29 January 2019

WISDOM ----- विचार कभी नष्ट नहीं होते

 मनुष्य  जीवन  तो  पानी  का  बुलबुला  है  l  वह  पैदा  भी  होता  है  और  मर  भी  जाता  है  l  किन्तु   शाश्वत  रहते  हैं  उसके  कर्म  और  विचार   l  मनुष्य  के  विचार  ही  उसका  वास्तविक  स्वरुप  होते  हैं   l  ये  विचार  ही  नए - नए  मस्तिष्क  में  घुसकर   ह्रदय  में  प्रभाव  जमाकर  मनुष्य  को  देवता  बना  देते  हैं   और  राक्षस  भी  l  जैसे  विचार  होंगे   , मनुष्य  वैसा  ही  बनता  जायेगा   l 
  चीन  में  कुंग  फुत्ज़  के  दो  सौ  वर्ष  पश्चात्  एक  राजा  ने  उनके  विचारों ,  उनकी  शिक्षाओं  को  नष्ट  करने  का  प्रयास  किया  l  उनकी  लिखी  पुस्तकें ,  उनके  उपदेश  व  शिक्षाओं  के  संग्रह  उसने  जला  दिए  l  जो  लोग  उनके  मतानुयायी  थे   और  प्रचार  करते  थे   उन्हें  उसने  मौत  के  घाट  उतार  दिया   l  फिर  भी  कुंग  फुत्ज़  के  विचार  मरे  नहीं  ,  वे  और   जीवंत   हो  उठे      l  उनके  उपदेश  लोगों  के  मन  में ,  मस्तिष्क  में  ,   ह्रदय   और    अंत: करण  में  उतरा  l  बाद  के  सम्राटों  ने  उन  विचारों  को  स्वीकारा   l  1912  तक  उनके  द्वारा  चलाया  गया  धर्म   चीन  का  राजधर्म  था  l  आज  भी  चीन  में  करोड़ों  व्यक्तियों  को  उनके  उपदेश  कंठस्थ  हैं  l  यह  है  विचारों  का  अमृतत्व  l  

28 January 2019

अकबर का मान - मर्दन करने वाली --- रानी दुर्गावती

 जिस  समय  सम्राट  अकबर  के  दबदबे  से  बड़े - बड़े  राजा  उसके  आधीन  हो  गए ,  उस  समय   नारी  होते  हुए  भी   एक  छोटे  से  राज्य  गढ़ मंडला  की  रानी  दुर्गावती  ने  दो  बार   दिल्ली  सम्राट  की  विशाल  सेना  को  पराजित  कर  पीछे  खदेड़  दिया  l 
  पति  दलपति शाह  की  मृत्यु  हो  जाने  पर  दुर्गावती  ने  राज्य  का  प्रबंधन  इतनी  योग्यता  व  कुशलता  से  किया  कि   राज्य  का  वैभव  बढ़ने  लगा  l  राज्य  की  समृद्धि  बढ़ने  लगी   और  रानी  दुर्गावती  का   यश  भी   चारों  और  फैलने  लगा   तो  उनसे  ईर्ष्या  करने  वाले  भी  पैदा  हो  गए  l 
  अगर कोई  पुरुष  शासक  ऐसी  उन्नति  करता  तो  संभवत:  लोगों  का  ध्यान  उस  तरफ  अधिक  आकर्षित  न  होता  ,  पर  एक  स्त्री  का  इतना  आगे  बढ़ना  और  अधिकांश  पुरुष  शासकों   के  लिए   उदाहरण  स्वरुप  बन  जाना  उनको  खटकने  लगा  l 
  आसफखां  की  गिनती  मुग़ल  साम्राज्य  के  प्रसिद्ध  सेनाध्यक्षों  में  होती  थी  l  मुग़ल  शासक  इस  वीरांगना  की  शक्ति  से  सशंकित  थे   l    प्रथम  बार  के  आक्रमण  में  रानी  दुर्गावती  से   बुरी  तरह  हार  कर   आसफ खां  बड़ा  दुःखी  हुआ  कि  एक  स्त्री  से  हार  कर  वह  अपना  मुंह  दुनिया  को  कैसे  दिखायेगा   l  उसने  इस  बात  को  अपने  लिए  बड़ा  अपमानजनक  समझा  l उसने  अपने  अधीनस्थ  अधिकारीयों  को  भी   बहुत  लानत - मलामत  दी  कि  तुम  एक  औरत  के   सामने  पीठ  दिखाकर  भाग  आये  और  फिर  भी  बहादुरी  का  दम  भरते  हो  l
अब  उसने  अपनी  सारी   बुद्धि  इसका  प्रतिकार  करने  की  युक्ति  सोचने  में  लगा  दी   l  l   

WISDOM ---- मानसिक दासता से अधिक हानिकारक और किसी भी तरह की दासता नहीं होती ------ लाला लाजपत राय

