अनुशासन में होकर बढ़े और तीसरे दिन के घमासान युद्ध में रोमेल के छक्के छुड़ा दिए l रोमेल भाग गया और मैदान मित्र - सेनाओं के हाथ रहा l
लीबिया की पराजय को विजय में बदलने वाले इन्ही जनरल जयन्त नाथ चौधरी ने पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध की कमान संभाली और तब जिस कौशल से जर्मन के अभेद्द टैंकों की मिटटी बनाई थी , उसी कौशल से भारत भूमि पर चढ़ कर आये अमेरिका के पैटर्न - टैंकों के टुकड़े - टुकड़े कर के फेंक दिया l
13 July 2017
संत तुकाराम के संरक्षण में छत्रपति शिवाजी
शिवाजी के गुरु के समान थे संत तुकाराम l वे शिवा के ह्रदय में बसते थे l शिवा की भावनाओं में तुकाराम स्पंदित होते थे l भक्तों के बीच तुकाराम कह रहे थे ------ " शिवा इस राष्ट्र की धरोहर हैं l इनका होना हिंदुत्व और मानवता के लिए सबसे बड़ा वरदान है , क्योंकि वे इस राष्ट्र को भीषण संकट से बचा सकते हैं l उनके संरक्षण में वर्तमान मानवता जीवित रहकर विकास कर सकती है l शिवा इन आतताइयों से राष्ट्र को सुरक्षा प्रदान करेंगे l वे इस राष्ट्र के ज्वलंत प्रहरी हैं l "
बीस वर्ष की आयु से ही शिवाजी ने अनेक किले जीत लिए थे l उनके वीरता व साहस के किस्से सब की जुबान पर थे l आदिलशाह और औरंगजेब षड्यंत्र से शिवा को बन्दी बनाना चाह रहे थे औरंगजेब को अपने ख़ुफ़िया तंत्र से पता लग गया था कि आज शिवा सत्संग में अवश्य आयेंगे l
तुकाराम के माथे पर चिन्ता की रेखाएं उभर आईं थीं , पर अब चिंता से क्या लाभ ? शिवाजी उनके चरणों में निश्चिन्त और शांति से बैठे थे l तुकाराम और शिवाजी के बीच काफी देर तक वार्तालाप होता रहा l तुकाराम कह रहे थे ----- " शिवा ! भगवान द्वारा दी गई जिम्मेदारियों का अवश्य निर्वहन करना l सफलता और सार इसी में है कि दी गई जिम्मेदारियों का निर्वहन कितने अच्छे ढंग से किया गया l इन जिम्मेदारियों का बोझ तब भारी हो जाता है , जब हम सोचते हैं कि हम कर रहे हैं l अधिकारों के मिलने से अहंकार जाग जाता है , परन्तु जब यह सोच लिया जाये कि कर्ता तो कोई और है , हम तो यंत्र मात्र हैं , निमित मात्र हैं l इस सोच से हम चिंता और तनाव से मुक्त हो जाते हैं l जाओ ! तनाव मुक्त रहो और साक्षी भाव से राष्ट्र धर्म का पालन करो सभी लोग वहां से शिवा के सकुशल निकल जाने के लिए भगवान से प्रार्थना कर थे किन्तु खतरों से खेलने के आदी शिवा निश्चिन्त मन से सत्संग का श्रवण कर रहे थे l अचानक कुछ साधुओ ने संत तुकाराम का जय घोष करते हुए सत्संग - क्षेत्र में प्रवेश और इसी के साथ कुछ साधु चिमटा बजाते हुए और अभंग गाते हुए बाहर निकल गए l सैनिक पहरा ही देते रहे , और शिवा साधु वेश में कब के निकल चुके थे l
बीस वर्ष की आयु से ही शिवाजी ने अनेक किले जीत लिए थे l उनके वीरता व साहस के किस्से सब की जुबान पर थे l आदिलशाह और औरंगजेब षड्यंत्र से शिवा को बन्दी बनाना चाह रहे थे औरंगजेब को अपने ख़ुफ़िया तंत्र से पता लग गया था कि आज शिवा सत्संग में अवश्य आयेंगे l
