24 December 2017

WISDOM -----

  दार्शनिक  च्वान्ग्त्से  को   रात्रि  के  समय  कब्रिस्तान  से  होकर  गुजरते  समय  पैर  में  ठोकर  लगी   l  टटोल  कर  देखा  तो   किसी  मुर्दे  की  खोपड़ी  थी   l  उठाकर  उनने  उसे  अपनी  झोली  में  रख  लिया   और  सदा  साथ  रखने  लगे   l  शिष्य  ने  इस  पर  उनसे  पूछा  -- यह  इतना  गन्दा  और  कुरूप  है  l  उसे  आप  साथ  क्यों  रखते  हो  ?  च्वान्ग्त्से  ने  उत्तर  दिया ---- ' यह  मेरे दिमाग  का  तनाव  दूर  करने  की  अच्छी  दवा    है  l  जब   अहंकार  का  आवेश  चढ़ता  है  ,  लालच  सताता है   तो  इस  खोपड़ी  को  गौर  से  देखता  हूँ   l  कल  परसों  अपनी  भी  ऐसी  ही  दुर्गति  होगी   तो  अहंकार  और  लालच  किसका  किया  जाये   ?
  वे  मृत्यु  का  स्मरण  रखने  ,  अनुचित  आवेशों  के  समय  का  उपयुक्त  उपचार  बताया  करते  थे   और  इसके  लिए  मुर्दे  की  खोपड़ी  का  ध्यान  करने  की  सलाह  दिया  करते  थे   और  वे  स्वयं  खोपड़ी  सदा  साथ  रखते  थे   l 

23 December 2017

WISDOM ----- अनीति , अनाचार ही सारी विपत्तियों का कारण है , सामूहिक शक्ति से इसे समूल नष्ट करें

  समाज  में  सज्जन  लोगों  की  कमी  नहीं  है   लेकिन  असुरता  बढ़ती  जा  रही  है   क्योंकि  अनीति ,  अत्याचार  का  विरोध - प्रतिरोध  करने  के  लिए   कोई  साहस  नहीं  दिखता  l  वेदों  में  कहा  गया  है --- ' हे  भगवन  ! आप  हमें '  मन्यु  ' प्रदान  करें  l  'मन्यु '  का  अर्थ  है  वह  क्रोध   जो  अनाचार के  विरोध  में  उमगता  है   l   इसमें  लोकमंगल  विरोधी   अनाचार  को   निरस्त  करने  का   विवेकपूर्ण  संकल्प  जुड़ा  होता  है   l   क्रोध  के  समतुल्य  दिखने  पर  भी  यह  ईश्वरीय  वरदान  है  l 

22 December 2017

WISDOM ----- ईश्वरीय न्याय में विश्वास होने पर ही व्यक्ति पाप कर्म से दूर रहेगा

  किये  गए  अच्छे  कर्मों  से   व्यक्ति  अपने  जीवन  में  पुण्यों  का  संचय  करता  है   और  बुरे  कर्मों  के  द्वारा  पाप  का   l   कर्मों  का  फल  तुरंत  नहीं  मिलता  , इसलिए  मनुष्य  को  अपने  किये  गए  कर्मों  का  कोई   एहसास  नही  होता  l  उसे   यही  लगता  है  कि  इतने  सारे  लोग  गलत  कार्य  कर  रहे  हैं   और  जीवन  में  सफल  हैं  , सुख  भोग  रहे  हैं   तो  वह  भी  क्यों  न  करे  ?  यह  मनुष्य   का  अज्ञान  ही  है   कि  वह  क्षणिक  लाभ  के  लिए   वर्तमान  में  बुरे  कर्म  करने  को  तैयार  हो  जाता  है   और  अच्छे  कर्मों  के  माध्यम  से   लाभ  कमाने  के  लिए  तैयार नहीं  होता   l
  कर्मफल  को  समझने के  लिए  हमें  व्यक्ति  के   पूरे   जीवन  को  देखना  चाहिए   जैसे  औरंगजेब   ने  सत्ता  हथियाने  के  लिए   अपने  भाइयों  की  हत्या  करवाई ,  अपने  पिता  को मरवाया   l   शासक  बना  . लेकिन   वह  अपने  जीवन  के  अंतिम  समय में    विक्षिप्त   होकर  मरा  l  अंतिम  समय  में  उसका  जीवन  इतना  कष्ट पूर्ण  था   जिसे  एक  पल  भी  सहन  करना  कठिन  था   l  यह  उसके  कर्मों  का  ही  परिणाम  था  l 