 लाला  लाजपत राय  एक  आदर्श  पुरुष  थे  ,  उन्होंने  अपने  आदर्शों  की  व्याख्या  करते  हुए   स्वयमेव  एक  स्थान  पर  कहा  है ---- " मेरा  मजहब  हकपरस्ती  है  l  मेरी  मिन्नत  कौम  परस्ती  है  l मेरी  इबादत  खलक  परस्ती  है  l  मेरी  अदालत  मेरा  अंत:करण  है  l  मेरी  जायदाद  मेरी  कलम  है   और  मेरा  मंदिर  मेरा  दिल  है   और  मेरी  उमंगें  सदा  जवान  हैं   l  " 
  जब  अक्तूबर  1928  में  साइमन  कमीशन  पुन:  भारत  आया  और  30 अक्तूबर  को  लाहौर  स्टेशन  पहुंचा   तब  लालाजी  ने  जनता  के  साथ  वहीँ  जाकर  उसका  बहिष्कार  किया  l  उन्होंने  अपने  ओजस्वी  भाषण  से  जनता  के  ह्रदय  में  जोश  भर  दिया  l  जनता  सुनती  और  ' साइमन  लौट  जाओ '  का  नारा  लगाती  l  जनता  के  उत्साह  और  लालाजी   की   द्रढ़ता  देखकर  कप्तान  सैंडर्स  से  न  रहा  गया  l  उसने  लालाजी  पर  लाठियां  चलाने  की  आज्ञा  दे  दी  l  जनता  में  भयानक  विक्षोभ  की  लहर  दौड़  गई  किन्तु  लालाजी  ने  उन्हें  शान्त  रहने  का  निर्देश   करते  हुए  कहा ---- "  आप  सब  लोग  शांतिपूर्वक  मेरे  ऊपर  होते  इस  अत्याचार  को  देखें   और  विश्वास  रखें  कि ---- मेरे  ऊपर  होने  वाली   लाठी  की  एक - एक  चोट   ब्रिटिश  साम्राज्य  के  कफन  की  एक - एक  कील  सिद्ध  होगी  l  "  जनता  शांत  सुनती  रही ,  लालाजी  बोलते  रहे  और  पुलिस  की  लाठी  चलती  रही  l  लाला  लाजपत राय  अपने  स्थान   तक  से  विचलित  न  हुए   और  तब  तक  बराबर  बोलते  और  लाठियां  खाते  रहे  जब  तक  उन्होंने  अपना  भाषण  पूरा  नहीं  कर  लिया  -----  धन्य  थे  पंजाब  केसरी  लाला  लाजपत राय  l  
  पुलिस  की  निर्दय   लाठियों  से  उनके  कलेजे  में  सांघातिक  चोट  आई ,  वे  चारपाई  पर  पड़  गए  तो  फिर  उठ  न  सके  ----
लाला  लाजपत  राय  ने   साहित्य   के  क्षेत्र  में  जो  योगदान  दिया  उससे  युवाओं  में   स्वाधीनता  के  लिए  जोश  जाग्रत  हुआ  l  उन्होंने   मेजिनी , गैरीबाल्डी ,  शिवाजी , कृष्ण ,  दयानंद   आदि  महापुरुषों  की  बहुत  सी  शिक्षाप्रद  जीवनियाँ  लिखीं  l  '  आर्य  समाज  और  भारत  का  राजनीतिक  भविष्य '  नामक  उनकी  पुस्तक  बड़ी  उपयोगी  सिद्ध  हुई   l  उनके  ' यंग  इंडिया  '  नामक  ग्रन्थ  ने  भारतीय  स्वतंत्रता  संग्राम  को  विशेष  गति  दी  और  उनके  ' दुःखी  भारत '  नामक  ग्रन्थ  का  तो  जनता  में  अभूतपूर्व  स्वागत  हुआ   l 
 लालाजी  का  जीवन  एक  सफल  और  सार्थक  व्यक्ति  का  जीवन  था  l  उनके  विषय  में  उनके  एक  जानकार  श्री  ऐलबिलव्काक्स  ने  लिखा  है  ----- " यौवन  ने  उन्हें  बहादुर ,  समय  ने  राजनीतिज्ञ,  प्रेम  ने  मनुष्य  घोषित  किया   l  मृत्यु  ने  उन्हें  शहादत  का  ताज  पहनाया  l  इस  प्रकार  वे  मंजिल  तय  करते  हुए  महानता  की  ओर  बढ़ते  गए  l  मानव - जीवन  में  संभव  सब  प्रकार  की  विभूति  और  यश  का   उन्होंने  अनुभव  किया   l  वे  एक  पवित्र  और  ऊँची  आत्मा  थे   l  "

27 January 2019

WISDOM ------

संसार  में  लोग   प्रत्यक्ष  शक्ति , प्रभाव  और  आर्थिक  सफलता  की  ही  पूजा  करते  रहे  हैं  ,  पर  मानवता  की  सच्ची  भावना  उससे  कहीं  अधिक  महत्वपूर्ण  है   l  आर्थिक  सफलता  छाया  की  तरह  अस्थायी  होती  है   और  राजनीतिक  सफलता  उससे  भी  अधिक  क्षण भंगुर   होती  है   l  राजनीति  एक  सामयिक   खेल  है   जिसकी  अधिक  प्रशंसा  उसी  समय  तक होती है   जब  तक  दर्शक  उसे   देखते  रहते  हैं  l  लेकिन  मानव -सेवा , परोपकार   कि  वृति,  दूसरे  के  लिए  आत्म त्याग  कि  भावना  आदि  ऐसे  गुण  हैं   जिनकी  जन समुदत  तत्काल  प्रशंसा  न  करे  ,  पर  इसकी  महत्ता  लोगों  के  दिल  में  घर  कर  जाती  हैं  और  धीरे - धीरे  बढती  हुई   पल्लवित , पुष्पित   और  फलदायक   होती  दिखलाई  पड़ती  है   l 