तुकाराम के माथे पर चिन्ता की रेखाएं उभर आईं थीं , पर अब चिंता से क्या लाभ ? शिवाजी उनके चरणों में निश्चिन्त और शांति से बैठे थे l तुकाराम और शिवाजी के बीच काफी देर तक वार्तालाप होता रहा l तुकाराम कह रहे थे ----- " शिवा ! भगवान द्वारा दी गई जिम्मेदारियों का अवश्य निर्वहन करना l सफलता और सार इसी में है कि दी गई जिम्मेदारियों का निर्वहन कितने अच्छे ढंग से किया गया l इन जिम्मेदारियों का बोझ तब भारी हो जाता है , जब हम सोचते हैं कि हम कर रहे हैं l अधिकारों के मिलने से अहंकार जाग जाता है , परन्तु जब यह सोच लिया जाये कि कर्ता तो कोई और है , हम तो यंत्र मात्र हैं , निमित मात्र हैं l इस सोच से हम चिंता और तनाव से मुक्त हो जाते हैं l जाओ ! तनाव मुक्त रहो और साक्षी भाव से राष्ट्र धर्म का पालन करो सभी लोग वहां से शिवा के सकुशल निकल जाने के लिए भगवान से प्रार्थना कर थे किन्तु खतरों से खेलने के आदी शिवा निश्चिन्त मन से सत्संग का श्रवण कर रहे थे l अचानक कुछ साधुओ ने संत तुकाराम का जय घोष करते हुए सत्संग - क्षेत्र में प्रवेश और इसी के साथ कुछ साधु चिमटा बजाते हुए और अभंग गाते हुए बाहर निकल गए l सैनिक पहरा ही देते रहे , और शिवा साधु वेश में कब के निकल चुके थे l
12 July 2017
आध्यात्मिकता से भौतिक प्रगति
जमशेद जी टाटा लोहे की फैक्टरी लगाने की इजाजत मांगने के लिए इंग्लैंड गए हुए थे | क्वीन एलिजाबेथ से इजाजत मिली कि आप चाहें तो फैक्टरी लगा सकते हैं l अब वे इस तलाश में जुट गये कि लोहा , कोयला और पानी तीनो एक जगह मिल जाएँ तो बड़ी फैक्टरी लगा सकते हैं l जमशेद जी एक दिन स्वामी विवेकानन्द जी के पास पहुंचे और अपने मन की बात कही कि आप कृपा कर के हमें हिन्दुस्तान में ऐसी जगह बताइये जहाँ लोहा , कोयला और पानी तीनो एक जगह मिल जाएँ , लोहा होगा तो देश आगे बढ़ेगा l उस समय तक लोहे पर विदेशियों का आधिपत्य था l स्वामीजी ध्यान सिद्ध योगी थे l उन्होंने बताया ---- बिहार के सिंहभूमि जिले का एक छोटा सा गाँव है , उन दिनों वह वीरान जंगल था , पचासों मील की पथरीली और झाड़ियों वाली जगह में फैला हुआ था वहां कोई आदमी नहीं रहता था l विवेकानंदजी ने कहा कि आप उस इलाके को ले लें वहां पर तीनो चीजें मिल जाएँगी l जमशेद जी ने उस भूमि का पता लगाया और उसे खरीद लिया l आज भी वहां तीनो चीजें पर्याप्त मात्रा में हैं l
जमशेद जी ने अपने गुरु के नाम पर बेलूर मठ, संगमरमर का बनवाया l इसके लिए उन्होंने न चंदा लिया , न रसीदें छपवायीं l दान - दक्षिणा कुछ नहीं माँगा और हर दिन , हर महीने करोड़ों रूपये खर्च किये l उन्होंने सारे हिंदुस्तान में कितनी जल्दी और कितने सारे मठ बनवा दिए l
जमशेद जी ने अपने गुरु के नाम पर बेलूर मठ, संगमरमर का बनवाया l इसके लिए उन्होंने न चंदा लिया , न रसीदें छपवायीं l दान - दक्षिणा कुछ नहीं माँगा और हर दिन , हर महीने करोड़ों रूपये खर्च किये l उन्होंने सारे हिंदुस्तान में कितनी जल्दी और कितने सारे मठ बनवा दिए l
Subscribe to:
Posts (Atom)