21 December 2017

WISDOM ------ तृष्णा का अंत नहीं होता

    आचार्य  शंकर  एक  गाँव  में   शिव  मंदिर  में  ठहरे  थे  l  उस  गाँव  के  एक  वृद्ध  सज्जन  उनसे  मिले  आये  l   आचार्य  ने   उनकी   ओर  देखा  --- झुकी  हुई  कमर ,  दंतविहीन  मुख ,  शरीर  भी  अति   कमजोर ,  फिर  भी  उन्होंने  अपने  कांपते   हाथों  में  एक   पुस्तक   पकड़ी  हुई  थी   l  उसने  कहा --- ' आचार्य  1  आप  परम  विद्वान  हैं  , मुझे  व्याकरण  का  ज्ञान  दें  l "  आचार्य  ने  कहा --- ' " इस  आयु  में   सीखने  की  इच्छा  प्रशंसनीय  है  l   परन्तु  यदि  आपको  ज्ञान  पाना  है  ---- '  वह  वृद्ध  कहने  लगा ---- "  मैं  व्याकरण  सीखूंगा , फिर  शास्त्रों  का  अध्ययन  करूँगा  l  पंडित ,  फिर  महा पंडित  बनूँगा  l    शास्त्रार्थ  में  विजेता  होने  पर  मेरा  सम्मान  होगा  l  लोग  मुझे  तर्क शिरोमणि ,  ज्ञानी वृद्ध ,  महा महोपाध्याय   कहेंगे  l '
   इस   कमजोर ,  कांपते  हुए  वृद्ध  की  मनोदशा  पर  आचार्य  को  करुणा  हो  आई  ,  साथ  ही  उनमे  रोष  भी  उभरा  l   उन्होंने  कहा --- "  इतनी  आयु  होने  पर  भी  तुम्हारी   महत्वाकांक्षा ,  तृष्णा  न  छूटी  l  ज्ञान  शब्दों  में  नहीं  ,  अहंकार  के  पोषण  में  नहीं   बल्कि  अहंकार  के  विनाश  में  है  l  काल  ने  तुम्हारी  आयु  को  समाप्त  कर  दिया ,  अब  मरण  समीप  आने  पर   यह  व्याकरण  काम  नहीं  आएगा   l  अब  तुम   गोविन्द  का  भजन  करो  l  भक्ति  से  ही  अहंकार  का  विनाश  होगा  l  "

20 December 2017

WISDOM ------ प्रतिकूलताओं में भी जीवन जीना सीखना चाहिए

  जीवन  के  इस  महासमर  में  तनाव  से  गुजरते  हुए   यदि  शांति  चाहिए   तो  ' गीता ' का  ज्ञान  जरुरी  है  l  संघर्ष  और  चुनौतियां  तो  जीवन  में  रहेंगी  ही  , इसलिए  प्रतिकूलताओं  में  जीवन  जीना  सीखना  चाहिए  l
  हमारे  जीवन  में  जो  परेशानियाँ  आती  हैं   उन्हें  गीता  ' अवसर '  का  नाम  देती  है  l  यही  अवसर   व्यक्ति  के  जीवन  को  ऊँचाइयों  तक   ले  जाता  है   और  इस  अवसर  के   चूक  जाने  पर   व्यक्ति  वहीँ  का  वहीँ   खड़ा  रह  जाता  है  l 
   गीता  हमें    असफलताओं  में   सफलता  का  मार्ग  दिखाती  है  ,  अवसाद  से  निकालने  का  कार्य  करती  है   और  हमारे  जीवन  संबंधों  को  भी  निखारती  है  l  हम  अपने  जीवन  में  किसी  भी  क्षण  उत्तेजित  व  दुःखी  न  हों  और  सदैव  ईश्वर  की  शरण  में  रहें  l  ईश्वर  की  शरण  का  मतलब  कर्महीन  होना  नहीं  है  l  हम  ईश्वरीय  व्यवस्था  को  समझें  ,  उस  पर  विश्वास  रखें  l   आंतरिक  रूप  से  शान्त  और   बाहरी  जीवन  में  क्रियाशील  बने ,  कर्मयोगी  बने  l   हमारी  सोच  सकारात्मक  हो  l  हर  कष्ट  और  परेशानी  में  ,  कहीं  न  कहीं  एक  सुख  छुपा  होता  है  ,  हम  उसी  सुख  की  अनुभूति  कर  मन  को  शांत  रखें  l  यह  सकारात्मक  सोच  ही   हमारे  जीवन  को  सफलता  की  ऊँचाइयों  पर  ले  जाएगी  l 