26 January 2019

WISDOM ------ इतिहास से शिक्षा लें -----

 पं. श्रीराम शर्मा  आचार्य  ने  वाड्मय -- ४४  में  पृष्ठ   1.2  पर  लिखा  है ---- ' सच  पूछा  जाये  तो  भारतवर्ष   की  पराधीनता  का  एक  बड़ा  कारण  यहाँ  के  शासक  वर्ग  का  झूठा  अहंकार   और   जांत - पांत  का  भेदभाव  ही  था  l  इससे  उनकी  एकता  नष्ट  हो  गई   और  वे  छोटे - छोटे  टुकड़ों  में  बंटकर  तीन - तेरह  हो  गए   l  उनकी  देखा - देखी  उनकी  प्रजा  में  भी  ऊँच - नीच  और  छोटी - बड़ी  जाति  का  विष  फैल  गया  और  समस्त  देश   एक  संगठित  शक्ति  होने  के  बजाय   छोटे - छोटे  भागों  में  विभाजित    लोगों  की  भीड़  की  तरह   हो  गया  l   ऐसी  दशा  देखकर   विदेशियों  का  आकर्षित  होना  स्वाभाविक  ही  था  l  वे  धर्म ,  आचार - विचार , वेश , भाषा   आदि  सब  द्रष्टियों  से  समान  थे   और  इस  आधार  पर  पूर्णत:  संगठित  थे   l  जब  उन्होंने  देखा  कि  भारतवर्ष  जैसा   सम्रद्ध   तथा  सब  प्रकार  के  साधनों  से  संपन्न  देश  ऐसे  असंगठित  और  आपस  में  फूट  रखने  वाले  लोगों  के  अधिकार  में  है   तो  उन्होंने  उसे  बलपूर्वक  छीन  लिया   l    यदि  ऐसा  न  होता  तो  कोई  कारण   न  था  कि   कुछ  हजार  आक्रमणकारी    करोड़ों  की  आबादी  वाले  देश  को     कुछ  वर्षों  में  पद - दलित  कर  के   यहाँ  अपना  शासन  स्थापित  कर  सकते   l   बिहार  के  कुछ  नगरों  के  लिए  तो  इतिहासकारों  ने  यहाँ  तक  लिखा  है  कि  बखित्यार  खिलजी  ने   केवल   अठारह   सवारों  को  लेकर  ही  कब्जा  कर  लिया  था  l  "  

25 January 2019

WISDOM -----

' देश - प्रेम , स्वतंत्रता  की रक्षा ,  संस्कृति  और  धर्म  के  क्षरण  को   रोकने  के  लिए  जिन - जिन महापुरुषों  और  क्रांतिकारियों  ने  बलिदान   दिए  हैं   वे  भले  ही  स्थूल  जीवन का  आनंद   न  ले  सके  हों  , पर  काल  पर  विजय  प्राप्त कर   महामानव   बनने  का  श्रेय  उन्हें  प्राप्त  होता  रहा  है  l 

WISDOM -----

 "  नन्ही  सी  चिंगारी  ! तुम  भला  मेरा  क्या  बिगाड़  सकती  हो  ,  देखती  नहीं  मेरा  आकार  ही  तुमसे  हजार  गुना  बड़ा  है  l  अभी  तुम्हारे  ऊपर  केवल  गिर पडूं  तो  तुम्हारे  अस्तित्व  का  पता भी  न लगे  l  "  तिनके  का  ढेर  अहंकार पूर्वक  बोला  l 
  चिनगारी  बोली  कुछ  नहीं  ,  चुपचाप  ढेर  के  समीप  जा  पहुंची  l  तिनके  उसकी  आंच  में  भस्म  होने  लगे  l   अग्नि   की   शक्ति  ज्यों - ज्यों  बढ़ी  ,  तिनके  जलकर  नष्ट  होते  गए  , देखते - देखते  भीषण  रूप  से  आग लग  गई  और  सारा  ढेर   राख    में  परिवर्तित  हो  गया  l
  यह  द्रश्य  देख  रहे  आचार्य  ने    अपने  शिष्यों  को  बताया  ---- " बालकों  ! जैसे  आग  की  एक  चिनगारी  ने   अपनी  प्रखर  शक्ति  से   तिनकों  का  ढेर  खाक  कर  दिया  l  वैसे  ही  तेजस्वी  और  क्रियाशील  एक  व्यक्ति  ही    सैकड़ों  बुरे  लोगों  से  संघर्ष  में    विजयी  हो  जाता  है   l  "