19 December 2017

WISDOM ------- ईश्वर कहाँ है ? ------ ----

  पुराणों  में  एक  कथा  आती  है ------ पहले  भगवन  सर्वत्र  सहज   सुलभ    थे  l  लोग  उनसे  मिलकर ,  अपनी  कष्ट - समस्याएं   सुनाकर  समाधान  पा  लेते  थे   l  लोग  निस्वार्थ  भाव  से  उनकी  छवि का   दर्शन  करते   और  अपने  जीवन  को  धन्य  बनाते  l   फिर  लोगों  में  स्वार्थ भाव  जगा , वासना , तृष्णा,  आवश्यकताएं  बढ़ती   गईं  l  पहले  भगवान को  भक्त   घेरे  रहते  थे  अब  स्वार्थी , लालची  और  मनोकामना  पूरी  कराने  वालों  की  भी  भीड़  बढती  गई  l
  भगवान  ने  अपने  सभासदों  से  पूछा  --- कोई  ऐसा  गुप्त  स्थान  बताएं  जहाँ  मैं   थोड़ी  देर  विश्राम  कर  लूँ   l"    कहीं  कोई  स्थान  नहीं  मिला ,  हर  जगह  मनुष्य  अपनी  कामनाएं  लेकर  पहुँच  जाता  है  l  अंत  में  नारद  जी  की  सलाह  पर    भगवान्  मनुष्य  के  ह्रदय  में  जा  छुपे  ,  जो  अत्यंत  पवित्र  और  कोलाहल रहित  है  l 
  लेकिन  अब  स्थिति  विकट   हो  गई   l  लोगों  के  ह्रदय  में  संवेदना  सूख  गई ,  ईर्ष्या - द्वेष ,  छल - कपट  से  ह्रदय  भी  मलिन  हो  गया  l   स्वार्थी   मनुष्य   ने   ईश्वर  के  रहने  का  शांत - सुन्दर, पवित्र    स्थान  भी  छीन  लिया   और  अब  उनके  लिए  चूने - मिटटी  का  घर  बनाने  के  लिए  लड़  रहे हैं ,  मरने - मारने  पर  उतारू  हैं  l   अब  भगवान    ढूंढ    रहे  हैं  --- सच्चे  इनसान  को    !  

18 December 2017

WISDOM ------- भौतिक प्रगति के साथ मनुष्यों ने जीवन - मूल्यों को नाकारा है इस कारण समस्याएं उत्पन्न हुई हैं

  बुद्धि  और  शक्ति  के  साथ  यदि  संवेदना  न  हो  तो   ऐसी  भावशून्यता   और  संवेदनहीनता   के  कारण समाज  में  आतंकवाद ,  दंगे , खून - खराबा  बढ़  जाता  है   l
  जब  व्यक्ति   स्वार्थ , अहंकार ,  ईर्ष्या - द्वेष   जैसे  दुर्गुणों   से  स्वयं  को  दूर  रखेगा   और  उस     के  भीतर  संवेदना  जागेगी  तभी  वह  प्राणिमात्र   के  कल्याण  की  बात  सोच सकता  है   l
  एक  प्रसंग  है ----- कौशाम्बी   के  राजगृह  में  कारू  कसूरी  नामक  कसाई  रहता  था  l  वह  पशुओं  का  मांस  बेचकर  अपनी  जीविका  चलाता  था  l  जब  राजगृह  में  बौद्ध  संत  आते  तो  वह  उनके  दर्शनों  को  जाता  था   l  संत  किसी  भी  प्रकार  की  हिंसा  न  करने  की  प्रेरणा  दिया  करते  थे  l  परन्तु  कारू  कसूरी  कहता  --- मैं  अपने  पुरखों  के  धंधे  को  कैसे  छोड़  दूँ   ?  यदि  मैं  हिंसा  न  करूँ  तो  खाऊंगा  क्या  ? '
   जब  कारू  कसाई  वृद्ध  हो  गया  तो  उसने  तलवार  अपने  बेटे  सुलस  को  सौंप  दी  l  कसाइयों  की  पंचायत  में  सुलस  से  कहा  गया  कि   कुलदेवी  की  प्रतिमा  के  समक्ष  भैंसे  की  बलि  दो  l 
 सुलस  का  ह्रदय   पशुओं  के  वध  के  समय  उनकी  छटपटाहट  देख  द्रवित  हो  उठता  था  l  अत:  उससे  तलवार  नहीं  उठी  l  मुखिया  ने  दुबारा  उससे  कहा  ---- " बेटे  !  यह  हमारे  कुल  की  परंपरा  है  ,  देवी  को  प्रसन्न  करने  के  लिए  खून  बहाना  पड़ता  है  l "  सुलस  ने  भैंसे  की  जगह  अपने  पैर  में  तलवार मार  ली   l  पूछने  पर  सुलास  बोला   ---- ' यदि  देवी  को  रक्त  की  चाहत  है  तो  किसी  निर्दोष  का  खून  बहाने  से  बेहतर  है  कि   वे  मेरा  ही  रक्त  स्वीकार  कर  लें  l '  सुलस  की  बात  सुनकर  कसाई  का  ह्रदय  द्रवित  हो  गया  और  उस  दिन  के  बाद  से   उस  कसाई  के  परिवार  में  पशुवध  बंद  कर  दिया  गया   l '
  यदि  मनुष्य  के  भीतर  करुणा,  दया ,  सेवा , प्रेम  जैसे  भाव  जाग्रत  हो  जाएँ  तो  आत्मीयता  और   अपनेपन  का  विस्तार  होता  है   l